S M L

प्रधानमंत्री जी देश की न्याय व्यवस्था आपसे इंसाफ चाहती है!

हमें अदालतों पर से बोझ कम करना होगा. अटके मुकदमों का जल्द से जल्द निपटारा करना होगा

Updated On: Jan 17, 2017 11:16 PM IST

Madhav Godbole

0
प्रधानमंत्री जी देश की न्याय व्यवस्था आपसे इंसाफ चाहती है!

आदरणीय प्रधानमंत्री मोदी जी,

सुप्रीम कोर्ट ने देश के न्यायिक प्रशासन और निचली अदालतों की स्थिति पर 2015-16 के हालात पर इसी महीने एक रिपोर्ट जारी की है. इस रिपोर्ट से एक बात फिर से साबित हुई है कि हमारे देश की अदालतों में लंबित मुकदमों का ढेर पहाड़ में तब्दील होता जा रहा है. लेकिन ये नयी बात नहीं.

अदालतों में लंबित मुकदमों की ये परेशानी आजादी के बाद से ही देश झेल रहा है. 1959 में राज्य के कानून मंत्रियों के सम्मेलन में पहले प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने न्यायिक व्यवस्था की धीमी रफ्तार पर चिंता जताई थी.

1970 में जस्टिस के सुब्बाराव ने कहा था, 'न्याय में देरी कोई नयी बात नहीं, ये तो तब से चली आ रही है जब से अंग्रेजों ने अदालत में विग पहननी शुरू की थी'. यानी इंसाफ में देर होने का सिलसिला आज की न्यायिक व्यवस्था की शुरुआत से ही चला आ रहा है.

30 जुलाई 1978 को उस वक्त के कानून मंत्री शांति भूषण ने उम्मीद जताई थी कि, 'देश की अदालतों में लंबित सभी मुकदमे अगले पांच सालों में निपटा लिये जाएंगे. ताकि कोई भी मुकदमा हाईकोर्ट में एक साल से ज्यादा पेंडिंग न रहे'.

शांति भूषण ने आगे कहा था 'सरकार इस बात के लिए दृढ़ है कि कोई भी मुकदमा ट्रायल कोर्ट से अपील कोर्ट के बीच एक साल से ज्यादा लंबित न रहे'.

मगर ये सारे संकल्प मुंगेरी लाल के हसीन सपने बनकर रह गए हैं.

यह भी पढ़ें: चुनावी चंदे पर अलग-अलग सरकारों का एक ही राग

मशहूर सीनियर वकील स्वर्गीय ननी पालखीवाला ने कहा था, 'मैं किसी और देश के बारे में नहीं जानता जहां भारत की तरह मुकदमे इतने लंबे वक्त तक खिंचते रहते हैं.

कानून भले ही गधा हो या न हो, मगर भारत में ये घोंघा है और हमारी अदालतों में मुकदमे जिस रफ्तार से चलते हैं वो तो घोंघों की रफ्तार के लिहाज से भी धीमी हैं'.

supreme court

न्यायिक व्यवस्था धीमी

देश में संवैधानिक कामकाज की समीक्षा करने वाले राष्ट्रीय आयोग ने 2002 में देश की अदालतों में लंबित मुकदमों का जिक्र करते हुए कहा था कि, 'देश की न्यायिक व्यवस्था इतनी धीमी है.

इस पर इतना बोझ है कि ये बिखरने के कगार पर है इंसाफ पाना बहुत ही महंगा होता जा रहा है.'

'इंसाफ को लेकर अनिश्चितता की वजह से एक इंसाफपसंद, बराबरी की व्यवस्था की उम्मीदें बेमानी होती जा रही है.'

इस वक्त तीन करोड़ से ज्यादा मुकदमे लंबित हैं. हालात में बरसों से कोई सुधार नहीं हो रहा है. बल्कि हालात दिनों-दिन और खराब ही होते जा रहे हैं.

