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गहलोत और पायलट के झगड़े में चुनाव से पहले ही धराशायी न हो जाए कांग्रेस

कांग्रेस मतदाताओं को बताए कि जीतने के बाद उनमें जूतमपैजार नहीं होगी बल्कि वे वसुंधरा राजे से ज्यादा अच्छा नेतृत्व दे पाने में सक्षम होंगे.

Mahendra Saini Updated On: Jul 31, 2018 05:42 PM IST

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गहलोत और पायलट के झगड़े में चुनाव से पहले ही धराशायी न हो जाए कांग्रेस

'वोटर के सामने अब कोई कन्फ्यूजन नहीं है कि वो किसे चुने- बीजेपी को या फिर कन्फ्यूज पार्टी को.'

'गांव बसा नहीं, मंगते पहले आ गए.'

ये दोनों टिप्पणियां राजस्थान बीजेपी प्रदेशाध्यक्ष मदन लाल सैनी और आमेर से चुनाव लड़ चुके सतीश पूनिया की हैं. राजस्थान में 'मंगता' उनको कहा जाता है जो मांग-मांग कर अपनी जरूरतें पूरी करते हैं. ये तंज कांग्रेस में मुख्यमंत्री पद के लिए मचे घमासान पर किए गए हैं.

कांग्रेस को राजस्थान में सरकार बनाने की उम्मीद है. लेकिन पिछले कुछ दिन से कांग्रेस मे मुख्यमंत्री पद को लेकर जिस तरह से बयानबाजी की जा रही है. जिस तरह से पार्टी कार्यक्रमों में ही नेताओं के गुट एक दूसरे से मारपीट कर रहे हैं और जिस तरह से एक दूसरे नेताओं के पुतले जलाए जा रहे हैं, उससे लग रहा है कि कांग्रेस लड़ती ही रह जाए और हो सकता है बाजी उसके हाथ लगे भी नहीं.

कलह का कारण- चेहरा किसका ?

कांग्रेस में कलह कोई नई बात नहीं हैं. राजस्थान में वैसे भी पिछले कुछ महीनों से मुख्यमंत्री पद को लेकर अशोक गहलोत और सचिन पायलट खेमों के बीच शीतयुद्ध सरीखे हालात बने हुए हैं. सबसे ताजा घटनाक्रम शुरू हुआ जब गहलोत ने मीडिया से बात करते हुए कहा कि 10 साल मुख्यमंत्री रह चुके शख्स से बेहतर चेहरा और कौन हो सकता है. यानी कांग्रेस को वोट मिल सकते हैं तो सिर्फ उनके नाम पर और कांग्रेस में कोई मुख्यमंत्री बन सकता है तो सिर्फ वो.

गुलाब चंद कटारिया

गुलाब चंद कटारिया

इसके बाद पूर्व केंद्रीय मंत्री लालचंद कटारिया ने बयान दिया कि आलाकमान को फौरन अशोक गहलोत को सीएम के तौर पर प्रोजेक्ट करना चाहिए. कटारिया के इस बयान ने कलह को खुलकर सामने रख दिया. राजस्थान प्रभारी अविनाश पांडेय ने कटारिया के इस बयान को 'संजीदगी' से लिया और ऐसे बयानों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई तक की चेतावनी दे डाली. लेकिन कटारिया गुट इस चेतावनी के बाद भी चुप नहीं रहा. जयपुर में कटारिया समर्थकों ने पार्टी प्रभारी का पुतला फूंक कर मुर्दाबाद के नारे लगाए.

इससे पहले कि पांडेय इस पर कुछ प्रतिक्रिया देते, अशोक गहलोत ने कहा कि कार्यकर्ता कई बार अति उत्साह में ऐसे बयान दे देते हैं, उन पर अनुशासनात्मक कार्रवाई कैसी. यानी शह और मात का खेल दोनों तरफ से नहीं रुक रहा और न कोई भी एक पक्ष ये मैसेज देना चाहता है कि वो कमजोर है. अब पार्टी प्रभारी पांडेय ने बयान दिया कि पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी को पूरा घटनाक्रम सिलसिलेवार ढंग से ब्रीफ किया जाएगा. इसका मतलब क्या ये कि गहलोत की शिकायत की जाएगी?

