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सुप्रीम कोर्ट प्रेस कॉन्फ्रेंस: न्यायपालिका की साख और लोकतंत्र को खड़ा रखने की कोशिश

इन जजों ने दो महीने पहले चीफ जस्टिस को लेटर लिख अपनी चिंताएं जाहिर की थीं, लेकिन इनकी बात नहीं सुनी गई

Updated On: Jan 13, 2018 05:25 PM IST

Ajay Kumar

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सुप्रीम कोर्ट प्रेस कॉन्फ्रेंस: न्यायपालिका की साख और लोकतंत्र को खड़ा रखने की कोशिश

एडिटर की टिप्पणीः आर पी लूथरा बनाम भारत सरकार के केस का जिक्र खासतौर पर सुप्रीम कोर्ट के चार जजों के चीफ जस्टिस को लिखे गए पत्र में किया गया है. यह मामला उच्च अदालतों में नियुक्तियों और मेमोरेंडम ऑफ प्रोसीजर (एमओपी) से जुड़ा हुआ है. इन्हीं मसलों को शुक्रवार को इन जजों ने अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में उठाया. इस आर्टिकल में यह ब्योरा दिया गया है कि किस तरह से सुप्रीम कोर्ट के आर पी लूथरा केस में दिए गए ऑर्डर ने शुक्रवार को पैदा हुए विवाद में एक अहम रोल निभाया.

क्या है एमओपी?

सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स ऑन रिकॉर्ड एसोसिएशन बनाम यूनियन ऑफ इंडिया एंड एएनआर [(2016) 5 एससीसी 1] में सुप्रीम कोर्ट के 5 जजों की बेंच के फैसले ने नेशनल ज्यूडिशियल अपॉइंटमेंट्स कमीशन (एनजेएसी) को खारिज कर दिया और जजों की नियुक्ति के लिए कोलेजियम सिस्टम को जारी रखा. इस सिस्टम के तहत सुप्रीम कोर्ट के पांच वरिष्ठतम जज एक कोलेजियम के तौर पर काम करते हैं और ऊंची अदालतों के लिए जजों की नियुक्ति करते हैं. ये एक प्रक्रिया का पालन करते हैं जिसमें केंद्र और संबंधित राज्यों के साथ चर्चा भी की जाती है.

इस प्रक्रिया को मेमोरेंडम ऑफ प्रोसीजर (एमओपी) कहा जाता है. एनजेएसी केस का एक नतीजा यह था कि एमओपी में इस तरह से बदलाव और संशोधन होना था कि ताकि ज्यादा हालिया घटनाक्रमों को इसमें शामिल किया जा सके, खासतौर पर पारदर्शिता के हितों का इसमें ख्याल रखा जाना था.

एनजेएसी केस और सरकार की तरकीब

एनजेएसी केस में फैसले के बाद एमओपी को लेकर सरकार और सुप्रीम कोर्ट के बीच एक लंबी रस्साकसी चली. पिछले सीजेआई (सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश) टी एस ठाकुर ने सांसदों के ओके नहीं किए जाने के बहाने न्यायिक नियुक्तियों को लटकाने को लेकर सरकार की खुलेआम आलोचना की. लेकिन, मार्च 2017 में एमओपी को अंतिम रूप दे दिया गया और इसे चीफ जस्टिस जे एस केहर के वक्त सरकार के पास भेज दिया गया.

जस्टिस कर्णन लगातार अपने साथी जजों पर खुद के साथ दुर्व्यवहार के आरोप लगाते रहे हैं

