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गोवा: कांग्रेस का बीजेपी पर लोकतंत्र की हत्या का आरोप बिल्कुल बेमानी है

गोवा में चल रहा सियासी ड्रामा कांग्रेस की बुरी हालत और बीजेपी की कामयाबी की वजह बताने के लिए काफी है.

Sreemoy Talukdar Updated On: Mar 15, 2017 09:47 AM IST

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गोवा: कांग्रेस का बीजेपी पर लोकतंत्र की हत्या का आरोप बिल्कुल बेमानी है

गोवा में चल रहा सियासी ड्रामा कांग्रेस की बुरी हालत और बीजेपी की कामयाबी की वजह बताने के लिए काफी है. पूरा मामला ऐसा है जो राजनीति शास्त्र में दिलचस्पी रखने वाले हर शख्स के लिए कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति को समझने में मददगार हो सकता है.

गोवा में जो भी हुआ वो कांग्रेस के लिए गांधी परिवार की मजबूरी को बयां करता है.उस पर हम बाद में बात करेंगे. पहले हम कांग्रेस के उस आरोप पर चर्चा करते हैं कि, 'बीजेपी लोकतंत्र की चोरी कर रही है'.

पहले पी चिदंबरम ने ट्वीट करके ये आरोप लगाया. फिर राहुल गांधी ने कहा कि जिस तरह बीजेपी, गोवा और मणिपुर में सरकार बना रही है वो लोकतंत्र में डाका डालने जैसा है. दोनों ही जगह पर विधानसभा चुनाव के बाद किसी पार्टी को बहुमत नहीं मिला था.

पी चिदंबरम ने ट्विटर पर लिखा कि, 'चुनाव में दूसरे नंबर पर आने वाली पार्टी को सरकार बनाने का कोई हक नहीं. बीजेपी गोवा और मणिपुर में चुनाव नतीजों की चोरी कर रही है'.

मंगलवार को संसद के बाहर राहुल गांधी ने पत्रकारों से कहा कि यूपी में हार कोई बड़ा झटका नहीं. राहुल गांधी ने तो पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों को लेकर ये दावा भी कर दिया कि उनकी पार्टी ने बीजेपी से बेहतर प्रदर्शन किया है क्योंकि तीन राज्यों में वो नंबर वन पार्टी रहे.

राहुल का आरोप

राहुल ने आरोप लगाया कि बीजेपी, गोवा और मणिपुर में जो कर रही है उससे लोकतंत्र को गहरी चोट पहुंची है. बीजेपी अपनी सत्ता और पैसे की ताकत पर दोनों राज्यों में सरकार बना रही है.

राहुल गांधी को इस बात का पूरा हक है कि वो अपनी ख्वाबों की दुनिया में रहें. मगर कांग्रेस ने बीजेपी पर जो आरोप लगाए हैं उनकी समीक्षा होनी चाहिए.

Rahul Gandhi

गोवा मामले पर कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी पर सवाल खड़े हो रहे हैं

कांग्रेस ने गोवा की राज्यपाल पर हड़बड़ी मे मनोहर पर्रिकर को सरकार बनाने का न्यौता देने का आरोप लगाया. इस बारे में एक अर्जी भी पार्टी ने सुप्रीम कोर्ट में दी. सवाल ये है कि क्या मनोहर पर्रिकर को सरकार बनाने के लिए बुलाकर गोवा की राज्यपाल मृदुला सिन्हा ने कोई गड़बड़ी की?

अगर हां तो ये दावा कहां तक सही है कि दूसरे नंबर पर आने वाली पार्टी को सरकार बनाने का कोई हक नहीं? इसके राजनैतिक, कानूनी और नैतिक पहलू क्या हैं?

हमें पहले चुनाव के नतीजों पर गौर करना चाहिए. गोवा में कांग्रेस के 17 विधायक हैं. ये सबसे बड़ी पार्टी है. 40 सदस्यों वाली विधानसभा में बहुमत के लिए 21 विधायक चाहिए.

