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अवैध बूचड़खाने बंद करे सरकार... लेकिन उनका क्या, जिनका छिनेगा रोजगार ?

बूचड़खाना अगर अवैध है तो उसे बंद करने का विरोध भी अवैध ही होगा

Updated On: Mar 22, 2017 08:35 PM IST

Nazim Naqvi

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अवैध बूचड़खाने बंद करे सरकार... लेकिन उनका क्या, जिनका छिनेगा रोजगार ?

जो कहा था वही तो कर रहे हैं. अपार समर्थन की बंदिशें वही महसूस कर सकता है जिसे अपार समर्थन मिला हो. स्लॉटर हॉउस कहिये या बूचड़खाना या फिर माहौल को गरमाने के लिए कत्लखाना कहकर पुकारिए. इन्हें बंद करने के नाम पर भी जनता से वोट मांगा गया था.

'भारतीय जनता पार्टी जिस दिन अपनी सरकार बनाएगी, उसी दिन से सभी अवैध बूचड़खाने बंद कर दिए जायेंगे.' 19 मार्च को शपथ लेते ही सरकार ने अपना वादा निभाते हुए ‘तुरंत-प्रभाव’ से अवैध बूचड़खानों पर ताला लगाना शुरू कर दिया.

होना तो ये चाहिए था कि अवैध कारोबार रोकने के फैसले का स्वागत होता, लेकिन चूंकि ये धंदा, जो गंदा जरूर है पर 17 हजार करोड़ रुपए का है और जमीनी सच्चाइयों में करीब तीन लाख लोगों के रोजगार से जुड़ा हुआ है, शायद इसीलिए, लोगों को बेचैन कर रहा है.

सियासत से सवाल बनाकर पेश किया

दरअसल ये सियासी सवाल है नहीं बल्कि इसे सियासत ने एक सवाल बनाकर पेश किया है. उत्तर प्रदेश में हालिया हुए चुनाव में बहुत सी जमीनी बातों को उठाया गया, वो बातें जो जनता के सरोकारों से जुड़ी हुई हैं.

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सीएम योगी आदित्यनाथ ने प्रदेश में अवैध बूचड़खानों को बंद कराने का आदेश दिया है (फोटो: पीटीआई)

मिसाल के तौर पर श्मशान और कब्रिस्तान को ही ले लीजिए. अगर आप इसे सिर्फ ध्रुवीकरण की राजनीति द्वारा उछाला गया एक शोशा समझते हैं तो शायद आप भूल कर रहे हैं. ये सवाल पहले कभी नहीं उठाया गया तो इसका मतलब ये नहीं कि ये हकीकत नहीं है. ये सच है की हर उस गांव या कस्बे में, जहां मुस्लिम आबादी है, कब्रिस्तान भी है, लेकिन जरा अपने-अपने गांवों पर नजर दौड़ा कर देखिए, क्या हर गांव में श्मशान है? जवाब मिलेगा नहीं. खुद ये लेखक जब अपने गांव पर नजर डालता है तो कब्रिस्तान तो मिलते हैं मगर श्मशान नहीं मिलता.

ये सही है कि चाहे श्मशान हो या कत्लखाना, दोनों ही बातों पर चुनावों में सियासत की गयी. हम उम्मीद करते हैं कि प्रदेश की सरकार जहां-जहां कब्रिस्तान हैं वहां-वहां श्मशान भूमि की व्यवस्था भी करेगी. वैसे ही जैसे उसने अवैध बूचड़खानों को बंद करने की शुरुआत की है.

उत्तर प्रदेश में लाइसेंस प्राप्त बूचड़खानों पर नजर डालते हैं.

यूपी में कुल 285 स्लॉटर हाउस हैं जिनके पास बाकायदा जानवरों को काटने का लाइसेंस है. इन सभी स्लॉटर हाउस में बफैलो यानी भैंस काटे जाते हैं जिन्हें ‘बीफ’ भी कहा जाता है. चूंकि यूपी में गौमांस पर प्रतिबंध है लिहाजा किसी भी बूचड़खाने के पास गाय को मारने का लाइसेंस नहीं है, बल्कि ये जघन्य अपराध की श्रेणी में आता है.

