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जाति के आगे जीत है: यूपी-बिहार की तरह गुजरात की सियासत में 'जाति का जंजाल'

चुनावी गणित से जातियों को साधने की सियासी साधना पर 'सियाराम' का नारा सम्मोहन से कम नहीं होता है. लेकिन अब ये ही जातियां सत्ता के लिये गोलबंद हो चुकी हैं.

Kinshuk Praval Kinshuk Praval Updated On: Nov 29, 2017 02:44 PM IST

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जाति के आगे जीत है: यूपी-बिहार की तरह गुजरात की सियासत में 'जाति का जंजाल'

देश के चुनावों में भले ही मुद्दों की हवा बनाई जाती है लेकिन असली राजनीतिक भूमिका जातियां ही निभाती आई हैं. बिहार के चुनावों में लालू प्रसाद यादव की राष्ट्रीय जनता दल और नीतीश कुमार की जेडीयू जाति की सवारी कर सत्ता तक पहुंची तो यूपी में भी जातिगत समीकरणों के एडवांस्ड वर्ज़न सोशल इंजीनियरिंग ने बीजेपी को ऐतिहासिक सत्ता दिलाई.

यही जाति की राजनीति का वायरस पूरे देश में किसी न किसी नाम से पॉलिटिकल वोटबैंक में चुनावों के लिये सुरक्षित सहेज कर रख लिया जाता है. इस बार गुजरात विधानसभा चुनाव में भी बीजेपी के विकास के दावों के उलट जातियों का ही जोर दिखाई दे रहा है. गुजरात देश के सबसे विकसित राज्यों में शुमार करता है. पीएम मोदी ने गुजरात के विकास को ही लोकसभा चुनाव का ब्रांड बनाया था. याद कीजिए तत्कालीन पीएम उम्मीदवार ने जब यूपी की एक रैली में कहा था कि ‘यूपी में बिजली आना खबर होता है जबकि गुजरात में बिजली जाना’.

उसी विकसित गुजरात में अब विकास को पागल बताकर जातियों की जंग छिड़ी हुई है. जाति की राजनीति में पिछले 22 सालों में ऐसा शून्य गहराया कि 22 साल पहले जन्मे युवा विकास की बजाए जाति को ही अपना राजनीतिक हथियार बना चुके हैं. जिस तरह बिहार में यादवों, यूपी में जाटों, राजस्थान में मीणा की बड़ी भूमिका है उसी तरह गुजरात में पटेलों का वर्चस्व है. 1995 के बाद से गुजरात में बीजेपी के पूर्ण बहुमत के पीछे 15 फीसदी पटेल समुदाय का ‘विजयी भव:’ आशीर्वाद रहा है.

लेकिन दूसरी जातियों ने भी बदलते दौर के साथ अपना मसीहा चुनने में देर नहीं की. हिंदुत्व की धारा को कांशीराम ने बहुजन समाज के ब्रहास्त्र से ऐसा मोड़ा था कि यूपी में दलित वोटरों ने मायावती को देवी बना दिया. अब गुजरात में जिग्नेश मेवाणी और अल्पेश ठाकोर खुद को दलित और ओबीसी के मसीहा के तौर पर दावा कर रहे हैं.

alpesh thakor

राहुल गांधी के साथ दलित नेता अल्पेश ठाकोर

दलित और ओबीसी वोटबेस को समझने की कोशिश नहीं की

जिग्नेश मेवाणी ने बनासकांठा से निर्दलीय पर्चा भरा है. जिग्नेश ने एलान किया है कि बीजेपी को छोड़कर सब उन्हें वोट देंगे. बड़ा सवाल उठता है कि आखिर जिस गुजरात में पिछले 22 साल से बीजेपी की सत्ता है वहां अचानक दलितों में बीजेपी के प्रति आक्रोश कैसे पैदा हो गया? क्या बीजेपी अतिआत्मविश्वास का शिकार है या फिर उसने ध्रुवीकरण की राजनीति के चलते दलित और ओबीसी वोटबेस को समझने की कोशिश नहीं की. हालांकि खुद पीएम मोदी ने जब ये एलान किया कि वो पिछड़ी जाति से आते हैं तो इसका संदेश ओबीसी में काफी गहरे तक गया. यहां तक कि गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए नरेंद्र मोदी ने पिछड़े वर्ग को साथ लेकर चलने का काम किया.

ऐसे में जिग्नेश का जोशीला बयान उनके अतिआत्मविश्वास का परिचय ही देता है. शायद उमड़ती भीड़ के अक्स में उन्हें ये दिखाई दे रहा है कि मात्र तीन साल के समाजिक कार्यकर्ता के करियर से वो बीजेपी को टक्कर देने की स्थिति में आ चुके हैं. भले ही चुनाव को लेकर बीजेपी और जिग्नेश के दावों में विरोधाभास झलके लेकिन ओबीसी की राजनीति की हांडी में कुछ न कुछ तो पक जरूर रहा है. उसे ‘चावल कच्चे हैं’ कह कर खारिज़ कर देना बीजेपी के लिये भूल हो सकती है.