बीजेपी के पास 13 विधायक हैं. गोवा फॉरवर्ड पार्टी और महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी के पास तीन-तीन विधायक हैं. तीन निर्दलीय और एनसीपी का भी एक विधायक जीता है.

नतीजा आने के एक दिन बाद बीजेपी ने राज्यपाल के पास जाकर दावा किया कि उनके पास 21 विधायकों का समर्थन है. रविवार को मनोहर पर्रिकर को मुख्यमंत्री मनोनीत किया गया. उन्हें बहुमत साबित करने के लिए 15 दिनों का वक्त दिया गया.

राज्यपाल के यहां से जारी प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया कि, 'मनोहर पर्रिकर ने माननीय राज्यपाल के सामने बीजेपी के 13, जीएफपी और एमजीपी के 3-3 और दो निर्दलीय विधायकों के समर्थन का दावा किया है जो 40 सदस्यों की विधानसभा में ये 21 विधायक होते हैं. ऐसे में गोवा की राज्यपाल मनोहर पर्रिकर को मुख्यमंत्री मनोनीत करके उन्हें 15 दिन में बहुमत साबित करने को कहती हैं'.

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राज्यपाल के इस फैसले के बाद भड़की कांग्रेस ने बीजेपी पर बहुमत चुराने का दावा किया. पार्टी ने सुप्रीम कोर्ट में अर्जी देकर अपील की कि वो मंगलवार को होने वाले मनोहर पर्रिकर के शपथ ग्रहण समारोह को रोकने का आदेश पारित करे. साथ ही कांग्रेस ने अदालत से गुहार लगाई कि वो राज्यपाल के पर्रिकर को मुख्यमंत्री नियुक्त करने के आदेश को भी रद्द करे.

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कांग्रेस की तरफ से अभिषेक मनु सिंघवी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका डाली

कांग्रेस को किसने रोका

पूरे घटनाक्रम से ये सवाल उठता है कि कांग्रेस को बहुमत के लिए सिर्फ चार विधायक चाहिए थे तो पार्टी को किसने बहुमत जुटाने से रोका था? पार्टी सो भी नहीं रही थी.

हां, त्रिशंकु विधानसभा की सूरत में बहुमत के लिए विधायकों का समर्थन जुटाने में पार्टी ने काफी वक्त गंवा दिया. क्योंकि कांग्रेस यही नहीं तय कर पाई कि विधायक दल का नेता कौन होगा.

पार्टी महासचिव दिग्विजय सिंह भी गोवा में ही थे और सारे कांग्रेसी नेता एक होटल में जमा थे. वो जब तक पार्टी के भीतर मुख्यमंत्री पद के दावेदार के नाम पर सहमति बनाते तब तक बीजेपी ने बहुमत के लिए जरूरी विधायक अपने पाले में कर लिए.

मीडिया रिपोर्ट्स कहती हैं कि, 'प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष लुइजिन्हो फलेरियो, पूर्व मुख्यमंत्री दिगंबर कामत और प्रताप सिंह राणे कांग्रेस विधायक दल के नेता की दौड़ में आगे थे. मगर हर कैंप ने दूसरे की दावेदारी खारिज कर दी.

ऐसा करके कांग्रेस पार्टी ने अपना कीमती वक्त बर्बाद किया. फिर नेता चुनने के लिए गुप्त मतदान भी किया गया लेकिन इसके नतीजे भी मीडिया से छुपाए गए. यहां तक कि पार्टी के जूनियर विधायकों को भी नहीं पता था कि उनका नेता कौन चुना गया.

शाम के वक्त परेशान और खीझे हुए कांग्रेसी नेता जब होटल से बाहर निकले तो उन्होंने आरोप लगाया कि दिल्ली के नेताओं ने विधायक दल का नेता चुनकर साझा सरकार बनाने का मौका गंवा दिया था.

कांग्रेस के मुकाबले बीजेपी ने तेजी दिखाई. केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी और पूर्व मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर लगातार विधायकों के संपर्क में थे. लंबी बातचीत के बाद विधायकों का समर्थन जुटाकर ही बीजेपी राज्यपाल के पास सरकार बनाने का दावा करने पहुंची.

