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शहादतों पर सियासत का खतरनाक खेल

मोदी सरकार 'सेना का राजनीतिकरण' और 'राजनीति का सैन्यीकरण' करने पर उतारू है

Updated On: Nov 21, 2016 07:45 PM IST

Krishna Kant

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शहादतों पर सियासत का खतरनाक खेल

रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने सुरक्षा जैसे संवेदनशील और गंभीर मसले को मजाक बनाकर रख दिया है. ऐसा लगता है कि उन्हें बयानबाजी में मजा आता है, इसलिए कुछ भी बोलते हैं.

क्या रक्षा मंत्री को यह अंदाजा नहीं कि सेना और सुरक्षा के बारे में हास्यास्पद बयानबाजी सिर्फ नुकसान पहुंचाएगी? वे भाजपा के उस अभियान में शामिल हो चुके हैं जो सेना को चुनावी सभाओं तक खींच लाया है.

आज मीडिया में उनके बयान के आधार पर खबर छपी है. पणजी में एक चुनावी सभा को संबोधित करते हुए रक्षा मंत्री ने कहा कि 'देश की सेना का मानोबल काफी बढ़ा हुआ है. सेना देश के दुश्मनों को सबक सिखाना चाहती है. इसके लिए वह बस सरकार की इजाजत का इंतजार कर रहे हैं. हम सेना को 2-3 बार मंजूरी दे भी चुके हैं.'

केंद्रीय रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर

रक्षा मंत्री को चाहिए कि सेना और सुरक्षा को लेकर उन्हें जो करना है करें, लेकिन चुनावी सभाओं में उसका ढिंढोरा क्यों पीट रहे हैं, जबकि उनकी उपलब्धि पिछली सरकारों से बदतर है?

सच्चाई यह है कि भारत और पाकिस्तान दोनों देश के सत्ताधारी दल सीमा पर एक मूर्खतापूर्ण युद्ध छेड़े हुए हैं. वे दोनों ही सैनिकों की शहादत को चुनावी सभाओं में बेच रहे हैं. दोनों देश लगातार अपनी जनता से झूठ बोल रहे हैं. रक्षा मंत्री जब चुनावी सभा संबोधित कर रहे थे, उन्होंने यह नहीं बताया कि आज भी एक सैनिक शहीद हुआ है और तीन घायल हैं. वे इस पर कुछ नहीं कह रहे हैं कि रोज जवानों की शहादत हो रही है और सरकार इसे रोक पाने में नाकाम है.

लगातार जारी है शहादत 

समाचार एजेंसी भाषा के मुताबिक, '29 सितंबर को पीओके में आतंकी ठिकानों को निशाना बनाकर की गई सर्जिकल स्ट्राइक के बाद से पाकिस्तान नियंत्रण रेखा और अंतरराष्ट्रीय सीमा पर गोलीबारी और गोलाबारी की 286 घटनाओं को अंजाम चुका है जिनमें 14 सुरक्षाकर्मियों सहित 26 लोगों की मौत हुई है.' जिस सर्जिकल स्ट्राइक को भाजपा और मोदी सरकार चुनावों में दुहना चाह रही है उसके बाद सीमा पर संघर्ष विराम उल्लंघन और घुसपैठ की घटनाएं बढ़ गई हैं.

एक नवंबर को मीडिया में प्रकाशित खबरों में कहा गया कि पिछले तीन महीनों में सीमा पर 42 जवान शहीद हुए. अगस्त में 10, सितंबर में 24 और अक्टूबर में 8 जवान शहीद हो गए. 2016 में एक नवंबर कुल 76 जवान शहीद हो चुके थे. इसके पहले 2009 में सेना के 79 जवान शहीद हुए थे.kashmir jawan

एक नवंबर को ही दिल्ली में एक समीक्षा बैठक हुई जिसमें राजनाथ सिंह की सुरक्षा हालाता की समीक्षा की. इस बैठक में रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल, सेना प्रमुख जनरल दलबीर सिंह सुहाग एवं अन्य वरिष्ठ अधिकारी मौजूद थे. यह बैठक उस घटना के बाद हुई, जिसमें सीमा पर हुई पाकिस्तानी गोलीबारी में आठ भारतीय नागरिक मारे गए हैं और 22 घायल हुए. भारत की जवाबी कार्रवाई में पाकिस्तान के दो सैनिक मारे गए.

इसके बाद छह नवंबर को पाकिस्तान ने पुंछ के कृष्णा घाटी सेक्टर में भारतीय चौकियों को निशाना बनाया, जिसमें दो जवान शहीद हो गए. इसके बाद 12 नवंबर को कुपवाड़ा के केरन सेक्टर में संघर्ष विराम के उल्लंघन के दौरान एक जवान शहीद हो गया. यानी शहादतों की संख्या 2009 की संख्या से ज्यादा हो चुकी है.