22 साल से पिछड़ी हुई कांग्रेस को अब पिछड़ी जातियों में अपनी जीत दिखाई दे रही है. गुजरात में ओबीसी 50 फीसदी हैं और 1985 में जब इसने कांग्रेस का हाथ थामा तो 100 से ज्यादा सीटें दिलाई थीं.

ओबीसी के अलावा कांग्रेस को ‘पटेल पावर’ पर भी भरोसा है. कांग्रेस पूर्व मुख्यमंत्री माधव सिंह सोलंकी के पोषित खाम फॉर्मूले के तहत दलित, आदिवासियों क्षत्रिय और मुसलमानों को साधने की जुगत में है क्योंकि गुजरात के 70 फीसदी वोटर इसी तबके से आते हैं. इसी जातीय गणित के पीछे ही राहुल गांधी के सॉफ्ट हिंदुत्व की छवि काम कर रही है ताकि वोटों के ध्रुवीकरण होने पर ये जातियां हिंदुत्व की झंडाबरदारी के नाम पर कांग्रेस से छिटक न जाएं. 1985 में आरक्षण के खिलाफ जब पटेल आंदोलन कर रहे थे तब वही आंदोलन बाद में हिंदू मुस्लिम संघर्ष में तब्दील हो गया था.

हिंदुत्व की छत के नीचे पिछड़ी जाति की भीड़ खुद को मजबूत और सुरक्षित महसूस करने लगती है. ऐसे में चुनावी गणित से जातियों को साधने की सियासी साधना पर 'सियाराम' का नारा सम्मोहन से कम नहीं होता है. तभी मोदी ने गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए हिंदुत्व के नाम पर दलितों, अनूसूचित और पिछड़ी जातियों, अन्य पिछड़ी जातियों और आदिवासियों को बीजेपी से जोड़कर वोटबेस तैयार किया था. लेकिन अब ये ही जातियां सत्ता के लिये गोलबंद हो चुकी हैं.

Narendra Modi

मोदी हिंदुत्व की नहीं बल्कि ‘गुजराती अस्मिता’ की बात कर रहे हैं

पटेल समुदाय को हार्दिक पटेल आरक्षण का झुनझुना दिखा रहे हैं.  कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी आरक्षण देने का वादा कर रहे हैं. जबकि 50 फीसदी की तय सीमा से ज्यादा आरक्षण तभी दिया जा सकता है जब पटेलों को पिछड़ा वर्ग में शामिल किया जाए और इसके लिये केंद्र सरकार ही पटेल समुदाय को संविधान की नौवीं अनुसूची में डाल सकती है. ऐसे में कांग्रेस का छलावा और हार्दिक का भुलावा पाटीदारों को कितना बरगला पाएगा ये देखने वाली बात होगी. लेकिन एक बात तय हो गई कि साल 1960 में गुजरात के बनने के बाद जिस पटेल-पाटीदार की आर्थिक तौर पर मजबूती समाज में दबदबे का काम करती थी वो आज आरक्षण को लेकर सड़कों पर उतर गई है.

पटेल समुदाय का गुस्सा कहीं न कहीं बीजेपी के गणित को कमजोर करने का काम कर सकता है. गुजरात में 12 से 15 फीसदी लोग पटेल समुदाय से आते हैं और गुजरात की सत्ता में इनकी भागेदारी से कोई भी पार्टी मुंह नहीं मोड़ सकी है.

दो दशक तक विकास के नाम पर अपनी अलग पहचान बनाने वाला गुजरात इस बार जातियों के जंजाल में बुरी तरह उलझ चुका है. ऐसे में पीएम मोदी का मास्टरस्ट्रोक भुज में उनकी रैली के आगाज़ से समझा जा सकता है. इस बार मोदी हिंदुत्व की नहीं बल्कि ‘गुजराती अस्मिता’ की बात कर रहे हैं. गुजरात में ये लड़ाई अब जातियों के झंझवात से बाहर निकाल कर ‘गुजरात के बेटे’ की 'मन की बात' से आगे बढ़ाने की कोशिश की जा रही है क्योंकि जातियों के ज़ोर और शोर से निपटने का यही एकमात्र विकल्प बाकी रह गया है.

बहरहाल राजनीतिक दलों को चुनाव की शांति के बाद ये जरूर सोचना होगा कि जातिवाद की वजह से अगर मंदिरों में दलितों का जाना रोका जाएगा और कुएं से पानी भरने पर बेरहमी से पीटा जाएगा तो सदियों से कमज़ोर ही रहने का अभिशाप पालने वाला वर्ग अपना आक्रोश किसी मौके पर तो दिखाएगा ही. उसके लिये ये मौका चुनाव ही होता है. वो भले ही धर्म और संप्रदाय के नाम पर जाति से ऊपर उठ जाए लेकिन एक दिन तो उसे अपने घर लौटना ही होता है जहां समाज की कड़वी सच्चाई उसे आइना दिखाने का काम करती है.

Gujarat Election Results 2017

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