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गुजरात चुनाव 2017: नर्मदा के आदिवासी इलाकों में दम तोड़ता मेडिकल सिस्टम

आदिवासी बहुल इलाके में मतदाताओं का भरोसा जीतने के लिए सत्ताधारी पार्टी को स्वास्थ्य सुरक्षा की नीतियों के बेहतर क्रियान्वयन पर जोर देना होगा

Updated On: Dec 05, 2017 09:38 AM IST

Pallavi Rebbapragada Pallavi Rebbapragada

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गुजरात चुनाव 2017: नर्मदा के आदिवासी इलाकों में दम तोड़ता मेडिकल सिस्टम

जन्म हुआ नहीं कि मौत शुरू! कुछ को जिंदगी ऐसे ही मिला करती है. गुजरात के आदिवासी बहुल पूर्वी पट्टी में, जिसका विस्तार बनासकांठा जिले के अंबाजी से लेकर दक्षिण में डांग जिले के अहवा तक है, नेशनल हेल्थ मिशन ने ‘सिक्ल सेल ट्रेट’ के 9,00,000 मामले दर्ज किए हैं. मिशन के आंकड़ों के मुताबिक इस इलाके में सिक्ल सेल बीमारी के रोगियों की संख्या 70,000 है.

इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) के सर्वे के मुताबिक कोलचा, कोटवाडिया और कथोडी के आदिवासियों में सिक्ल सेल की बीमारी से पीड़ित 30 फीसदी बच्चे 14 साल की उम्र से पहले मर जाते हैं और बाकी हद से हद 50 साल की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते मौत के शिकार हो जाते हैं.

फ़र्स्टपोस्ट ने नर्मदा जिले में गहरी छानबीन कर के जानना चाहा कि आखिर सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था 89.12 लाख की आबादी के इस घातक रोग से किस तरह हिफाजत कर रही है. इलाके में एक छोटा सा कस्बा है राजपिपला. यह जगह उस सरदार सरोवर बांध से बस 30 किलोमीटर की दूरी पर है जहां सरदार पटेल की मूर्ति खंभों को फलांगती आकाश छूने को आतुर है. राजपिपला में डॉ. शंकर एक अस्पताल चलाते हैं. अस्पताल 20 बेड वाला है लेकिन राजपिपला में एक भी इंटेसिव केयर यूनिट (आईसीयू-सघन चिकित्सा कक्ष) नहीं है.

Sardar patel Idol

प्रसव के पहले से फेफड़े में खून के थक्का बनने की बीमारी लगी चली आ रही 

डॉ. शंकर ने बताया कि 'दरअसल पूरे नर्मदा जिले में एक भी आईसीयू नहीं है. मैंने सिक्ल सेल एनीमिया से कई मरीजों को मरते देखा है. पांच साल पहले मैं सिविल हास्पिटल में था तो वहां 20-30 साल की उम्र की 3 महिलाएं प्रसव के तुरंत बाद मर गईं. उन्हें प्रसव के पहले से फेफड़े में खून के थक्का बनने की बीमारी लगी चली आ रही थी. सिक्ल सेल एनीमिया की बीमारी से ग्रस्त लोगों में ऐसी जटलिता पैदा होने की आशंका होती है.'

डॉ. शंकर के मुताबिक आदिम जनजातियों (प्रिमीटिव ट्राइब) के अतिरिक्त यह बीमारी गुजरात के अन्य सभी प्रमुख आदिवासी समुदायों जैसे धोडिया, गवितस, चौधरी, हलपति, डुबला, कूकना, वरली तथा कोकनिस में पाई जाती है.

सिक्ल सेल बीमारी में खून में पाई जाने वाली लाल रक्त कोशिकाएं (आरबीसी) नष्ट हो जाती हैं. यह आनुवांशिक बीमारी है. मरीज में हीमोग्लोबीन के दो जीन असमान्य होते हैं. इनमें से एक जीन माता से मिला होता है तो एक जीन पिता से. इन जीन्स के कारण ही मरीज में हीमोग्लोबीन एस बनता है. ऐसी स्थिति में लाल रक्त कोशिकाओं का आकार हसिया या फिर नवचंद्र की तरह होता है और लाल रक्त कोशिकाएं मुड़कर तेजी से टूट जाती हैं. टूटने के कारण रक्तवाही नलिकाओं में खून का थक्का जमता है. जिन लोगों में एक जीन सिक्ल सेल पैदा करने वाला होता है और एक जीन सामान्य होता है उन्हें ‘सिक्ल सेल ट्रेट’ या फिर इस बीमारी के लक्षणों वाला माना जाता है. सिक्ल सेल ट्रेट की दशा जीवन के लिए घातक तो नहीं होती लेकिन ऐसे लक्षणों वाला व्यक्ति किसी दूसरे सिक्ल सेल ट्रेट वाले व्यक्ति से शादी करे तो आशंका होती है कि संतान को सिक्ल सेल एनीमिया की बीमारी लग जाएगी.

