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गुजरात चुनाव 2017: नाराज आदिवासियों ने राजनीतिक दलों से बनाई दूरी

दक्षिण गुजरात के आदिवासियों की ढेरों समस्याएं हैं, लेकिन उन्हें इस बात की जरा भी उम्मीद नहीं है कि, राजनीतिक दल कभी उनकी समस्याओं को सुनेंगे और उनका समाधान निकालेंगे

Updated On: Nov 28, 2017 12:24 PM IST

Pallavi Rebbapragada Pallavi Rebbapragada

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गुजरात चुनाव 2017: नाराज आदिवासियों ने राजनीतिक दलों से बनाई दूरी

बीजेपी ने गुजरात विधानसभा चुनाव में इस बार 'हो छूं विकास, हो छूं गुजरात' का नारा बुलंद कर रखा है. 'मैं हूं विकास, मैं हूं गुजरात' अभियान के जरिए राज्य में सत्तारूढ़ बीजेपी सरकार गुजरात के 4.33 करोड़ मतदाताओं को एक बार फिर से विकास के सब्जबाग दिखाना चाहती है. लेकिन समाज के अलग-अलग वर्गों के अलग-अलग नजरिया रखने वाले लोगों को महज एक नारे से एक साथ लाना आसान काम नहीं होता है. लोगों को किसी अभियान से जोड़ने के लिए सिर्फ रैलियां और कोरी बयानबाजी कारगर नहीं होती है.

गुजरात में समाज का एक वर्ग ऐसा है जो अरसे से अलग-थलग पड़ा हुआ है. ये लोग हैं गुजरात के आदिवासी. गुजरात के कुल मतदाताओं में आदिवासियों की तादाद लगभग 15 फीसदी है. साल 2011 की जनगणना के मुताबिक, गुजरात में अनुसूचित जनजातियों (एसटी) की जनसंख्या 89,17,174 थी. बीजेपी के वर्चस्व वाले राज्य में कुल 27 जनजातीय (एसटी) सीटें है, जिनमें से 16 पर कांग्रेस का कब्जा है.

आदिवासी मतदाताओं का मूड जानने के लिए फ़र्स्टपोस्ट की टीम ने दक्षिण गुजरात का दौरा किया. इस दौरान तापी, नवसारी, सूरत और वलसाड जैसे आदिवासी बाहुल्य जिलों के कई गांवों में रुककर फ़र्स्टपोस्ट संवाददाता ने लोगों से बात की और उनकी समस्याएं समझने की कोशिश की.

सबसे पहले हम अनावल नाम के एक गांव में पहुंचे. दिलचस्प बात यह है कि, देसाई ब्राह्मण खुद को इसी गांव का मूल निवासी बताते हैं. लेकिन अब इस गांव में एक भी ब्राह्मण परिवार नहीं रहता है. 'समस्त आदिवासी समाज' नामक संगठन के गुजरात अध्यक्ष डॉ. प्रदीप गरासिया इस गांव में एक छोटा सा क्लिनिक चलाते हैं. डॉ. प्रदीप आज जब पाटीदार, दलित और ओबीसी समाज से ताल्लुक रखने वाले क्रमश: हार्दिक पटेल, जिग्नेश मेवाणी और अल्पेश ठाकुर जैसे युवा नेताओं को उभरते देखते हैं, तो मायूसी से भर जाते हैं. डॉ. प्रदीप को ऐसा लगता है कि, आदिवासियों को राजनीति की मुख्यधारा से पूरी तरह से अनदेखा कर दिया गया है.

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डॉ. प्रदीप ने आरोप लगाया कि, गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रूपाणी ने जूनागढ़ के गिर जंगलों में रहने वाले अनगिनत लोगों को फर्जी एसटी प्रमाण पत्र बांटे हैं. फर्जी एसटी प्रमाण पत्रों का ये वितरिण 14 जून 2017 को 14वें कुटियाना महोत्सव के दौरान किया गया.

