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गुजरात चुनाव 2017: मणि कुर्बान हुआ इलेक्शन तेरे लिए...

बदजुबानी राजनीति का श्रृंगार है. जुबान सबकी फिसलती है लेकिन गाज किस्मत के मारे मणिशंकर अय्यर जैसे चंद लोगों पर ही गिरती है

Rakesh Kayasth Updated On: Dec 09, 2017 01:43 PM IST

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गुजरात चुनाव 2017: मणि कुर्बान हुआ इलेक्शन तेरे लिए...

मुन्नी बदनाम हुई थी, मणि कुर्बान हो गए. मणि यानी मणिशंकर अय्यर. कांग्रेस से बौद्धिक लेकिन बड़बोले नेता. जोश-जोश में प्रधानमंत्री को नीच कह डाला और बदले में कांग्रेस ने उन्हें सस्पेंड कर दिया. लेकिन बदजुबानी का यह ना तो पहला मामला था और ना आखिरी होगा. सार्वजनिक सभा से लेकर संसद तक भारतीय राजनेता जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल करते हैं और विरोधियों को जिन विशेषणों से सम्मानित करते हैं, अगर कोई उनकी लिस्ट बनाने बैठे तो ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी से भी मोटी किताब तैयार होगी.

नेता बड़ी सफाई से अपने बयानों पर लीपापोती कर देते हैं और बात आ गई हो जाती है. प्रधानमंत्री की शान में हुई गुस्ताखी से गुजरात के चुनाव में अगर सीधे नुकसान का डर नहीं होता तो कांग्रेस भी मामले को नजरअंदाज कर देती और मणिशंकर अय्यर बेदाग बच जाते. मणिशंकर अय्यर ने अपनी सफाई में कहा- 'मैं अंग्रेजी में सोचकर हिंदी में बोलता हूं. मैने `लो’ का अनुवाद नीच किया और मुझे बाद में पता चला कि वह गलत था.'

नीच का `नीश’ हो जाता तो?

अय्यर ने थोड़ा दिमाग दौड़ाया होता तो वे कह सकते थे कि मैंने नीच कहा ही नहीं, मैंने अंग्रेजी में `नीश’ कहा था. मार्केटिंग की दुनिया में यह शब्द लीक से हटकर या किसी खास चीज को बताने के लिए किया जाता है. तो नीच को `नीश’ बताकर अय्यर ना सिर्फ खुद को बचाते बल्कि एक दिन मौका देखकर बीजेपी का दामन भी थाम सकते थे. वैसे भी कांग्रेस में उनकी हालत बुरी है.

मणिशंकर अय्यर ने चंद दिनों पहले राहुल गांधी की ताजपोशी की तैयारियों पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि इसमें कोई बड़ी बात नहीं है. मुगलों में भी तो एक बादशाह के बाद उसका बेटा उसकी जगह लेता था. बीजेपी और खुद प्रधानमंत्री ने अय्यर के इस बयान में से मुगल शब्द को लपक लिया. देखा जाए तो कांग्रेस में रहकर भी अय्यर एक तरह से काम बीजेपी का ही कर रहे हैं. उन्हें बचाव के लिए सिर्फ नीच को `नीश’ बनाने की जरूरत थी. पहले भी बहुत से नेताओं ने ऐसी कलाकारी की है और विवाद खड़ा करने के बाद बेदाग बच निकले हैं. आपको बहुत से ऐसे किस्से याद होंगे. आइये कुछ कहानियां फिर से याद करते हैं.

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बच्चा-बच्चा राम का, राघवजी के काम का

मध्य-प्रदेश की बीजेपी सरकार के बुजुर्ग मंत्री राघवजी सेक्स स्कैंडल में फंस गए थे. कम उम्र के अपने घरेलू नौकर के साथ शारीरिक संबंध बनाते हुए राघवजी का वीडियो वायरल हो गया. कुर्सी तो गई ही उन्हें जेल भी जाना पड़ा था. कांग्रेस के सीनियर लीडर दिग्जविजय सिंह ने इस घटना पर चुटकी लेते हुए ट्वीट किया- 'बच्चा-बच्चा राम का, राघवजी के काम का.'

इस बयान पर बहुत हंगामा हुआ. लोगों ने इसे घटिया सोच वाला और धार्मिक भावनाओं को चोट करने वाला बताया. विवाद बढ़ा तो दिग्विजय ने सफाई में कहा- मेरा बीजेपी नेता राघवजी से क्या लेना-देना? मैं तो उन राघवजी की बात कर रहा था, जिनका मंदिर हमारे इलाके में है. हमारे यहां का बच्चा-बच्चा उनकी पूजा करता है. अपनी बात को सही ठहराने के लिए दिग्विजय सिंह ने बाकायदा पत्रकारों को राघवजी के मंदिर चलने का न्यौता भी दिया.