इस घातक बीमारी से निजात दिलाने में जापान की मदद मांगी थी

सिक्ल सेल एनीमिया के कारण मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक और पश्चिम बंगाल में भी आदिवासियों की जान जा रही है. साल 2014 में क्योटो विश्वविद्यालय के दौरे के वक्त प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस घातक बीमारी से निजात दिलाने में जापान की मदद मांगी थी.

उन्होंने इस मामले में शिना यमानाका से बात की. यमानाका को 2012 में मेडिसीन का नोबेल पुरस्कार मिला था. यमानका ने खोज की है कि प्रौढ़ कोशिकाओं को स्टेम सेल में बदला जा सकता है.

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नरेंद्र मोदी के गुजरात के मुख्यमंत्री रहते साल 2006 में दक्षिण गुजरात के 5 जिलों में निजी-सार्वजनिक भागीदारी (पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप) के आधार पर सिक्ल सेल एनीमिया कंट्रोल (एससीएसीपी) कार्यक्रम शुरू हुआ. और 2011 में अलग-अलग विभागों की कोशिशों को एक प्लेटफॉर्म पर लाने के लिए गुजरात सिक्ल सेल एनीमिया कंट्रोल सोसायटी बनाई गई. साल 2012 में एक पंचवर्षीय स्क्रीनिंग कैंपेन की शुरूआत हुई.

'स्क्रीनिंग कार्यक्रम का पांचवां साल चल रहा है लेकिन दिक्कत यह है कि सरकार इसमें मात्र रोग का पता लगाती है और फोलिक एसिड की गोलियां बांटकर आगे बढ़ जाती है. आदिवासी इलाके में सिक्ल सेल के तकरीबन 2000 मरीज बिना दवा के जिंदगी गुजार रहे हैं. हालत गंभीर होने पर ऐसी कोई सुविधा नहीं है जहां वो जाएं और उपचार कराएं'. फ़र्स्टपोस्ट को यह बात डॉ. प्रदीप गरासिया ने बताई. डॉ. गरासिया गुजरात में समस्त आदिवासी समाज के अध्यक्ष हैं और बीते दो दशक से सरकार के विभिन्न विभागों के बीच ऐसे मसले उठाते रहे हैं.

डॉ. गरासिया ने यह बात मानी कि महुआ तहसील के अनवल गांव में भी कोई आईसीयू नहीं है. उन्होंने जोर देकर कहा कि सेंट्रल लाइन ऑक्सीजन, इन्फ्यूजन पंप, ब्लड वॉर्मर्स, सीरिंज पंप और प्रशिक्षित मेडिकल अटेन्डेन्ट उपलब्ध होने चाहिए. डॉ. गरासिया ने कहा, 'फिलहाल इमर्जेंसी के मामले सूरत और वडोदरा और यहां तक कि अहमदाबाद के बड़े अस्पतालों में भेजे जाते हैं. जबकि अहमदाबाद अनवल से 320 किलोमीटर दूर है.'

सिक्ल सेल जागरुकता अभियान

डॉक्टर आदिवासी इलाके में सिक्ल सेल एनीमिया के मामलों पर ध्यान दें, इस मकसद से डॉ. डेक्स्टर पटेल ने 2013 में सिक्ल सेल अवेयरनेस मिशन शुरू किया. मिशन गुजरात के भरुच जिले में शुरू हुआ.

तकरीबन 200 डॉक्टर इस नेटवर्क में शामिल हैं. वो आदिवासी पट्टी के जिलों में नियमित अंतराल पर स्क्रीनिंग और अवेयरनेस कैंप लगाते हैं. इस समूह के साथ एक खास बात यह है कि इसमें शामिल डाक्टर और स्वास्थ्यकर्मी आदिवासी पट्टी के हैं. समस्या यह है कि सरकार इन लोगों से संपर्क नहीं साधती बल्कि बाहर की एजेंसियों को दौरे के लिए बुलाती है.

