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गोधरा: यहां 15 वर्षों के बाद हिंदू भी परेशान हैं और मुस्लिम भी

मुस्लिमों के साथ-साथ इलाके के हिंदुओं की शादी में दिक्कत आती है, कोई भी गोधरा में नहीं रहना चाहता है

Updated On: Dec 03, 2017 04:00 PM IST

Pallavi Rebbapragada Pallavi Rebbapragada

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गोधरा: यहां 15 वर्षों के बाद हिंदू भी परेशान हैं और मुस्लिम भी

गोधरा वो जगह है जहां सरदार वल्लभ भाई पटेल महात्मा गांधी से पहली बार मिले थे. 1917 में उस मुलाकात के बाद पटेल ने देश की आजादी के आंदोलन में हिस्सा लेने का फैसला किया था. हालांकि गोधरा के उस इतिहास को आज कोई याद नहीं करता. आज गोधरा को 2002 की भयंकर हिंसा, लोगों की चीखों और आग की लपटों के लिए याद किया जाता है. इतिहास गोधरा में शर्मिंदा खड़ा है.

27 फरवरी, 2002 को अहमदाबाद जा रही साबरमती एक्सप्रेस गोधरा स्टेशन पर रुकी थी. जब ट्रेन गोधरा से रवाना होने लगी, तो किसी ने ट्रेन की चेन खींचकर उसे रोक लिया. इसके बाद भीड़ ने ट्रेन के डिब्बों पर हमला बोल दिया. इस हिंसा और आगजनी में 59 लोग मारे गए. कहा जाता है कि मारे गए लोग कारसेवक-रामसेवक थे. ये सभी लोग अयोध्या से लौट रहे थे. इस घटना के बाद समूचे गुजरात में दंगे भड़क उठे. दंगों के 15 साल बाद और गुजरात चुनाव से कुछ दिन पहले फ़र्स्टपोस्ट की टीम ने गोधरा का दौरा किया.

गोधरा की रहने वाली मदीना शेख पूछती हैं कि 'पास्ट तो चला गया. अब फ्यूचर क्यों खराब करने का'. मदीना के परिवार के 13 सदस्य साल 2002 के दंगों में मारे गए थे. उस वक्त मदीना की उम्र 30 के आस-पास थी. दंगों के बाद उनके पास बचा था तो सिर्फ जला हुआ घर. और इस बात की याद कि किस तरह उनके पति को मार डाला गया था. किस तरह उनके बच्चे जान बचाने के लिए उनसे चिपके हुए थे. इसके बाद पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का जमावड़ा लगने लगा. सियासी दलों के नेताओं की आवाजाही भी बढ़ी. हर कोई ये कह रहा था कि वो सच का पता लगाना चाहता है. सबने मदीना की जिंदगी को एक केस स्टडी में तब्दील कर दिया था. वो एक नागरिक को बचाने में राज्य सरकार की नाकामी की मिसाल बना दी गईं.

अगली पीढ़ी की मुश्किलें

उस घटना के बाद के कुछ साल तक मदीना इस आस में दंगों की बातें बताती थीं कि शायद कोई पैसे से उनकी मदद कर दे. अब वो कासिमाबाद में अपने बड़े हो चुके बेटों के परिवार और अपनी बेटियों के साथ रहती हैं. उनके आस-पास 150 और दंगा पीड़ित रहते हैं. ये बस्ती गोधरा के बाहर आबाद है. मदीना छोटे-मोटे काम कर के अपना और अपनी दो बेटियों अकीला और शकीला का पेट पालती हैं. दोनों जुड़वां हैं. उनकी उम्र 21 साल है. मदीना की बेटियों ने शेठ पीटी आर्ट्स् ऐंड साइंस कॉलेज से बीएससी की पढ़ाई की है. एक ने केमिस्ट्री और दूसरे ने माइक्रोबायोलॉजी में डिग्री ली है. इन दिनों वो स्थानीय दवा कंपनी में काम कर रही हैं. शकीला कहती हैं, 'हमारे लिए पढ़ाई करना आसान नहीं था. तालीम में भेदभाव कम किया जाना चाहिए. हमारी मां ने हमें हमारे पांव पर खड़े होने के लिए बहुत मेहनत की.'