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शूट नहीं `शूट’ करने को कहा था

दिग्विजय सिंह के राज्य की उमा भारती अपने गर्म मिजाज तेवर के लिए मशहूर रही हैं. इस समय केंद्रीय मंत्री हैं, लेकिन एक समय बीजेपी से अलग होकर उन्होंने अपनी भारतीय जन शक्ति नाम की एक पार्टी बनाई थी. इसी दौरान उमा ने गुजरात की यात्रा की थी और तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को विनाश पुरुष बताया था. उमा की पार्टी 2008 में मध्य प्रदेश विधानभा का चुनाव भी लड़ी थी. इसी दौरान उन्होंने अपनी पार्टी के महासचिव अमित राय को सार्वजनिक तौर पर थप्पड़ जड़ दिया था.

लेकिन उमा की जुबान फिसलने और उस पर लीपापोती की कहानी इन बातों से कहीं ज्यादा दिलचस्प है. मध्य प्रदेश के एक राजनीतिक कार्यक्रम में भीड़ में मौजूद किसी आदमी से उमा अचानक इस कदर नाराज हुईं कि उन्होंने उसकी तरफ उंगली से इशारा करते हुए अपने गनमैन को अंग्रेजी में कहा- 'शूट दैट मैन!'

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दिल्ली की इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने खबर को हाथोंहाथ लपक लिया. `शूट दैट मैन’ के नाम चैनलों पर कार्यक्रम चलने लगे. दोपहर बाद उमाजी सफाई देने कैमरे के सामने आईं और बोली- मैं किसी को गोली मारने की बात कैसे कर सकती हूं. मैंने तो कहा था कि कैमरे से शूट कर लो. न्यूज एंकरों ने उनसे सवाल किया कि इतने गुस्से में गनमैन से शूट दैट मैन कहने का क्या मतलब था, क्या गनमैन बंदूक के बदले कैमरा उठाकर शूट करता? लेकिन उमा भारती अपनी बात पर अड़ी रहीं.

बाबा रामदेव का `हनीमून’ प्रसंग

2014 के चुनाव में देशभर में घूम-घूमकर बीजेपी के लिए प्रचार करते बाबा रामदेव के सिर पर पॉलिटक्स का बुखार जोरो से चढ़ा था. रामलीला मैदान कांड पर वे कांग्रेस को पानी-पीकर गालियां देते थे और राहुल गांधी के लिए पप्पू से लेकर भोंदू तक तमाम विशेषणों का इस्तेमाल करते थे. इसी जोश में बाबाजी एक तगड़ा कांड कर बैठे.

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रामदेव ने कहा, `राहुल गांधी पिकनिक करने और हनीमून मनाने के लिए दलितों के घर में जाता है, लेकिन वह किसी दलित की लड़की से शादी नहीं करेगा.’ घनघोर आपत्तिजनक बयान के बाद पूरे भारत में जगह-जगह बाबाजी के पुतले जलाये जाने लगे. लेकिन ज्यादा बड़ा चक्कर कानूनी पचड़े का था. महिला आयोग से एसटीएसी कमीशन तक कई जगह मामले का संज्ञान लिया गया.

हाल बिगड़ता देखकर योगगुरु बोले- मैंने राजनीतिक अर्थ में हनीमून बनाने की बात कही थी. पूरा बयान राहुल गांधी की निजी जिंदगी और उनकी शादी पर था. लेकिन बाबाजी ने हाथ जोड़कर कहा कि बयान राजनीतिक अर्थ में था. जैसे-तैसे मामला ठंडा पड़ा था. उसके बाद से बाबाजी ने अपनी जुबान पर ताला लगा दिया. भारत माता की जय ना बोलने वाली गर्दन काटने वाले बयान को छोड़कर उन्होंने बहुत समय से कुछ विवादित नहीं कहा है.

पार्टी की बहूरानी बनाम टीवी की बहूरानी

ज्यादा पुरानी बात नहीं है. किसी न्यूज चैनल पर कांग्रेस के संजय निरुपम और बीजेपी के संबित पात्रा एकदूसरे से गुत्थम-गुत्था थे. राहुल गांधी को शाहजादा और युवराज कहे जाने से तमतमाये संजय निरूपम ने स्मृति ईरानी को बहूरानी कहा. इस पर संबित पात्रा कुछ इस तरह भड़के कि ऐसा लगा कि स्टूडियो में ही दोनों नेताओं के बीच हाथापाई हो जाएगी.

Lucknow : Textiles Minister and BJP leader Smriti Irani addresses a press conference at the party office in Lucknow on Saturday. PTI Photo by Nand Kumar (PTI2_4_2017_000189B)

संबित पात्रा ने कहा- 'आपने स्मृति ईरानी को पहले भी बहूरानी कहा था. दोबारा कहने की हिम्मत मत कीजिएगा, मैं आपको चेतावनी देता हूं.' दोनों नेता एक-दूसरे पर चिल्लाये. जब संबित पात्रा ने अपनी चेतावनी दोहराई तो संजय निरुपम ने कहा- 'बहुत देखे हैं, चेतावनी देनेवाले.'

