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गुजरात चुनाव में 'पाकिस्तान' की एंट्री कुछ गंभीर सवाल खड़े करती है

गुजरात चुनाव में पाकिस्तानी हाथ होने का पीएम मोदी का इल्जाम बहुत ज्यादा गंभीर है. उंगली पूर्व प्रधानमंत्री और पूर्व सेनाध्यक्ष पर भी उठाई गई है. फिर केंद्र सरकार कोई कार्रवाई क्यों नहीं कर रही है?

Updated On: Dec 11, 2017 01:49 PM IST

Rakesh Kayasth Rakesh Kayasth

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गुजरात चुनाव में 'पाकिस्तान' की एंट्री कुछ गंभीर सवाल खड़े करती है

पिछले तीन साल में शायद ही विधानसभा का कोई ऐसा चुनाव रहा हो, जिसमें गाय, श्मशान, कब्रिस्तान, पाकिस्तान और आईएसआई जैसे शब्द इस्तेमाल नहीं किये गए हों. जो लोग इस देश की राजनीति को समझते हैं, उन्हें इन शब्दों पर कोई ताज्जुब नहीं होता है. जब गुजरात का कैंपेन शुरू हुआ उसी वक्त से सोशल मीडिया पर चुटकुले चलने लगे कि आखिर पाकिस्तान की एंट्री कब होगी?

पाकिस्तान आया और एकदम क्लाइमेक्स के समय यानी दूसरे राउंड की वोटिंग से ठीक चंद दिन पहले. पाकिस्तान की एंट्री बिहार के चुनाव में भी आखिरी दौर में ही हुई थी. लेकिन गुजरात का मामला सिर्फ जुमलेबाजी नहीं है. प्रधानमंत्री ने एक बेहद संगीन आरोप लगाया है, जिसका जवाब हरेक देशवासी जानना चाहेगा.

`पाक कहता है, अहमद पटेल बनें गुजरात के सीएम’

गुजरात के बनासकांठा की एक रैली में प्रधानमंत्री ने दावा किया था कि पाकिस्तान अहमद पटेल को गुजरात का सीएम बनवाना चाहता है. पाकिस्तानी फौज के एक पूर्व जनरल ने इस सिलसिले में कांग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर के घर में मीटिंग की थी. इस बैठक में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी उपस्थित थे. मोदी ने वोटरों से पूछा है कि क्या यह गुजरातियों का अपमान नहीं है.

अगर मोदीजी का आरोप सच है तो फिर उनसे पूछा जाना चाहिए कि वे इसे गुजरातियों के अपमान का सवाल क्यों बना रहे हैं, राष्ट्रीय सुरक्षा का क्यों नहीं? भारत दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य ताकतों में है. इंटेलिजेंस के मुखिया अजित डोभाल जैसे व्यक्ति हैं, जिनके कारनामों की ना जाने कितनी कहानियां आजकल घर-घर में गूंजती है.

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फिर प्रधानमंत्री मोदी इस अति संवेदनशील मुद्दे का रहस्योद्घाटन गुजरात की चुनावी रैली में क्यों कर रहे हैं. अगर पाकिस्तान भारत के अंदरूनी राजनीतिक मामलों में दखल दे रहा है, तो यह एक बेहद गंभीर किस्म का अतिक्रमण है. क्या भारत ने पाकिस्तान सरकार के सामने यह मुद्दा उठाया?

अगर भारत के कुछ ताकतवर लोग पाकिस्तान के साथ मिलकर कोई साजिश कर रहे हैं तो फिर यह एक ऐसी गंभीर घटना है, जो देश के इतिहास में कभी नहीं हुई. लेकिन आज़ाद भारत की सबसे देशभक्त सरकार इसका इस्तेमाल सिर्फ चुनावी हवा बनाने के लिए क्यों कर रही है, कोई कदम उठाकर देशवासियों में भरोसा क्यों पैदा नहीं किया जा रहा है?

NARENDRAMODI

पाकिस्तानी मीटिंग का सच

कुछ राष्ट्रीय अखबारों ने मणिशंकर अय्यर के घर हुए उस कार्यक्रम का ब्यौरा छापा है, जिसे आधार बनाकर प्रधानमंत्री मोदी ने साजिश का इल्जाम लगाया है. अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक मणिशंकर अय्यर ने पूर्व पाकिस्तानी विदेश मंत्री खुर्शीद अहमद कसूरी के सम्मान में रात्रिभोज दिया था.

कसूरी भारत-पाक संबंधों पर होनेवाले किसी सेमिनार में भाषण देने के लिए दिल्ली आए थे. इस कार्यक्रम में पूर्व प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह, पूर्व सेनाध्यक्ष दीपक कपूर और पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह समेत दर्जन भर से ज्यादा वरिष्ठ राजनेता, पूर्व राजनायिक और सेना के पूर्व वरिष्ठ अधिकारी शामिल थे.

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ट्रैक टू डिप्लोमैसी कोई नई चीज नहीं है. भारत-पाक संबंधों पर सेमिनार सरहद के दोनों तरफ होते रहते हैं. दोनों तरफ के राजनेता और राजनायिक और पूर्व सैन्य अधिकारी भी एक-दूसरे से मिलते रहते हैं. बीजेपी के नेताओं ने भी समय-समय पर शिष्टमंडलों में शामिल होकर पाकिस्तान की यात्रा की है. लेकिन प्रधानमंत्री मोदी के भाषण पर यकीन करें तो लगता है कि मणिशंकर अय्यर के घर पर यह यह मीटिंग गुजरात में बीजेपी को हराने के लिए बुलवाई गई थी.

