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गया रेपकांड: बाहुबली RJD MLA सुरेंद्र यादव ने पार्टी की 'प्लानिंग' पर पानी फेर दिया

आरजेडी को नीतीश सरकार के खिलाफ बैठे-बिठाए मिला तगड़ा मुद्दा विधायक सुरेंद्र यादव की एक गलती के कारण हाथ से सरक गया. सरक ही नहीं गया बल्कि 'बूमरैंग' कर गया

Updated On: Jun 17, 2018 05:51 PM IST

Kanhaiya Bhelari Kanhaiya Bhelari
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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गया रेपकांड: बाहुबली RJD MLA सुरेंद्र यादव ने पार्टी की 'प्लानिंग' पर पानी फेर दिया
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अति उत्साह में की गई असावधानी ने सारा गुड़गोबर कर दिया. पिछले 2 दिन से राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) नेतृत्व इसी बात का रोना रो रहा है. बात सही भी है. बिहार में एनडीए सरकार के खिलाफ बहुत ही तगड़ा मुद्दा विधायक सुरेंद्र प्रसाद यादव द्वारा की गई एक गलती के कारण हाथ से सरक (निकल) गया. सरक ही नहीं गया बल्कि 'बूमरैंग' कर गया.

अपराध और नक्सलवाद के लिए कुख्यात गया जिले के कोंच इलाके में दरिंदों ने पिछले दिनों एक डॉक्टर को पेड़ में बांध कर उसके आंखों के सामने उसकी नाबालिग बेटी और पत्नी के साथ गैंगरेप किया. पुलिस ने फौरन कार्रवाई करते हुए चिन्हित 9 में से 3 रेपिस्टों को 24 घंटे के अंदर पकड़ लिया.

मुख्य विपक्षी पार्टी आरजेडी को इससे बैठे-बिठाए जानदार मुद्दा मिल गया था. बिहार विधानसभा में विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव तो मानो इतराने लग थे. उन्होंने इसपर ट्वीट की झड़ी लगा दी. उनकी देखा-देखी आरजेडी के अखबारी नेतागण पवन गति से मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर टूट पड़े. दल के ‘अनुशासित’ नेताओं ने दिल्ली के 'निर्भया कांड' की चश्मे से गया कांड को भी देखना शुरू कर दिया था.

नीतीश कुमार को बेनकाब करने के लिए रेप पीड़िता को मीडिया में लेकर आए

खबरों के अनुसार बर्निंग इश्यू (ज्वलंत मुद्दे) को लपकने के लिए आनन-फानन में प्लान बना कि रेप पीड़ित 15 साल की बालिका को मीडिया के सामने लेकर आया जाए और नीतीश सरकार को बेनकाब किया जाए. सबूत के साथ बताया जाए कि बिहार में कानून का राज खत्म हो चुका है. अगर पत्रकार की हैसियत से क्रिटिकल एनालिसिस किया जाए तो यह बात सच के काफी करीब है कि लगातार हो रही वारदातों से राज्य में लाॅ एंड आॅडर व्यवस्था चरमरा गई है.

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गया रेप कांड के बहाने तेजस्वी यादव और आरजेडी को बैठे-बिठाए नीतीश सरकार को घेरने का एक बड़ा मुद्दा मिल गया था

कहते हैं कि आरजेडी नेतृत्व ने बेलागंज के विधायक सुरेंद्र प्रसाद यादव के कंधों पर प्लान की सफलता की जिम्मेवारी सौंपी. कर्म और वाणी से दबंग विधायक ने अबोध और सहमी पीड़िता को पुलिस की जीप से जबरन खींचकर अपनी चमचमाती एसयूवी में बिठाया और पहले से तैयार कलमजीवियों के सामने बयान दिलवाया. टीवी फुटेज (न्यूज चैनलों के विजुअल) इस बात के गवाह हैं कि लड़की कितना डरी-सहमी है.

सुरेंद्र यादव के नेतृत्व में आधा दर्जन आरजेडी महारथी अपने बाॅस द्वारा निर्देशित प्लान को अंजाम तक पहुंचाने के लिए बेढंगे तरीके से कसरत करते फुटेज में दिख रहे हैं. अति उत्साही आरजेडी नेताओं ने पीड़ित लड़की पर दबाव बनाकर ओढ़नी से छुपाए उसके चेहरे को सबके सामने उजागर कर दिया. ऐसा करते हुए जाने-अनजाने उन सबने सुप्रीम कोर्ट की उस चेतावनी का भी उलंघन कर दिया. जिसमें किसी हालत में रेप विक्टिम का चेहरा नहीं दिखाना है. अगर कोई रेप पीड़िता के चेहरे को बेपर्दा करता है तो कोर्ट की नजर में वो गुनाहगार है.

सुप्रीम कोर्ट के नियमन को सरेआम ठेंगा दिखाने के जुर्म में गया पुलिस ने विधायक सुरेंद्र प्रसाद यादव के अलावे आरजेडी के 5 नेताओं के खिलाफ केस दर्ज कर लिया है. इनके खिलाफ पॉक्सो एक्ट लगाने की भी बात चल रही है. आरजेडी द्वारा की गई कृत्य का टीवी फुटेज भी सोशल मीडिया में चरखी की तरह घूम रहा है. इसके बाद अब आरजेडी नेतृत्व को रेप का यह मुद्दा न तो निगलते बन रहा है और ना ही उगलते. सहयोगी पार्टी कांग्रेस ने भी इसकी आलोचना शुरू कर दी है. बिहार प्रदेश कांग्रेस कमेटी (बीपीसीसी) के कार्यकारी चीफ कौकब कादरी ने बयान दिया कि ‘हमारी पार्टी गया रेप के खिलाफ आरजेडी द्वारा अपनाई गई ऐसी रणनीति का समर्थन नहीं करती है.’

