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जीएसटी: नेहरू की राह पर मोदी, फिर संघ में चुप्पी क्यों?

आजादी के जश्न में संघ और बापू शरीक नहीं हुए थे. अब जीएसटी के जश्न में विपक्षी नहीं दिखेंगे

Updated On: Jun 30, 2017 05:25 PM IST

Virag Gupta Virag Gupta

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जीएसटी: नेहरू की राह पर मोदी, फिर संघ में चुप्पी क्यों?

जीएसटी की रात के जश्न में देश की नियति का निर्धारण करके प्रधानमंत्री मोदी क्या प्रथम प्रधानमंत्री नेहरू की भूमिका को दोहराने की कोशिश कर रहे हैं. अंग्रेजों द्वारा भारत के विभाजन का पुरजोर विरोध करते हुए महात्मा गांधी और संघ आजादी के जश्न में शरीक नहीं हुए थे और अब जीएसटी समारोह का विपक्षी दलों द्वारा बहिष्कार हो रहा है. 1991 में शुरू आर्थिक सुधारों में जीएसटी एक स्वाभाविक पड़ाव है फिर उसे ‘एक भारत एक टैक्स’ का क्रांतिकारी कदम बताकर मेगा इवेन्ट में क्यों तब्दील किया जा रहा है. जीएसटी की स्वीकृति व्यवस्था में टैक्स की 8 दरों से ‘एक टैक्स’ की बात तो गलत साबित हुई और अब ‘एक भारत’ की अवधारणा पर भी सवालिया निशान खड़े हो रहे हैं?

नेहरू के रूसी मॉडल की तर्ज में मोदी का अमेरिकी मॉडल

नेहरु द्वारा आधी रात को आजादी के ऐतिहासिक ऐलान के बाद अर्थव्यवस्था के रुसी मॉडल को अपनाया गया था जिसे अब सभी समस्याओं का कारण बताया जा रहा है. सोवियत संघ के पतन के बाद अमेरिकी अर्थव्यवस्था अब ढलान पर है जिसके बावजूद प्रधानमंत्री मोदी ने भारत को अमेरिका बनाने का ऐलान कर दिया है. इसके बाद दीनदयाल उपाध्याय की विचारधारा और स्वदेशी अर्थव्यवस्था से भारत को विश्व गुरू बनाने के संघ के एजेंडे पर सवालिया निशान खड़े हो गए हैं.

ई-कॉमर्स कंपनियों को जीएसटी में राहत क्यों?

भारतीय बैंकिंग संघ और एसोचैम सहित अनेक संगठनों द्वारा जीएसटी को दो महीने बाद लागू करने की मांग को नामंजूर करने वाले वित्त मंत्री ने जीएसटी लागू होने से सिर्फ 4 दिन पहले ई-कॉमर्स कंपनियों को बड़ी राहत देते हुए टीसीएस (टैक्स कलैक्शन ऐट सोर्स) और टीडीएस (टैक्स डिडैक्शन ऐट सोर्स) से छूट क्यों दी?

ई-कॉमर्स कंपनियां 5 लाख विक्रेताओं के माध्यम से भारत में 24 करोड़ ग्राहकों से 38 बिलियन डॉलर का कारोबार कर रही हैं. जीएसटी के तहत अभी तक 65 लाख रजिस्ट्रेशन हुए हैं जबकि ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म में सन् 2020 तक एक करोड़ विक्रेता होने के आंकलन के बावजूद उन्हें जीएसटी के रजिस्ट्रेशन से अनिश्चित काल के लिए छूट दे दी गई. रिजर्व-बैंक के अनुसार ई-कॉमर्स कंपनियों द्वारा भारतीय कानून तथा टैक्स नियमों का पालन पहले ही नहीं हो रहा था और अब जीएसटी में छूट से सरकार की मंशा पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं.

जीएसटी से बड़े पैमाने पर बेरोजगारी और विस्थापन

जीएसटी से आईटी क्षेत्र में 1 लाख नए रोजगार के अवसरों की बात की जा रही है. दूसरी ओर संघ परिवार से जुड़े भारतीय मजदूर संघ और स्वदेशी जागरण मंच द्वारा प्रधानमंत्री को दर्ज शिकायत के अनुसार जीएसटी की टैक्स प्रणाली से छोटे और मझोले व्यापार-उद्योगों से जुड़े करोड़ों लोग बेरोजगार हो जाएंगे. जीएसटी में आईटी तकनीकी तथा इंटरनेट के इस्तेमाल में निश्चित तौर पर बढ़ोत्तरी होगी पर उसका अधिकांश फायदा अमेरिकी कंपनियों को मिलेगा.

अमेरिका की बड़ी कंपनियां भारत जैसे देशों से बड़े पैमाने पर कारोबार करने के बावजूद पूरा टैक्स नहीं देती. नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार इन बड़ी कंपनियों ने 2.3 ट्रिलियन डॉलर की गैर-कानूनी रकम आयरलैण्ड जैसे टैक्स हैवन देशों में जमा कर रखी है, जिसकी वसूली के लिए कानून के बावजूद सरकार के पास दृढ़ इच्छाशक्ति का अभाव देश को खोखला कर रहा है.

PTI

कश्मीर की रियासत को जीएसटी का हिस्सा बनाने के लिए पटेल की दृढ़ता क्यों नहीं

बीजेपी-पीडीपी शासित जम्मू कश्मीर सरकार ने पिछले साल जुलाई में वित्त मंत्रियों के सम्मेलन में जीएसटी पर आपत्ति की थी जिसका केंद्र की बीजेपी सरकार 1 साल के बाद भी समाधान नहीं कर पाई.

‘एक देश’ की तर्ज वाला जीएसटी जम्मू कश्मीर में अभी लागू नहीं हुआ उसके बावजूद सरकार जीएसटी का जश्न कैसे मना रही है. विपक्षी दलों ने आरोप लगाया है कि आतंकवाद के विरुद्ध अमेरिका द्वारा पारित प्रस्ताव में ‘भारत शासित कश्मीर’ शब्दों के इस्तेमाल पर प्रधानमंत्री मोदी ने राष्ट्रपति ट्रंप से आपत्ति क्यों नहीं जताई? विभाजित भारत में 565 रियासतों के एकीकरण के जनक सरदार पटेल की सबसे उंची मूर्ति की प्रतीकात्मक स्थापना के बावजूद भारत के मुकुट कश्मीर को जीएसटी नेटवर्क में लाने के लिए मोदी दृढ़ कदम उठाने में क्यों विफल रहे हैं?

जीएसटी की सियासत में दरकता देश

आजादी के बाद देश के सभी राजनीतिक दलों ने तमाम मतभेदों के बावजूद केंद्र में मिलकर पहली सरकार बनाई. जीएसटी का विचार यूपीए सरकार की देन है जिसे एनडीए के दौरान विपक्ष के सभी राज्यों ने कानूनी मंजूरी दी. इसके बावजूद संसद में आयोजित जीएसटी समारोह में अधिकांश विपक्षी दलों के नेताओं की अनुपस्थिति से जीएसटी के क्रियान्वयन पर प्रशासनिक गतिरोध उत्पन्न हो सकता है.

आर्थिक नीतियों पर तो मतभेद हो सकते हैं पर टैक्स प्रणाली पर सियासत के बाद एक देश का सपना कैसे साकार होगा? कश्मीर के बगैर, सियासी जंग के बीच, ई-कॉमर्स कंपनियों को राहत देने वाला जीएसटी देश की नियती को कैसे बदलेगा, इसका फैसला तो आने वाला इतिहास ही करेगा.

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