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बड़े होटलों में छोटी प्लेट! आइडिया बढ़िया फिर होटल क्यों हैं नाराज?

खाने की बर्बादी रोकने के लिए सरकार बड़े होटलों में खाने का पोर्शन छोटा करना चाहती है लेकिन होटल इंडस्ट्री को यह जबरदस्ती लग रही है

Sulekha Nair Updated On: Apr 13, 2017 06:35 PM IST

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बड़े होटलों में छोटी प्लेट! आइडिया बढ़िया फिर होटल क्यों हैं नाराज?

बड़े होटलों में भोजन की हो रही बर्बादी से सरकार चिंतित है. यही वजह है कि सरकार अब भोजन की बर्बादी को रोकने के लिए पहल करने जा रही है.

इसके तहत सरकार अब होटलों में परोसे जाने वाली थाली की मात्रा पर नियंत्रण रखने पर विचार कर रही है.

परेशान क्यों है होटल इंडस्ट्री?

हालांकि केंद्रीय खाद्य मंत्री रामविलास पासवान के इस पहल से होटल और रेस्तरां उद्योग भ्रम की स्थिति में हैं.

होटल और रेस्तरां मालिकों का मानना है कि अगर सरकार ऐसा कोई कानून अमल में लाती है तो सरकार इससे कारोबार को बढ़ावा देने की अपनी मूल जिम्मेदारी से एक कदम आगे बढ़ जाएगी.

क्या है तर्क?

हालांकि केंद्रीय खाद्य मंत्री रामविलास पासवान ने सरकार के प्रस्तावित कदम को जायज ठहराया है.

उनका तर्क है, 'अगर कोई व्यक्ति दो प्रॉन या झींगा खा सकता है तो उसे छह प्रॉन क्यों परोसा जाता है? अगर कोई ग्राहक दो इडली ही खा सकता है तो उसे चार इडली क्यों परोसी जाए ?'

दरअसल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में कार्यक्रम मन की बात में भोजन की बर्बादी को लेकर चिंता जाहिर की थी. लेकिन पासवान के बयान ने तूफान खड़ा कर दिया है.

आखिर क्या है आइडिया?

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बुधवार को पासवान ने इस बात से साफ इनकार किया कि सरकार रेस्तरां में भोजन की मात्रा को नियंत्रण करने की कोशिश कर रही है.

उन्होंने साफ किया कि आइडिया बस इतना है कि ग्राहकों को सारी जानकारी उपलब्ध कराई जा सके. मसलन, होटल मालिक ये बता सकें कि प्रति प्लेट प्रॉन मछलियों की कितनी संख्या होगी.

निराश क्यों हैं होटल?

लेकिन खाने की मात्रा से लेकर डिश की संख्या का निर्धारण करने के कदम से होटल मालिक बहुत ज्यादा उत्साहित नहीं हैं.

जैसा कि एक रेस्तरां मालिक ने पूछा इसके बाद क्या ? क्या किसी शाकाहारी डिश में कितने प्याज और आलू के टुकड़े लगेंगे उसकी संख्या की भी मुझे गिनती करनी पड़ेगी. सिर्फ मांसाहारी डिश को ही क्यों चुन रहे हैं?'

सरकार की मंशा को पूरी तरह समझ पाने में नाकाम रेस्तरां मालिक राहुल अकेरकर ने एक ट्वीट के जरिए सरकार को कुछ सुझाव दिए हैं.

उनके मुताबिक सरकार को इस उद्योग को सुधारने की भी कोशिश करनी चाहिए.

होटल कर्मचारियों को मिलने वाली टिप पर भी सरकार को पाबंदी लगानी चाहिए. सभी मांसाहारी भोजन के साथ-साथ देश से बाहर बने सामान पर भी पाबंदी लगाई जानी चाहिए.

सरकार को प्लास्टिक पर भी पाबंदी लगाने के बारे में सोचना चाहिए.

क्या यह मुमकिन नहीं?

फ़र्स्टपोस्ट से बातचीत में अकरेकर ने कहा कि खाने की मात्रा पर नियंत्रण करने का सरकारी कदम वैसा ही है जैसा कि किसी कलाकार को ये सुझाव देना कि वो कैनवस पर कितना रंग इस्तेमाल करे.