पाकिस्तान का दावा

बीबीसी के मुताबिक, 17 नवंबर को पाकिस्तानी सेना के जनरल राहिल शरीफ़ ने दावा किया कि पाकिस्तानी फौज ने हालिया झड़पों में 40 से 44 भारतीय सैनिकों को मार दिया है. लेकिन भारतीय फौज इस बात को स्वीकार नहीं कर रही है. हालांकि, भारतीय फौज ने आधिकारिक बयान देकर पाकिस्तान के इस दावे को 'फर्जी' ठहराया.

20 नवंबर को फिर से बीबीसी ने पाकिस्तानी सेना प्रमुख और अखबारों के हवाले से खबर प्रकाशित की कि 'जिस दिन एलओसी पर पाकिस्तान के सात सैनिक मारे गए थे, उस दिन के बाद से अब तक भारत के 45 सैनिक मारे जा चुके हैं लेकिन भारत इसे स्वीकार नहीं कर रहा है.'

हम भारत के नागरिक वही सही मानेंगे जो हमें भारतीय सेना और भारत सरकार बताएगी. लेकिन सीमा पर मारे गए लोगों की संख्या का सच अलग-अलग कैसे हो सकता है? दोनों देशों की सरकारें अपनी-अपनी जनता से झूठ बोलकर अपनी बहादुरी के कसीदे गढ़ रही हैं.

पाकिस्तानी जनता खुश होगी कि 45 भारतीय सैनिक मारे गए. यहां भारत में रक्षा मंत्री कह रहे हैं कि हम पहले से ज्यादा तीर मार रहे हैं. जनता को यह कौन बताएगा कि करीब 80 भारतीय सैनिक पिछले एक साल में मारे जा चुके हैं?army

इस प्रश्न पर विचार क्यों नहीं हो रहा है कि शहादतें कैसे रोकी जाएं? क्या जवानों की जान की कीमत यही इतनी है उनकी शहादतों को चुनाव में भुनाया जाए और शहादत रोकने के उपायों पर कभी चर्चा न हो? भारत और पाकिस्तान छह दशक से युद्ध लड़ रहे हैं. लाखों लोगों के शहीद होने के बावजूद कोई हल नहीं निकला है.

साउथ एशिया टेररिज्म पोर्टल के मुताबिक, 1988 से लेकर सितंबर, 2016 तक आतंकी वारदातों में कुल 6,250 भारतीय सुरक्षाकर्मी शहीद हुए हैं. वहीं जवाबी कार्रवाई में कुल 23,084 आतंकियों को भारतीय जवानों ने मार गिराया. इन घटनाओं में करीब 15000 लोग मरे हैं. इन मौतों का अब तक कुछ हासिल नहीं है. नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद दो साल के भीतर 156 जवान शहीद हुए हैं. अब यह आंकड़ा ढाई सौ के करीब पहुंच रहा है.

मूर्खतापूर्ण युद्ध का हासिल सिर्फ मौतें

'द क्विंट' बेवसाइट पर एक लेख में कहा गया है कि 'आतंकी वारदातों में मारे गए जवानों की सालाना औसत मृत्यु दर पर नजर डालें, तो यह आंकड़ा कांग्रेस की मनमोहन सरकार से जरा भी कम नहीं है, बल्कि कश्मीर में आतंकी वारदातों की संख्या अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सरकार की तुलना में मोदी सरकार के कार्यकाल में बढ़ी हैं.'

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर को यह बचकानी हरकत छोड़ देनी चाहिए कि उन्होंने इतने मारे और हमने इतने मारे. सैनिकों की जिंदगियों पर अपनी बहादुरी के किस्से सुनाना बंद करें और पाकिस्तान समस्या का कूटनीतिक हल खोजें. पाकिस्तान पर रणनीतिक दबाव बनाकर सीमा पर हो रही घटनाओं को रोकना ही बेहतर हल हो सकता है. इस मूर्खतापूर्ण युद्ध का हासिल सिर्फ मौतें हैं.

दूसरी सबसे खतरनाक बात यह है कि नरेंद्र मोदी, उनके मंत्री और भाजपा 'सेना का राजनीतिकरण' और 'राजनीति का सैन्यीकरण' करने पर उतारू है. यह बहुत खतरनाक है. अगर कभी सेना के किसी जनरल को राजनीति का शौक चढ़ा तो न सिर्फ सियासी गलियारा, बल्कि लोकतंत्र के लिए भी मुश्किल होगी. सेना सरकार चलाएगी और सारे बड़बोले नेता जेल के अंदर होंगे. पाकिस्तान का हासिल यही है. वहां सेना ही सरकार है. भारत को यह मूर्खता नहीं करनी चाहिए.

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