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गुजरात चुनाव: केशुभाई पटेल से कितना अलग है हार्दिक पटेल का विरोध?

हार्दिक युवाओं के नायक बने हुए हैं मगर गिनती वोट में बदल पाएगी

Amitesh Amitesh Updated On: Dec 06, 2017 01:06 PM IST

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गुजरात चुनाव: केशुभाई पटेल से कितना अलग है हार्दिक पटेल का विरोध?

हार्दिक पटेल की रैलियों में जुट रही भीड़ के बाद पूरे गुजरात में चर्चा इसी बात की हो रही है कि पाटीदार आंदोलन के नायक के तौर पर उभरे इस लड़के की रैली का कितना असर पड़ेगा? क्या हार्दिक की रैलियों में उमड़ रही भीड़ उनके कहने के मुताबिक बीजेपी के खिलाफ मतदान करेगी या फिर भीड़ महज हार्दिक को देखने भर ही आ रही है?

राजकोट की रैली हो या फिर सूरत का रोड शो हार्दिक की रैली में आए युवा पाटीदार हार्दिक के साथ दिख रहे हैं. उन्हें ना तो हार्दिक की सीडी के बाद किसी तरह का मलाल है और ना ही उन्हें किसी दूसरे बात की परवाह. हार्दिक की रैली में इन युवाओं की मौजूदगी उस करंट का एहसास कराती है जो किसी नायक के साथ जनता को सीधे जोड़ने वाली होती है.

हार्दिक पटेल की रैली में जुट रही भीड़ को लेकर चर्चा और तुलना पिछले विधानसभा चुनाव में केशुभाई पटेल की रैली और उसमें जुट रही भीड़ से की जा रही है. 2012 में जब केशुभाई पटेल ने अलग पार्टी बनाकर चुनाव लड़ा था तो उस वक्त भी पटेल फैक्टर की चर्चा हो रही थी. उनके साथ भी नाराज पटेल समुदाय के जाने की चर्चा होती रही, लेकिन, वोटिंग के वक्त केशुभाई का साथ छोड़ पटेल समुदाय ने फिर से बीजेपी को ही वोट कर दिया था.

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2012 के चुनाव में केशुभाई पटेल के अलावा उनका एक और विधायक चुनाव जीता था. केशुभाई की पार्टी गुजरात परिवर्तन पार्टी यानी जीपीपी को महज दो सीटें आई थीं और वोट था 3.6 फीसदी. ये अलग बात है कि जीपीपी का बाद में बीजेपी में ही विलय हो गया था.

केशुभाई का पटेलों ने साथ क्यों नहीं दिया?

आखिर क्या कारण रहा कि केशुभाई पटेल के मैदान में रहने के बावजूद पटेल समुदाय ने उनका साथ नहीं दिया? इसको जानने के लिए हमें पटेल समुदाय के बारे में कुछ और पहले की राजनीति को समझना होगा.

गुजरात में करीब 15 फीसदी पटेल वोटर हैं जिनमें 60 फीसदी लेउवा पटेल और 40 फीसदी कडवा पटेल की तादाद है. पटेल समुदाय काफी पहले सत्तर के दशक तक कांग्रेस के साथ था. लेकिन, जब कांग्रेस के नेता माधव सिंह सोलंकी ने खाम (KHAM) का फॉर्मूला निकाला जिसमें क्षत्रिय, हरिजन यानी दलित, आदिवासी और मुस्लिम को मिलाकर गुजरात में एक समीकरण बनाया. इसके दम पर कांग्रेस को बड़ी जीत मिल गई. लेकिन, पटेल समुदाय उस वक्त से ही अपने-आप को उपेक्षित महसूस करने लगा.

फिर धीरे-धीरे बीजेपी के साथ पटेल समुदाय जुड़ने लगा. 1995 में जब बीजेपी की सरकार बनी तब से ही पटेल समुदाय बीजेपी के ही साथ रहा है. जब लेउवा समाज के केशुभाई पटेल को हटाकर नरेंद्र मोदी को गुजरात का मुख्यमंत्री बना दिया गया तब भी पटेल बीजेपी के ही साथ जुडे रहे. ऐसा मोदी की उस विकास-नीति के परिणामस्वरूप हुआ जिसमें उन्होंने पटेल बाहुल्य सौराष्ट्र के लिए बहुत कुछ किया था.

