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गुजरात चुनाव 2017: उत्तर प्रदेश से किन-किन मायनों में अलग रहा ये चुनाव प्रचार

पिछले कुछ समय में चुनावी सर्वे के अनुमान जिस तरह से बदले हैं वो बीजेपी के लिए चिंता का विषय हो सकते हैं

Devparna Acharya Updated On: Dec 13, 2017 01:05 PM IST

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गुजरात चुनाव 2017: उत्तर प्रदेश से किन-किन मायनों में अलग रहा ये चुनाव प्रचार

गुजरात विधानसभा चुनाव प्रचार का अंतिम दिन खत्म होने के साथ ही राज्य के चुनावी माहौल में कटुता और दुर्भावना अपने चरम को पार कर चुकी है. 49 दिन के सघन चुनावी प्रचार, जिसमें बीजेपी और कांग्रेस के नेता इस धरती पर उतरे, जुबानी जंग बद से बदतर होती गई (भारत में यही स्थिति कमोबेश अब हर चुनाव में होती है).

शुरुआती चुनावी भाषण विकास, पिछड़ी जातियों का उत्थान, राज्य में अच्छे बुनियादी ढांचे की स्थापना और सरकार की नीतियों की आलोचना से होते हुए तेजाबी निजी हमलों में बदल गए और उन मुद्दों से भटक गए जो वाकई में मायने रखते थे. लेकिन इस बात से किसी को अचंभा नहीं होना चाहिए क्योंकि भारत में अब हर  चुनाव में यही परंपरा बन गई है.

वर्ष 2015 से हमारे यहां चुनाव को दो कारणों से नया महत्व मिल गया है. सबसे पहला, 2014 के आम चुनाव के बाद बीजेपी की किस्मत का सितारा लगातार बुलंद है. 2016 में पांच राज्यों में चुनाव में बीजेपी ने बहुत शानदार प्रदर्शन किया, जिससे उनकी उस ख्वाहिश को बल मिला, जिसे पार्टी नेता ‘कांग्रेस-मुक्त भारत’ कहते हैं. दूसरा यह कि, कांग्रेस अपनी स्थापना के बाद से सबसे बुरे चुनावी दौर से गुजर रही है. हार पर हार और कमजोर शीर्ष नेतृत्व से पार्टी को गहरा नुकसान हो रहा है.

दोनों पार्टियों द्वारा गुजरात में जोशीले चुनाव प्रचार ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की यादें ताजा कर दी हैं, जो कि बीजेपी के लिए अंतिम बड़ा लिटमस टेस्ट था. एक अप्रत्याशित जीत के साथ बीजेपी ने 14 साल बाद सत्ता में वापसी की- पार्टी को उत्तर प्रदेश में दो तिहाई बहुमत मिला था. 81 फीसद सफलता दर और 41.5 फीसद वोट के साथ 325 सीटें. राज्य में अधिकांश चुनावी सर्वे त्रिशंकु विधानसभा की भविष्यवाणी कर रहे थे. कांग्रेस, जिसने समाजवादी पार्टी के साथ गठजोड़ किया था, दोनों इस साल मार्च में हुए विधानसभा चुनाव में सिर्फ 55 सीटें निकाल सके.

गुजरात अलहदा कारणों से उत्तर प्रदेश से ज्यादा महत्वपूर्ण है. ऐतिहासिक रूप से कारोबारी रहा राज्य गुजरात मोदी के सम्मान से जुड़ा है. गुजरात गंवाने से, जहां बीजेपी बीते 22 साल से राज कर रही है, बीजेपी को गहरी शर्मिंदगी उठानी पड़ेगी. हालांकि गुजरात में चुनाव उन मुद्दों से अलग मुद्दों पर लड़े जा रहे हैं, जिन पर यूपी में चुनाव लड़ा गया था, फिर भी दोनों चुनावों और चुनावी अभियान की जुबानी जंग में कई समानताएं भी हैं.

गुजरात के महत्व की उत्तर प्रदेश से तुलना

Rahul-Akhilesh

बीजेपी के लिए दोनों, गुजरात और उत्तर प्रदेश महत्वपूर्ण हैं- गुजरात मोदी के सम्मान के लिए तो उत्तर प्रदेश बीजेपी को मिली सीटों के लिए. गुजरात में प्रधानमंत्री कांग्रेस को घेरते हुए गुजराती अस्मिता का मुद्दा उठा रहे थे, उत्तर प्रदेश में मोदी ने राज्य के विकास का मुद्दा उठाया था और बीजेपी को 14 साल के वनवास से वापस लाने पर जोर दिया था. यूपी में 14 साल की अवधि में सत्ता से बाहर रहने की याद दिलाते हुए मोदी ने कहा था यह वनवास उनकी पार्टी का नहीं था, बल्कि यह राज्य में विकास का वनवास था. मोदी ने अपनी पार्टी के लिए पूर्ण बहुमत मांगते हुए वादा किया कि यह “14 साल का वनवास खत्म होगा.” उन्होंने कहा था, “परिवर्तन वैसा ही पूर्ण होना चाहिए, जैसा उन्हें 2014 में केंद्र में मिला था.”