निरुपम का दावा था कि स्मृति ईरानी छोटे पर्दे पर बहूरानी के रूप में स्थापित रही हैं, इसलिए उन्होंने उनके लिए यह विशेषण इस्तेमाल किया. इसमें कुछ गलत नहीं है. संबित पात्रा ने क्या समझा यह स्पष्ट नहीं हो पाया. लेकिन जो बात स्पष्ट हुई वो यह कि कौन किस नाम से पुकारा जाए, उसका अधिकार उस व्यक्ति पर छोड़ दिया जाना चाहिए. राजनीतिक विरोधियों पर उनकी मर्जी के खिलाफ विशेषण थोपना सही नही है.

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नीतीश बाबू का डीएनए

लेकिन बिना विशेषणों के राजनीति कहां चलती है. बीजेपी ने राहुल गांधी के लिए पप्पू नाम इजाद किया और सोशल मीडिया के जरिए उसे घर-घर तक पहुंचा दिया. विशेषणों के इस्तेमाल के मामले में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी किसी से पीछे नहीं हैं. विरोधियों पर किये गए उनके हमलों में रचनात्मकता होती है. भाषा का स्तर कैसा होता है, इस पर अलग-अलग राय हो सकती है.

मोदी ने तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के लिए देहाती औरत विशेषण का इस्तेमाल किया था. संसद में उन्होंने मनमोहन सिंह को रेनकोट पहनकर नहाने वाला व्यक्ति बताया. राहुल गांधी को मोदी ने जर्सी गाय का हायब्रिड बछड़ा बताया था. गुजरात के दंगे में मारे गये लोगों के बारे में पूछे जाने पर मोदीजी को गाड़ी के नीचे गलती से आ गये कुत्ते के बच्चे की याद आई थी और उनका दिल भर आया था. कांग्रेस का नाता मुगलों से जोड़ने का काम वे गुजरात के कैंपेन के दौरान लगातार कर रहे हैं.

 

लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा मोदीजी के जिस एक बयान की हुई, वह था- बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश को लेकर. बिहार की एक जनसभा में मोदी ने कहा था कि नीतीश जिस तरह अपने राजनीतिक साथियों को बार-बार छोड़ देते हैं, उससे लगता है कि डीएनए ही गड़बड़ है. नीतीश ने इसे एक बेहद भावनात्मक मुद्दा बना दिया और जेडीयू के समर्थक प्रधानमंत्री मोदी के नाम अपने बाल और नाखून के सैंपल डीएनए टेस्ट करवाने के लिए भेजने लगे.

Patna: Union Finance Minister Arun Jaitley and Bihar Chief Minister Nitish Kumar at a marriage ceremony in Patna on Sunday. PTI Photo (PTI12_3_2017_000164B)

सुशील मोदी के बेटे की शादी में वित्त मंत्री अरुण जेटली और नीतीश कुमार (फोटो: PTI)

मोदी के किसी बयान पर आमतौर पर बीजेपी सफाई नहीं देती क्योंकि ऐसा माना जाता है कि वे जो कुछ कहते हैं, वह पूरी तरह ठीक कहते हैं. लेकिन मामला बिगड़ा तो बीजेपी को यह कहना पड़ा कि मोदी का मतलब राजनीतिक डीएनए से था. वैसे नीतीश के राजनीतिक डीएनए में भी जो दोष था, वह अब पूरी तरह मिट चुका है क्योंकि वे पुराने पार्टनर बीजेपी के साथ लौट चुके हैं.

चमड़े की जुबान फिसल जाती है

भारतीय राजनीति का जो अंदाज है, उसमें भाषा की मर्यादा के बने रहने की उम्मीद करना बेमानी है. कोई ऐसा दिन नहीं होता जब मर्यादा की धज्जियां उड़ाने वाले बयान नहीं आते. केंद्र के साथ ज्यादातर राज्यों में बीजेपी की सरकार है. बीजेपी की राजनीति स्वभाविक रूप से आक्रामक है, इसलिए सबसे ज्यादा विवादित बोल उसी की तरफ से आते हैं. लेकिन बदजुबानी में ज्यादातर पार्टियां अपने-अपने हिसाब से हाथ बंटा रही हैं.

भारतीय राजनीति के मर्यादा पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी से जुड़ा एक वाकया याद आता है. अटल जी संसद में अक्सर बड़े गर्व से अपना एक फेवरेट डायलॉग दोहराया करते थे- 'अध्यक्ष महोदय 40 साल से प्रतिपक्ष में हूं, आज तक कभी मर्यादा का उल्लंघन नहीं किया. यही डायलॉग बोलते हुए अटल जी एक बार कह गए- मैंने कभी मर्यादाओं का पालन नहीं किया. सदन में ठहाके गूंज उठे.

खुद अटल जी भी हंसने लगे और बोले- क्या करें अध्यक्ष महोदय चमड़े के जुबान है, कभी-कभी फिसल जाती है. काश! आज के नेताओं की जुबान भी अटल जी की तरह ही फिसलती. वह फिसलती हुई जुबान भी कुछ ऐसी थी कि हर कोई सुनना चाहता था, आजकल की संभली हुई जुबान में भी ऐसी फिसलन होती है कि तौबा-तौबा!

Gujarat Election Results 2017

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