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दिग्विजय सिंह तो बीजेपी पर विधायकों को खरीदने का आरोप लगा रहे थे. मगर उन्हीं की पार्टी के मुख्यमंत्री पद के एक और दावेदार विश्वजीत राणे ने एनडीटीवी से कहा कि, 'नेतृत्व ने सब बंटाधार कर दिया'. राणे ने कहा कि जनता उनके साथ थी मगर पार्टी ने मौका सिर्फ इसलिए गंवाया क्योंकि उनकी पार्टी के नेता तेजी से फैसला नहीं ले सके.

दिग्विजय पर आरोप

गोवा माइनॉरिटी कांग्रेस के उपाध्यक्ष सेवियो रोडरिग्ज ने कांग्रेस की नाकामी के लिए दिग्विजय सिंह को जिम्मेदार ठहराया. रोडरिग्ज ने टाइम्स नाऊ चैनल को बताया कि, 'मैं इस हालत के लिए अपने पार्टी नेतृत्व को जिम्मेदार मानता हूं. बल्कि मैं ये कहूंगा कि सरकार बनाने में हमारी नाकामी की वजह सिर्फ दिग्विजय सिंह हैं. कांग्रेस ने ये तय करने में वक्त बर्बाद कर दिया कि मुख्यमंत्री कौन होगा'.

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गोवा के विधायकों का आरोप है कि दिग्विजय सिंह फैसला लेने में असमर्थ थे

साफ है कि बीजेपी पर आरोप लगाकर कांग्रेस अपनी नाकामी छुपा रही है. अब जबकि उसके पास कोई और विकल्प नहीं था तो वो खुद को लोकतंत्र की रक्षक पार्टी के तौर पर पेश करके अपना चेहरा बचा रही है.

जब बहुमत नहीं होता तो पार्टियां दूसरे दलों के साथ मिलकर सरकार बनाती ही हैं बीजेपी ऐसा ही कर रही थी. कांग्रेस का लोकतंत्र की चोरी का आरोप तो बेकार का इल्जाम है.

राज्यपाल के खिलाफ कांग्रेस की कोर्ट में अर्जी में भी दम नहीं दिखता. क्योंकि संविधान में कहीं ये नहीं लिखा कि राज्यपाल मृदुला सिन्हा 17 विधायकों वाली पार्टी को सरकार बनाने के लिए बुलाने को बाध्य हैं. वित्तमंत्री अरुण जेटली ने अपने ट्वीट के जरिए बताया कि राज्यपाल अपनी मनमर्जी नहीं चला रही थीं.

अरुण जेटली ने लिखा कि त्रिशंकु विधानसभा की सूरत में जब कुछ विधायक मिलकर साझा सरकार बनाने का दावा पेश करते हैं तो राज्यपाल को पूरा अधिकार है कि वो उन्हें मौका दे. साथ ही उन्हें कम वक्त में अपना बहुमत साबित करने को कहें.

मार्च 1998 में उस वक्त के राष्ट्रपति केआर नारायणन ने जो आदेश जारी किया था, मृदुला सिन्हा का फैसला उस आदेश के भी अनुरूप है. राष्ट्रपति ने कहा था कि राज्यपाल सबसे बड़ी पार्टी को सरकार बनाने के लिए बुलाने को बाध्य नहीं है.

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मार्च 1998 में जो प्रेस विज्ञप्ति राष्ट्रपति भवन से जारी हुई थी उसके मुताबिक, 'जब कोई भी पार्टी चुनाव पूर्व गठबंधन के हिसाब से बहुमत नहीं हासिल करती तो भारत में या कहीं और के राष्ट्राध्यक्ष सबसे ज्यादा विधायकों वाले गठजोड़ को सरकार बनाने का मौका देते हैं.'