हार्दिक पटेल की पिछली रैली में आई भीड़ चर्चा का विषय रही थी

हार्दिक पटेल की पिछली रैली में आई भीड़ चर्चा का विषय रही थी

सौराष्ट्र में पानी की समस्या से जूझ रहे लोगों को कई मील पैदल जाना पड़ता था. मोदी की नीति ने उनके घर-घर तक पानी सप्लाई कराया. गांवों में चौबीस घंटे बिजली की व्यवस्था हो पाई. किसानों के लिए भी बिजली-पानी का पूरा इंतजाम कर उनकी परेशानी को काफी हद तक दूर किया गया. अपना व्यापार करने वाले पटेल समुदाय के लोगों ने भी मोदी-राज में बिना किसी परेशानी के अपने व्यापार को और आगे बढाया. यूं कहें कि मोदी के मुख्यमंत्री रहते गुजरात में पटेल समुदाय को वो सबकुछ मिला जो वो पाना चाहता था. पटेल समुदाय का विकास भी हुआ और सम्मान भी मिला.

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2012 के विधानसभा चुनाव के वक्त भी कुछ इसी तरह का माहौल दिखा था. उस वक्त भी पटेलों के मन में केशुभाई पटेल को लेकर एक सहानुभूति थी. उन्हें लगा कि केशुभाई को किनारे लगा दिया गया है. नाराजगी कई पटेल बहुल इलाके में दिख भी रही थी. लेकिन, पटेल समुदाय ने केशुभाई जैसे कद्दावर नेता को छोड़कर मोदी और बीजेपी का साथ दे दिया. नतीजा यही रहा बीजेपी एक बार फिर से लगभग दो तिहाई बहुमत से गुजरात की सत्ता में काबिज हो गई.

तो क्या इस बार भी वैसा ही होगा, क्या हार्दिक का साथ छोड़कर पटेल फिर से बीजेपी के लिए वोट करेंगे. यही सवाल इस बार भी सबके जेहन में चल रहा है. लेकिन, दोनों में तुलना करें तो दोनों के व्यक्तित्व और अनुभव में बहुत बड़ा अंतर दिख रहा है.

केशुभाई पटेल से कितने अलग हैं हार्दिक?

केशुभाई पटेल जब मुख्यमंत्री पद से हटाए गए तो उसके बाद धीरे-धीरे वो पार्टी के भीतर हाशिए पर चले गए. केशुभाई का नाम बड़ा था, लेकिन, पार्टी में उनका प्रभाव धीरे-धीरे कम होता गया. 2012 आते-आते केशुभाई का प्रभाव खत्म होता गया लेकिन, उन्हें इस बात का एहसास ही नहीं हुआ.

धीरे-धीरे जनता में अपनी पकड़ खोते जा रहे केशुभाई पटेल ने अलग पार्टी बनाकर मोदी को चुनौती दी. लेकिन, तबतक कमजोर हो चुके पुराने कद्दावर केशुभाई पटेल कुछ कमाल नहीं कर पाए. उन्हें समाज से सम्मान तो मिला लेकिन, उनके पक्ष में मतदान नहीं हुआ.

हालाकि केशुभाई पटेल के अलावा भी बीजेपी के भीतर कई ऐसे नेता हुए जो अलग होकर भी कुछ नहीं कर पाए. उनकी काबिलियत और उनका कद सिर्फ पार्टी और संगठन के दम पर ही था.

अलग होकर उनकी लोकप्रियता का सारा तिलिस्म टूट गया. मसलन, यूपी में कल्याण सिंह से लेकर मध्यप्रदेश में उमा भारती तक या फिर अलग होकर राष्ट्रीय जनता पार्टी बनाने वाले गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री शंकर सिंह वाघेला तक, सबका एक ही हाल हुआ. कुछ ऐसा ही केशुभाई के साथ भी होना था जो कि 2012 में उनके साथ हो गया.

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लेकिन, हार्दिक पटेल 23 साल का एक नौजवान है जो कि ना ही किसी संगठन की उपज है और ना ही किसी पार्टी का कार्यकर्ता. आरक्षण को लेकर चलाए जा रहे आंदोलन की आग में हार्दिक एक नायक के तौर पर उभर कर सामने आ गया.

इस लड़के का कद केशुभाई पटेल के कद से तुलना लायक भी नहीं है. लेकिन, तुलना इसलिए करना पड़ रही है क्योंकि हार्दिक के साथ लोग खड़े दिख रहे हैं. पिछली बार चुनाव में केशुभाई पटेल को लेकर चर्चा थी तो इस बार हार्दिक पटेल को लेकर ही चर्चा हो रही है. बीजेपी को अगर इस चुनाव में चिंता हो रही है तो हार्दिक पटेल की रैली में जुटी भीड़ को लेकर ही हो रही है.