डॉ. प्रदीप गरासिया के मुताबिक, 'जब तक आदिवासी समाज को सार्वजनिक विमर्श में हाशिए पर रखा जाएगा, तब तक लोग हमें सिर्फ एक विशेष 'श्रेणी' में रखे जाने वाले समुदाय के तौर पर ही देखेंगे. हमारी समस्याओं का अंत महज आरक्षण ही नहीं है.'

डॉ. प्रदीप ने आगे बताया, 'गुजरात लोक सेवा आयोग के तहत हाल ही में डिप्टी कलेक्टर के पद के लिए हुई भर्ती में जमकर धांधली की गई. डिप्टी कलेक्टर पद के वास्ते अनुसूचित जनजाति के आरक्षित 68 सीटों में से 27 पर फर्जी एसटी प्रमाण पत्र वाले लोगों को भर्ती कर लिया गया. हमने इस मामले में सरकार, राज्यपाल और एसटी कमीशन (अनुसूचित जनजाति आयोग) से शिकायत की है. इसके अलावा हम लोग आरटीआई भी डालने जा रहे हैं.'

डॉ. प्रदीप का कहना है कि, डिप्टी कलेक्टर पद की भर्ती में हुई धांधली से पूरा आदिवासी समाज आहत और परेशान है. केवल एसटी कमीशन ने ही उनकी शिकायतों का जवाब दिया है, और विश्वास दिलाया है कि मामले की जांच शुरू हो गई है.

दरअसल गिर के जंगलों में रहने वाले कुटियाना समुदाय के लोगों को तथाकथित फर्जी एसटी प्रमाण पत्र दो सरकारी प्रस्तावों के आधार पर बांटे गए हैं. पहला सरकारी प्रस्ताव साल 2007 में पारित हुआ था, जबकि दूसरा प्रस्ताव साल 2017 में वजूद में आया. 26 जून, 2007 को पारित किए गए पहले सरकारी प्रस्ताव में, 'माता-पिता' शब्द का अर्थ गलत तरीके से 'पूर्वजों' के तौर पर लगाया गया.

डॉ. प्रदीप के मुताबिक, 'सरकार के पहले प्रस्ताव का मतलब यह है कि, अगर जूनागढ़ के गिर, बरदा और अलेच के जंगलों में रहने वाले लोग उस क्षेत्र में अपने पूर्वजों का मूल ढूंढ सकें, तो वह लोग अनुसूचित जनजाति के तहत आरक्षण पाने के हकदार हो जाएंगे. इसी प्रकार का प्रावधान साल 2017 में पारित सरकारी प्रस्ताव में रखा गया. जिसके चलते, वर्तमान में उन क्षेत्रों में रहने वाले ज्यादातर लोग आरक्षण के दायरे में आ गए.

डॉ. प्रदीप का कहना है कि साल 1956 में इस इलाके के स्थानीय लोगों को एसटी का दर्जा दिया गया था. लेकिन अब ऐसे लोग जिनके वंशज अन्य जगहों पर रहते हैं, उन्हें भी एसटी के रूप में गिना जाने लगा है. इस गड़बड़झाले में फर्जी जाति प्रमाण पत्र बहुत बड़ी भूमिका निभा रहे हैं. राजनीतिक दलों के फरेब और चालबाजियों से डॉ. प्रदीप समेत ज्यादातर आदिवासी बुरी तरह मायूस हैं. इन लोगों ने अब राजनीतिक पार्टियों से किसी भी तरह की उम्मीद करना ही छोड़ दिया है.

डॉ. प्रदीप के मुताबिक, 'हमारी पहचान को मिटाने की लगातार कोशिशें हो रही हैं. चाहे बीजेपी हो या कांग्रेस, किसी को भी हमारी परवाह नहीं है.'

