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राजस्थान नहीं जनाब, फिलहाल तो हड़तालिस्तान कहिए !

इस सबके बीच सरकार को ढूंढो तो वो नदारद है. आखिर राजस्थान की सरकार है कहां? न किसी मंत्री का बयान सामने आ रहा है, न ही कोई खबर ही निकल कर आ रही है

Updated On: Oct 04, 2018 10:27 PM IST

Mahendra Saini
स्वतंत्र पत्रकार

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राजस्थान नहीं जनाब, फिलहाल तो हड़तालिस्तान कहिए !

राजस्थान को इन दिनों अगर हड़तालिस्तान के नाम से संबोधित किया जाए तो कुछ गलत न होगा. इन दिनों शायद ही ऐसा कोई डिपार्टमेंट होगा जिसमें हड़ताल नहीं चल रही हो. शायद ही ऐसा कोई अधिकारी-कर्मचारी वर्ग होगा जो हड़ताल पर न हो या फिर हड़ताल पर जाने की धमकी न दी हो. क्या अंदर, क्या बाहर, हर जगह, हर कोई हड़ताल पर है.

दफ्तर सूने पड़े हैं और सारे बाबू लोग जयपुर में विधानसभा-सचिवालय के आसपास तंबू लगाए धरने पर बैठे हैं. यही नहीं, मानसरोवर, जगतपुरा, अजमेर रोड और सीकर रोड जैसे बाहरी इलाकों तक में हड़तालियों के तंबुओं को देखा जा सकता है. ऐसा लग रहा है जैसे जयपुर हड़तालियों का ही शहर बन गया है.

मंत्रालय के कर्मचारी हड़ताल पर हैं. आशा कर्मचारी हड़ताल पर हैं. नर्स और लैब टेक्नीशियन हड़ताल पर हैं. बिजली कंपनियों के कर्मचारी हड़ताल पर हैं. पशु अस्पतालों के कर्मी हड़ताल पर हैं. पंचायती राज के हजारों कर्मचारी हड़ताल पर हैं. सहकारी बैंक वाले हड़ताल पर हैं. लिस्ट बहुत लंबी है. सब हड़ताल पर हैं. जनता का कोई काम नहीं हो रहा है.

कर्मचारियों के लिए घाटा, खुद की तनख्वाह बढ़ाई

राजस्थान रोडवेज की बसों का चक्का घूमे हुए 15 दिन से ऊपर हो चुके हैं. उनके समर्थन में जयपुर में चलने वाली लो-फ्लोर बसें भी बंद हैं. रोजाना 10 लाख से ज्यादा लोग इनमें सफर करते थे. करीब 5 करोड़ रुपए रोजाना की रोडवेज की आय भी बंद है, लोग परेशान हैं. महंगाई की आग में घरों का बजट बिगड़ गया है. लोगों को मजबूरन प्राइवेट बस, टैक्सी वालों को दोगुना-तिगुना किराया देना पड़ रहा है.

रिटायरमेंट के बाद भी बकाया न मिलने पर जयपुर में मुख्यमंत्री आवास के पास सिविल लाइंस फाटक पर एक रोडवेज कर्मचारी ने खुदकुशी कर ली. लेकिन सरकार के कानों पर जैसे जूं ही नहीं रेंग रही. खुद को लोगों की सरकार कहने का दावा करने वाले जिम्मेदार लोग सिर्फ ये कहकर पल्ला झाड़ रहे हैं कि घाटे के कारण रोडवेज में 7वां वेतन आयोग लागू नहीं कर सकते. कोई इनसे पूछे कि राजकोषीय घाटा कम नहीं हो रहा फिर भी हर दूसरे-तीसरे साल विधायकों-मंत्रियों की तनख्वाह और भत्ते कैसे बढ़ जाते हैं. RTI से पता चला है कि 2010 में जिन विधायकों की तनख्वाह 64 हजार रुपए महीना थी, वो 2017 में दोगुनी होकर 1,25,000 रुपए हो चुकी है.

वैसे रोडवेज के घाटे का गणित भी समझने में किसी रॉकेट साइंस से कम नहीं है. मैं खुद रोडवेज बसों में सफर करता हूं और यकीन मानिए मैंने आजतक कभी किसी सरकारी बस को खाली दौड़ते हुए नहीं देखा. मतलब ऑक्यूपेंसी लगभग 90 से 100% के बीच रहती ही है. हड़ताल के समय जो डेटा खुद सरकार रख रही है कि भई हमें तो रोजाना इतने का नुकसान हो रहा है वो भी कई करोड़ों में है. इसके बावजूद रोडवेज को लगातार सैकड़ों करोड़ रुपए के घाटे में कैसे दिखाया जाता है. ये समझ से परे है?

सब हड़ताल पर तो सरकार क्या कर रही है ?

