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गुजरात चुनाव 2017: कांग्रेस को जीत के लिए बीजेपी के खिलाफ गुस्से को और आंच देनी होगी

कांग्रेस ने माहौल तो बना लिया है लेकिन बीजेपी को हरा पाना अभी भी उसके लिए मुश्किल है

Sandipan Sharma Sandipan Sharma Updated On: Nov 28, 2017 12:29 PM IST

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गुजरात चुनाव 2017: कांग्रेस को जीत के लिए बीजेपी के खिलाफ गुस्से को और आंच देनी होगी

कच्छ की रण में खाराघोड़ा क़स्बे के पास दो युवतियां रेत पर लकीरें खींच रही थीं. मेरे साथी ने उनसे पूछा कि क्या उन्होंने राहुल गांधी के बारे में सुना है? उन्होंने कंधे उचकाकर ना में जवाब दिया. फिर उसने पूछा कि क्या उन्होंने नरेंद्र मोदी के बारे में सुना है? दोनों एक साथ बोल पड़ीं- प्रथम वडा प्रधान.

यानी दोनों मोदी को सिर्फ देश का प्रधानमंत्री नहीं मानतीं. वो मोदी को देश का पहला प्रधानमंत्री कहती हैं. मोदी समर्थकों की तरह ये युवतियां भी मानती हैं कि मोदी जैसा कोई दूसरा नेता नहीं हुआ. गुजरात में दूसरी जगहों पर भी बहुत से लोग मोदी को बहुत सम्मान से अपना नेता, अपना प्रधानमंत्री बताते हैं. लोग कहते हैं कि वो उनके अपने नरेंद्र भाई हैं.

मोदी को लेकर लोगों की राय सुनिए तो लगता है कि इस बार भी गुजरात में विधानसभा चुनाव बीजेपी बड़े आराम से जीत लेगी. अपने नेता को देश का प्रथम वडा प्रधान बनाने के बाद आखिर गुजराती वोटर क्यों उन्हें नीचा दिखाएंगे. लेकिन, दुर्भाग्य से मोदी का समर्थक वोटर अपने देवता से नाराज है.

खाराघोड़ा में मिली दो लड़कियों के पिता अंबू पटेल कहते हैं कि बहुत से लोग मोदी सरकार के अहंकार से खफा हैं. केंद्र और राज्य सरकारों के बहुत से फैसलों से गुजराती लोगों को तकलीफ पहुंची है.

पाटीदार नाराज हैं क्योंकि 2015 में आरक्षण आंदोलन के दौरान उनके युवाओं पर राज्य सरकार ने गोली चलवाई थी. कारोबारी जीएसटी की पेचीदगियों की वजह से नाराज हैं. छोटे और मझोले कारोबारी नोटबंदी के असर की वजह से खफा हैं. युवा बेरोजगारी से दुखी हैं. अंबू पटेल कहते हैं कि कुल मिलाकर माहौल ये है कि लोग बीजेपी को सबक सिखाना चाहते हैं. गुजराती वोटर बीजेपी को बताना चाहता है कि उसे हल्के में न लिया जाए.

गुजरात में बहुत से लोग अंबू पटेल की बात से इत्तेफाक रखते हैं. मेहसाणा बाईपास के पास एक रेस्तरां के मालिक का कहना है कि नोटबंदी के जरिए कारोबारियों को निशाना बनाकर मोदी ने बहुत गलत किया. वो कहते हैं, 'नेता और सियासी दल कभी नहीं बताते कि उनके पास पैसे कहां से आते हैं. वो अपना कमा और खा रहे हैं. फिर वो हमारी आमदनी और खर्च का हिसाब क्यों चाहते हैं'. फिर वो शिकायतों की लंबी लिस्ट गिनाते हैं. उनकी शिकायतों का लब्बो-लुबाब ये है कि कारोबार बहुत मंदा हो गया है. आमदनी घट गई है.

Amit Shah and Narendra Modi in Ahmedabad

आईआईएम अहमदाबाद का एक छात्र मोदी का कट्टर समर्थक है. वो कहता है, 'मोदी सरकार में बहुत गुरूर आ गया है. इसे तोड़ना जरूरी है ताकि जब बीजेपी 2019 में सत्ता में लौटे तो उसे इतना गुरूर न आए. वो तानाशाही रवैया न अख्तियार करे. वो लोगों की शिकायतें और सुझाव सुने. जमीनी हकीकत को समझने को राजी हो'.