जनवरी में, गुजरात सरकार ने नियम-2017 के तहत 4,503 ग्राम सभाओं में पीईएसए यानी पंचायत (एक्सटेंशन टू शेड्यूल्ड एरियाज) एक्ट लागू करने का ऐलान किया था. ऐसा ग्राम सभाओं को मजबूत बनाने के उद्देश्य से किया गया है.

सरकार का मानना है कि, पंचायत एक्ट से आदिवासियों की कर्ज और ब्याज संबंधी समस्याओं का हल निकल सकेगा, साथ ही उन्हें महाजनों के मायाजाल से भी मुक्ति मिलेगी. लेकिन, गायकवाड़ी कस्बे के व्यारा गांव में रहने वाले सामाजिक कार्यकर्ता विरल कोनकाणी पीईएसए एक्ट पर सरकारी दावों को सिरे से नकार देते हैं. विरल लंबे अरसे से जनजातीय लोगों के अधिकारों की लड़ाई लड़ते आ रहे हैं. उनके मुताबिक, पीईएसए से आदिवासी समाज की किस्मत नहीं बदलने वाली है.

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पीईएसए एक्ट को साल 1996 में भूरिया कमेटी की सिफारिशों के आधार पर पारित किया गया था. यह एक्ट उन क्षेत्रों की ग्राम सभाओं को शक्ति देने के लिए तैयार किया गया था, जो संविधान की पांचवीं अनुसूची के तहत आते हैं. दरअसल संविधान की पांचवीं अनुसूची के तहत राज्यपाल के पास संसद और राज्य विधानसभा द्वारा पारित कानूनों को अपनाने और उनके प्रयोग की शक्तियां होती हैं. संविधान की पांचवीं अनुसूची कहती है कि, जनजातीय वर्चस्व वाले क्षेत्रों के गांवों और कस्बों का संचालन करने के लिए पंचायती राज एक्ट और नगरपालिका एक्ट के तहत अलग-अलग कानून हैं.

कोनकाणी के मुताबिक, 'पीईएसए एक्ट को लागू करने के लिए एक आदिवासी सलाहकार समिति की जरूरत है. लेकिन गुजरात में बीते छह साल में इस समिति की केवल दो ही बैठकें हुईं हैं. इसके अलावा 2017 के पीईएसए एक्ट का स्वरूप 1996 के मूल एक्ट से बिल्कुल अलग है. पीईएसए एक्ट पर गौर करने पर हम पाते हैं कि, इसमें ग्राम सभाओं के लिए किसी भी तरह की वास्तविक शक्ति छोड़ी ही नहीं गई हैं. सरकार इस मामले में बहस और चर्चाओं के जरिए सिर्फ जुबानी जमा खर्च कर रही है.'

कोनकाणी को आदिवासी की जगह वनवासी शब्द के इस्तेमाल पर भी सख्त ऐतराज है. उनका कहना है कि, सरकार की 'वनवासी कल्याण योजना' में वनवासी शब्द के इस्तेमाल से बहुत भ्रम फैल रहा है. वनवासी शब्द की वजह से लोगों को लगता है कि, जंगली इलाके में रहने वाला हर शख्स आदिवासी होता है.

कोनकाणी, जो खुद आदिवासी समाज से संबंध रखते हैं, उनके मुताबिक, 'आदिवासी लोग सांस्कृतिक और सामाजिक रूप से हिंदुओं से बिल्कुल अलग होते हैं. लिहाजा हमारी पहचान मिटाने के जो प्रयास हो रहे हैं, उनका हम पुरजोर विरोध कर रहे हैं.'

तस्वीरः पल्लवी

तस्वीरः पल्लवी

हाईवे पर जमकी नाम का एक छोटा सा गांव है. आदिवासी बाहुल्य इस गांव के ज्यादातर लोग कांग्रेस के समर्थक हैं. यहां मर्दों में अब भी गांधी टोपी पहनने का रिवाज है. जमकी गांव की प्रमुख प्रवीणा बेन गामित का कहना है कि, हमारे समाज के पढ़े-लिखे लड़के-लड़कियां टीचर्स ट्रेनिंग टेस्ट (टीएटी) परीक्षा तक में कामयाबी हासिल नहीं कर पाते हैं. यहां तक कि बीए और एमए की डिग्री रखने वाले लोगों को भी टीएटी परीक्षा में फेल कर दिया जाता है. इस गांव में पीने के पानी की भी बड़ी समस्या है, वो भी तब जब उकाई बांध इस गांव से महज एक किलोमीटर की दूरी पर है.