स्थानीय डॉक्टर पूछते हैं कि आखिर सरकारी मिशन में हमें क्यों नहीं जोड़ा जाता, कम से कम राय-सलाह वाली भूमिका के लिए हमें मिशन में जोड़ा जा सकता है. डॉ. डेक्स्टर पटेल ने बताया कि 'फिलहाल हमलोग एक छोटे से समाजसेवी समूह के रुप में काम कर रहे हैं. सिर्फ हमारे समूह में ही नहीं बल्कि चौधरी, डोधिया, गमित आदि आदिवासी समुदायों से भी डॉक्टर हैं. सरकार के स्क्रीनिंग कार्यक्रम के साथ दूसरी परेशानी यह है कि इसमें रिपोर्ट और रिपोर्ट के आधार पर नजर आने वाले नतीजों के बारे में मरीज को नहीं बताया जाता.'

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डॉ. पटेल ने बात को समझाते हुए कहा कि मरीजों को कार्ड दिए जाते हैं. जिनकी जांच निगेटिव आती है उन्हें सफेद कार्ड दिया जाता है. सिक्ल सेल ट्रेट वाले मरीजों को सफेद-पीला दोरंगा कार्ड दिया जाता है और सिक्ल सेल की बीमारी वाले मरीजों को पीले रंग का कार्ड. डॉ. पटेल का कहना है कि 'जो प्राइवेट एजेंसी सरकार के साथ इन परियोजनाओं पर काम कर रही हैं उन्हें चाहिए कि हरेक को कार्ड मुहैया कराएं क्योंकि जिन लोगों को रोग (सिक्ल सेल एनीमिया) है उन्हें सरकारी ब्लड बैंक से मुफ्त में खून हासिल करने का हक दिया गया है. अगर अपनी जेब से रकम खर्च करनी पड़े तो एक यूनिट खून के लिए उन्हें 800 से 1200 रुपए खर्च करने पड़ेंगे.'

गुजरात सरकार के आंकड़ों के मुताबिक इस कार्यक्रम के तहत 55,10,494 आदिवासियों की स्क्रीनिंग की गई है. इसमें 5,20,770 लोग सिक्ल सेल ट्रेट वाले हैं जबकि 29,584 लोगों को सिक्ल सेल की बीमारी है.

हीमोग्लोबिन इलेक्ट्रोफोरेसिस की जांच के लिए हर जिले में मशीनें होनी चाहिए

एक और समस्या की तरफ इशारा करते हुए उन्होंने कहा कि सॉफ्टवेयर टेस्टिंग लाइफ साइकिल (एसटीएलसी) की कमी है. डॉ. पटेल का कहना था कि 'नर्मदा और भरुच के सिविल अस्पताल में एसटीएलसी मशीन नहीं है. ऐसी मशीनें दूर-दराज के नवसारी, वलसाड और बारदोली में हैं'. डॉ. पटेल की सिफारिश थी कि हीमोग्लोबिन इलेक्ट्रोफोरेसिस जैसी अहम जांच के लिए हर जिले में मशीनें होनी चाहिए.

डॉ. पटेल ने कहा कि 'डेडियापाडा, सदबारा, राजपिपला (सरदार सरोवर बांध से एकदम नजदीक) जैसे गांवों में चले जाइए, आप देखेंगे कि सैकड़ों लोगों का जन्म इस बीमारी के साथ ही हुआ है. जबकि आदिवासी समुदाय के कुछ और लोगों को रिश्ते-नातेदारियों में शादी-ब्याह के कारण इस रोग ने अपनी चपेट में लिया है.'

उन्होंने कहा कि बड़े दुर्भाग्य की बात है कि पूरा आदिवासी समुदाय एक घातक रोग से जूझ रहा है जबकि इसके बारे में शहरी लोगों को होने वाली डेंगू और स्वाईन फ्लू जैसी बीमारियों की तुलना में आधी भी चर्चा नहीं होती. सिक्ल सेल अवेयरनेस कंपेन से जुड़े डॉक्टर बताते हैं कि इस बीमारी के चंगुल में फंसे लोगों की उम्र सीमा (लाइफ एक्सपेक्टेंसी) कुछ साल पहले तक 35 वर्ष थी और अब बढ़कर 40 साल हुई है. सिक्ल सेल एफ नवजात बच्चों की उम्र सीमा पर असर डालता है. 6 महीने की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते इस बीमारी के लक्षण दिखने लगते हैं.

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डॉ. सुरेश चौधरी व्यारा जिले में 15 बेड का एक अस्पताल चलाते हैं. उन्होंने कहा कि 'एक्यूट चेस्ट सिंड्रोम वाले मरीजों की मृत्यु-दर ज्यादा है. अगर ऐसे मरीज को समय रहते ऑक्सीजन नहीं दिया गया तो वह हायपोक्सिया में चला जाता है. हायपोक्सिया की स्थिति में मांसपेशियों में ऑक्सीजन की मात्रा कम हो जाती है. ऐसी स्थिति में लाल रक्त कोशिकाएं टूट जाती हैं. अगर ऐसे मरीजों को शुरूआती दौर में सहायक उपचार दिया जाए तो कइयों की जिंदगी बचाई जा सकती है.'

