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गोरखपुर त्रासदी: इस शोक की उम्र भी टीआरपी तय करेगी!

देश की सबसे  बड़ी समस्या नैतिक सत्ताओं का मरना है

Rakesh Kayasth Updated On: Aug 13, 2017 04:39 PM IST

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गोरखपुर त्रासदी: इस शोक की उम्र भी टीआरपी तय करेगी!

गोरखपुर के सरकारी अस्पताल में 60 बच्चों ने बिना ऑक्सीजन के दम तोड़ दिया. अस्पताल में ऑक्सीजन की कमी को लेकर खबरें लगातार आ रही थी, लेकिन ये कमी दूर नहीं हो पाई. सोशल मीडिया पर इस मामले को लेकर बहुत नाराजगी है. मजबूरन मेन स्ट्रीम मीडिया को भी इस खबर को अच्छी-खासी अहमियत देनी पड़ी है.

फिलहाल गोरखपुर एक नेशनल हेडलाइन है. लेकिन कब तक?  क्या ये कवरेज वैसी है, जैसी दिल्ली के निर्भया कांड को लेकर थी? यकीनन नहीं है. ये कवरेज वैसी भी नहीं है जैसी शीना बोरा हत्याकांड में इंद्राणी मुखर्जी और पीटर मुखर्जी की गिरफ्तारी को लेकर थी.

वजह पर बात करना बहुत ही बोरिंग है. यह देश बड़े-बड़े शहरों की छोटी-छोटी बातों से हिल जाता है, छोटे शहरों की बड़ी बातें दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की सेहत पर कोई असर नहीं डालती. इसलिए गोरखपुर के बच्चो की तरह उनके शोक की उम्र भी बहुत छोटी होगी. ये खबर उसी समय तक जिंदा रहेगी जब तक ज्यादा टीआरपी देनेवाली कोई नई पटकथा सामने नहीं आ जाती है.

बच्चों के परिजनों के गुस्से और नाराजगी को देखते हुए बीआरडी अस्पताल के अंदर बड़ी संख्या में पुलिसकर्मियों को तैनात किया गया है

बच्चों के परिजनों के गुस्से और नाराजगी को देखते हुए बीआरडी अस्पताल के अंदर बड़ी संख्या में पुलिसकर्मियों को तैनात किया गया है

नई पटकथा किसी भी समय आ सकती है. चीन के बॉर्डर पर तनाव बढ़ सकता है. 15 अगस्त से पहले किसी जगह से आतंकवादी हमले की आशंका वाला कोई एलर्ट आ सकता है. मदरसों में वंदे मारतम गाने या ना गाने को लेकर विवाद फिर से गरमा सकता है.

इसलिए ये मान लेना बहुत बड़ी नादानी है कि गोरखपुर की घटना ने राष्ट्र की सामूहिक चेतना को इस तरह झकझोर दिया है कि इसका असर लंबे समय तक रहेगा और समाज ऐसी घटनाएं रोकने के लिए राष्ट्रीय जनमत का निर्माण करेगा.

त्रासदियां इस देश में हमेशा से इवेंट की तरह आती हैं. एक इवेंट खत्म होता है और दूसरा शुरू आ जाता है. जनता अपनी रुचि और अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धताओं के हिसाब से इन त्रासदियों पर रिएक्ट करती है. इस देश में रोजाना ना जाने कितने किसान आत्महत्या करते हैं. अखबार के पन्ने और टेलिविजन स्क्रीन पर ढूंढे से कोई खबर नहीं मिलती. सूखे की मार झेल रहे तमिलनाडु के किसानों ने दिल्ली में आकर डेरा डाला.

tamilnadu farmers

अपनी दयनीय स्थिति बयान करने के लिए वे अपने साथ हड्डियां लेकर आए और मुंह में मरे चूहे दबाकर प्रदर्शन किया. किसी भी संवेदनशील समाज को झकझोरने के लिए वे दृश्य काफी थे. लेकिन समाज पर असर? सोशल मीडिया का बड़ा तबका इन किसानों का मजाक उड़ा रहा था और उन्हें सरकार के खिलाफ साजिश करने वाला बता रहा था.

संविधान निर्माता बी.आर.अंबेडकर ने कहा था कि असली राष्ट्र वही होता है, जो वहां रहने वालों के साझा सुख और साझा दुखों से बनता है. क्या भारत इस लिहाज से अभी तक एक राष्ट्र बन पाया है? इस देश की बहुत बड़ी आबादी जिन सवालों से रोजमर्रा की जिंदगी में जूझती है, उससे बाकी देश का कोई लेना-देना नहीं है. भारत में लाखों लोग अब भी गटर में उतरकर बिना किसी सुरक्षा और उपकरण के सफाई का काम करते हैं.

दुनिया के किसी भी सभ्य समाज के लिए यह एक कलंक है. लेकिन शर्म किसे आती है? क्या विश्वगुरू होने की डींगे हांकने वाला सत्ता तंत्र कभी इस बात को लेकर शर्मसार होता है? क्या स्मार्टफोन फोन इस्तेमाल करने वाला समाज कभी एक बार भी सोचता है कि आखिर ये लोग क्यों हैं और इन्हे ऐसा काम क्यों करना पड़ रहा है?

पिछले चार महीने में देश के अलग-अलग हिस्सों में गटर की जहरीली गैस में दुम घुटने से 15 सफाई कर्मचारी मर चुके हैं. इनमें से चार मौत तो राजधानी दिल्ली के बीचो-बीच हुई. मीडिया में आपने इन घटनाओं का कितना कवरेज देखा है? क्या सोशल मीडिया पर आपको गटर में मरने वालों को लेकर किसी तरह की कोई बेचैनी नजर आई है? जाहिर है खुद को एक सभ्य, सुसंस्कृत और संवेदनशील समाज समाज बताने का हमारा दावा पूरी तरह से खोखला है.

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इनसेफेलाइटिस से मरने वाले सभी बच्चों की उम्र एक से चार साल के बीच है

इनसेफेलाइटिस से मरने वाले सभी बच्चों की उम्र एक से चार साल के बीच है

गोरखपुर के जिस अस्पताल में बच्चों की मौत हुई है, वहां से ऑक्सीजन उपलब्ध ना होने की खबरें लगातार आ रही थीं. ऑक्सीजन की सप्लाई तो बहाल नहीं हुई, लेकिन उस दौरान राज्य में गायों के लिए एंबुलेंस सेवा जरूर शुरू हो गई.

गोरखपुर के अस्पतालों से जिन दिनों बच्चों की मौत की खबरें आ रही थीं, उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार मदरसों में वीडियोग्राफी की तैयारी करवा रही थी, ताकि 15 अगस्त के दिन वंदेमारतम ना गाने वालों की पहचान की जा सके. समझना मुश्किल नहीं है कि जनता के वोट से बनने वाली और पब्लिक के टैक्स पर चलने वाली सरकारों की प्राथमिकाएं क्या हैं.

लेकिन सवाल पूछने और जवाब देने मे दिलचस्पी किसे है? इस बात को गले से उतार पाना थोड़ा मुश्किल है, फिर भी सच यही है कि हम एक ऐसे देश बाशिंदे हैं, जहां सरकारें मगरूर हैं, विपक्ष नकारा है, मीडिया सिद्धांतहीन है, संस्थाएं कमजोर है और आवाम पूरी तरह से बेपरवाह.

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