हर साल 2 अक्टूबर को ग्राम सभाओं की बैठक का दिन मुकर्रर है. लेकिन पंचायती राज के ग्राम सचिव 12 सितंबर से ही हड़ताल पर चल रहे हैं. इसके चलते गांधी जयंती पर न ग्राम सभाओं की बैठक हो पाई और न ही कोई दूसरे काम ही हो रहे हैं.

vasundhara raje

इन हड़ताली कर्मचारियों ने अटल सेवा केंद्रों पर भी ताले जड़ दिए हैं. केंद्रों के ई-मित्रों को भी काम नहीं करने दिया जा रहा है. सरकार रोजाना अखबारों में अपनी योजनाओं के पूरे-पूरे पेज के और न्यूज चैनलों पर कई-कई मिनट के विज्ञापन दे रही है. लेकिन हकीकत बड़ी स्याह है. सरकारी योजनाओं का फायदा लेना तो दूर, जाति प्रमाण पत्र या लाइसेंस बनवाने जैसे रोजमर्रा के काम ही नहीं हो रहे हैं.

इस सबके बीच सरकार को ढूंढो तो वो नदारद है. आखिर राजस्थान की सरकार है कहां? न किसी मंत्री का बयान सामने आ रहा है, न ही कोई खबर ही निकल कर आ रही है. बस ये पता लग रहा है कि मुख्यमंत्री की गौरव यात्रा की समाप्ति पर 6 अक्टूबर को प्रधानमंत्री अजमेर आ रहे हैं. सब बस इन्हीं तैयारियों में लगे हैं कि इस सभा में कैसे लाखों लोगों को जुटाया जाए. मुझे तो हैरानी है कि वोट देने वालों और दिलाने वालों को नाराज कर रखा है तो फिर सभा आएगा कौन?

हड़ताल की बाढ़ एकाएक कैसे?

2013 में 1 दिसंबर को वोट डाले गए थे. उस हिसाब से इस बार भी माना जा रहा था कि नवंबर के आखिर या दिसंबर के पहले हफ्ते में चुनाव करवाए जा सकते हैं. इससे अंदाजा लगाया गया कि अक्टबूर के पहले या दूसरे हफ्ते में आचार संहिता लग सकती है. आचार संहिता लगने के बाद सरकार रोजमर्रा के कामकाज को निपटाने के अलावा विशेष कुछ नहीं कर पाएगी. सरकारी कर्मचारी भी ये बात जानते हैं.

दूसरे, राज्य में मतदाताओं की रायशुमारी के जो भी आंकड़े सामने आ रहे हैं, उनमें कांग्रेस को बीजेपी पर बढ़त दिख रही है. ऐसे में वसुंधरा सरकार बैकफुट पर है और मतदाताओं को लुभाने के लिए नए-नए प्रयास कर रही है जैसे एक करोड़ परिवारों को इंटरनेट युक्त फोन बांटना. चुनाव ड्यूटी पर सरकारी कर्मचारी ही रहते हैं और उन्हे नाराज रखकर कोई भी सरकार अपने पांवों पर कुल्हाड़ी मारने की नौबत नहीं ला सकती. आखिर, 2003 में कांग्रेस की गहलोत सरकार के हारने की सबसे बड़ी वजह सरकारी कर्माचारियों की नाराजगी ही थी.

ऐसे में अधिकारी-कर्मचारियों को लगा कि अपनी मांगें मनवाने के लिए इससे बढ़िया समय दूसरा नहीं हो सकता. बीजेपी को हर हाल में राजस्थान जीतना जरूरी है. जैसा कि पिछले दिनों पार्टी राम माधव ने जयपुर में कहा कि हर हाल में सत्ता लेंगे चाहे रोकर लें या लड़कर लें.

खुद अमित शाह कोटा में सोशल मीडिया कार्यकर्ताओं को कह चुके हैं कि अगर इस साल राजस्थान हार गए तो अगले साल लोकसभा चुनाव बहुत भारी हो जाएगा. इस हाल में सरकारें लोकलुभावन फैसले ही करती है. रूठे कर्मचारियों की मांगें भी पूरी कर ही दी जाती हैं. इसीलिए चुनावी समय हड़ताल का सबसे सुहावना मौसम बन गई है.

पिस रही है जनता

लेकिन सरकार और सरकारी बाबूओं के दो पाटों के बीच पिस रहा है आम आदमी. वही आम आदमी जिसके लिए सरकार प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में रोजाना कई लाख रुपए विज्ञापनों पर खर्च कर रही है. सरकार बता रही है कि आपके लिए हमने ये किया, वो किया और अब आप हमें वोट दीजिए.

लेकिन साहब, किसी को आप लगातार रुलाएं और दूर के ढोल दिखाकर खुश करना चाहें तो ये मुमकिन नहीं है. आम आदमी पिछले 15 दिन से परेशान हो रहा है. अपने काम के लिए निजी बसों में कई गुना रुपया खर्च कर सरकारी दफ्तर पंहुचता है और वहां पता लगता है कि न बाबू जी कुर्सी पर हैं और न ही सचिवालय में मंत्रीजी. वह धक्के खाकर वापस लौट रहा है और किसे पता वापसी के रास्ते पर EVM के जरिए सबक सिखाने का मन भी बना रहा हो.

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