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ओपिनियन पोल के बदलते समीकरणों से क्या संकेत? बीजेपी को पहले बढ़त तो अब कांग्रेस से कांटे का मुकाबला

कांग्रेस ने उन्हीं जातियों से अपने सेनापति चुने जो जातियां बीजेपी का वोटबैंक रही हैं

Updated On: Dec 05, 2017 10:03 PM IST

Kinshuk Praval Kinshuk Praval

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ओपिनियन पोल के बदलते समीकरणों से क्या संकेत? बीजेपी को पहले बढ़त तो अब कांग्रेस से कांटे का मुकाबला

गुजरात चुनाव पर पूरे देश की नज़र है. पीएम मोदी के गृहराज्य में चुनाव हो रहा है. पहली दफे गुजरात की जनता के बीच मोदी किसी उम्मीदवार के रूप में नहीं हैं. वो यहां बीजेपी के लिये वोट मांग रहे हैं. गुजराती अस्मिता की बात कर रहे हैं तो गुजराती में जनता से संवाद भी कर रहे हैं. इसकी बड़ी वजह भी है कि अपने मैदान पर खेलने का दबाव हर बड़े खिलाड़ी पर होता है. खासतौर से ये दबाव तब और बढ़ जाता है जब वो खिलाड़ी दूसरे मैदानों पर ज़ोरदार रन बनाकर लगातार जीत रहा हो. यही स्थिति पीएम मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के साथ भी है. हालांकि दोनों आत्मविश्वास से लबरेज़ हैं. गुजरात में बीजेपी की जीत को सुनिश्चित मानते हैं. लेकिन गुजरात के चुनावी घमासान में हर दिन बदलते समीकरणों के चलते ये मैच रोमांचक होता जा रहा है.

एबीपी न्यूज-लोकनीति-सीएसडीएस का ओपिनियन पोल नज़दीकी मुकाबले का संकेत दे रहा है. एबीपी न्यूज-लोकनीति-सीएसडीएस के ओपिनियन पोल के मुताबिक गुजरात चुनाव में बीजेपी और कांग्रेस के बीच कांटे की टक्कर है. ओपिनियन पोल दोनों ही पार्टियों का वोट शेयर 43-43 प्रतिशत बता रहा है. वोट शेयर का बराबर होना बीजेपी के लिये चिंता का विषय है जो कि नए ओपनियन पोल में गिरा हुआ बताया जा रहा है. हालांकि ओपिनियन पोल बीजेपी की सरकार का दावा तो कर रहा है लेकिन कांग्रेस को भी उसने करीब ही रखा है. ऐसे में जरा सी भी बदली हुई हवा कई समीकरणों का उलटफेर कर सकती है. कांग्रेस सोच सकती है कि उसकी वापसी का वक्त आ गया है तो बीजेपी को सोचना पड़ सकता है कि चूक कहां हो रही है क्योंकि ओपिनियन पोल बीजेपी को 95 सीटें दिला रहा है तो कांग्रेस को 82 सीटें दिखा रहा है.

PM Modi in Surendranagar

एक महीने पहले तक गुजरात में बीजपी और कांग्रेस के बीच मुकाबला एकतरफा था.बड़ा सवाल ये है कि आखिर कुछ ही महीनों में सर्वे की सूरत कैसे बदल गई?  क्या वाकई गुजरात में धीरे धीरे सत्ता विरोधी लहर बनना तैयार हो रही है? या फिर पटेल आरक्षण के मुद्दे और दलित-ओबीसी वोटबैंक पर पकड़ ढीली होने की वजह से बीजेपी बैकफुट पर आ रही है?

22 साल से सत्ता का वनवास झेल रही कांग्रेस के लिये ओपिनियन पोल से सकारात्मक संकेत आ रहे हैं. कांग्रेस वहां से वापसी करती दिख रही है जहां उसके पास खोने के लिये कुछ नहीं था. बीजेपी के लिये चिंता वाली बात जातिगत समीकरणों से हो सकती है क्योंकि ओपिनियन पोल के मुताबिक दलित, आदिवासी और पटेल समुदाय का एक हिस्सा कांग्रेस का हाथ थामता दिखाई दे रहा है. अगर वाकई ऐसा है तो ये कांग्रेस के लिये बड़ी रणनीतिक कामयाबी है. कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने जिस तरह से गुजरात में युवाओं की त्रिमूर्ति को साधने की कोशिश की उसके नतीजे भले ही कांग्रेस के पक्ष में कम जाएं लेकिन बीजेपी के खिलाफ जरूर जा सकते हैं.