मुख्यमंत्री पद का ये घमासान तब है, जबकि राहुल गांधी यहां किसी को भी इसके लिए प्रोजेक्ट न करने का ऐलान कर चुके हैं. बहरहाल, इस समय सवाल ये उठता है कि आखिर गहलोत गुट की तरफ से मुख्यमंत्री पद को लेकर बार-बार ऐसी बयानबाजी क्यों की जा रही है? क्या उनके मन में असुरक्षा की भावना आ गई है ?

गृह राज्य में डोल रहा गहलोत का मन

पंजाब चुनाव में सफलता, गुजरात में 'नैतिक विजय' और राज्यसभा चुनाव में अहमद पटेल को हारी हुई बाजी जिताने के बाद अशोक गहलोत को पार्टी ने राष्ट्रीय संगठन महासचिव बनाकर इसका इनाम दिया. बेशक, अशोक गहलोत देश के सबसे बड़े राज्य के सर्वाधिक चर्चित और लोकप्रिय नेताओं में गिने जाते हैं. कांग्रेस में मोहन लाल सुखाड़िया के बाद सबसे ज्यादा समय तक मुख्यमंत्री रहने का रिकॉर्ड भी उनके नाम ही है.

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राष्ट्रीय संगठन महासचिव जैसा पद बेहद बड़ा है. एक तरह से सोनिया और राहुल के बाद घोषित रूप से पार्टी में यह पद नंबर 3 की हैसियत रखता है. नाम न छापने की शर्त पर एक कांग्रेस नेता ने बताया कि यह पद ऐसा है कि इस पर बैठा शख्स कई मुख्यमंत्रियों का कृपा निधान बन सकता है. लेकिन अशोक गहलोत के साथ ऐसा नहीं है. वे इतने बड़े पद पर पहुंचने के बाद भी अपने गृह राज्य का मोह नहीं छोड़ पा रहे हैं. लगता है जैसे उन्हे दिल्ली का बड़ा पद भी किसी मुख्यमंत्री के सामने बौना लग रहा है.

ये बयान गहलोत की शख्सियत के अनुकूल नहीं

क्या ये मुख्यमंत्री पद का मोह ही है जो बार-बार गहलोत से ऐसे बयान दिला रहा है मसलन, 'मैं थांसू दूर नहीं' या फिर '10 साल से चेहरा तो वो ही हैं.' गहलोत के पूरे राजनीतिक सफर में ये पहली बार देखा जा रहा है जब वे ऐसी बयानबाजी कर रहे हैं. इससे पहले वे इंदिरा गांधी से लेकर राजीव गांधी और पी वी नरसिम्हा राव तक की सरकारों में काम कर चुके हैं. राजस्थान कांग्रेस का नेतृत्व भी कर चुके हैं. लेकिन कभी अपनी महत्वाकांक्षा को खुलकर जाहिर नहीं किया.

यहां तक कि 1998 में जब वे कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष थे और उनके नेतृत्व में कांग्रेस ने प्रचंड बहुमत हासिल किया था, तब भी वे मुख्यमंत्री पद को लेकर खामोश थे. तब आखिरी समय तक किसी जाट (मुख्यत: परसराम मदेरणा) के मुख्यमंत्री बनने की चर्चा थी. इसी तरह 2008 में उन्होने वसुंधरा राजे की सत्ता में पुनर्वापसी के सपने को तोड़ दिया था. तब भी उन्होने एक बार भी सार्वजनिक तौर पर मुख्यमंत्री पद को लेकर कोई बयान नहीं दिया था.