जस्टिस कर्णन लगातार अपने साथी जजों पर खुद के साथ दुर्व्यवहार के आरोप लगाते रहे

मई 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने कलकत्ता हाईकोर्ट के एक तत्कालीन जज को अवमानना के मामले में छह महीने की जेल की सजा दे दी. जस्टिस सी एस कर्णन के मामले में सुप्रीम कोर्ट के सात जजों की बेंच ने फैसला दिया. भारत के और शायद कॉमनवेल्थ देशों के इतिहास में यह पहला मौका था जबकि एक उच्च अदालत के किसी सिटिंग जज को आपराधिक अवमानना का दोषी ठहराया गया. जस्टिस चेलामेश्वर ने एक अलग से लिखी गई राय में लिखा है, ‘हमारी राय में यह मामला तत्काल दिक्कत से आगे जाकर अहमियत रखता है. यह केस दो बातों पर रोशनी डालता है, (1) संवैधानिक अदालतों में जजों के चयन और नियुक्ति की प्रक्रिया पर फिर से नजर डालने की जरूरत है, और (2) एक उचित कानूनी व्यवस्था स्थापित करने की जरूरत है ताकि ऐसे हालातों से निपटा जा सके जहां किसी जज के आचरण में सुधारवादी उपायों- महाभियोग को छोड़कर- की जरूरत हो.’ (पैराग्राफ 26, इन आरईः माननीय जस्टिस सी एस कर्णन [(2017) 1 एससीसी] में जस्टिस चेलामेश्वर सेपरेट ओपीनियन)

आर पी लूथरा बनाम भारत संघ मामला

यह चीज हमें 27 अक्टूबर 2017 को आर पी लूथरा बनाम केंद्र सरकार के मामले में आदेश पर ले जाती है. इस मामले में याचिकाकर्ता ने दरख्वास्त की थी कि एमओपी को जल्द से जल्द तय किया जाए और उच्च न्यायालयों में नियुक्तियों को जाने वाले जज की विदाई से पहले शुरू किया जाए. इससे एक दिलचस्प सवाल पैदा हुआ. अगर एमओपी मार्च 2017 में ही तय हो गया था, तो यह कैसे अभी भी एक खुला हुआ सवाल बना हुआ है? इस केस की सुनवाई एक दो जजों की बेंच ने की और इसमें जस्टिस सी एस कर्णन के मामले का जिक्र हुआ और तय किया गया कि एमओपी के तय होने पर ही इसमें आगे काम होगा और हाईकोर्ट के जजों की नियुक्तियों पर विचार होगा. इस फैसले को मौजूदा चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के टेन्योर में ही पास किया गया था.

क्या होता है रोस्टर?

अस्तित्व में आने के शुरुआती सालों में सुप्रीम कोर्ट में केवल सात जज थे और वे मिलकर मामले सुना करते थे. इसका मतलब है कि हर केस सुप्रीम कोर्ट के सभी जजों के पास आता था. लेकिन, जैसे-जैसे कोर्ट का विस्तार हुआ और इस पर काम का बोझ बढ़ा, सुप्रीम कोर्ट कई बेंचों वाली संस्था बन गई. मामलों की सुनवाई एक, दो, तीन, चार पांच, सात या उससे ज्यादा जजों की बेंचों में होने लगी. बेंचों को मामलों के आवंटन के रिकॉर्ड को रोस्टर कहा जाता है.

रोस्टर की शक्ति चीफ जस्टिस के हाथ

deepak misra mishra

चीफ जस्टिस सभी बराबर जजों में सबसे पहले होते हैं और चीफ जस्टिस का जजमेंट कोर्ट के किसी भी दूसरे जज के मुकाबले ज्यादा भार नहीं रखता है. लेकिन, चीफ जस्टिस के पास प्रशासनिक मोर्चे पर शक्तियां होती हैं. इन शक्तियों में रोस्टर पर नियंत्रण शामिल है. इसका मतलब है कि कौन सा जज किस मामले को सुनेगा, यह तय करने का अधिकार चीफ जस्टिस के पास होता है, और इस अधिकार का इस्तेमाल बेहद सतर्कता के साथ होना चाहिए.

किसी खास जज के पास कानून के किसी खास क्षेत्र की विशेषज्ञता हो सकती है और ऐसे में वह किसी दूसरे जज की बजाय उस क्षेत्र से जुड़े मामलों की सुनवाई करने के लिए ज्यादा उपयुक्त होता है. इस तरह के फैसले चीफ जस्टिस मामलों को जजों को सौंपने से पहले लेते हैं.

हालांकि, ज्यादातर रेगुलर मामलों के लिए एक सिस्टम आमतौर पर अपनाया जाता है, लेकिन जब बात विशेष बेंच बनाने की होती है या संवैधानिक रूप से महत्वपूर्ण विषयों के मामले सौंपने की होती है, तब इस शक्ति का इस्तेमाल बेहद अहम हो जाता है.