डॉ. चौधरी ने राज फाश करते हुए कहा कि सिक्ल सेल एनीमिया के तकरीबन 60 फीसदी मरीज व्यस्क होने से पहले ही मौत के शिकार हो जाते हैं- 'अकेले तापी जिले में, मैंने देखा है कि हर साल इस बीमारी से 10-15 लोगों की मौत होती है. मैंने ऐसे भी परिवार देखें में जिनमें 3 या 4 सदस्यों को यह बीमारी है.'

रोग की आशंका को आंकने की कोई तरकीब नहीं

नर्मदा जिले की डिस्ट्रिक्ट हेल्थ अफसर डॉ. किरण पटेल ने फ़र्स्टपोस्ट को बताया कि ऐसी कोई तरकीब मौजूद नहीं जिसके सहारे यह जाना जा सके कि किस समुदाय को स्किल सेल एनीमिया का रोग लगने की आशंका ज्यादा है. उनका कहना था कि 'गुजरात में कम से कम एक आईसीएमआर सेंटर होना चाहिए.'

उन्होंने अपनी बात को समझाते हुए कहा कि जो कुछ उपचार के सहारे रोका जा सकता है उसके बारे में डॉक्टर आपस में बहस कर सकते हैं लेकिन रोग के पैदा होने और उसे खत्म करने के बारे में जो दावे या अधपके निष्कर्ष कहे-सुनाए जाते हैं उनकी पुष्टि के लिए रिसर्च जरुरी है. यहां सबसे ज्यादा जरुरी है कि लोगों को लगातार सलाह-मशविरा दिया जाए. चूंकि शादी-ब्याह का मामला अटक जाने का डर होता है सो सिक्ल सेल एनीमिया के रोग की आशंका वाले परिवार खुलकर सामने नहीं आते. फिलहाल जिले में 12 काउंसेलर्स (परामर्श देने वाले) हैं और गर्भवती स्त्रियों के लिए एक फोकस ग्रुप है.

दूर-दराज के गांवों में राजसत्ता की मौजूदगी पुलिस चौकियों के रुप में दिखती है. प्रोफेसर प्रफुल्ल वसावा छोटूभाई वसावा की भारतीय ट्रायबल पार्टी (बीटीपी) के टिकट से वाघोलिया से चुनाव लड़ रहे हैं.

वसावा गुजरात यूनिवर्सिटी के पीएचडी हैं. उन्होंने पुलिसकर्मियों के मानसिक स्वास्थ्य और इस पेशे से जुड़े तनाव की स्थितियों पर अपना रिसर्च किया है. उन्होंने कहा कि 'पुलिस के हर महकमे में एक मनोवैज्ञानिक होना चाहिए. अगर पुलिस की छवि बदले और उसे सकारात्मक बदलाव करने वाला माना जाए तो लोग पुलिस से सहायता मांगने में हिचकिचाएंगे नहीं'. वासव ने यह भी कहा कि पुलिस एक बार राजनीतिक दबाव से मुक्त हो जाय तो वह समुदाय के विकास के कामों पर जोर लगाएगी.

मुख्यमंत्री अमृतम् योजना और इसके विस्तारित रुप मा वात्सल्य योजना आनंदी बेन पटेल के मुख्यमंत्री रहते चालू की गई. इस योजना के तहत गरीबी रेखा से नीचे के लोगों को मुफ्त उपचार की गारंटी दी गई है. इसके दायरे में उपचार से जुड़ी 544 प्रक्रियाएं शामिल हैं. लेकिन जब तक लाभार्थी को अपनी बीमारी के बारे में पता नहीं चलता वो उपलब्ध विकल्प की तलाश कैसे कर सकते हैं.

स्वास्थ्य सुरक्षा की नीतियों के बेहतर क्रियान्वयन पर जोर देना होगा

आदिवासी पट्टी में कांग्रेस को पिछली बार 27 में से 16 सीटें मिली थीं. इस इलाके में मतदाताओं का भरोसा जीतने के लिए सत्ताधारी पार्टी को स्वास्थ्य सुरक्षा की नीतियों के बेहतर क्रियान्वयन पर जोर देना होगा. गुजरात सरकार का लक्ष्य साल 2020 तक चिकित्सा की ऐसी स्थिति कायम करने की है कि हर नवजात शिशु स्किल सेल एनीमिया से मुक्त हो.

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