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गुजरात विधानसभा चुनाव 2017: अभी भी वो दर्द नहीं भूले हैं उना कांड के पीड़ित

एक साल पहले की उस घटना ने इस दलित समुदाय के भीतर सबकुछ बदल दिया है. इनके भीतर अपने अधिकारों को लेकर वो सजगता दिख रही है

Updated On: Nov 28, 2017 05:24 PM IST

Amitesh Amitesh

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गुजरात विधानसभा चुनाव 2017: अभी भी वो दर्द नहीं भूले हैं उना कांड के पीड़ित

उना के मोटा समडियाला गांव के वसराम सरवैया एक साल पहले की उस घटना को याद कर आज भी सिहर उठते हैं. 11 जुलाई 2016 की वो सुबह इनकी जिंदगी की सबसे काली सुबह साबित हुई.

दलित समुदाय के वसराम के पास सुबह सात बजे ही बगल के गांव के किसी आदमी का फोन आया कि उनकी गाय को शेर ने मार दिया है. परंपरागत और पुश्तैनी काम करने वाले वसराम सरवैया अपने तीन भाईयों के साथ उस जगह पहुंच गए और फिर मरी हुई गाय का चमड़ा निकालने का काम करने लगे.

फिर क्या था, 40 से 50 की तादाद में गोरक्षकों की एक टोली पहुंची और बिना जाने-समझे इन सबकी पिटाई करनी शुरू कर दी. उस दिन को याद करते हुए वसराम का गला आज भी रूंध जाता है. वसराम सरवैया उस घटना के बारे में कहते हैं कि ‘इनके चारों भाई को गोरक्षक गांव से लगभग 25 किलोमीटर की दूरी पर उना ताल्लुका में ले गए और फिर इनकी पिटाई करनी शुरू कर दी.’

पिटाई के बाद इनकी हालत इतनी खराब थी कि इन्हें उना सिविल अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा और फिर बेहतर इलाज के लिए राजकोट ले जाया गया जहां सात दिन तक इन्हें वहां भर्ती होना पड़ा.

इस घटना के मीडिया में आने के बाद हालांकि गोरक्षकों को पकड़ लिया गया. उनके उपर फिलहाल केस चल रहा है जिसमें 9 अभी जेल में हैं लेकिन बाकियों को जमानत मिल गई है.

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नाराज हैं उना के पीड़ित दलित

उना कांड के पीडित वसराम सरवैया के भीतर की नाराजगी, दर्द और दुख सामने आ जाता है. वसराम सरवैया फर्स्टपोस्ट से बातचीत के दौरान कहते हैं ‘हमें अबतक न्याय नहीं मिला.’

इनकी नाराजगी उन सियासतदानों से भी है जो उना की इस बहुचर्चित घटना के बाद इनके यहां आए भी, इनके दुख-दर्द को बांटने का भरोसा भी दिया लेकिन, अबतक उस वादे पर अमल नहीं हुआ.

वसराम सरवैया का कहना है ‘उस घटना के बाद हमारे घर कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी भी आए, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भी आए और जब विपक्ष की तरफ से बवाल और दबाव बढ़ा तो राज्य की तत्कालीन मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल भी आई. लेकिन, इनके जीवन में कोई बदलाव नहीं आया.’

वसराम की शिकायत है कि आनंदीबेन पटेल ने उस वक्त उन्हें जमीन और रोजगार के साथ-साथ आजीविका के कुछ और साधन मुहैया करने का वादा किया था. लेकिन, अब तो एक साल से भी ज्यादा हो गए उन्हें कुछ नहीं मिला.

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रोजगार की तलाश में बाहर जाने को मजबूर

गांव में ही मेहनत-मजदूरी कर अपना जीवन-यापन करने वाला सरवैया परिवार अब रोजगार की तलाश में दूसरे जगहों पर भी जाने को मजबूर है. वसराम सरवैया के साथ उस घटना का पीड़ित उनका छोटा भाई रमेश सरवैया इन दिनों अहमदाबाद में है जहां वो सिलाई का काम सिख रहा है. वसराम का कहना है कि ‘यहां कोई रोजगार नहीं मिला तो उसे हमने शहर की तरफ भेज दिया.’

वसराम सरवैया के परिवार में पिता वल्लूभाई सरवैया के अलावा उसकी मां, पत्नी, छोटा भाई रमेश सरवैया और उसकी पत्नी रहते हैं. उना कांड में पीडित उसके दो चचेरे-भाई अशोक सरवैया और बेछर सरवैया भी अपने पिता के साथ खेतों में मजदूरी का काम कर अपना गुजर-बसर कर रहे हैं.

वसराम के पिता वल्लू भाई सरवैया कहते हैं कि ‘राहुल गांधी ने भी यहां आकर कहा था कि हम न्याय दिलाएंगे, लेकिन, अभी हमें न्याय नहीं मिला.’ इनका आरोप है कि बीजेपी के राज में हमें कभी न्यान नहीं मिला. कई जगहों पर दलितों पर अत्याचार होते रहे लेकिन, कभी भी दोषियों पर उचित कारवाई नहीं हुई. उन्हें न्याय नहीं मिला.

अब चुनाव के वक्त उना के दलित समाज में इस घटना को लेकर गुस्सा देखने को मिल रहा है. उन्हें लगता है कि उनके साथ नाइंसाफी हुई, सरकार ने उनकी नहीं सुनी तो फिर हम इस बार अपनी आवाज सरकार तक जरूर पहुंचाएंगे.