इसकी तुलना में गुजरात में देखें तो मोदी या बीजेपी के नेताओं ने कांग्रेस पर वंशवादी और जातिवादी राजनीति का आरोप लगाते हुए पिछले कई सालों में पार्टी द्वारा किए गए काम दोहराए. पहली बार है जब मोदी राज्य में एक मुख्यमंत्री के रूप में प्रचार नहीं कर रहे थे, और इस बात ने भी पार्टी की छवि पर असर डाला है. आनंदी बेन पटेल को पद से हटाए जाने और विजय रूपाणी की मुख्यमंत्री पद पर ताजपोशी के बाद से राज्य में पार्टी की छवि धूमिल हुई है.

बीजेपी की इकलौती रणनीति मोदी की छवि को फिर से भुनाना

गुजरात से एक ग्राउंड रिपोर्ट कहती है कि बीजेपी का घर-घर जाकर फिर से मोदी का नाम बेचने की कोशिश करना, “इस चुनाव को परिभाषित करने वाली घटना” है. करीब दो दशकों तक मोदी  की छवि, रेकॉर्ड और अपील की बदौलत इसे सेंत-मेंत में लिया गया. लेकिन इस साल इसे संग्राम में पूरी फौज उतारने पर मजबूर होना पड़ा.

इसके उलट, उत्तर प्रदेश में जहां मुलायम-अखिलेश की समाजवादी पार्टी और मायावती की बहुजन समाज पार्टी सामने खड़ी थीं, बीजेपी की रणनीति विकास के अभाव का मुद्दा उठाने और परिवर्तन  पर जोर देने की थी. 

कई पार्टियों बनाम द्वि-पक्षीय लड़ाई

उत्तर प्रदेश में बीजेपी की जीत अप्रत्याशित थी और पार्टी के घनघोर समर्थकों को भी स्तब्ध कर दिया था और हर कोई सवाल कर रहा था कि बीजेपी ने कितनी सटीक रणनीति बनाई और अमल में लाई कि पूरा राज्य भगवा ध्वज के नीचे आ गया. मोदी ने अखिलेश सरकार की ढिलाई और गिरती कानून-व्यवस्था पर सवाल उठाया. मोदी ने, उत्तर प्रदेश में रैली करते हुए, लोगों से राज्य को “SCAM” से मुक्ति दिलाने को कहा था.  इसमें S का मतलब था समाजवादी (पार्टी), C का मतलब कांग्रेस, A अखिलेश (यादव) और M मायावती” थे.

गुजरात में आमने-सामने की सीधी लड़ाई है. आरोप ज्यादा प्रत्यक्ष हैं और ग्रहणकर्ता थोड़े हैं. मोदी कांग्रेस और राहुल पर वंशवादी राजनीति और पार्टी की जातिवादी राजनीति “जरूरत” को लेकर लगातार हमले कर रहे थे. हकीकत तो यह है कि मोदी द्वारा मणि शंकर अय्यर की टिप्पणी को अपनी “नीची जाति” पर हमला बताने के बाद बीजेपी का मुद्दा विकास से खिसक कर जाति पर आ गया है. और अंत में तो चुनाव आतंकवाद और मुस्लिम पर आ कर टिक गया है. बीजेपी की तरफ से दो मुख्य प्रचारक - मोदी और अमित शाह- मतदाताओं को याद दिला रहे थे किस तरह 22 साल पहले कांग्रेस राज में गुजरात में कर्फ्यू झेलना पड़ता था.