किसी भी लोकतंत्र में लोगों की शिकायतों पर ध्यान देकर जनप्रतिनिधियों को जल्द से जल्द उनका समाधान देना चाहिए. मगर हम लगातार इस मुद्दे की अनदेखी करते आ रहे हैं. फिर चाहे राज्यों में और केंद्र में किसी भी दल की सरकार रही हो.

इसकी सबसे बड़ी वजह तो ये है कि मुवक्किल वोट बैंक नहीं. वो किसी खास समुदाय, जाति या धर्म के नहीं. समाज का हर तबका धीमी न्याय व्यवस्था की चक्की मे पिस रहा है. ऐसे में हमारे राजनैतिक दल भी बेफिक्र हैं.

इतिहास में पहली बार देश के पूर्व मुख्य न्यायाधीश, इंसाफ में देरी पर इतने भावुक हुए कि उनके कई बार आंसू निकल पड़े. वो इतने असहाय थे कि अपने इमोशन्स को वो रोक नहीं पाये. ऐसा भारत जैसे लोकतंत्र में ही हो सकता है जहां का चीफ जस्टिस इतना असहाय महसूस करे कि सबके सामने रो पड़े.

यह भी पढ़ें: पहले 'महात्मा' को पहचानिए, फिर 'गांधी' की बात कीजिए

अच्छा राज-पाट देना कमोबेश हर राजनैतिक दल का दावा होता है. सब गुड गवर्नेंस की बात करते हैं. गुड गवर्नेंस की जो परिभाषा कही जाती है, उसमें ऐसी संस्थाओं का निर्माण शामिल है जो जल्द से जल्द इंसाफ दे सकें.

ये परिकल्पना अमेरिका की 1776 की वर्जिनिया डेक्लेरेशन ऑफ राइट्स में भी शामिल हैं और बाद में छठवें संशोधन के जरिए इसे अमेरिकी संविधान में भी शामिल किया गया है.

जल्द इंसाफ का दावा

इसके अलावा 1974 का फेडरल एक्ट भी है, जो जल्द से जल्द इंसाफ दिलाने का वादा करता है. ये मुकदमों के निपटारे की एक मियाद भी तय करता है.

जल्द से जल्द इंसाफ का अधिकार तेरहवीं सदी के इंग्लैंड के मैग्ना कार्टा से लेकर आज तक के सभी चर्चित संवैधानिक प्रपत्रों का हिस्सा रहा है.

ब्रिटेन हो या कनाडा या फिर न्यूजीलैंड सभी इस अधिकार को मान्यता देते हैं. 1966 के इंटरनेशनल कन्वेंशन ऑफ सिविल ऐंड पॉलिटिकल राइट्स की धारा 14 में भी मुकदमों के तेजी से निपटारे के अधिकार को मान्यता मिली हुई है.

यूरोपियन कन्वेंशन ऑफ ह्यूमन राइट्स की धारा 3 भी जल्द से जल्द इंसाफ के अधिकार पर मुहर लगाती है.

भारतीय संविधान की धारा 21, जिसमें जीने की गारंटी, निजी स्वतंत्रता का अधिकार दिया गया है उसकी भी हमारा सुप्रीम कोर्ट तुरंत इंसाफ पाने के अधिकार के तौर पर व्याख्या करता रहा है.

कोर्ट ने ये भी कहा है कि कोई भी कानून जो तेजी से इंसाफ पाने की राह में बाधा बन सकता है, वो लागू नहीं किया जा सकता.

मुकदमों का तेजी से निपटारा निजी स्वतंत्रता का ही हिस्सा है. सुप्रीम कोर्ट की इस व्याख्या के बावजूद हमारी सरकारें नागरिकों को ये अधिकार देने के मामले में गंभीर नहीं दिखतीं.

माननीय प्रधानमंत्री जी, आप बहुमत के साथ सत्ता में आए. आपके पास किसी भी गैर कांग्रेसी सरकार में सबसे ज्यादा जनसमर्थन है. देश में ऐसा पहली बार हुआ है कि किसी गैरकांग्रेसी नेता के पास इतनी राजनैतिक ताकत है. ऐसा पहली बार हुआ है कि आपके सत्ता में आने से हम संसदीय और राष्ट्रपति प्रणाली के राज-पाट को एक साथ देख पा रहे हैं.