rahul gandhi

पटेल आरक्षण आंदोलन से उभरे हार्दिक पटेल ने बीजेपी के घोर विरोध में कांग्रेस को वोट देने की वकालत की है. उन्होंने तो ये तक नारा दिया है कि बीजेपी को वोट देने वाला पटेल नहीं कहलाएगा. हालांकि ओपिनियन पोल के ही सर्वे में हार्दिक पटेल की लोकप्रियता के ग्राफ में गिरावट भी दिखाई जा रही है. ओपिनियन पोल के मुताबिक जहां अक्टूबर में 64 प्रतिशत लोग हार्दिक पटेल के साथ थे वहीं अब पटेल समुदाय के 58 प्रतिशत लोग हार्दिक को समर्थन दे रहे हैं. फिर भी हार्दिक पटेल बीजेपी के वोटबैंक में सेंध तो लगा ही सकते हैं.

ओपिनयन पोल ने दलित और आदिवासी वोटरों को लेकर भी बड़ा बदलाव दिखाया गया है. साफ है कि जिग्नेश मेवाणी और अल्पेश ठाकोर का बीजेपी विरोधी प्रचार भले ही कांग्रेस को सत्ता में नहीं ला सके लेकिन बीजेपी के 22 साल पुराने वोटबैंक में डैमेज करने का संकेत दे रहा है. कांग्रेस की शुरुआत से ही आक्रमण की रणनीति साफ रही है और उसने इसके लिये उन्हीं जातियों से अपने सेनापति चुने जो बीजेपी को सत्ता का संग्राम जिताती रही हैं. ऐसे में हार्दिक पटेल, जिग्नेश मेवाणी और अल्पेश ठाकोर को कम आंकना बीजेपी की भूल साबित हो सकता है. वहीं दूसरी तरफ बीजेपी गुजरात में जाति समीकरण साधने में उतनी कामयाब नहीं हो पा रही जितना उसे यूपी में सोशल इंजीनियरिंग से फायदा मिला. ऐसे में तीन मुख्य समुदायों का कांग्रेस को समर्थन का ये दायरा बीजेपी के लिये अलार्म से कम नहीं है.

लेकिन इसके बावजूद बीजेपी के निराश होने की बड़ी वजह नहीं दिखाई देती है. बीजेपी के साथ सवर्ण और कोली वोटर पूरी तरह है तो वहीं कांटे के इस मुकाबले में आखिरी मौके पर बढ़त बनाने में बीजेपी माहिर भी है.

जीएसटी को लेकर कांग्रेस ने जरूर हवा बनाने की कोशिश की लेकिन ओपिनियन पोल के मुताबिक जीएसटी पर लोगों की राय बंटी हुई है. ओपिनियन पोल के मुताबिक जीएसटी से 44 प्रतिशत व्यापारी खुश नहीं है. वहीं 37 प्रतिशत व्यापारियों को जीएसटी के पक्ष में बताया गया है. ऐसे में गुजरात में जीएसटी ऐसा बड़ा मुद्दा नहीं दिखाई देता है जिससे बीजेपी के लिये चुनाव में मुसीबत खड़ी हो सके. लेकिन इसके बावजूद सीटों और वोट शेयर में गिरावट साल 2019 के लोकसभा चुनाव के लिये अच्छा संकेत नहीं है. भले ही बीजेपी की गुजरात में सरकार बनना तय हो लेकिन घटता वोट शेयर बीजेपी के 22 साल पुराने वोटबैंक में कांग्रेस की सेंध को तस्दीक करता है.

बहरहाल गुजरात चुनाव से न सिर्फ पीएम मोदी की साख जुड़ी हुई है बल्कि ये साल 2019 के चुनाव में भी बड़ी भूमिका निभाएगा. ऐसे में 18 दिसंबर को होने वाली मतगणना में भले ही नतीजे गुजरात के साथ हिमाचल प्रदेश के भी आएंगे लेकिन असल बात गुजरात के सरदार पर ही देश में होगी.

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