सरकार को औकात दिखाना चाहते हैं लोग

गुजराती वोटर की सरकार को औकात दिखाने की ये ख्वाहिश ही बड़ी वजह है कि लोग उन लोगों को सुनने के लिए जुट रहे हैं, जो सरकार पर हमला कर रहे हैं. हार्दिक पटेल, जिग्नेश मेवानी, अल्पेश ठाकोर और यहां तक कि राहुल गांधी की रैलियों में भारी भीड़ जुट रही है. उनकी रैलियों में आने वाले, उनकी बातें सुनना चाहते हैं.

बीजेपी के लिए अच्छी बात ये है कि वोटर अभी उससे वक्ती तौर पर ही खफा है. गुस्सा इतना ज्यादा नहीं है जिसे संभाला न जा सके. अभी लोगों की नाराजगी नफरत में नहीं बदली है. जो बात हम ने यूपीए-2 के आखिरी दिनों में देखी थी, वैसा माहौल अभी बीजेपी के खिलाफ नहीं दिखता. ऐसे में अगर बीजेपी नाराज वोटरों को मना लेती है, अपनी गलतियां सुधारने का वादा करती है, उनकी बातें सुनने का भरोसा देती है, लोगों से माफी मांग लेती है तो हो सकता है कि वोटर एक बार फिर बीजेपी के पाले में आ जाएं.

बीजेपी के हक में एक पुरानी कहावत भी जाती है. वो ये कि जाना-पहचाना शैतान, अनदेखे देवता से बेहतर होता है. गुजरात में कांग्रेस 22 सालों से सत्ता से बाहर है. मतदाता कांग्रेस के नेताओं से वाकिफ नहीं हैं. उन्हें ये नहीं पता कि कांग्रेस जीती तो मुख्यमंत्री कौन होगा. एक प्रशासक के तौर पर राहुल गांधी का इम्तिहान भी अभी बाकी है. ऐसे में बहुत से वोटरों के लिए बीजेपी ही बेहतर विकल्प है.

वैसे भी अगर बीजेपी के खिलाफ गुस्सा वोटों में तब्दील न हो, तो क्या फायदा? बीजेपी की हार के लिए जरूरी है कि कांग्रेस हर वोटर को पोलिंग बूथ तक ले आए. लेकिन बीजेपी के मुकाबले कांग्रेस का कैडर जमीन पर उतनी मजबूत पहुंच नहीं रखता. ऐसे में वोटिंग के दिन ये बात सब से अहम होगी कि कौन सी पार्टी वोटर को पोलिंग बूथ तक लाती है.

कांग्रेस ने माहौल बनाया पर काम अभी अधूरा

हो सकता है कि कांग्रेस को जबरदस्त झटका झेलना पड़े. उसे ये सबक मिले कि सरकार से नाराजगी का मतलब विपक्ष की विजय नहीं होती. ऐसा हुआ तो इसकी सबसे बड़ी वजह जमीनी स्तर पर कांग्रेस कार्यकर्ताओं की गैरमौजूदगी होगी.

Rahul Gandhi-Hardik Patel

राहुल गांधी और हार्दिक पटेल

जमीनी स्तर पर वोटर न जुटा पाने की कांग्रेस की कमजोरी से मतदाता बीजेपी के पाले में जा सकते हैं. लोग ये सोचते हैं कि बीजेपी को एक झटका देना जरूरी है. उन्हें लगता है कि कांग्रेस ने माहौल तो बना लिया है लेकिन बीजेपी को हरा पाना अभी भी उसके लिए मुश्किल है.

कांग्रेस गठजोड़ के जरिए ये कमी पूरी कर सकती है. इसीलिए उसने दलित नेता जिग्नेश मेवानी, पाटीदार नेता हार्दिक पटेल और ओबीसी नेता अल्पेश ठाकोर से हाथ मिलाया है. ये तीनों युवा नेता लगातार सियासी रैलियां कर रहे हैं. हां, उनके पास तजुर्बे की कमी है. वोटर पर उनका असर भी अभी जांचा-परखा नहीं गया है.

अब अगर ये तीनों नेता, कांग्रेस के साथ मिलकर काम करते हैं तभी कांग्रेस नाराज वोटरों को अपने पाले में कर सकती है, तभी वो कच्छ की उन दो युवतियों को अपने नेता राहुल गांधी से परिचित करा सकती है.

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