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कांग्रेस की इस बड़ी हार में उसके लिए भविष्य की तैयारियों के सबक भी छिपे हैं

हालांकि राहुल गांधी के पास जादू की छड़ी नहीं है, फिर भी कांग्रेस को खुश होना चाहिए कि भारत की राजनीति 2014 में फ्रीज नहीं हो गई है

Updated On: Dec 19, 2017 08:18 AM IST

Sandipan Sharma Sandipan Sharma

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कांग्रेस की इस बड़ी हार में उसके लिए भविष्य की तैयारियों के सबक भी छिपे हैं

अगर राहुल गांधी के पास कोई जादू की छड़ी होती तो वह इसकी मदद से समय को वहीं फ्रीज कर देते, जब सोमवार की सुबह घड़ी ने 9:30 बजाए थे. उस घड़ी, वह अपनी कुर्सी से उछल पड़े होंगे, हवा में मुट्ठी घुमाई होगी और सोचा होगा कि कांग्रेस ने आखिरकार गुजरात फतह कर लिया. उस समय, न्यूज चैनलों की टीवी स्क्रीनें दिखा रही थीं कि कांग्रेस चुनावी पायदान पर ऊपर चढ़ रही है और बहुमत के करीब पहुंचने की रेस में बीजेपी से आगे निकल रही है.

उफ्फ! आखिरकार वही ऐसा लम्हा था जब कांग्रेस जीत के करीब पहुंची थी.

कांग्रेस के साथ समस्या यह है कि राहुल के पास भले ही जादू की छड़ी ना हो, बीजेपी के पास है. इसके पास कमोबेश हैरी पॉटर के डबलडोर की तरह मंतर फेर देने की शक्ति है, जिससे कांग्रेस की चुनावी किस्मत पर ताला लग गया.

गुजरात चुनाव कांग्रेस के संकट की सटीक व्याख्या करता है. भूकंप, दंगों, जन आंदोलनों और नेतृत्व में कई बदलावों- राजीव गांधी से लेकर उनके बेटे तक - 22 साल के बाद कांग्रेस एक बार फिर पिछले चुनाव से कुछ ज्यादा सीटों के साथ खुद को विपक्ष की सीट पर पा रही है.

सबसे ज्यादा टीस वाली हार

लेकिन 1985 के बाद के सभी नुकसानों में यह सबसे ज्यादा टीस देगा. दशकों बाद पहली बार ऐसा हुआ था जब यह वास्तव में जीत के इतने करीब दिख रही थी. खुद के प्रयासों की कमी और अपनी किस्मत (हम भारतीय इसके लिए एक मुहावरा इस्तेमाल करते हैं: बिल्ली के भाग्य से छींका टूटा) के अलावा इसके लिए कोई और चीज जिम्मेदार नहीं है.

इस साल कांग्रेस पाटीदार और दलित आंदोलन की हवा पर सवार थी. जीएसटी, बेरोजगारी से परेशानी, सत्ता विरोधी लहर और नरेंद्र मोदी की अनुपस्थिति से इसे फायदा मिलने की उम्मीद थी. फिर भी कांग्रेस बीजेपी की बिल्ली के गले में घंटी नहीं बांध सकी.

इस नुकसान की एक ही वजह हो सकती है. कांग्रेस में मददगार हालात का फायदा उठाने की काबिलियत नहीं है. ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि यह गुजरात में खुद को मोदी और बीजेपी के एक मजबूत विकल्प के रूप में पेश कर पाने में नाकाम रही और इसके साथ ही इसके कार्यकर्ता बीजेपी-विरोधी भावना को वोट में तब्दील नहीं कर पाए. कांग्रेस को इस पर सोचना चाहिए क्योंकि इससे यह आभास पैदा होता है कि अगर मतदाता तख्तापलट करना चाहते हैं तो भी कांग्रेस स्वाभाविक उत्तराधिकारी नहीं है.

Ahmedabad: Congress President-elect Rahul Gandhi being felicitated at an election campaign rally at Popat Chokdi, Viramgam in Ahmedabad district on Monday. PTI Photo (PTI12_11_2017_000184B)

यह स्थिति बताती है कि 2019 के चुनाव से पहले बीजेपी का कोई विकल्प नहीं, यही भारतीय राजनीति का सबसे प्रभावी कारक है.

कांग्रेस अब अगर सोचती है कि इस साल कुछ अधिक सीटें जीतना उसकी नैतिक जीत है, तो वह भ्रम में जी रही है. कांग्रेस शायद उस बात को भी याद दिलाना चाहे कि 2012 के मुकाबले उसे चार प्रतिशत अधिक वोट मिले. लेकिन वास्तव में इसने पाटीदारों, कारोबारियों और बेरोजगार नौजवानों की उम्मीदों से धोखा किया है, जो बदलाव की फरियाद कर रहे थे. इसने बीजेपी को उखाड़ फेंकने का सुनहरा मौका गंवा दिया.