इस तरह, प्रधानमंत्री बने शख्स को तय वक्त के भीतर सदन में बहुमत साबित करने को कहा जाता है. हालांकि, ये कोई बंधा-बंधाया फॉर्मूला नहीं है. क्योंकि कई बार ये भी हो सकता है कि सबसे बड़ी पार्टी का दावा करने वालों के मुकाबले कम सदस्यों वाले गठजोड़ के पास ज्यादा समर्थन हो सकता है.

यही वजह है कि मुख्य न्यायाधीश जस्टिस जेएस खेहर की अगुवाई वाली सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने मनोहर पर्रिकर के शपथ लेने पर रोक लगाने से इनकार कर दिया. साथ ही अदालत ने पर्रिकर को 16 मार्च तक सदन में अपना बहुमत साबित करने को कहा.

अदालत के आदेश से लोकतंत्र पर डाका डालने का आरोप खुद ब खुद दम तोड़ देता है. सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कांग्रेस के वकील अभिषेक मनु सिंघवी से कई सख्त सवाल भी पूछे.

अदालत ने पूछा, 'क्या कांग्रेस ने विधायकों के समर्थन की लिस्ट राज्यपाल को दी थी? आप जो बात हमसे कह रहे हैं वही बात आपको राज्यपाल को बतानी चाहिए थी आपके पास भी पूरा वक्त था और पूरी रात पड़ी थी.'

अदालत ने कांग्रेस पार्टी पर तंज कसते हुए रहा कि रात का वक्त तो सबसे अच्छा होता है आपने कोई भी शपथपत्र नहीं पेश किया जो आपके समर्थन का दावा करता हो.

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गोवा में कांग्रेस के नेता के एच मुनियप्पा

कांग्रेस कितने पानी में

कांग्रेस का आखिरी आरोप नैतिकता का है. दूसरे नंबर की पार्टी होने के बावजूद क्या बीजेपी को बहुमत जुटाकर सरकार बनाने की कोशिश करनी चाहिए थी?

ये आरोप इस बुनियाद पर लगाया जा रहा है कि सबसे बड़ी पार्टी के पास ही सरकार बनाने का अधिकार होता है. अफसोस की बात ये है कि आज ये दावा ठोक रही कांग्रेस का खुद का इतिहास बेहद खराब है.

2005 में झारखंड में एनडीए के पास 36 और यूपीए के पास 27 विधायकों का समर्थन था. जबकि 81 सदस्यों वाली विधानसभा में बहुमत के लिए 42 विधायकों की जरूरत थी. तब कांग्रेस विधायकों को चार्टर्ड प्लेन से गुप्त ठिकाने पर ले गई थी ताकि एनडीए सरकार न बना सके. आज वही पार्टी नैतिकता की दुहाई दे रही है.

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2013 में दिल्ली में विधानसभा चुनाव के बाद कांग्रेस ने 28 सीटें जीतने वाली आम आदमी पार्टी को अपने 8 विधायकों के समर्थन से सरकार बनवाने का प्रस्ताव दिया था. ताकि सबसे ज्यादा 31 सीटें जीतने के बावजूद बीजेपी सरकार न बना सके.

इन किस्सों को याद रखते हुए कांग्रेस को नैतिकता का पाठ पढ़ाने से बचना चाहिए. बल्कि बीजेपी को तो इस बात का जवाब देना चाहिए कि सबसे बड़ी पार्टी और 'पार्टी विद डिफरेंस' होने का दावा करने के बावजूद वो कांग्रेस के ऐसे हथकंडे क्यों अपना रही है?

ये पूरा किस्सा ये बताने के लिए काफी है कि कांग्रेस गांधी परिवार के साथ भी बर्बादी की राह पर है और उनके बगैर उसका काम भी नहीं चल सकता.

अब पार्टी अगर ये तक नहीं तय कर पा रही कि मुख्यमंत्री कौन बनेगा वो भी गोवा जैसे छोटे राज्य में तो इस बात का सिर्फ अंदाजा ही लगाया जा सकता है कि अगर गांधी परिवार नहीं होगा तो कांग्रेस का क्या हश्र होगा?

Goa Election Results 2017

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