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गुजरात चुनाव 2017: कांग्रेस मजबूत, लेकिन बीजेपी के पास 'मोदी' हैं

गुजरात में कांग्रेस अच्छा मुकाबला कर रही है लेकिन गुजराती समुदाय नरेंद्र मोदी से परे कुछ और सोच और देख ही नहीं पाता है

Sandipan Sharma Sandipan Sharma Updated On: Nov 18, 2017 09:44 AM IST

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गुजरात चुनाव 2017: कांग्रेस मजबूत, लेकिन बीजेपी के पास 'मोदी' हैं

गुजरात में जैसे-जैसे चुनाव की तारीख नजदीक आ रही है, वैसे-वैसे लोगों की उत्सुकता बढ़ती जा रही है. हर कोई बस यही जानना चाहता है कि गुजरात चुनाव में इस बार जनादेश का ऊंट किस करवट बैठेगा. यानी गुजरात की जनता किस पार्टी को बहुमत से नवाजेगी. लोगों की यह उत्सुकता इसलिए है, क्योंकि इस बार गुजरात के मतदाताओं का रुझान साफ नजर नहीं आ रहा है.

बीते जमाने के खलनायक अजीत अगर आज जिंदा होते तो, वो लिक्विड ऑक्सीजन (तरल ऑक्सीजन) जैसी अवस्था में नजर आ रहे गुजरात के मतदाताओं का मूड आसानी से समझ जाते. तब अजीत अपने अनोखे अंदाज में कुछ इस तरह डॉयलॉग मारते, 'लिक्विड उन्हें जीने नहीं देगा, और ऑक्सीजन उन्हें मरने नहीं देगा'. लिक्विड ऑक्सीजन वाली बात से आप यकीनन चकरा रहे होंगे कि, मैं राजनीति में भौतिक और रसायन विज्ञान कहां से ले आया. चलिए तो फिर हम आपको समझा देते हैं- आप लिक्विड की जगह बीजेपी पढ़िए और ऑक्सीजन की जगह मोदी. अब आप गुजरात के मौजूदा चुनावी परिदृश्य को आसानी से समझ सकते हैं.

वोटरों को बीजेपी से हैं ढेरों शिकायतों

बीजेपी भले ही गुजरात में ऑल इज वेल का दावा कर रही है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि, गुजराती मतदाताओं को इस बार राज्य और केंद्र की बीजेपी सरकार से ढेरों शिकायतें हैं. छोटे और मझोले व्यापारी जीएसटी के जटिल तंत्र और उसकी अलग-अलग दरों से परेशान हैं. वहीं अगर ग्रामीण इलाकों की बात करें तो वहां किसान और मजदूर अब तक नोटबंदी का नतीजा भुगत रहे हैं. जबकि युवा वर्ग इसलिए परेशान है क्योंकि सरकार रोजगार के नए अवसर पैदा करने में नाकाम रही है.

इसके अलावा गुजरात के कई समुदाय और जाति समूह विराट हिंदुत्व परिवार से निकलकर अपनी अलग पहचान और अस्तित्व बनाने के लिए संघर्षरत हैं. ऐसे में इन परिस्थितियों को गुजरात में बीजेपी के 22 साल के शासन के खिलाफ एंटी इंकंबेंसी (सत्ता विरोधी लहर) ही माना जाएगा.

वहीं कांग्रेस इस बार गुजरात में खासी मजबूत नजर आ रही है. एक तरफ तो उसे पाटीदारों और दलितों का खासा समर्थन मिल रहा है, वहीं अच्छी चुनावी रणनीति ने रेस में कांग्रेस को बीजेपी से आगे कर रखा है. ऐसे हालात और एक अलग किस्म के राजनीतिक परिवेश में गुजरात 2017 का चुनाव कांग्रेस के लिए द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान पेरिस विजय जैसी घटना साबित हो सकता है.

यानी बिना गोली चलाए और खून-खराबा किए एक महत्वपूर्ण गढ़ जीत लेना. कांग्रेस अगर कोई बड़ी सियासी गलती न करे, तो उसके लिए गुजरात में जीत का परचम लहराना मुमकिन हो सकता है. लेकिन नरेंद्र मोदी गुजरात में कांग्रेस की जीत की राह में सबसे बड़ा रोड़ा हैं. मोदी रूपी ऑक्सीजन गुजरात में बीजेपी को इतनी आसानी से मरने नहीं देगी.

narendra modi

गुजरात की जनता को है मोदी की लत

मोदी और गुजराती मतदाताओं के बीच अरसे से प्यार और विश्वास का रिश्ता है, जो अब एक लत में तब्दील हो चुका है. गुजरात का सामान्य मतदाता सरकार से नाराजगी और लाख शिकायतों के बावजूद मोदी के साथ अपना रिश्ता तोड़ने को तैयार नहीं है. अगर राजनीति को फिल्म (सिनेमा) मान लिया जाए, तो गुजरात की जनता की नजर में मोदी वही अहमियत रखते हैं, जैसा कि हॉलीवुड फिल्म 'ऑरिजनल सिन' में एंटोनियो बेंडेरिस की निगाह में एंजेलिना जॉली की अहमियत थी. गुजरात की जनता यह बात बखूबी समझती है कि, सरकार अपने सभी वादे पूरे नहीं करेगी, लेकिन इसके बावजूद लोग मोदी का साथ छोड़ने को तैयार नहीं हैं.

गुजरात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का गृह राज्य है, वहां की जनता मोदी को गुजराती अस्मिता का प्रतीक मानती है. यही वजह है कि गुजराती समुदाय मोदी से परे कुछ और सोच देख ही नहीं पाता है.