सरकारी मंशा को लेकर अकरेकर का कहना है कि ये बकवास है और तर्क के विपरीत है. रेस्तरां में डिश की मात्रा पर नियंत्रण करने से आखिर कैसे भोजन की बर्बादी रूक सकती है जो सरकार बतौर तर्क आगे बढ़ा रही है.

अगर कोई ग्राहक छह प्लेट खाना का ऑर्डर करता है और जिसके लिए वो भुगतान भी करने को तैयार है तो ऐसे में रेस्तरां मालिक क्या करेंगे ये सवाल अकरेकर पूछते हैं.

कोई भी ग्राहक अगर किसी रेस्तरां में जाता है तो वो अपनी भूख मिटाने के साथ साथ वहां के माहौल में सुकून तलाशता है.

और तो और ग्राहक को ये भी पता है कि उसे इसके लिए कितने पैसे का भुगतान करना पड़ेगा.

क्या सही और क्या गलत है?

सरकारी तर्क को लेकर जो सबसे भ्रमात्मक स्थिति है वो ये कि सरकार इस बात को कैसे निर्देशित कर सकती है प्रति प्लेट प्राउन की संख्या कितनी होगी.

हर एक रेस्तरां इस बात का फैसला करती है कि थाली की मात्रा कितनी होगी. और इस निर्णय तक पहुंचने से पहले कई बार ग्राहकों पर इसका ट्रायल किया जाता है.

इसलिए अगर कोई रेस्तरां 50 रुपए में दो इडली परोसना पर्याप्त मानता है तो कुछ रेस्तरां एक थाली में 3 इडली भी परोसते हैं. ऐसे में ये तर्क कौन दे सकता है कि क्या सही है और क्या गलत है.

इम्प्रेसारियो इंटरनटेनमेंट एंड हॉस्पिटालिटी प्राइवेट लिमिटेड जिनकी रेस्तरां की 48 शाखाएं देश भर में हैं.

उनके सीईओ और एमडी रियाज अमलानी का कहना है कि दरअसल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब भोजन की बर्बादी की बात कही थी तो इससे उनका तात्पर्य सरकारी गोदामों में अन्न, फल और सब्जियों के सड़ने से था.

मन की बात से शुरू हुआ था सिलसिला

यहां तक कि प्रधानमंत्री की चिंता सब्जी मंडियों में उन सब्जियों को लेकर भी थी जिनके खरीददार नहीं बच जाते हैं.

उनका कहना है कि रेस्तरां में खाने की बर्बादी नहीं होती है. ग्राहक वही लेते हैं जिसका वो भुगतान करते हैं. ज्यादातर वो बचे हुए खाना को अपने साथ बैग में वापस ले जाते हैं.

अमलानी सरकार के डिश की साइज को नियंत्रण करने के प्रस्तावित कदम से भ्रम में हैं. “ठीक है आप एक प्लेट में तीन प्रॉन की गिनती कर सकते हैं.

लेकिन चावल के दाने या फिर चना भटुरे में चना की कितनी संख्या है इसकी गिनती कैसे होगी ? मैं इसे लेकर भ्रम में हूं.

जबरदस्ती दखल कर रही है सरकार

होटल उद्योग के एक जानकार के मुताबिक सरकार उस क्षेत्र में जबरदस्ती हाथ डाल रही है जिसके बारे में उसे खास ज्ञान नहीं है.

सरकारी गोदामों में अन्न की बर्बादी को लेकर पिछले कई वर्षों से सरकार कुछ नहीं कर पाई है.

यहां तक कि फल और सब्जी बाजार में बर्बादी रोकने में भी सरकार सक्षम नहीं है. उनका कहना है कि उदाहरण के तौर पर सड़क पर ठेले लगाने वाले.

मैं इस बात को जानने के लिए उत्सुक हूं कि जनता के लिए बेचे जाने वाले ऐसे भोजन को लेकर सरकार क्यों नहीं विचार कर रही है.