क्या पाकिस्तान से आए लोग इतने ज्ञानी हैं कि वे अहदम पटेल को मुख्यमंत्री बनाने का ब्लू प्रिंट लेकर आएंगे और सरदार मोहन सिंह इतने शातिर राजनेता हैं कि उस ब्लू प्रिंट को पूरी श्रद्धा से गुजरात में लागू करवा देंगे? ठीक है कि चुनावी मौसम में राजनेता विरोधियों पर हमले करते हैं. लेकिन ऐसी बातें करना भला कहां तक न्यायसंगत है कि प्रधानमंत्री पद की विश्वसनीयता ही सवालों के घेरे में आ जाए.

MODI-AIYAR

गुजरात के कैंपेन में पीएम की गलतबयानी

कहना मुश्किल है कि प्रधानमंत्री मोदी के सलाहकार उन्हें लगातार गलत सूचनाएं दे रहे हैं या फिर चुनाव का दबाव असर दिखा रहा है. मोदीजी अपने कैंपेन में लगातार कई ऐसी बातें कह रहे हैं, जो तथ्यात्मक रूप से गलत है.

कांग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर को कोट करते हुए प्रधानमंत्री ने पूछा- `अय्यर कह रहे हैं, मोदी नीच जाति में पैदा हुआ है, इसलिए नीच है, यह गुजरातियों का अपमान है या नहीं.’ मणिशंकर अय्यर का पूरा बयान यू ट्यूब पर पड़ा है, जिसे कोई भी देख सकता है. अय्यर ने पीएम के खिलाफ अपशब्द का प्रयोग जरूर किया लेकिन एक बार भी उन्होंने जाति का नाम नहीं लिया. जाति मोदीजी ने अपनी तरफ से जोड़ लिया ताकि वोटरों की हमदर्दी मिल सके.

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ऐसा ही कुछ कांग्रेस के कथित राजनेता सलमान निजामी के बयान के मामले में हुआ. मोदी ने सलमान निजामी को कांग्रेस का स्टार कैंपेनर और एक जिम्मेदार नेता बताया जबकि सच यह है कि ज्यादातर लोगों ने निजामी का नाम पहली बार पीएम के मुंह से ही सुना. मीडिया ने निजामी को ढूंढ निकाला, वह जम्मू में कहीं रहता है.

कांग्रेस का दावा है कि वह पार्टी का प्राथमिक सदस्य तक नहीं है. हालांकि निजामी ने कहा कि वह कांग्रेस से जुड़ा है लेकिन उसने साथ-साथ यह भी दावा किया कि उसका ट्विटर एकाउंट हैक किया गया था. मामला चाहे जो भी हो लेकिन ज्यादा गंभीर बात यह है कि देश के प्रधानमंत्री चुनावी जंग जीतने के लिए एक ऐसे अनजान आदमी को बड़ा बना रहे हैं, जिसे कोई नहीं जानता.

फर्ज कीजिये अगर कांग्रेस इसी राह पर चल पड़ी तो क्या होगा. अगर पाकिस्तान के लिए जासूसी करते पकड़े गये ध्रुव सक्सेना का फोटो दिखाकर हर रैली में जवाब प्रधानमंत्री से मांगा जाएगा तो राजनीति किस स्तर तक जाएगी? आसाराम बापू और गुरमीत राम रहीम जैसे ना जाने कितने ऐसे लोग हैं, जिनकी शान में प्रधानमंत्री ने भाषण दिए हैं और वे तमाम लोग संगीन इल्जाम में जेलो में बंद हैं. अब कोई वीडियो दिखा-दिखाकर प्रधानमंत्री पर उंगली उठाने लगे तो इस देश में राजनीतिक मर्यादा का क्या होगा?

Bhuj: Prime minister Narendra Modi being felicitated by the BJP workers during a public meeting in Bhuj on Monday. PTI Photo (PTI11_27_2017_000043B)

गुजरात के भुज में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चुनाव प्रचार करते हुए

विकास से विभाजक राजनीति तक

2003 के बाद से नरेंद्र मोदी की छवि एक ऐसे राजनेता की रही है, जिसकी बुनियादी सोच में विकास है. मोदी समर्थक लगातार यह दावा करते आए हैं कि गुजरात दंगों के बाद मोदीजी की गलत छवि पेश की गई. दरअसल वे समाज के सभी तबकों को साथ लेकर चलने वाले व्यक्ति हैं और `सबका साथ सबका विकास’ चाहते हैं. 2014 के चुनाव में भी यही नारा लगा और देश की जनता ने मोदी के इस दावे पर अपनी मुहर लगाई.

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लेकिन गुजरात के कैंपेन में कहानी बदल चुकी है. विकास कहीं नही है. प्रधानमंत्री तक की रैली में पूछा जा रहा है कि मंदिर चाहिए या मस्जिद. पूरी चुनावी लड़ाई को हिंदू बनाम मुस्लिम बनाने की कोशिशें बदस्तूर जारी हैं. यह भारतीय राजनीति का पतन बिंदु है या नहीं इस पर बहस हो सकती है. लेकिन इसमें कोई शक नहीं है कि प्रधानमंत्री की विकास पुरुष वाली छवि पूरी तरह से सवालों के घेरे में है. क्या वे इस छवि को बचाना चाहते हैं या फिर उनकी राजनीति जिस दिशा में निकल पड़ी है, वह 2019 तक वैसे ही चलेगी? यह एक ऐसा सवाल है, जिसका जवाब सिर्फ मोदीजी दे सकते हैं.

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