यूपी देश में दूसरे नंबर पर

पशुपालन विभाग ने आरटीआई के जरिए पूछे गए एक सवाल के जवाब में कहा है कि देश में बूचड़खानों के लिए सबसे ज्यादा बदनाम यूपी असल में सबसे ज्यादा स्लॉटर हाउस के मामले में पहले नहीं दूसरे नंबर पर है. यहां सिर्फ 285 बूचड़खाने हैं. जबकि इस फेहरिस्त में पहला नंबर महाराष्ट्र का है जहां 316 बूचड़खाने हैं.

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देश में सबसे ज्यादा बूचड़खाने वाले प्रदेशों की सूची में उत्तर प्रदेश का नंबर दूसरा है (फोटो: रॉयटर्स)

इतना ही नहीं, उत्तर प्रदेश में करीब तीन दर्जन बूचड़खाने ऐसे हैं जो केंद्र सरकार से लाइसेंस प्राप्त और रजिस्टर्ड हैं. जिनमें सबसे ज्यादा, अलीगढ़ (7), गाजियाबाद (5), उन्नाव (4), मेरठ (3) और सहारनपुर (2) में हैं. इसके अलावा बाराबंकी, बुलंदशहर, मुजफ्फरनगर, गौतमबुद्ध नगर, हापुड़, मुरादाबाद, रामपुर, बरेली, झांसी, लखनऊ और बुलंदशहर में एक-एक बूचड़खाना रजिस्टर्ड है.

पशुपालन विभाग के अनुसार वर्ष 2014-15 में उत्तर प्रदेश ने 7,515.14 किलोग्राम बीफ का कारोबार किया. एक आंकड़ा ये भी है कि वर्ष 2015-16 में देश के मांस निर्यातकों ने 13 लाख टन से ज्यादा बीफ और मांस का निर्यात किया. जो सालाना 26 हजार करोड़ से ज्यादा का कारोबार था.

ऐसा नहीं है कि अवैध बूचड़खानों पर रोक के लिए, पहले कभी आदेश नहीं दिए गए. 2-3 वर्ष पूर्व अलीगढ़ में अवैध बूचड़खानों को बंद कर दिया गया था. नतीजा ये हुआ कि शहर में मांस खाने वालों की परेशानियां बढ़ गयीं.

बूचड़ के कारोबारियों और जनता के भारी दबाव के बाद वहां के डीएम ने लखनऊ में बैठी सरकार से इस आश्वासन के साथ, आदेश को रद्द करने का निवेदन किया कि बूचड़ कारोबारियों ने नियमावली के अनुसार अपने बूचड़खानों में परिवर्तन लाने की कार्रवाई शुरू कर दी है.

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यूपी में बूचड़खाने से लाखों लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रुप से रोजगार मिलता है (फोटो: पीटीआ)

नौकरशाह अनदेखा कर देते थे

सरकारी आदेश के मुताबिक, गाज उन बूचड़खानों पर गिराई जानी है जो गैर-कानूनी तरीके से चल रहे हैं. ये पर्यावरण के लिए खतरा हैं. कानून की किताब में इसकी मनाही है. कानून वर्तमान सरकार ने नहीं बनाया है.

कानून पहले भी था, अब भी है. बस पहले नौकरशाह इसे देखते हुए अनदेखा कर देते थे. अब फरमान मिलते ही एक्शन में आ गए हैं. खोट कानून में नहीं था, खोट तो कायदे से उन लोगों में है जिनपर इस कानून को लागू करवाने की जिम्मेदारी थी.

हां, जैसा कि बुलंदशहर निवासी कल्लन कुरैशी कहते हैं कि, 'बूचड़खाना अगर अवैध है तो उसे बंद करने का विरोध भी अवैध ही होगा... लेकिन हम सरकार से ये फरियाद जरूर करते हैं कि जिस धंधे से लोगों की रोजी-रोटी जुड़ी हो, और जो वर्षों से चल रहा हो, उसे जरूर बंद करो... लेकिन जो लोग बेरोजगार हुए हैं... जिनका धंधा चौपट हुआ है, उन्हें विकल्प भी मुहैया कराओ... तभी हम सरकार की जिम्मेवारी मानेंगे.'

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