वो बेहद अस्वस्थ माहौल में खाना तैयार करते हैं, सरकार को कोई टैक्स नहीं देते, सड़क का इस्तेमाल खाना बनाने और बेचने के लिए करते हैं.

यहां तक कि सड़क पर ही वो बचे हुए खाने को डंप करते हैं. जिस पर चूहे और बिल्लियों को मंडराते हुए देखा जा सकता है.

ये हालत देश के सबसे पॉश कहे जाने वाले इलाकों में देखी जा सकती है. क्या ऐसे लोग जो नेताओं के लिए वोट बैंक हैं सिर्फ इसी वजह से उन्हें इस सूची में शामिल नहीं किया जा रहा है.

क्या है मुश्किल?

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रेस्तरां मालिक कहते हैं कि जब नेता फाइव स्टार होटलों में बतौर जनता के चुने हुए प्रतिनिधि जाते हैं. और वहां एक कप चाय के लिए उन्हें 400 से 500 रु. अदा करनी पड़ती है तो ये चीज उन्हें ‘इलिटिस्ट’ और ज्यादा कीमती लगती है.

वो कहते हैं कि नेता इस बात को भूल जाते हैं कि रियल एस्टेट की कीमतों में बढ़ोतरी होती रहती है.

यहां तक कि जिस माहौल में चाय की बिक्री की जाती है उन सभी को इसकी कीमत में जोड़ दिया जाता है.

इससे भी बड़ी बात ये है कि फाइव स्टार होटल कुल रेस्तरां का सिर्फ 5 से 10 फीसदी ही संख्या में हैं. और यहां आने वाले ग्राहक भी विशिष्ट श्रेणी में आते हैं.

नहीं होता है खाना बर्बाद ?

रेस्तरां मालिकों का कहना है उनके यहां भोजन की बर्बादी नहीं होती है क्योंकि उनका कारोबार तरह तरह के व्यंजन को परोसने पर ही निर्भर करता है.

एचआरएडबल्यूआई एंड फेडरेशन ऑफ होटल एंड रेस्ट्यूरेंट एसोसिएशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष भारत मलकानी का कहना है कि रेस्तरां से अक्सर जो खाना बेचा नहीं जा सकता है उसे रेफ्रिजेटर में रखा जाता है.

जो खाने योग्य होते हैं और होटल कर्मचारी उसे खाते हैं. ज्यादातर रेस्तरां मालिक अपने इलाके के वंचित लोगों को खाना मुहैया करा देते हैं.

लिहाजा रेस्तरां में भोजन की बर्बादी नहीं होती है. हम हमेशा अपनी व्यवस्था को बेहतर करने में लगे रहते हैं. जहां तक बात झूठन की है-जो ग्राहक अपनी थाली में छोड़ देते हैं, उसे कुछ रेस्तरां में खाद में बदल दिया जाता है.

बशर्ते कि उनके पास इसके लायक जमीन होती हो. नहीं तो इन्हें फेंक दिया जाता है क्योंकि ये खाने योग्य नहीं रह जाता.

कहां जाता है बचा हुआ खाना?

वैसे भी जो खाना छोड़ा जाता है उसमें दाल और चावल ही ज्यादा होते हैं. शायद ही कोई ग्राहक ऐसा होता है जिसने चिकन, मटन या फिर पनीर डिश के लिए भुगतान किया हो और वो उसे प्लेट में छोड़ कर निकल जाए.

जो भोजन बिल्कुल खाने योग्य नहीं रह जाता उसका क्या किया जाए ? इस समस्या के समाधान के लिए होटल और रेस्तरां उद्योग लगातार इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नालॉजी और दूसरे विशेषज्ञों से राय मशविरा कर रहा है.

मलकानी कहते हैं कि लंबे समय में हम इसका समाधान तलाशने में जुटे हैं. रेस्तरां मालिक पूछते हैं कि इसके बाद सरकार क्या करने वाली है.

क्या सरकार रेस्तरां में पूरी तरह से शराब पर पाबंदी लगाएगी या फिर फोर्क और चाकू के इस्तेमाल पर रोक लगा देगी, क्योंकि ये हमारी संस्कृति का हिस्सा नहीं हैं ?

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