यूपी मेडिकल कॉलेज मामले में हुआ था विवाद

मिसाल के तौर पर, पिछले साल यूपी मेडिकल कॉलेज स्कैम याचिकाओं के लिस्ट होने के तरीकों को लेकर काफी विवाद पैदा हुआ. इस लेखक ने उस वक्त इस विवाद के बारे में विस्तार से लिखा था. लेकिन, यह केवल यही बताता है कि किस तरह से केवल किसी मामले के लिए बेंच बनाने और मामलों की लिस्टिंग से बिना वजह एक संस्था को विवाद में घेरा जाता है.

शुक्रवार की दोपहर कुछ अभूतपूर्व घटित हुआ है. चीफ जस्टिस के बाद सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठतम जजों ने जस्टिस चेलामेश्वर के आवास पर प्रेस कॉन्फ्रेंस की और सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा वक्त में कामकाज के तरीके पर सवाल खड़े किए.

पत्र के जरिए उठाए सवाल

एक पत्र के रूप में इन्होंने अपने मसलों को सामने रखा. इस पत्र को इन जजों ने इससे पहले चीफ जस्टिस को लिखा था. इस पत्र में खासतौर पर 27 अक्टूबर 2017 के आर पी लूथरा बनाम भारत संघ मामले में दिए गए आदेश का जिक्र किया गया है. इसमें यह भी मांग की गई है कि कैसे एक संवैधानिक बेंच द्वारा तय किए गए एक मामले को दो जजों की बेंच को सौंप दिया गया. इसके अलावा, पत्र में आरोप लगाया गया है कि मामलों को सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस अपनी तरजीह के मुताबिक जजों को असाइन कर रहे हैं. प्रेस कॉन्फ्रेंस में इन्होंने कहा कि लोकतंत्र खतरे में है और पसंदीदा जजों को मामले सौंपे जा रहे हैं और संवेदनशील मामले जूनियर जजों को दिए जा रहे हैं.

लोया मामले का भी जिक्र

Justice Loya

जस्टिस लोया: फेसबुक से साभार)

इन्होंने जज लोया मामले को हैंडल करने के तरीके पर भी चिंता जाहिर की. जज लोया सीबीआई के स्पेशल जज थे जो कि अमित शाह के खिलाफ एक मर्डर केस की सुनवाई कर रहे थे. लोया की 2014 में रहस्यमयी तरीके से मौत हो गई थी. चीफ जस्टिस को भेजे अपने लेटर में इन्होंने कहा कि मुख्य न्यायधीश दूसरे बराबर जजों में सबसे पहले आते हैं, वह न इससे ज्यादा हैं न इससे कम.

पहली बार दिखा है सुप्रीम कोर्ट के जजों में मतभेद

भारत के इतिहास में यह पहला मौका है जबकि सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों में एक खुला मतभेद सामने आ रहा है और जजों ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर अपना दर्द बयां किया है. हालांकि, इन जजों को लगता है कि प्रेस कॉन्फ्रेंस कर अपनी बात कहना उनकी मजबूरी हो गई थी. इन्होंने दो महीने पहले चीफ जस्टिस को लेटर लिख अपनी चिंताएं जाहिर की थीं, लेकिन इनकी बात नहीं सुनी गई और इन जजों ने एक बार फिर शुक्रवार की सुबह अपनी बात मुख्य न्यायाधीश से की, लेकिन कोई कदम नहीं उठाया गया.

मसलों को गंभीरता से देखना होगा

अगर सुप्रीम कोर्ट के जज कह रहे हैं कि चीफ जस्टिस मामलों का आवंटन अपने पसंद के मुताबिक कर रहे हैं और इन आवंटनों को लेकर मसले पैदा हो रहे हैं तो यह साफ है कि देश की सबसे ऊंची अदालत में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है और देश को इस बारे में गंभीरता से विचार करने की जरूरत है.