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जब अकीला और शकीला 17 बरस की थीं, तो उन्होंने प्रोफेसर जे एस बंदूकवाला से मुलाकात की थी. उन्होंने प्रोफेसर बंदूकवाला से आगे की पढ़ाई के लिए मदद मांगी. उन्हें छह महीने तक 1300 रुपयों और किताबों की जरूरत थी. बंदूकवाला वडोदरा की एम एस यूनिवर्सिटी में फिजिक्स के प्रोफेसर रहे थे. उन्होंने 2006 में जिदनी इल्म ट्रस्ट की स्थापना की. ये ट्रस्ट अच्छे छात्रों को पढ़ाई में मदद करता है. ताकि वो मेडिकल, इंजीनियरिंग, साइंस एंड टेक्नोलॉजी के अलावा मैनेजमेंट की पढ़ाई कर सकें.

प्रोफेसर बंदूकवाला बताते हैं कि इस साल उन्हेंने 62 लाख रुपए जुटाए और 474 छात्रों की मदद की. इनमें से 170 लड़कियां थीं. प्रोफेसर बंदूकवाला कहते हैं कि बच्चों को पढ़ाई में मदद करना राजनीति से बेहतर है. प्रोफेसर बंदूकवाला के घर पर चार बार हमले हो चुके हैं. मगर वो भी जिद पर हैं कि हिंदू बहुल इलाके में ही रहेंगे. जबकि वो शहर के जाने-माने मुस्लिम चेहरे हैं.

एम के चिश्ती गुजरात सरकार के अल्पसंख्यक वित्त और विकास निगम के अध्यक्ष हैं. उन्होंने बताया कि केंद्र सरकार के अल्पसंख्यक मंत्रालय की मदद से मैट्रिक से नीचे की पढ़ाई करने वाले छात्रों को वजीफे देने की योजना 2007-2008 में ही लागू होनी थी. मगर आखिर में गुजरात में ये योजना 2013-14 में लागू की जा सकी. इस योजना के तहत पहली से दसवीं कक्षा तक पढ़ाई कर रहे अल्पसंख्यक समुदाय के छात्रों को 500 रुपए एडमिशन के लिए दिए जाते हैं. इसके अलावा उन्हें पढ़ाई की फीस के लिए 3500 रुपए और 1000 से 6000 रुपए तक की मदद गुजारे के लिए की जाती है. इस मदद को हासिल करने वाले बच्चे के मां-बाप की सालाना आमदनी एक लाख रुपए से कम होनी चाहिए.

कम नहीं हैं मुस्लिम बस्तियों की मुश्किलें

फिरोज खां पठान गोधरा के नवरचना स्कूल के प्रिंसिपल इन चार्ज हैं. इस स्कूल के ज्यादातर छात्र मुस्लिम हैं. वो कहते हैं कि योजना में कोई खामी नहीं. लेकिन दिक्कत ये है कि ज्यादातर मां-बाप अनपढ़ हैं. अब इस योजना के लिए एप्लिकेशन फॉर्म 2015 से ऑनलाइन कर दिया गया है. अब आधार कार्ड और बैंक खाता भी अनिवार्य कर दिया गया है. ऐसे में किसी छात्र से जुड़ी जानकारी में जरा सी गड़बड़ी भी छात्र को योजना का फायदा लेने से रोक देती है. पठान कहते हैं कि कई मां-बाप तो अपने दस्तखत तक नहीं कर पाते. इन्हें योजना का फायदा नहीं मिल पाता.