राजनीतिक विश्लेषक श्याम पारेख के मुताबिक, 'साल 2012 के विधानसभा चुनाव में गुजरात की जनता ने मोदी को इसलिए वोट किया था ताकि वो आगे बढ़कर प्रधानमंत्री बन सकें. यह गुजरात की जनता ही थी, जिसने एक राजनेता के रूप में मोदी को पनपने का मौका दिया. इसके बाद भारतीय राजनीति में गुजरातियों का वर्चस्व कायम करने के सपने के साथ लोगों ने मोदी को दिल्ली भेजा. लिहाजा गुजराती मतदाता अपने सपने को चकनाचूर करेंगे ऐसा लगता तो नहीं है.'

क्यों अजेय हैं नरेंद्र मोदी?

मोदी के अजेय होने की एक अहम वजह हिंदुओं का रक्षक होने की उनकी छवि भी है. साल 2002 के दंगों के बाद से हिंदुओं को ऐसा लगता है कि राज्य सरकार उनके साथ है, और हर हालात में उनकी रक्षा करेगी. सुरक्षा की इस भावना के चलते जनता हर चुनाव में मोदी पर विश्वास जताती आ रही है. हालांकि गुजरात में बहुसंख्यक हिंदुओं के दिल में असुरक्षा की यह भावना कैसे भरी यह समझना जरा मुश्किल है.

फ़र्स्टपोस्ट से बातचीत के दौरान एक गुजराती महिला ने जो कहा, उससे गुजरात में हिंदुओं के दिलों पर छाई तथाकथित असुरक्षा की भावना की झलक मिलती है. उस महिला ने कहा, 'अगर मोदी हार जाएंगे, तो गुजरात में ढेर सारी मस्जिदें बन जाएंगी.'

इसमें भी कोई दो राय नहीं है कि गुजरात में इस बार बड़ी तादाद में मतदाता मोदी से नाखुश हैं. जनता इस बात से बहुत आहत है कि, मोदी ने जो वादे किए थे उन्हें पूरा नहीं किया है. अहमदाबाद की रहने वाली पत्रकारिता की एक छात्रा अंकिता ओजा का कहना है कि, ऐसा पहली बार हो रहा है, जब उन्होंने लोगों को घर, कॉलेज और दफ्तरों में मोदी के बारे में गंभीर सवाल करते देखा है. लेकिन तमाम बहस-मुबाहिसे के बाद अंतत: जवाब में लोगों को मोदी ही नजर आते हैं क्योंकि लोगों के सामने दूसरा कोई विकल्प ही नहीं है.

मोदी से पुराने प्यार और नई नाराजगी ने गुजरात के मतदाताओं को भ्रम में डाल दिया है. वहीं राज्य में कांग्रेस की जोरदार तैयारियों ने भी मतदाताओं को विचलित कर रखा है. ऐसे में गुजरात में हर जगह दो बातें सुनने को मिल रही हैं. पहली यह कि, गुजरात में कांग्रेस अच्छा मुकाबला कर रही है और उसके पास दो दशक बाद बीजेपी को हराने का सबसे अच्छा मौका है. वहीं दूसरी बात यह सुनने को मिल रही है कि, कांग्रेस कुछ भी कर ले, कोई भी रणनीति बना ले, लेकिन गुजरात में जीत बीजेपी की ही होगी क्योंकि बीजेपी के पास मोदी है.

राजनीति में एक हफ्ते का वक्त काफी लंबा माना जाता है. गुजरात में मतदान का पहला चरण अभी तीन हफ्ते से ज्यादा दूर है. कांग्रेस ने राज्य में पिछले कुछ महीनों में जो बढ़त हासिल की है, अगर उसे बरकरार रखने में कामयाब हो जाती है, तो बीजेपी के लिए यह चौंकाने वाली बात होगी.

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मोदी ऑक्सीजन के सहारे है बीजेपी

साल 2012 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने नारा दिया था, 'मोदी फॉर पीएम'. इस नारे के चलते गुजरात में बीजेपी को कांग्रेस से 10 फीसदी अधिक वोट मिले थे. इस बार के विधानसभा चुनाव में अगर 5 फीसदी वोट बीजेपी से खिसककर कांग्रेस के पाले में चले जाते हैं तो मुकाबला टक्कर का हो सकता है.

हालांकि इस बार यह साफ नजर आ रहा है कि बीजेपी और कांग्रेस के बीच वोट शेयर में ज्यादा अंतर नहीं होगा. इसकी वजह गुजरात में सत्ता विरोधी लहर, पाटीदारों और दलितों की नाराजगी, कारोबार में गिरावट और बेरोजगारी है. लोकनीति और सीएसडीएस के एक सर्वे के मुताबिक, बीते दो महीनों में कांग्रेस ने अपेक्षित वोटों की हिस्सेदारी के अंतर को घटाकर 6 फीसदी कर दिया है.

लेकिन, कांग्रेस के साथ एक समस्या यह है कि, गुजरात में अभी तक मोदी की चुनाव प्रचार टीम मैदान में नहीं उतरी है. कुछ दिनों में मोदी गुजरात में ताबड़तोड़ प्रचार अभियान शुरू कर देंगे. वह दो हफ्तों में करीब 50 रैलियों को संबोधित करेंगे. जाहिर है, गुजरात में मोदी के निशाने पर कांग्रेस ही होगी और वो उसपर जमकर हमले बोलेंगे. इसके अलावा मोदी लोगों से गुजराती अस्मिता की अपील कर के चुनाव की दिशा और दशा बदल सकते हैं.

गुजरात में फिलहाल परिस्थितियां अस्पष्ट हैं. मतदाताओं की नाराजगी के चलते बीजेपी बैकफुट आकर लड़खड़ा रही है. लेकिन मोदी रूपी ऑक्सीजन बीजेपी को नया जोश देकर चुनाव में विजयी बना सकती है.

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