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गुजरात चुनाव: हार्दिक के कांग्रेस के साथ रिश्ते को लेकर अब साथी ही उठाने लगे सवाल

हार्दिक पटेल अपने 20 से ज्यादा समर्थकों को कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ाना चाहते हैं लेकिन, कांग्रेस की पहली लिस्ट में सिर्फ दो ही नाम आए

Updated On: Nov 21, 2017 11:26 AM IST

Amitesh Amitesh

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गुजरात चुनाव: हार्दिक के कांग्रेस के साथ रिश्ते को लेकर अब साथी ही उठाने लगे सवाल

नवाबों के शहर जूनागढ़ में गुजरात विधानसभा चुनाव को लेकर कांग्रेस की पहली लिस्ट सामने आते ही हो-हल्ला, हंगामा और रात को ही पुतला दहन सब एक साथ शुरू हो गया. हंगामा करने वाले हार्दिक पटेल की अगुआई में चलने वाली पाटीदार अनामत आंदोलन समति (PAAS) के ही कार्यकर्ता थे.

लेकिन, हंगामा करने वालों में कांग्रेस के भी कुछ पुराने कार्यकर्ता थे जो हार्दिक के सहयोगी रहे पटेल समुदाय के अमित थूमर को टिकट दिए जाने से खफा थे. यहां हंगामे की कहानी भी काफी मजेदार थी. कांग्रेसी इसलिए हंगामा कर रहे थे क्योंकि उनके पुराने कार्यकर्ता भीकाभाई जोशी को नजरअंदाज कर दिया गया था. दूसरी तरफ, PAAS वाले इसलिए हंगामा कर रहे थे क्योंकि उनकी सहमति के बगैर कांग्रेस ने अमित थूमर को टिकट दे दिया था.

रविवार रात हुए हंगामे का असर भी हुआ और सोमवार को कांग्रेस के टिकट पर नामांकन भरने के बावजूद अमित थूमर को चलता कर दिया गया. चौबीस घंटे के भीतर ही अमित थूमर का टिकट काट कर कांग्रेस ने अपने पुराने कार्यकर्ता भीकाभाई जोशी को चुनाव मैदान में उतार दिया.

कांधल पटेल

कांधल पटेल

लेकिन, इसके पहले ही जूनागढ़ में मचा विरोध और बवाल गुजरात में हार्दिक पटेल और कांग्रेस के बीच के रिश्ते और PAAS की अंदरुनी गुटबाजी की कलई खोल गया. दरअसल हार्दिक के सहयोगी और 'पास' के जूनागढ़ जिले के संयोजक कांधल पटेल किसी भी सूरत में पास के उनके सहयोगी अमित थूमर को समर्थन के मूड में नहीं थे. फर्स्टपोस्ट से बातचीत के दौरान उनके भीतर की आवाज खुलकर सामने आ गई.

कांधल पटेल ने PAAS के सदस्यों के चुनाव लड़ने की कोशिश पर ही सवाल खड़ा कर दिया. कांधल पटेल का कहना था कि ‘पहले आरक्षण की बात हो, ना कि चुनाव लड़ने की बात हो.’ कांधल पटेल इस बारे में हार्दिक पटेल के चुनाव मैदान में उतरने की रणनीति से सहमत नहीं दिख रहे हैं.

टिकट बंटवारे पर कांग्रेस-'पास' में विवाद

उनके भीतर की खीझ बातचीत के दौरान निकलकर सामने आ जाती है. यह खिझ अमित थूमर के खिलाफ भी है और हार्दिक पटेल को लेकर भी है. क्योंकि हार्दिक पटेल की तरफ से अबतक कांग्रेस के साथ रिश्ते और चुनाव लड़ने को लेकर खुलकर कुछ नहीं कहा जा रहा है.

अपने सहयोगियों के साथ कांधल पटेल

अपने सहयोगियों के साथ कांधल पटेल

जूनागढ में कांधल के अलावा भी और दूसरे भी PAAS समर्थक उनके साथ खड़े हैं. जूनागढ़ शहर के PAAS संयोजक नरेश पटेल ने भी मौजूदा भ्रम को जल्द से जल्द दूर करने को कहा. सोमवार 20 नवंबर को ही राजकोट में हार्दिक पटेल की तरफ से कांग्रेस के साथ समझौते को लेकर बड़ा ऐलान करने की बात कही जा रही थी. लेकिन, आंदोलन समिति के भीतर के झगड़े के बाद हार्दिक पटेल को राजकोट के गोंडल का अपना कार्यक्रम भी रद्द करना पड़ा.

दरअसल, कांग्रेस की पहली लिस्ट सामने आने के बाद उनमें हार्दिक पटेल के दो सहयोगी यानी PAAS से जुड़े रवि वसावा को राजकोट की धोराजी सीट और अमित थूमर को जूनागढ से उम्मीदवार बना दिया गया. इसी के बाद हार्दिक पटेल के करीबी दिनेश बम्भानिया ने भी कांग्रेस को पूरे गुजरात में विरोध करने की धमकी तक दे डाली.

अहमदाबाद में तो कांग्रेस अध्यक्ष भरत सिंह सोलंकी के घर के बाहर हार्दिक समर्थक और कांग्रेसी कार्यकर्ता आमने-सामने आ गए. हार्दिक पटेल और उनके समर्थकों को परेशानी इस बात से है कि उनके दो समर्थकों को कांग्रेस ने बिना उनकी सहमति के टिकट कैसे थमा दिया.

लेकिन लगता नहीं है कि बात सिर्फ इतनी भर है. दरअसल, हार्दिक पटेल कम से कम अपने 20 समर्थकों को कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ना चाहते हैं. लेकिन, जब कांग्रेस की पहली लिस्ट में सिर्फ दो ही नाम आए तो फिर मामला भड़क गया.

बनी हुई है भ्रम की स्थिति

एक तरफ हार्दिक पटेल और कांग्रेस के बीच की लड़ाई और दूसरी तरफ हार्दिक समर्थकों की अंदरूनी खींचतान से पूरे गुजरात में इस वक्त भ्रम की स्थिति बनी हुई है. समिति मुख्य संयोजक हार्दिक पटेल और बाकी 11 संयोजकों के बीच समन्वय की कमी दिखने लगी है. सब अपनी-अपनी डफली, अपना-अपना राग अलापने लगे हैं.

जूनागढ़

जूनागढ़

सोमवार को हार्दिक पटेल ने चुप्पी ही साधे रखी, लेकिन, दो ट्वीट के माध्यम से उन्होंने अपने भीतर की मौजूदा उलझन को ही सामने ला दिया. हार्दिक पटेल को भी PAAS के भीतर के मतभेद का डर सताने लगा है. लेकिन, कांग्रेस के साथ रिश्ते और पटेल आरक्षण को लेकर कांग्रेस के साथ किसी भी तरह की सहमति पर उनकी चुप्पी इस रहस्य को और गहरा कर रही है.

हार्दिक पटेल को खुलकर अब सामने आना होगा. इन दोनों मुद्दों पर उन्हें खुलकर अपने युवा कैडर्स को हकीकत से रूबरू कराना होगा. वरना जूनागढ़ जैसे हालात बाकी जगहों पर भी होते देर नहीं लगेगी.

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