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पठान कहते हैं कि आज की तारीख में भी मुस्लिम बस्तियों में अंग्रेजी स्कूल बमुश्किल मिलते हैं. ज्यादातर मुसलमान आस-पास ही रहते हैं. अगर कोई अफसर बन गया तो अलग बात है. प्रोफेसर बंदूकवाला कहते हैं कि सांप्रदायिक माहौल के चलते ही आज मुस्लिम बेहद घनी बस्तियों में एक-दूसरे के आस-पास रहते हैं. फिर चाहे वो राजकोट हो, अहमदाबाद या सूरत. पठान बताते हैं कि वडोदरा के तंडलाजा में 50 हजार मुसलमान रहते हैं. क्रिकेट के मशहूर पठान बंधु भी वहीं रहते हैं. पठान कहते हैं कि आलीशान इमारतों से घिरी बस्तियों के बीच ऐसे घर भी हैं जहां लोग थोड़ी सी जगह में जिंदगी बसर करते हैं.

प्रोफेसर बंदूकवाला कहते हैं कि 'हिंदुओं और मुसलमानों को साथ-साथ रहना शुरू करना चाहिए. वरना हमारा देश मंडेला के पहले का दक्षिण अफ्रीका और मार्टिन लूथर किंग के पहले का अमेरिका बन जाएगा. मैंने सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की कीमत चुकाई है. मेरे घर पर चार बार हमला हो चुका है. 2002 में हुए आखिरी हमले में मुझे जान से मारने का इरादा था'. प्रोफेसर बंदूकवाला की बेटी एक हिंदू से ब्याही हुई हैं. दोनों अच्छी शादीशुदा जिंदगी जी रहे हैं. प्रोफेसर बंदूकवाला कहते हैं कि 'मेरे छात्र मेरा बहुत सम्मान करते हैं. लेकिन अगर में प्रोफेसर होने के बजाय कोई आम मुसलमान होता, तो शायद वो मुझे मारते'. प्रोफेसर बंदूकवाला कहते हैं कि अलग-अलग रहने की वजह से ही हिंदुओं और मुसलमानों में दूरी बहुत बढ़ गई है.

गोधरा में भी बहुत से इलाके हैं, जहां हिंदू और मुसलमान अलग-अलग रहते हैं. जैसे कि सातपुल बाजार, पोलन बाजार और रानी मस्जिद के इलाके. यहां पर 52 फीसदी मुसलमान हैं, जो बस्तियों के पश्चिम में रहते हैं. वहीं हिंदू इनके पूर्वी हिस्से में. युवा कारोबारी मोहसिन पटेल कहते हैं कि इससे वो महफूज महसूस करते हैं. मोहसिन ने बताया कि उनके एक ईसाई दोस्त की शादी का प्रस्ताव करीब 50 लड़कियां ठुकरा चुकी हैं. कोई भी गोधरा में नहीं रहना चाहता. मुस्लिम अपने परिवार में ही शादियां करते हैं. लेकिन हिंदुओं की शादी में दिक्कत आती है. गोधरा का नाम सुनकर कोई शादी नहीं करना चाहता. दो साल पहले जनरल मोटर्स ने हालोल का अपना प्लांट बंद किया, हालोल गोधरा से 50 मिनट की दूरी पर है. फैक्ट्री बंद होने से ज्यादातर लोग बेरोजगार हो गए.

मोहसिन कहते हैं कि जीएसटी की वजह से छोटे कारोबार भी बंद हो रहे हैं. वो कहते हैं कि अशिक्षा के चलते लोग जीएसटी की तकनीकी पेचीदगियां नहीं समझ पाते हैं.

