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क्या सोनिया गांधी की नई कोशिश विपक्ष को एक साथ ले आएगी

कांग्रेस और विपक्ष दोनों खस्ता हाल में हैं, ऐसे में क्या 2019 तक विपक्ष अपनी मुश्किलों से पार पा सकेगा

Updated On: Mar 10, 2018 03:35 PM IST

Aparna Dwivedi

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क्या सोनिया गांधी की नई कोशिश विपक्ष को एक साथ ले आएगी

विपक्षी पार्टियों को एक बार फिर से एकजुट करने की कोशिश हो रही है. और इस कोशिश में एक बार फिर कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी जुटी हैं. सोनिया गांधी ने 13 मार्च को रात्रिभोज का आयोजन किया है और इसमें करीब 17 दलों को न्यौता भेजा है. इसमें कांग्रेस के नेताओं के अलावा आरजेडी अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव के बेटे और बिहार के पूर्व उप-मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव शामिल होंगे. आरजेडी के अलावा तृलमूल कांग्रेस, बहुजन समाजवादी पार्टी, समाजवादी पार्टी, वामपंथी दलों को न्यौता गया हैं. इसके अलावा एनडीए में परेशान सहयोगी दलों से भी बातचीत हो रही है. कोशिश ये है कि आने वाले लोकसभा चुनाव से पहले बीजेपी और प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ एक मजबूत गठबंधन तैयार हो जाए.

ये पहली बार नहीं है कि विपक्षी पार्टियों को एकजुट करने की कोशिश की जा रही है. इससे पहले कांग्रेस या फिर शरद यादव के जरिए ऐसी कोशिश होती रही हैं. राष्ट्रपति चुनाव के समय कांग्रेस ने विपक्ष का एक उम्मीदवार खड़ा करने की पुरजोर कोशिश की लेकिन असफल रही. सोनिया गांधी की पहल पर 17 दलों के नेता एक साथ बैठे, लेकिन संयुक्त विपक्ष का प्रत्याशी तय करने में इतनी अगर-मगर हुई कि मौका हाथ से निकल गया.

लेकिन कांग्रेस के नेताओं की माने तो उनका दावा है कि वो एक साल पुरानी बात है. अब समय बदल गया है. अब एकजुटता दिखाए बिना काम नहीं होगा. कांग्रेस नेताओं के हिसाब से अब सही समय है गठजोड़ का और इसके बाकयदा तर्क देतें हैं-

सोनिया गांधी का न्यौता

Sonia Gandhi

चूंकि ये न्यौता कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के बजाय सोनिया गांधी की तरफ से गया है – ये इशारा करता है कि एक दशक से भी ज्यादा सफलतापूर्वक राजनीति करने वाली सोनिया गांधी अभी भी मजबूत हैं और लगी हैं. ये विपक्ष के उन नेताओं के लिए संदेश है जो पुरानी विरासत संभाले हुए हैं. इन लोगों ने सोनिया गांधी के साथ काम किया है और उन्हें नेता के रूप में स्वीकारते भी हैं. उन पार्टियों को गठजोड़ में लाना और संभालने का जिम्मा सोनिया गांधी ने उठाया है.

राहुल गांधी सोनिया गांधी काम्बो

sonia gandhi rahul gandhi

बुजुर्ग नेताओं का अनुभव और युवा नेताओं की उर्जा, एक दशक तक यूपीए गठबंधन चला कर सोनिया गांधी ने ये तो साबित कर दिया था कि वो नेता के रूप में सबको लेकर चलती है साथ ही दिसंबर में गुजरात में कांग्रेस के बेहतर प्रदर्शन के बाद राहुल गांधी ने भी अपनी पहचान कायम की. कांग्रेस की उम्मीद है कि विपक्षी दल अब इस काम्बों के प्रति आकर्षित होंगे और कांग्रेस के नए अध्यक्ष राहुल गांधी को गंभीरता से लेगे. कांग्रेस का दावा है कि पार्टी में राहुल राज आने से युवा नेताओं को भी अवसर मिलेगा. साथ ही सहयोगी दलों के युवा नेताओं से भी राहुल गांधी के अच्छे रिश्ते हैं. युवाओं से जुड़ने के लिए युवा राजनीति में राहुल गांधी चेहरा बन सकते हैं.

विपक्षी एकता की इस कोशिश में युवा नेताओं की भागीदारी ज्यादा होगी. कांग्रेस का दावा है कि पार्टी के अध्यक्ष राहुल गांधी के रिश्ते सहयोगी दलों के युवा नेताओं से काफी नजदीकी हैं. राहुल के राजनैतिक दोस्तों में समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव, आरजेडी के नेता तेजस्वी यादव, लोकदल के महासचिव जयंत चौधरी, नेशनल कांफ्रेंस के अध्यक्ष उमर अब्दुल्ला, तमिलनाडु पार्टी डीएमके के अध्यक्ष एमके स्टालिन शामिल हैं. ये सारे नेता अपनी पार्टियों का चेहरा हैं. साथ ही कांग्रेस के मजबूत सहयोगी भी माने जाते हैं.