तब नोटबंदी, अब जीएसटी

22nd GST Council meeting in New Delhi

उत्तर प्रदेश चुनाव के दौरान एसपी-कांग्रेस गठबंधन और बीएसपी के पास तब ताजा-ताजा लागू की गई नोटबंदी सबसे बड़ा हथियार था- नोटबंदी फैसले ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था और केंद्र सरकार को घेरने के लिए विपक्ष के हाथ में बड़ा हथियार दे दिया था. कांग्रेस ने बीजेपी और मोदी को घेरते हुए आम जनता के लिए मोदी की उदासीनता को मुद्दा बनाया और काला धन वापस लाने के केंद्र के वादे पर सवाल पूछा. फरवरी 2017 में झांसी में एक रैली को संबोधित करते हुए अखिलेश ने कहा था, “बीजेपी ने आम जनता को उसी के पैसे के लिए लाइन में खड़ा कर दिया. अब लोग चुनाव में फिर से लाइन में खड़े होंगे, बीजेपी को हराने के लिए. बीजेपी को लोगों के मन की बात पता चल गई है और तीसरे व चौथे चरण के बाद बीजेपी के नेताओं का ब्लड प्रेशर चेक कराना पड़ेगा.”

राहुल अब कहते हैं, “लोगों को अच्छे दिन की फिल्म दिखाने के बाद वह (मोदी) शोले के गब्बर सिंह की तरह बर्ताव कर रहे हैं और कहते हैं वह भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ना चाहते हैं और आपका मेहनत से कमाया पैसा कागज में बदल दिया. अब लोग बदला लेंगे.”

गुजरात चुनाव अभियान में कांग्रेस ने नोटबंदी के मुद्दे की जीएसटी से बदल दिया है. राज्य में चुनाव प्रचार करते हुए राहुल गांधी ने छोटे कारोबारियों के नुकसान लिए मोदी पर हमला किया और पूछा, क्या उनकी सरकार इसकी जिम्मेदारी लेगी? अपने ‘रोज एक सवाल’  की श्रृंखला को आगे बढ़ाते हुए राहुल ने कहा कि बीजेपी के बीते साल नवंबर में नोटबंदी और इस साल जुलाई में जीएसटी, इन दो कदमों से गुजरात के छोटे कारोबारियों को गहरा झटका लगा है और गुजरात के सूरत व राजकोट जैसे कारोबारी हब को नुकसान पहुंचा है.

उत्तरी और केंद्रीय गुजरात में सेकेंड फेज के मतदान से पहले राहुल मोदी से सवाल पूछते हैं, “छोटे कारोबारी बदहाल हैं और बड़े उद्योगपति फल-फूल रहे हैं. नोटबंदी और जीएसटी ने सूरत, राजकोट, अलंग और अंजार में कारोबार को तगड़ा नुकसान पहुंचाया है. क्या आपकी सरकार जिम्मेदारी लेगी? ”

अपनी सरकार के नोटबंदी और जीएसटी के एक बाद एक दिए झटके लोगों की परेशानी को देख नवंबर में मोदी ने जीएसटी लागू किए जाने के फैसले से खुद को और अपनी सरकार को अलग कर लिया और कहा कि कर सुधारों का यह एक ‘सामूहिक फैसला’  था.

प्रधानमंत्री ने कहा कि “बीजेपी अकेले नहीं, बल्कि कांग्रेस समेत सभी राजनीतिक दल और सभी राज्य इस (जीएसटी के) फैसले में शामिल थे. केंद्र पूरी जीएसटी काउंसिल का 30वां पार्टनर मात्र था.”

किसी तरह के हमले से खुद को बचाने के लिए बीजेपी का इस तरह से रक्षात्मक रुख दिखाता है कि पार्टी इस बात से डरी हुई है कि परंपरागत रूप से एक कारोबारी राज्य रहा गुजरात सरकार के खिलाफ प्रतिक्रिया (या दंडित) कर सकता है.

फिर भी जैसा कि यह लेख दावा करता है कि छोटे कारोबारियों पर जीएसटी के असर की नोटबंदी से तुलना करना गलत है. जीएसटी प्रगतिशील सुधार की दिशा में उठाया गया कदम है, जिसे भारत को आज नहीं तो कल कभी ना कभी अपनाने की जरूरत थी. इस पर संसद में पहली बार चर्चा होने के बाद से राजनीतिक रस्साकशी में एक दशक से ज्यादा का समय गंवा दिया गया है.

उत्तर प्रदेश का दत्तक पुत्र गुजरात में माटी का बेटा है

मोदी की भावुक अपीलें नई नहीं हैं. साल 2014 में संसद मं प्रधानमंत्री के रूप में पहले भाषण से लेकर “आंसू भरी आंखों” के साथ लोगों से बड़े मकसद के लिए केंद्र सरकार के फैसले का समर्थन करने की अपील करने वाले मोदी अपने भाषणों में इस तरह की नाटकीयता लाने के लिए मशहूर रहे हैं. खुद को उत्तर प्रदेश का “दत्तक पुत्र” बताने वाले मोदी ने कहा था कि एसपी, बीएसपी और  कांग्रेस से छुटकारा पाए बिना राज्य का भविष्य सुरक्षित नहीं किया जा सकता.