मोटा समडियाला गांव के ही रहने वाले गोविंद भाई सरवैया कहते हैं ‘पनदर बरसती दलित समाज ने पंचासी टका बीजेपी में शामिल था बाद में पता चला कि दलित समाज के सब वसुका अन्याय होगा.’ गोविंद भाई कहते हैं कि ‘पिछले पंद्रह सालों से उना के दलित बीजेपी के साथ थे लेकिन, हमारे साथ अन्याय हो गया.’

 

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बातचीत के दौरान गांव के दलित समाज के भीतर मौजूदा सरकार और बीजेपी को लेकर नाराजगी दिख रही है. वे इस बार कांग्रेस के साथ खड़े दिख जाते हैं.

हंसमुख भाई सरवैया का कहना है कि ‘इस बार हम कांग्रेस को ही वोट करेंगे.’ बगल में खड़े सन्ना भाई सरवैया की राय भी इससे कुछ अलग नहीं दिख रही है. उनका कहना है कि ‘इस बार हम बदलाव के लिए वोट करेंगे. अगर पूरी प्रजा बदलाव करेगी तो फिर बदलाव हो जाएगा.’

मोटा समडियाला गांव की आबादी लगभग तीन हजार है जिसमें 1200 के करीब वोटर हैं. इस गांव में दलितों की आबादी कम है. लगभग 25 घर ही दलित हैं जो एक साथ ही रहते हैं. इसके अलावा गांव में पटेल, अहीर और कोरी जाति के लोगों की तादाद ज्यादा है.

लेकिन, एक साल पहले की उस घटना ने इन दलित समुदाय के भीतर सबकुछ बदल दिया है. इनके भीतर अपने अधिकारों को लेकर वो सजगता दिख रही है. उनका कहना है कि सरकार की तरफ से उन्हें जो वादे किए गए थे वो नहीं पूरा हुआ तो फिर हम आगे आंदोलन भी करेंगे.

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उना के दलितों के हीरों हैं जिग्नेश मेवानी

उना कांड के बाद चर्चा में आए दलित विचार मंच के जिग्नेश मेवानी को उना के ये दलित अपना हीरो मान रहे हैं. इनके भीतर जिग्नेश से प्रेरणा लेकर आगे बढ़ने की बात कही जा रही है. अपने अधिकारों और अपने लिए इंसाफ की मांग को लेकर उना के ये दलित आंदोलन पर उतारु होने की बात कर रहे हैं.

पूरे गुजरात में दलित समुदाय का वोटिंग प्रतिशत महज सात फीसदी है जो कि राष्ट्रीय औसत के करीब आधा है. देश भर में दलितों का वोटिंग प्रतिशत 16 फीसदी के आस-पास है. दलितों की तादाद के हिसाब से बात करें तो दलित समुदाय गुजरात की राजनीति में उस कदर प्रभावी नहीं रहा है.

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हालांकि उना की घटना के बाद पूरे गुजरात में दलितों का आंदोलन जिस अंदाज  में चला उसके बाद इस बार के चुनाव में दलित-फैक्टर भी सामने आ गया. जिग्नेश मेवानी के नेतृत्व में कांग्रेस को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष समर्थन देने की कोशिश ने दलित समुदाय को कांग्रेस के और करीब ला दिया है.

हालांकि संघ की तरफ से दलित समुदाय को अपनी तरफ जोड़ने की पहल लगातार होती रही है, लेकिन, दलित समुदाय अभी भी गुजरात में कांग्रेस के साथ ज्यादा दिख जाता है.

जिग्नेश मेवानी जैसे दलित आईकॉन लगातार बीजेपी सरकार के दौरान हो रहे अत्याचार और दलित-उत्पीड़न को लेकर इस बार सवाल खड़े कर रहे हैं. निर्दलीय चुनाव मैदान में उतरे जिग्नेश मेवाणी को कांग्रेस का समर्थन दलित सियासत को साधने की कोशिश के तौर पर ही दिखता है.

विकास के नाम पर क्या दलित देंगे बीजेपी का साथ?

हालांकि उना के बाद सौराष्ट्र के कई इलाकों का दौरा करते वक्त ऐसा लगा कि जो दलित अब शिक्षित हो रहे हैं, जिनके भीतर बदलाव दिख रहा है, जो अपने-आप को समाज की मुख्यधारा से जोड़कर आगे बढ़ने में लगे हैं, उनमें बदलाव हो रहा है. वो समाज के और लोगों से थोडा अलग भी सोंच रहे हैं.

गोंडल में अक्षरधाम मंदिर में मिले जयेश दवेरा का कहना था ‘मोदी जी का काम बेहतर है. शिक्षा से लेकर बाकी हर क्षेत्र में गुजरात और देश में विकास हुआ है. मोदी जी ने गुजरात में बुलेट ट्रेन दिया. बाहरी राष्ट्रों से उनका संपर्क और विदेश नीति काफी बेहतर है. हम वोट देते वक्त विकास के लिए वोट करेंगे.’

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राजकोट में रहकर चार्टर्ड एकाउंटेंट बनने की तैयारी में लगे दलित समुदाय के 20 साल के जयेश की सोच से लगता है कि दलित समुदाय में भी एक तबका है जो समय के साथ कुछ अलग भी सोच रहा है. फिर भी उना कांड और जिग्नेश मेवानी के जरिए कांग्रेस इस चुनाव में बीजेपी को घेरने की रणनीति पर चल रही है.

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