साथ ही राहुल गांधी की दोस्तों में ऐसे युवा नेता भी है जो राजनीति में जन आंदोलन के जरिए कदम रख चुके हैं. इनमें पाटीदार नेता हार्दिक पटेल , दलित नेता जिग्नेश मेवाणी के साथ ओबीसी नेता अल्पेश ठाकोर शामिल हैं. गुजरात में इन्हीं नेताओं के साथ की वजह से कांग्रेस का प्रदर्शन बेहतर रहा है. इसके अलावा कांग्रेस पार्टी ऐसे ही छोटे-छोटे पॉकेट के युवा नेताओं के साथ भी दोस्ती का हाथ बढ़ा रहे हैं.

विपक्ष का नेता

Rahul Gandhi In Singapore

इससे पहले जब जब विपक्षी पार्टियों के एकता की बात शुरु होती थी, मामला नेता पर आकर रुक जाता था. कांग्रेस राहुल गांधी को नेता के रूप में देखती थी लेकिन बाकी दलों के लिए वो विकल्प नहीं थे. राजनीति का उसूल है जो जीता वो सिकंदर.. लेकिन राहुल गांधी को जीत मिली नहीं थी. कांग्रेस का दावा है कि राहुल गांधी पिछले एक साल में मजबूत नेता बन कर उभरे हैं. भले ही उन्होंने पार्टी को जीत नहीं दिलवाई लेकिन गुजरात में थमकर टिके रहे और बीजेपी और प्रधानमंत्री मोदी को उनके ही गढ़ में परेशान कर दिया.

गोरखपुर का अनौपचारिक गठबंधन

विपक्षी गठजोड़ में सबसे बड़ी चुनौती होती क्षेत्रीय नेताओं को एक मंच पर इकट्ठा करने की होती थी. अपने राज्य में कांटे की लड़ाई करने वाले नेताओं को एकसाथ लाने की कोशिश में सभी पार्टियां अलग हो जाती थी. लेकिन गोरखपुर में एक आंख ना सुहाने वाले दो दलों का अनौपचारिक गठबंधन सबके लिए उम्मीद की किरण ले कर आया. बीजेपी की आंधी ने सभी क्षेत्रीय राजनैतिक दलों के लिए अस्तिव का सवाल खड़ा कर दिया है. ऐसे में अब तक एक दूसरे को फूटी आंख नहीं देखने वाले दल अब साथ बैठने और हाथ मिलाने को तैयार हैं.

वैसे भी अपनी जमीन पर भी ये दल मजबूत नहीं रहे. वामदल को बीजेपी ने सिर्फ केरल तक समेट दिया वहीं उत्तर प्रदेश की दोनो पार्टियां भी कमजोर हो गई हैं. लालू की आजेडी सिर्फ बिहार में मजबूत है. लेकिन बिहार की राजनीति में उथल पुथल मची है. एनडीए से अलग होकर मांझी ने आरजेडी महागठबंधन का हाथ थामा तो वहीं बिहार कांग्रेस के पूर्व अध्‍यक्ष अशोक चौधरी अपने चार पार्षदों के साथ जदयू में शामिल हो गए हैं. ऐसे में मजबूत विपक्ष गठबंधन सबकी मजबूरी है.

एनडीए में परेशान साथियों का साथ

इस रात्रिभोज का न्यौता तेलुगु देशम और बीजू जनता दल को भी गया है. ये दोनो ही दल बीजेपी से नाराज हैं. कांग्रेस की कोशिश है कि न्यूनतम एजेंडा में सहमति बनाने वाले दलों को शामिल किया जाए. हालांकि ये अभी तय नहीं है कि इन दोनो पार्टियों से कोई नेता शिरकत करेगा कि नहीं.

मोदी की लोकप्रियता

Biplab Kumar Deb takes oath as Tripura chief minister

सरकार बनने के चार साल बाद भी प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी लोकप्रियता साबित की है. और तो और चुनाव जीतने के रिकार्ड में इंदिरा गांधी को भी पीछे छोड़ दिया. नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री रहते 4 साल में 21 चुनाव हुए. इनमें से 14 राज्यों में बीजेपी ने जीत हासिल की है. जबकि इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री रहते 4 साल में 19 चुनाव हुए थे. इनमें से 13 राज्यों में कांग्रेस ने जीत हासिल की थी. कांग्रेस के ये बड़ा झटका था. साथ ही जिस हिसाब से जोड़ तोड़ की राजनीति में बीजेपी सरकार बनाने में लगी है उससे पार्टी अंदर से हिल गई है. ऐसे में विपक्ष की एकजुटता कांग्रेस के लिए जिन्दगी और मौत का सफर बन गया है.

कांग्रेस की कोशिश है कि लोकसभा चुनाव से पहले विपक्ष को कांग्रेस के नेतृत्व में एकजुट हो जाएं. तीसरा मोर्चा बनाने वाली क्षेत्रीय पार्टियां विपक्ष में बिखराव ला सकती हैं इसिलिए ये रात्रिभोज एक जरिए होगा सबको एक जुट करने का.

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