जमकी गांव के लोगों पास इस बात का जवाब नहीं है कि वो कांग्रेस का समर्थन क्यों करते हैं. जब उनसे पूछा गया कि, क्या कभी कांग्रेस का कोई नेता उनसे उनकी समस्याएं जानने आया है, और क्या किसी नेता ने उनके मुद्दों के समाधान के लिए किसी तरह का आश्वासन दिया है, जो जवाब में सभी लोग खामोश हो गए. हालांकि गांव में कई लोग ऐसे नजर आए, जो अपने हाथ में कांग्रेस का झंडा थामे 'पंजा आएगा' का नारा लगा रहे थे.

व्यारा गांव में हमने कांग्रेस के पूर्व सांसद अमर सिंह जीनाभाई चौधरी से भी मुलाकात की. अमर सिंह 1971 से लेकर 1977 तक संसद के सदस्य रह चुके हैं.

अमर सिंह के मुताबिक, 'आदिवासियों की स्थिति समझने के लिए हमें इतिहास के पन्नों में झांकना होगा. जब मैं बड़ा हो रहा था, मुझे याद है तब, लखाली, करंजखेड़, पंचोर, असोपालाव और बेसनिया जैसे दूरस्थ स्थानों में लोगों के पास न तो पहनने के लिए कपड़े होते थे, और न ही खाने के लिए भोजन था. कांग्रेस सरकार ने इस इलाके में पहला प्राइमरी स्कूल खोला था. मैं 1966 में 25 साल की उम्र में कांग्रेस में शामिल हुआ था. जिसके बाद इलाके में कई बड़े बदलाव आए. कई लोग जो किराएदार थे वो खेतीहर जमीनों के मालिक बन गए.'

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लेकिन अब अमर सिंह राजनीतिक दलों के रवैए से बहुत दुखी हैं. उन्हें लगता है कि ज्यादातर पार्टियों के नेताओं को अब गरीबों की कोई चिंता नहीं है. अमर सिंह के मुताबिक, 'पहले कांग्रेस अलग हुआ करती थी, तब पार्टी का व्यवसायीकरण नहीं किया गया था. कांग्रेस के नेता ईमानदारी के साथ जनता की भलाई के लिए काम किया करते थे. लेकिन अब, लगभग सभी नेता सिर्फ अपने फायदे के लिए काम करते हैं, वो चाहे बीजेपी के नेता हों या कांग्रेस के नेता.'

हाईवे पर चलते हुए हम वेदची गांव स्थित गांधी आश्रम पहुंचे. आजादी की लड़ाई के दौरान यह गांव दक्षिण गुजरात में स्वतंत्रता आंदोलन का केंद्र हुआ करता था. यहां हमारी मुलाकात पुराने गांधीवादी अशोक चौधरी से हुई. अशोक चौधरी इस आदिवासी इलाके की बहुत मशहूर हस्ती हैं. अशोक चौधरी की मां दशरी बेन और पिता कांजी भाई ने ही कस्तूरबा गांधी को जेल में पढ़ना- लिखना सिखाया था.

गांधीवादी पर्यावरणविद् अशोक चौधरी का मानना है कि, कांग्रेस और बीजेपी समेत सभी राजनीतिक दल पर्यावरण के लिए आदिवासियों के महत्व को समझने में नाकाम रहे हैं. लिहाजा यह जिम्मेदारी अब जनता के जिम्मे आ गई है. ऱाजनीति ने सामुदायिक भावना, भाईचारे और पर्यावरण के अनुकूल (ईको फ्रेंडली) जीवन पद्धति को तबाह करके रख दिया है.

अशोक चौधरी पर्यावरण के मुद्दे पर ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी के रस्किन कॉलेज में लेक्चर दे चुके हैं. इसके अलावा उन्होंने 1992 में रियो डी जनेरियो में हुई अर्थ समिट के दौरान दुनियाभर से आए पर्यावरणविदों को भी संबोधित किया था.

अशोक चौधरी के मुताबिक, 'कांग्रेस अपने पुराने मूल्यों को भूलती जा रही है. कांग्रेस पहले भूमि और धन वितरण संबंधी जो आर्थिक नीतियां बनाती थी, वो गरीबों को ध्यान में रखकर बनाई जाती थीं.'

वेदची गांव से दक्षिण की ओर कुछ किलोमीटर आगे बढ़ने पर सोनगढ़ आता है. गायकवाड़ राजाओं ने सोनगढ़ में एक पहाड़ी पर विशाल किला बनवाया था. सोनगढ़ इलाके का सबसे विकसित ताल्लुका माना जाता है. यहां कई बैंक और बड़ी-बड़ी दुकानों के साथ-साथ तीन मंजिला मकान भी नजर आते हैं. सोनगढ़ में हम बैंक ऑफ इंडिया के एक पूर्व कर्मचारी प्रमोद वाल्वी से मिले.

प्रमोद ने बताया कि, उकाई बांध के निर्माण के बाद इलाके के कुछ लोगों को नौकरी मिल गई है, जबकि ज्यादातर लोगों को रोजगार की तलाश में शहरों का रुख करना पड़ता है. वहीं इस गांव में बीजेपी ताल्लुका की नींव रखने वाले दिलीप भाई भट्ट का कहना है कि, इलाके में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ बहुत काम कर रहा है. यहां विकास के प्रति लोगों को फिर से उन्मुख करने में संघ की सबसे अहम भूमिका है.

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दिलीप भाई ने हमसे एकल विद्यालयों (एक शिक्षक वाले स्कूल) की संख्या में हो रहे इजाफे पर भी चर्चा की. इसके अलावा उन्होंने गरीब कल्याण मेलों का भी जिक्र किया. इन मेलों में गरीब लोगों को साइकिल और कपड़े वितरित किए जाते हैं. हालांकि दिलीप भाई को बीजेपी के विकासवाद से कुछ शिकायतें भी हैं. उन्हें लगता है कि, बीजेपी के मौजूदा नेता न सिर्फ जनसंघ के पुराने सदस्यों द्वारा किए गए कार्यों को तेजी से भूलते जा रहे हैं, बल्कि अपनी शक्ति को लेकर घमंडी भी बन गए हैं. दिलीप भाई कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में शामिल होने वाले नेताओं को पुराने वफादारों की तुलना में ज्यादा महत्व दिए जाने से भी खफा नजर आए.

हाईवे से हटकर संकरी सड़कों पर लंबी ड्राइव के बाद झगड़िया गांव आता है. इसी गांव में विधायक छोटू भाई वसावा का पैतृक घर है. वसावा ने ही हाल में हुए राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अहमद पटेल को वोट देकर उन्हें हारने से बचा लिया था. वसावा जेडीयू के विधायक हुआ करते थे. लेकिन शरद यादव और नीतीश कुमार के बीच छिड़ी वर्चस्व की लड़ाई के बाद वसावा का पार्टी से मोह भंग हो गया. जिसके बाद उन्होंने भारतीय ट्राइबल पार्टी का गठन किया है.

वसावा की पार्टी ने इस चुनाव में कांग्रेस के साथ गठबंधन किया है. कांग्रेस ने उन्हें चार सीटों पर टिकट दिया है. लेकिन फिर भी वसावा बड़ी राजनीतिक पार्टियों के रवैए से खुश नहीं है. फंर्स्टपोस्ट से बातचीत के दौरान वसावा ने कहा कि, बड़े दलों ने सिर्फ आदिवासियों की समस्याओं, मुद्दों और जरूरतों का राजनीतिकरण किया है. किसी भी पार्टी को संविधान की धारा 330 से लेकर 342 तक को ईमानदारी के साथ लागू करने में रुचि नहीं है.

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फिलहाल, इस आदिवासी इलाके की सबसे अहम जरूरत प्राथमिक शिक्षा के प्रति सही दृष्टिकोण बनाने की है. राज्य सरकार ने इस दिशा में कई प्रयास भी किए हैं. जिसके तहत अहमदाबाद, वडोदरा, सूरत, राजकोट, विद्या नगर और जामनगर में अनुसूचित जनजाति के विद्यार्थियों के लिए आश्रम शालाएं और समरस हॉस्टल खोले गए हैं. इन हॉस्टलों में भोजन की आपूर्ति सरकार की तरफ से की जाती है. वहीं एकलव्य मॉडल आवासीय स्कूलों में पूर्ण वेतन वाले शिक्षकों को नियुक्त किया गया है. इसके अलावा, सरकार ने आश्रम शालाओं के निर्माण के लिए 90 फीसदी अनुदान देने का फैसला भी किया है.

आश्रम शालाओं के साथ आरएसएस यहां अपने स्कूल भी चलाती है. हमने अहवा, धरमपुर और लिमड़ी के आदिवासी क्षेत्रों में ऐसे तीन स्कूलों की पहचान की, जिनका संचालन आरएसएस करता है.

हमने धरमपुर में आरएसएस द्वारा संचालित स्कूल का दौरा भी किया. इस स्कूल को साल 1979 में स्थापित किया गया था. स्कूल की दीवारों पर पौराणिक देवी-देवताओं के चित्र बने हुए थे. स्कूल परिसर में एक पंडित स्थायी तौर पर रहता है. जो रोजाना हवन करता है. स्कूल में बच्चों को मूर्तियां बनाना भी सिखाया जाता है.

इस इलाके में आदिवासी एकता परिषद नाम के एक संगठन ने जनजातीय लोगों के कल्याण के लिए राष्ट्रीय आंदोलन छेड़ रखा है. इस संगठन के सदस्य भूपेंद्र चौधरी ने भी आदिवासी बच्चों के लिए एक स्कूल खोल रखा है. लेकिन भूपेंद्र का स्कूल धरमपुर से करीब 60 किलोमीटर दूर है.

भूपेंद्र का कहना है कि, इस वक्त दूरदराज के आदिवासी क्षेत्रों में प्राथमिक शिक्षा पर खासा जोर दिया जा रहा है, लेकिन यहां पढ़ाई का जो पैटर्न है वो अजीबोगरीब है. कक्षा 8 और कक्षा 9 तक बच्चों की कोई परीक्षा नहीं होती है. स्कूलों में कई बच्चे अबतक शब्दों के उच्चारण ही सीख रहे हैं. भूपेंद्र का मानना है कि, आदिवासी समुदाय अबतक आधुनिक शिक्षा का लेश मात्र भी लाभ नहीं उठा पाया है.

दक्षिण गुजरात के आदिवासियों की ढेरों समस्याएं हैं, लेकिन उन्हें इस बात की जरा भी उम्मीद नहीं है कि, राजनीतिक दल कभी उनकी समस्याओं को सुनेंगे और उनका समाधान निकालेंगे. यही वजह है कि राजनीतिक पार्टियों के प्रति आदिवासियों की पुरानी वफादारी लुप्त होने लगी है. वहीं इस चुनाव में युवा आदिवासियों को मिले अपर्याप्त प्रतिनिधित्व ने इस खाई को और चौड़ा कर दिया है. जिसके चलते गुजरात का आदिवासी समाज आज अलग-थलग खड़ा दिखाई दे रहा है.

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