मगर इस बात की भी फिक्र जताई जा रही है कि इंदिरा गांधी की सरकार की तरह ही आपके राज में भी बहुमत की तानाशाही हो सकती है. जिससे लोकतांत्रिक व्यवस्थाएं और संस्थान कमजोर हो सकते हैं.

indira15

लोकतंत्र में तालमेल जरूरी

किसी भी लोकतंत्र की कामयाबी इसके सभी अंगों मे अच्छे तालमेल से ही हासिल की जा सकती है. ऐसे में हम न्यायिक व्यवस्था को कमजोर नहीं छोड़ सकते.

इस संदर्भ में हमें सुप्रीम कोर्ट के कुछ पुराने फैसलों को याद कर लेना ठीक रहेगा. जो इमरजेंसी जैसे संवैधानिक संकट के दौर में भी देश के संविधान को बचाने में मददगार साबित हुए.

इनमें केशवानंद भारती केस, बैंकों के राष्ट्रीयकरण का केस, प्रिवी पर्स का केस और मिनर्वा मिल केस अहम हैं.

हालांकि एडीएम जबलपुर बनाम शुक्ला केस में सुप्रीम कोर्ट ने बहुमत से संविधान की धारा 19 और 21 में दिये अधिकारों को निलंबित करने के सरकार के फैसले पर मुहर लगाई थी.

मगर इस फैसले में भी जस्टिस एच आर खन्ना के विरोध ने न्यायिक व्यवस्था में जनता का भरोसा बनाये रखा.

यह भी पढ़ें: जब इंदिरा की इच्छा के खिलाफ कट गया कृष्ण मेनन का टिकट

जस्टिस खन्ना ने अपने डिसेंटिंग ऑर्डर में लिखा था, 'सरकार के पास कोई अधिकार नहीं है कि को वो किसी नागरिक से जीने और निजी स्वतंत्रता का अधिकार, बिना किसी कानून के छीन सके. ये देश में ही नहीं, किसी भी समाज में कानून के राज की बुनियादी जरूरत है'.

सुप्रीम कोर्ट ने जिस तरह से संविधान के बुनियादी ढांचे की व्याख्या की है, जिस तरह से उसकी रक्षा करने के लिए समय समय पर आदेश दिये हैं, वो देश में लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता और कानून का राज बनाये रखने में अहम साबित हुए हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने ये निर्धारित किया है कि कोई भी कानूनी प्रक्रिया, तार्किक, पारदर्शी और न्यायिक होनी चाहिए.

बोम्मई केस और दूसरे मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया है कि राष्ट्रपति के आदेश भी संविधान के दायरे में होने चाहिए और अदालत को इनकी समीक्षा का भी अधिकार है.

यहां ये बात समझना अहम है कि हमारे संविधान में न्यायपालिका और कार्यपालिका के संबंधों की जो परिकल्पना की गई है, वो एक दूसरे से टकराव की ही है.

अमेरिका के मशहूर जस्टिस फ्रैंकफर्टर ने कहा था 'अगर अदालतों को सरकार के दबाव में ही काम करना है तो फिर उनके होने का कोई मतलब नहीं.'

टकराव की स्थिति

ऐसे में ये मूर्खता होगी कि हम ऐसी न्यायिक व्यवस्था बनाने की कोशिश करें जो सरकार के हर कदम पर हामी भरे.

इंदिरा गांधी के राज में ऐसी न्यायिक व्यवस्था बनाने की कोशिश हुई थी. आपातकाल का कोई सबक जो हमेशा याद रखने लायक है वो ये है कि हमें कभी भी न्यायिक व्यवस्था की आजादी को कमजोर नहीं करना चाहिए.

ऐसा लगता है कि न्यायपालिका और कार्यपालिका का टकराव इसी बात को लेकर हो रहा है. सरकार अपनी मनमाफिक अदालतें चाहती है. इसीलिए जजों की नियुक्ति में देरी हो रही है.