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कांग्रेस ने प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान रेप पीड़ित लड़की के चहरे को सार्वजनिक करने के लिए आरजेडी की आलोचना की है

सुरेंद्र यादव पर अब भी आधा दर्जन आपराधिक मुकदमे चल रहे हैं

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और एनडीए सरकार के खिलाफ आक्रामक अटैक करने के लिए आरजेडी नेतृत्व द्वारा चुने गए 60 वर्षीय विधायक सुरेंद्र प्रसाद यादव के बारे में भी हल्की-फुल्की जानकारी ले लीजिए. अभी भी इन पर आधा दर्जन के करीब आपराधिक मुकदमे चल रहे हैं.

बहरहाल, 1990 और 2005 में सुरेंद्र प्रसाद यादव का गया में एकछत्र राज हुआ करता था. उसके बाद इनके प्रभाव में कमी आई पर रूतबा खत्म नहीं हुआ है. उस जमाने में यह लालू यादव के असली हनुमान हुआ करते थे. इनके ‘कर्मों’ को याद कर गया की जनता के तन-मन में आज भी सिहरन फैल जाती है. पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी तो इनकी ‘नेकी’ को चाहकर भी कभी भूल नहीं सकते हैं. मांझी 1991 लोकसभा चुनाव गया से कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में लड़ रहे थे. लालू यादव के हनुमान ने मांझी के पक्ष में कार्यरत तात्कालिक कांग्रेस विधायक जयकुमार पालित की चुनाव के दिन मगही स्टाइल में ऐसी ‘खातिरदारी’ की थी कि दवाई करने वाले पीलग्रीम हास्पीटल के डाक्टरों को आज भी याद है.

इस बात को गूगल पर जाकर कंफर्म किया जा सकता है कि सुरेंद्र यादव ने कैसे पुलिस कस्टडी से अतुल प्रकाश का अपहरण कर सूबे का नाम रोशन किया था. पुलिस रिकॉर्ड में देश की यह अनोखी घटना है. 14 दिसंबर, 2014 को अपने बॉडीगार्ड और ड्राइवर के साथ मिलकर गया बाजार में सरेराह एक तिलकुट व्यापारी की पिटाई की थी. इस घटना के खिलाफ शहर के चर्चित नागरिक संघर्ष मोर्चे ने जब आंदोलन किया था तब जाकर इनकी गिरफ्तारी हुई थी.

सुरेंद्र प्रसाद यादव देश के उन कुछ राजनीतिज्ञों में हैं जिन्होंने राजनीति और स्कूल की पढ़ाई साथ-साथ की है. अपने अकादमिक डिग्री के बारे में वो स्वयं कन्फयूज्ड हैं. कंफर्म करने के लिए चुनाव आयोग में दिए गए इनके शपथ-पत्र का अवलोकन किया जा सकता है.

प्रतीकात्मक तस्वीर

बिहार में महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ अपराध बढ़ने से एनडीए गठबंधन की सरकार विरोधियों के निशाने पर आ गई है (प्रतीकात्मक तस्वीर)

अलग-अलग चुनावों में दिए शपथ पत्र में अलग-अलग शैक्षणिक 

वर्ष 2005 में फरवरी और अक्टूबर में हुए बिहार विधानसभा चुनाव में सौंपे अपने शपथ-पत्र में उन्होंने बताया कि वो 1973 में मैट्रिक, 1977 में इंटरमीडिएट, 1989 में बी.ए, 1990 में एम.ए और 1996 में पीएचडी की डिग्री ले चुके हैं. वहीं 2010 विधानसभा चुनाव के शपथ पत्र के अनुसार उन्होंने मैट्रिक 1973, इंटर 1975, बी.ए 1988, एम.ए पाली भाषा में 1990, एल.एल.बी 1994, एम.ए बुद्धिस्ट भाषा में 1995 और पीएचडी 1996 में किया है. वर्ष 2015 में हुए विधानसभा चुनाव में सुरेंद्र यादव लिखते हैं कि उन्होंने मैट्रिक 1973, इंटर 1977, बी.ए पास कोर्स 1988, बी.ए ऑनर्स पाली भाषा 1990 और एम.ए बुद्धिस्ट स्टडी 1992 में किया.

सुरेंद्र यादव 2009 और 2014 में जहानाबाद से लोकसभा का चुनाव लड़ चुके हैं लेकिन अपने शपथ-पत्र की शैक्षणिक अहर्ता वाली कॉलम को पता नहीं उन्होंने क्यों खाली छोड़ दिया. 1985 में सुरेंद्र यादव जहानाबाद से पहली बार विधानसभा का चुनाव बतौर निर्दलीय लड़े और हार गए. बाद में वो गया जिले के नक्सली प्रभावित बेलागंज क्षेत्र शिफ्ट कर गए, जहां से वो लगातार 1990 से लेकर 2015 तक जीतते रहे हैं. 1998 में एक बार वो जहानाबाद से बतौर आरजेडी उम्मीदवार चुनाव जीते हैं.

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