हमने गोधरा में कुछ कामकाजी युवाओं से भी बात की. इमरान नाम के युवा का कहना था कि जीएसटी का उसके लकड़ी के धंधे पर बहुत बुरा असर हुआ है. आज वो 50 या 100 रुपए दिन भर में बमुश्किल कमा पाता है. लकड़ी के ढेर के पीछे उसका डांडिया बनाने का कारखाना छुपा हुआ था. यहां पर युवा कारीगर दिन भर मेहनत कर के डांडिया बनाते हैं. हर डांडिया पर 50 पैसे का मुनाफा होता है. फैजान नाम का एक किशोर इस कारखाने में दोपहर से रात तक काम करता है. उसे हफ्ते भर का मेहनताना 250 रुपए मिलता है. वो कहता है कि उसे अक्सर इस बात का ख्याल आता है कि क्या उसकी उम्र काम करने की है?

लकड़ी के धंधे पर जीएसटी की बुरी मार पड़ी है. फोटो- पल्लवी रेब्बाप्रगडा

लकड़ी के धंधे पर जीएसटी की बुरी मार पड़ी है. फोटो- पल्लवी रेब्बाप्रगडा

काजमी अशफाक एमए की पढ़ाई कर रहा है. वो बाइक के मेकैनिक का काम भी करता है ताकि अपनी पढ़ाई का खर्च उठा सके. पिछले साल तक काजमी की कॉलेज की फीस 2000 रुपए थी. अब ये 5000 हो गई है. एक किताब 120 रुपए की आती है. ऐसी सात किताबें उसे खरीदनी पड़ती हैं.

गोधरा के सिख युवा श्रवण सिंह ओंकार सिंह राठौड़ कहते हैं कि गोधरा में सबसे बड़ी समस्या रोजगार की है. वो कहते हैं कि गोधरा में कोई निवेश नहीं करना चाहता. इसी वजह से युवा छोटे-मोटे काम करने को मजबूर हैं.

क्या कहते हैं आंकड़े

नेशनल स्किल डेवलपमेंट को-ऑपरेशन के मुताबिक गुजरात के पंचमहाल जिले के गोधरा, शेहेरा, लूनावड़ा और संतरामपुर में विकास की काफी संभावनाएं हैं. लेकिन यहां शिक्षा का स्तर काफी नीचे है. 2011 के आंकड़ों के मुताबिक जिले में साक्षरता का प्रतिशत 72.32 है. जबकि पूरे राज्य का औसत 79.31 फीसदी है.

इस रिपोर्ट के मुताबिक पूरी जनसंख्या में आरक्षण वाली आबादी की तादाद 32.02 फीसदी है. यानी इस इलाके के विकास पर और जोर देने की जरूरत है. संतरामपुर आर्ट्स कॉलेज के रिटायर्ड प्रोफेसर खांडूभाई परमार 28 साल पढ़ाने के बाद अब गोधरा में रहते हैं. वो खुद को दलित समाज का बताते हैं. प्रोफेसर परमार कहते हैं कि 'अफसोस की बात है कि गोधरा में हिंदू-मुसलमान के बीच अमन की बात तो होती है. मगर वाल्मीकि समाज की बात कोई नहीं करता. यहां पर बहुत से सफाई कर्मचारी और मैला ढोने वाले रहते हैं. उन्हें रोज की कमाई के लिए भी काफी मेहनत करनी पड़ती है. नगर पालिका ने उनका मेहनताना तक तय नहीं किया है. दलितों के खिलाफ हिंसा भी बढ़ रही है.'

प्रोफेसर परमार बताते हैं कि पिछले साल 20 साल के लड़के को अगवा कर के उसे बुरी तरह पीटा गया था. आरोप है कि ये काम मुस्लिम युवाओं ने किया था. मामला एक लड़की से प्रेम संबंध का था. पहले इस युवा को इलाज के लिए गोधरा के सिविल अस्पताल भेजा गया. फिर उसे वडोदरा के एसएसजी अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा था.