युवाओं का साथ मिल सकता है हार्दिक को

हार्दिक पटेल कई साथी धीरे-धीरे बीजेपी का दामन थाम चुके हैं. बीजेपी ने आरक्षण के फॉर्मूले को भी बेमतलब बता दिया है. हार्दिक को कांग्रेस का एजेंट बता रही है. फिर भी हार्दिक के साथ पटेल समाज का युवा वर्ग काफी हद तक दिख रहा है.

हार्दिक पटेल की छवि एक नायक की बन गई है. हार्दिक को लेकर बीजेपी का सभी दांव उल्टा पड़ा है. हार्दिक की रैली में लाठीचार्ज हो या फिर जेल में डालने की बात या फिर देशद्रोह का मुकदमा दायर करना. यहां तक कि गुजरात से तड़ीपार भी करने के बावजूद हार्दिक पटेल का युवाओं से एक कनेक्शन दिख रहा है.

राजकोट की हार्दिक की रैली में आए युवाओं का यही कहना था कि हम हार्दिक का साथ देंगे. संजय पटेल और तुलसी पटेल ने हार्दिक के कहने पर कांग्रेस को वोट देने की बात भी कही. हालाकि ये दोनों अबतक बीजेपी के साथ ही रहे थे. यहां तक कि पिछले चुनाव में भी इन्होंने केशुभाई के बजाए बीजेपी को ही वोट किया था.

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तथाकथित सेक्स सीडी के सार्वजनिक होने के बाद भी हार्दिक पटेल को लेकर उनके समर्थकों पर कोई असर नहीं दिख रहा है. जबकि कुछ इसी तरह के विवादों ने बीजेपी के पूर्व संगठन महासचिव संजय जोशी को हाशिए पर डाल दिया था. हार्दिक ने उस सीडी को बीजेपी की साजिश के तौर पर दिखाने की कोशिश की है.

हार्दिक पटेल के साथ वो युवा तबका है जो 1995 के बाद या उसके थोड़ा पहले पैदा हुआ है. 18 से 30 साल के बीच युवाओं की उस टोली को उस दुर्दिन का एहसास नहीं है जो बीजेपी सरकार आने के पहले उनके परिवार वालों को बिजली और पानी जैसी समस्याओं को लेकर झेलना पड़ा था.

मोदी और शाह के लिए सबसे बड़ी चुनौती इस बार यही है. हार्दिक पटेल के साथ खडे दिख रहे इन युवाओं को कैसे समझाया जाए, यह एक गंभीर चुनौती है.

इससे भी बड़ी चनौती है कि 90 के दशक से कांग्रेस छोड बीजेपी के साथ रहे पटेलों को बीजेपी अबतक समझाती रही है कि कांग्रेस पटेलों की विरोधी रही है. इसका असर भी रहा है. केशुभाई पटेल जैसे बडे नेता के अलग होने के बावजूद पटेल बीजेपी के ही साथ रहे.

लेकिन, अब हार्दिक पटेल कांग्रेस को नहीं बीजेपी को ही पटेल विरोधी बताने में लगे हैं. पटेलों पर लाठीचार्ज, आनंदीबेन पटेल को हटाना और नितिन पटेल की जगह विजय रूपाणी को मुख्यमंत्री बनाना, इन सबके पीछे बीजेपी अध्यक्ष को ही निशाने पर रखा जा रहा है.

अब हार्दिक की इस अपील का असर कितना होगा इस बात की अग्निपरीक्षा जल्द ही होने वाली है.

इस वक्त सबसे बडा सवाल यही बना हुआ है क्या गुजरात का पटेल समाज 2012 की तरह एक बार फिर से केशुभाई पटेल की तरह हार्दिक पटेल का भी हाथ छोड़ेगा ? क्या पटेल समुदाय एक बार फिर गुजराती अस्मिता और मोदी के काम को याद कर अपने वाडा प्रधान के साथ ही जाएगा ? या इस बार कहानी कुछ और होगी ? यह सबसे बडा सवाल बना हुआ है.  हार्दिक पटेल की रैली में जुट रही भीड़ को कांग्रेस की तरफ से लाई गई भीड़ बताने वाली बीजेपी की बात क्या वाकई में सही साबित होगी. इसे जानने के लिए हमें 18 दिसंबर तक का इंतजार करना होगा.

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