कांग्रेस को नहीं भूलना चाहिए कि उसकी बढ़त मुख्य रूप से सौराष्ट्र में हैं, जहां पाटीदार और किसानों ने मिलकर इसे कुछ अधिक सीटें दिलाई हैं. यह अन्य सभी क्षेत्रों में अपने मतदाता आधार को साथ रखने में नाकाम रही है, जो बताता है कि यह अभी भी 2012 वाली हालत में ही ठहरी हुई है. ऐसा मानने में कोई खराबी नहीं है कि हार्दिक पटेल को छोड़ दें तो, अपने नेताओं के भरोसे रहने पर कांग्रेस की और बुरी हालत होती.

इस वजह से नहीं मिला पाटीदार फैक्टर का फायदा

सौराष्ट्र से बाहर कांग्रेस के लिए कुछ भी नहीं बदला है. 2012 में यह गांव-आधारित पार्टी थी, जो शहरों और अर्ध-शहरी क्षेत्रों के लिए महत्वहीन थी. इस चुनाव में भी यह गुजरात के चार बड़े शहरों- सूरत, वडोदरा, राजकोट और अहमदाबाद में कुछ उल्लेखनीय कर पाने में नाकाम रही है. शहरी मतदाताओं को आकर्षित कर पाने में इसकी नाकामी इसकी भारतीयों की अपेक्षाओं से कटे होने की तरफ इशारा करती है.

यह अपने जनजातीय और दलित मतदाताओं को भी अपने साथ रखने में नाकाम रही है. दक्षिण और उत्तर गुजरात में, पाटीदार फैक्टर फायदा ओबीसी, जनजातीय और दलितों के वोटबैंक में बीजेपी की सेंध से नाकाम हो गया. यह 1985 से लगातार हर चुनाव इसके KHAM (क्षत्रिय, हरिजन, आदिवासी और मुस्लिम) आधार  में सेंध लगने की तरफ इशारा करता है. इसी तरह राहुल गांधी को ‘जनेऊ धारी’ हिंदू बताने के बाद भी कांग्रेस बड़ी संख्या में उन सीटों पर हारी जहां हिंदू बहुसंख्या में हैं.

Rahul Gandhi-Hardik Patel

कांग्रेस को इस बात के लिए भी चिंता करनी चाहिए कि वह अनिर्णय वाले मतदाओं को आकर्षित नहीं कर पा रही है. यह दोनों पार्टियों के वोट प्रतिशत से जाहिर है. शुरुआती तौर पर मिले आंकड़ों के मुताबिक कांग्रेस को करीब 43 प्रतिशत वोट मिले जबकि बीजेपी को 50 प्रतिशत वोट मिले. यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि एबीपी-सीएसडीएस का अंतिम सर्वे दिखा रहा था कि दोनों पार्टियों को 43-43 प्रतिशत वोट मिल रहे हैं. जाहिर है कि अनिर्णय वाले मतदाता बीजेपी की तरफ चले गए.

क्या है कांग्रेस के लिए सबक

हालांकि इसमें कोई शक नहीं कि कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी उपलब्धि राहुल गांधी का एक नेता के रूप में उभरना है, जो जमीन पर लड़ाई के लिए तैयार है. अब वह एक ऐसे वक्ता हैं जिन्हें गंभीरता से लिया जाता है, बावजूद इसके कि वो अभी पीएम के स्तर के नेता नहीं हैं.

साल 2017 कांग्रेस के लिए 1-3 के अंतर से हार के साथ विदा हो रहा है. अगर कांग्रेस इस साल हुए चार बड़े राज्यों के चुनाव पर नजर डाले तो वह सही सबक सीख सकती है. पंजाब कहता है कि यह मोदी बनाम राहुल की लड़ाई में कांग्रेस नहीं जीत सकती है, लेकिन वह बढ़त बना सकती है अगर चुनाव दो क्षेत्रीय शक्तियों के बीच हो. शायद कांग्रेस अब कर्नाटक, राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में, जहां अगले साल चुनाव होने हैं, मजबूत क्षेत्रीय नेताओं को सेनापति बनाए.

rahul in somnath

उत्तर प्रदेश, गुजरात और बिहार भी, जहां कांग्रेस इस साल सत्ता से बाहर हो गई, इस बात की याद दिलाते हैं कि साइकिल पर पिछली सीट की सवारी करना और हार्दिक, अखिलेश व नीतीश जैसों पर यह भरोसा करना कि अंतिम मंजिल तक साथ देंगे, जोखिम भरा है. जीतने के लिए इसे खुद के सेनापति और कार्यकर्ता तैयार करने होंगे.

सिर्फ अच्छी खबर यह है कि गुजरात ने बताया है कि मोदी का ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ का सपना इतनी आसानी से पूरा नहीं होने वाला है. 2014 की तुलना में कांग्रेस ने इस साल 60 ज्यादा सीटें जीती हैं और वोट प्रतिशत में भी 10 फीसद का इजाफा हुआ है.

हालांकि राहुल गांधी के पास जादू की छड़ी नहीं है, फिर भी कांग्रेस को खुश होना चाहिए कि भारत की राजनीति 2014 में फ्रीज नहीं हो गई है. मोदी ने अपनी जादुई छड़ी से लोगों पर जो जादू फेरा था, उसका असर कम होने लगा है.

Gujarat Election Results 2017

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