वास्तव में अशोक गहलोत 'सेल्फमेड' नेता हैं. एक आम कार्यकर्ता के रूप में करियर शुरू कर राजनीति के सोपानों पर उन्होंने एवरेस्ट जैसी ऊंचाइयां छूई हैं. करीब 45-50 साल के राजनीतिक जीवन में उनपर कभी दाग नहीं लगा और न ही कभी ओछे स्तर की बयानबाजी ही उन्होंने की. फिर अब वो कौनसी वजह हैं जो उन्हे ऐसा करने पर मजबूर कर रही हैं ? क्या ये सचिन पायलट की तरफ से पहली बार मिल रही कड़ी चुनौती के कारण है ?

पायलट की चुप्पी बड़ी मारक

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इस पूरे घटनाक्रम में कम से कम मुझे गहलोत अपने प्रतिद्वंद्वी सचिन पायलट से पिछड़ते नजर आते हैं. अभी तक राजस्थान कांग्रेस में शायद ही कोई नेता गहलोत के सामने चुनौती बनकर खड़ा हो पाया है. बड़े-बड़ों को गहलोत ने चुपके-चुपके जोर का झटका दिया है. लेकिन अब मामला उलटा दिख रहा है. गहलोत लगातार बयानबाजी कर रहे हैं और सचिन पायलट चुप हैं. क्या सचिन पायलट ने गहलोत का शिकार उन्हीं के तरीके से करने की नीति तो नहीं बना ली है ?

सचिन ने एक बार भी न मुख्यमंत्री पद को लेकर खुद की महत्वाकांक्षा जाहिर की न गहलोत पर तंज कसा और न ही कोई ऐसा बयान दिया जिसे बड़बोलापन कहा जाए. दूसरी ओर गहलोत ने कई मौकों पर कहा कि सचिन के पिता उनके साथ काम कर चुके हैं (यानी सचिन का कद बहुत छोटा है). यह भी कि उनकी सिफारिश पर ही सचिन को केंद्र में मंत्री बनाया गया था (यानी सचिन पर एहसान कर चुके हैं) कि प्रदेशाध्यक्ष को मुख्यमंत्री बनने का सपना देखने का कोई हक नहीं है (यानी सचिन अपनी सीमा में रहें ) और कि कांग्रेस का चेहरा तो वो ही हैं (यानी सचिन अभी इस लायक नहीं कि वे कांग्रेस की पहचान बन सकें).

गहलोत के राजनीतिक करियर के सामने सचिन पायलट बच्चे सरीखे ही हैं. पायलट सिर्फ एक बार केंद्र में मंत्री रहे हैं, सिर्फ 2 चुनाव जीते हैं और तीसरा हार चुके हैं. पहली बार प्रदेशाध्यक्ष जैसे चुनौतीपूर्ण पद पर काम कर रहे हैं. लेकिन इस संघर्षपूर्ण समय में जैसी परिपक्वता वे दिखा रहे हैं, वो गहलोत जैसी शख्सियत के सामने एक बड़ी मिसाल बन रही है. कहीं ऐसा न हो जाए कि गहलोत के लिए उनके ये बयान ही चुनाव बाद मुसीबत बन जाएं और सचिन की चुप्पी नेतृत्व का दिल जीत ले.

बहरहाल, कांग्रेस को सोचना होगा कि ऐसे वक्त में जब मतदाताओं को वो अपनी ओर आकर्षित कर सकती है, तब मुख्यमंत्री पद को लेकर चल रही रस्साकशी कहीं आत्मघाती न हो जाए. कांग्रेस के लिए इस वक्त सबसे ज्यादा जरूरी ये है कि वोटर को विश्वसनीय होने का सबूत दिया जाए. कांग्रेस मतदाताओं को बताए कि जीतने के बाद उनमें जूतमपैजार नहीं होगी बल्कि वे वसुंधरा राजे से ज्यादा अच्छा नेतृत्व दे पाने में सक्षम होंगे.

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