एक चुनावी रैली में उन्होंने भावुक भाषण देते हुए कहा था, “कृष्ण भगवान उत्तर प्रदेश में पैदा हुए थे और गुजरात को कर्मभूमि बनाया. मैं गुजरात में पैदा हुआ और उत्तर प्रदेश ने मुझे गोद लिया… उत्तर प्रदेश मेरा माई-बाप है. मैं ऐसा बेटा नहीं हूं जो इस माई-बाप को धोखा देगा. आपने मुझे गोद लिया है और आपके लिए काम करना मेरा कर्तव्य है.” उन्होंने भारी भीड़ को संबोधित करते हुए कहा कि सभी राजनीतिक विश्लेषकों ने पहले दो चरणों में बीजेपी की जबरदस्त जीत की भविष्यवाणी की है , “बीजेपी सरकार को पूर्ण बहुमत दिलाने के लिए वोट कीजिएगा. मैं वादा करता हूं कि पांच साल में सारी समस्याओं से छुटकारा पाने का रास्ता दिखाउंगा.”

लेकिन गुजरात में मोदी की भावुक अपील बदली हुई है. पिछले महीने भुज में बीजेपी के चुनाव अभियान की शुरुआत करते हुए मोदी बोले,  “गुजरात के इस बेटे के सार्वजनिक जीवन पर कोई धब्बा नहीं है. आप यहां आते हैं और माटी के पुत्र पर आधारहीन आरोप लगाते हैं, लेकिन राज्य के लोग आपको क्षमा नहीं करेंगे. ”

मोदी कहते हैं, “कांग्रेस ने सरदार पटेल के साथ भी ऐसा ही बर्ताव किया.” “वो सरदार पटेल के बारे में बात करते हैं लेकिन मणिबेन की डायरी बताती है कि उनके साथ कैसा सुलूक किया गया. फिर, गुजरात के एक और बेटे व गांधीवादी मोरारजी देसाई को इंदिरा जी ने कैबिनेट से हटा दिया. सच ये है कि कांग्रेस गुजरातियों से नफरत करती है.” चुनाव को विकास और वंशवाद के बीच की लड़ाई बताते हुए मोदी बताते हैं कि कांग्रेस ने कभी लोगों के भले की परवाह नहीं की और सिर्फ एक परिवार की चिंता की और पार्टी के सभी बड़े नेता किनारे लगा दिए गए.

उत्तर प्रदेश नहीं है गुजरात

नरेंद्र मोदी ने गुजरात में 13 वर्षों तक सरकार चलाई है

नरेंद्र मोदी ने गुजरात में 13 वर्षों तक सरकार चलाई है

उत्तर प्रदेश और गुजरात बीजेपी के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हैं, फिर भी इतने अलग हैं कि दोनों राज्यों में बीजेपी की रणनीति बदल जाती है. उत्तर प्रदेश में बीजेपी विजेता बन कर निकली थी, लेकिन चुनावी पंडित और चुनावी सर्वे भविष्यवाणी कर रहे हैं कि गुजरात विधानसभा चुनाव 2017 में पार्टी के लिए जीत आसान नहीं होगी.

एक बड़े उलटफेर में चुनावी सर्वे बता रहे हैं कि कांग्रेस इस चुनाव में बीजेपी को कड़ी टक्कर देगी. एबीपी लाइव का कहना है कि 182 सदस्यों वाले सदन में बीजेपी 91-99 सीट जीत सकती है, जबकि कांग्रेस 78-86 सीट जीत सकती है. यह सर्वे बताता है कि कांग्रेस और बीजेपी दोनों को ही करीब 43-43 फीसद वोट मिलेंगे. चुनावी सर्वे कहता है कि परंपरागत रूप से बीजेपी का वोट बैंक रहा पाटीदार समुदाय कांग्रेस की तरफ खिसकेगा.

टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार अगस्त में हुए सर्वे में बीजेपी को 144-152 सीट पाने और कांग्रेस के 26-32 सीट मिलने के अनुमान के बाद से स्थिति में यह बड़ा उलटफेर है. अक्टूबर तक और गिरावट के साथ बीजेपी की सीटों की संख्या 113-121 पर आ गई थी, जबकि कांग्रेस बढ़कर 58-121 पर पहुंच गई थी.

हालांकि बीजेपी के नंबर अगर कांग्रेस के बराबर रहते हैं तो भी यह मोदी के गृह राज्य में भगवा ब्रिगेड के लिए बड़ी शर्मनाक स्थिति होगी.

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