सरकार की बैकडोर से दखल की कोशिश

27 अक्टूबर 2017 के आदेश के बारे में दिक्कत भरी बात यह है कि यह एमओपी को फिर से खोलता है. सरकार ने मार्च 2017 के सुप्रीम कोर्ट के भेजे गए एमओपी पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी थी, जिसका मतलब है कि यह माना गया कि सरकार ने इसे स्वीकार कर लिया है. नई न्यायिक नियुक्तियां उसके बाद संशोधित एमओपी के तहत की गईं. लेकिन, 27 अक्टूबर 2017 के आदेश से एमओपी का मामला फिर खुल गया और इससे सरकार को अटॉर्नी जनरल के मार्फत टिप्पणियां करने का मौका मिल गया. यह एक सेटल हो चुके मामले को बैकडोर से खोलने का तरीका था जिसमें किसी सामान्य न्यायिक प्रक्रिया का सहारा नहीं लिया गया. खुलकर कहा जाए तो शुक्रवार के पत्र के पहले देश के ज्यादातर लोगों को पता ही नहीं था कि इस आदेश की कितनी गंभीर संवैधानिक अहमियत है.

मार्च में फाइनल हो चुका कोई एमओपी किस तरह से उसी साल अक्टूबर ने फिर से खोल दिया जाता है? कैसे पांच जजों की बेंच द्वारा तय किया गया कोई मामला दो जजों की बेंच द्वारा खोल दिया जाता है? क्या इससे कोई संदेह नहीं पैदा होता कि किस तरह से सरकार के शामिल वाले मामलों को आवंटित किया जा रहा है?

नैतिकता के रास्ते से भटकाव?

पत्र अपने शब्दों और सामग्री के लिहाज से काफी हानिकारक है. इसमें चीफ जस्टिस के टेन्योर को कोर्ट के प्रशासन में बाकी जजों में सबसे पहले मगर बराबर होने की बात कही गई है. हो सकता है कि इसमें कोई गलती न हो और सबकुछ कानून और प्रैक्टिस के मुताबिक किया गया हो. लेकिन, जिस तरह से मामलों को आवंटित किया गया उससे दिखता है कि यह नैतिकता के रास्ते से भटकना था जिसकी अपेक्षा एक न्यायिक संस्थान से नहीं की जाती है.

न्यायपालिका दमनकारी शक्ति नहीं

न्यायिक संस्थान दमनकारी शक्तियों का इस्तेमाल नहीं करते. केवल कार्यपालिका में ऐसा हो सकता है. कार्यपालिका में लोगों से जबरन काम कराने की शक्ति होती है. इन संस्थाओं में पुलिस, सेना आदि आती हैं. न्यायपालिका संस्थानिक सॉफ्ट पावर का इस्तेमाल करती है. एक ऐसी शक्ति जो कि भरोसे पर आधारित है और यह निष्ठा के साथ काम करने की अपनी काबिलियत के भरोसे टिकी हुई है. इस अधिकार को कायम रखने के लिए संस्थान को खुद को एक ऐसे लेवल तक ले जाना होगा, जहां इसकी निष्ठा पर लेशमात्र भी सवाल न उठाया जा सके. मौजूदा चीफ जस्टिस के कार्यकाल में एक से अधिक विवाद देखे गए हैं. एक मामला यूपी मेडिकल कॉलेजों का है, एक जज लोया के मामले को आवंटित करने का और एक शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट के चार सबसे वरिष्ठ जजों के मीडिया के सामने आने का मामला है जो कि कह रहे हैं कि मामलों के आवंटन गलत तरीके से किए जा रहे हैं.

आत्मनिरीक्षण का वक्त

शुक्रवार की घटनाएं इस बात का आत्मनिरीक्षण करने के लिए हैं कि किस चीज ने इन्हें इस चीज के लिए मजबूर किया और इन संस्थानों की साख की बहाली कैसे की जाए. इन संस्थानों में सुधार अंदर से आना चाहिए. कोई भी संस्थान उतना ही सक्षम और मजबूत होता है जितना उसमें काम करने वाले लोग होते हैं और कोई भी लोकतंत्र तभी अच्छा होता है जबकि उसके संस्थान मजबूत होते हैं. अगर हमारा देश और हमारे संस्थानों को खड़े रहना है तो हमारी न्यायपालिका को आत्मनिरीक्षण करना होगा और देखना होगा कि गुजरे कुछ महीनों में किस तरह से घटनाएं घटी हैं जिनसे लोगों के भरोसे को ठेस पहुंची है. इन्हें दुरुस्त करने के उपाय करने होंगे. अगर हमने अपनी ज्यादातर स्वायत्त संस्थाओं को राजनीति का शिकार होने दिया तो देश के लोकतंत्र को बचाने के लिए किए जाने वाले हमारे प्रयास बेमानी साबित होंगे.

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