गोधरा में एक जनरल अस्पताल है. इसमें एक आईसीयू भी नहीं है. इसकी वजह ये है कि अस्पताल के पास काबिल कर्मचारी नहीं हैं. गोधरा में अपना अस्पताल चलाने वाली डॉक्टर शुजात वली कहती हैं कि गोधरा में बुलाने पर इलाज के लिए आने वाला एक ही मान्यता प्राप्त डॉक्टर है. डॉक्टर वली कहती हैं कि 'सरकारी अस्पताल मे 500 से ज्यादा मरीज हैं. गोधरा में तो लूनावड़ा और संतरामपुर से भी गर्भवती महिलाएं इलाज के लिए आती हैं. वो बताती हैं कि यहां अक्सर खून की कमी से मौत होती है. यानी गोधरा की हर मौत दंगों के खाते में दर्ज करना गलत है. बहुत से लोग सिस्टम की वजह से भी बेमौत मरते हैं.

इस सरकारी अस्पताल की सीढ़ियां चढ़ते हुए भी डर लगता है. फोटो- पल्लवी रेबाप्रगडा

इस सरकारी अस्पताल की सीढ़ियां चढ़ते हुए भी डर लगता है. (फोटो: पल्लवी रेब्बाप्रगडा)

दंगों के बाद गोधरा में शांति बहाली के लिए कई कदम उठाए गए हैं. गोधरा जमात के इशाक भाई कहते हैं कि बहुत से लोग बड़े उत्साह से गणपति उत्सव में शामिल होते हैं. वो इसे साल के सबसे बड़े त्योहारों में से एक बताते हैं. इसमें समाज के हर समुदाय के लोग शामिल होते हैं. इशाक भाई बताते हैं कि गणपति की मूर्ति की झांकी बहुत उत्साह से निकाली जाती है. पूरे रास्ते का करीब दो किलोमीटर लंबा हिस्सा मुस्लिम बहुल इलाके से गुजरता है. गोधरा के एसपी राजेंद्र सिंह चूड़ासमा बताते हैं कि हर इलाके से लोगों को लेकर शांति कमेटियां बनाई जाती हैं. इनके अलावा 50 आम लोग भी पुलिस के लिए काम करते हैं. पुलिस तमाम इलाकों में जागरूकता के लिए कैंप भी लगाती है. वजह ये है कि गोधरा मे कभी भी हिंसा भड़कने की आशंका रहती है.

सांप्रदायिक हिंसा से तो यहां सख्ती से निपटा जाता है. मगर धार्मिक भेदभाव पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता. कई जगह अशांत धारा एक्ट का इस्तेमाल खास समुदाय को निशाना बनाने के लिए होता है. महफूज पटेल बताते हैं कि उन्होंने एक जैन परिवार से जमीन खरीदी थी. उन्हें ये जमीन उस परिवार को वापस बेचनी पड़ी. वो बताते हैं कि जमीन जिस इलाके में थी उसके लिए सरकार की तरफ से अशांत धारा सर्टिफिकेट दिया गया था, जो बाद में वापस ले लिया गया. महफूज पटेल कहते हैं कि हिंदुओं से संपत्ति खरीदना मुसलमानों के लिए बहुत बड़ी चुनौती है. महफूज को इस सौदे की वजह से काफी नुकसान उठाना पड़ा था.

कर्फ्यू के बाद लोगों को अपनी रोजी-रोटी के लिए घरों की कैद से बाहर आना ही पड़ता है. उन्हें अपने बच्चों की ऐसी परवरिश करने की जरूरत होती है ताकि वो दुनिया की बुराइयों से दूर रहें. गोधरा चाहता है कि यहां उद्योग धंधे लगें. युवाओं को रोजगार मिले. यहां के लोग अपनी सेहत की बेहतरी के लिए और अच्छी सुविधाएं चाहते हैं. वो चाहते हैं कि उनकी बेटियां बच्चों की डिलिवरी के वक्त मौत की शिकार न हों. गोधरा के दलितों को भी सम्मान से जीने का हक है.

आज गोधरा हिंदू-मुसलमान की बात नहीं करना चाहता. वो अपनी इस पहचान से निजात चाहता है. गोधरा आज गोधरा को भूल जाना चाहता है.

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