हाई कोर्ट में न्यायाधीशों का तबादला अटका है. न्यायिक व्यवस्था सुधारने के लिए अदालतों की और पैसे की मांग पर सरकार ने कान बंद कर रखे हैं.

देश में लंबित मुकदमों की समीक्षा कई कमेटियों और आयोगों ने की है. इन सबकी तमाम सिफारिशों में एक बात जरूर शामिल रही है. ज्यादा जजों की नियुक्ति. साथ ही मुकदमों के निपटारे की मियाद तय करने के सुझाव भी दिए गए हैं.

सुझाव मौजूद हैं जरूरत है उस राजनैतिक इच्छाशक्ति की, जो ये तय करे कि वो कितने समय में इन दिक्कतों से निपटेगी. जजों की नियुक्ति करेगी. मुकदमों के निपटारे की मियाद तय करेगी. न्याय व्यवस्था सुधारने के लिए ज्यादा पैसे खर्च करेगी. अगर कोई भी सरकार ऐसा कर सकी, तो इसके शानदार नतीजे होंगे.

Narendra Modi

लेस गवर्नमेंट-बेटर गवर्नेंस

प्रधानमंत्री जी, आपकी सरकार के कुछ फैसले विवादित हो गए हैं, हालांकि ऐसा नहीं होना चाहिए था. मगर प्रधानमंत्री जी यकीन जानिए, देश में लंबित मुकदमों के निपटारे के लिए उठाये गए आपके हर कदम का चौतरफा स्वागत और समर्थन होगा. कोई भी राजनैतिक दल या गुट इसके खिलाफ नहीं होगा.

मैं आपसे अपील करता हूं कि आप घोषणा करें कि देश में लंबित सभी मुकदमे अगले तीन साल में निपटा लिए जाएंगे. इसके लिए जरूरी सभी कदम उठाये जाएंगे.

न्यायिक व्यवस्था को सुधारा जाएगा. मैं सुझाव दूंगा कि इसका पूरा खर्च केंद्र सरकार उठाये, मसलन नई अदालतों के गठन और जजों की नियुक्ति का खर्च.

आगे चलकर न्यायिक प्रशासन के कर्मचारियों की नियुक्ति के खर्च को राज्य और केंद्र सरकारें मिलकर उठा सकती हैं. लेकिन इसमें भी बड़ी जिम्मेदारी केंद्र सरकार की होनी चाहिए.

महोदय, आपने अपनी सरकार के लिए लेस गवर्नमेंट और बेटर गवर्नेंस का लक्ष्य निर्धारित किया है. आप सबका साथ, सबका विकास करने को लेकर कटिबद्ध हैं.

इस नारे ने देश को नए जोश, नई उम्मीद से भर दिया है. अगर ये वादे हकीकत में तब्दील करने हैं तो इसके लिए मैंने जो सुझाव दिये हैं, उन पर अमल जरूरी है.

यह भी पढ़ें: चुनावी चंदे पर अलग-अलग सरकारों का एक ही राग

हमें अदालतों पर से बोझ कम करना होगा. अटके मुकदमों का जल्द से जल्द निपटारा करना होगा. इसके लिए तीन साल का लक्ष्य निर्धारित करना ठीक होगा. ऐसी घोषणा देश के नागरिकों के लिए सबसे बड़ा तोहफा होगी. ये आपकी सबसे शानदार विरासत होगी.

सादर,

माधव गोडबोले, एक फिक्रमंद नागरिक

(इस चिट्ठी के लेखक पूर्व केंद्रीय गृह और न्याय सचिव हैं. उन्होंने ज्यूडीशियरी ऐंड गवर्नेंस इन इंडिया और सेक्यूलरिज़्म-इंडिया ऐट क्रॉसरोड्स जैसी कई किताबें लिखी हैं)

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
Jab We Sat: ग्राउंड '0' से Rahul Kanwar की रिपोर्ट

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi