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लालू के जेल जाने के बाद अब बिहार की राजनीति में क्या होगा?

लालू यादव को सजा के बाद बिहार में सियासी समीकरण बदल सकते हैं. बिन लालू आरजेडी के लिए अपने कुनबे को साथ रखने के साथ-साथ नए साथी की तलाश करना मुश्किल होगा

Amitesh Amitesh Updated On: Jan 06, 2018 04:35 PM IST

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लालू के जेल जाने के बाद अब बिहार की राजनीति में क्या होगा?

चारा घोटाले के एक मामले में रांची की सीबीआई की विशेष अदालत का फैसला लालू यादव के राजनीतिक भविष्य को लेकर भी कई सवाल छोड़ गया है. सीबीआई की अदालत ने लालू यादव को 3.5 साल की सजा सुनाई है. इसके बाद लालू यादव के लिए मुश्किलें अब काफी बढ़ गई हैं.

हालांकि, लालू यादव की तरफ से इस फैसले को ऊपरी अदालत में चुनौती भी दी जाएगी और बेल के लिए भी अर्जी दी जाएगी, लेकिन तबतक उन्हें कड़ाके की ठंड में रांची की बिरसा मुंडा जेल में ही वक्त गुजारनी पड़ेगी. लालू यादव को 23 दिसंबर के दिन ही अदालत ने चारा घोटाले के एक मामले में दोषी करार दिया था, लेकिन सजा का ऐलान अब हुआ है.

अब इस फैसले का बिहार की सियासत में काफी उलटफेर होने वाला है. बिहार में मुख्य विपक्षी दल आरजेडी के लिए सबसे बड़ा झटका है जब उसके राष्ट्रीय अध्यक्ष और विपक्ष के सबसे बड़े चेहरे लालू यादव नीतीश-बीजेपी गठबंधन को राज्य में चुनौती देने के बजाए खुद की चुनौतियों से निपटने में लग गए हैं.

लालू यादव के लिए मुश्किल है कि अलग-अलग मामलों में उनके परिवार के बाकी सदस्य भी जांच के दायरे में है. जिन भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर लालू यादव का साथ छोड़कर नीतीश कुमार फिर से बीजेपी के साथ हो गए, उन्हीं मामले में लालू यादव के छोटे बेटे और पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव, राज्यसभा सांसद बेटी मीसा भारती और पत्नी राबड़ी देवी के ऊपर भी जांच की तलवार लटक रही है.

पार्टी की बागडोर पर मतभेद

यही बात बिहार की सियासत में इस वक्त चर्चा का विषय बना है कि आखिरकार लालू के जेल जाने की सूरत में उनकी गैर-मौजूदगी में पार्टी की बागडोर किसके हाथों में होगी. संकट में फंसे परिवार के दूसरे सदस्य पार्टी को बिन लालू कैसे आगे बढ़ा पाएंगे.

लालू यादव की राजनीति को गौर से देखें तो लगता है कि उनको इस बात का अंदाजा था कि चारा घोटाले के मामले में उनको परेशानी का सामना करना पड़ सकता है. लालू ने बहुत ही चतुराई से पार्टी संगठन के चुनाव को पिछले साल ही निपटा दिया था. लालू यादव को आरजेडी का फिर से राष्ट्रीय अध्यक्ष चुन लिया गया और बिहार की कमान लालू के करीबी रामचंद्र पूर्वे को दे दी गई.

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उधर, लालू ने बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के पद पर छोटे बेटे तेजस्वी यादव को बैठाकर संकेत दे दिया है कि उनका उत्तराधिकारी कोई और नहीं बल्कि तेजस्वी यादव हैं. पार्टी की तरफ से बिहार में अगले चुनाव में मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर तेजस्वी के नाम को आगे बढ़ाकर भी उत्तराधिकार की लड़ाई को खत्म करने की कोशिश भी की गई है. लेकिन सियासत में पीढ़ी दर पीढ़ी सत्ता का हस्तांतरण इतना आसान नहीं होता, जितना दिख रहा है.

तेजस्वी के सामने सबसे बड़ी समस्या लालू यादव की गैर मौजूदगी में पूरी पार्टी को एकजुट रखने की होगी. अब्दुल बारी सिद्दीकी सरीखे पार्टी के कई सीनियर नेताओं की तेजस्वी के अधीन काम करने को लेकर नाखुशी पहले भी सामने आ चुकी है. ऐसे में लालू के जेल जाने के बाद पार्टी के फैसले लेने में सहमति बनाने पर तेजस्वी को परेशानी हो सकती है. अगर तेजस्वी पर भ्रष्टाचार के मामले में खुद शिकंजा कसा तो पार्टी और परिवार के लिए मुश्किलें और भी बढ़ जाएंगी.

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तेजप्रताप की बयानबाजी अलग मुसीबत

दूसरी तरफ, परिवार के भीतर तेजस्वी के साथ-साथ लालू यादव के बड़े बेटे तेजप्रताप की राजनीतिक महत्वाकांक्षा भी मुश्किलें खड़ी कर सकती हैं. तेजप्रताप की आरजेडी के भीतर अलग ही फैन फॉलोइंग है. उनके ठेंठ-गंवई अंदाज को आरजेडी कार्यकर्ता लालू के पुराने अंदाज से जोड़कर देखते हैं. ये बात अलग है कि तेजप्रताप की भाषा राजनीतिक मर्यादा की सीमाएं भी लांघती रहती हैं. लेकिन, लालू यादव की गैर-मौजूदगी में तेजप्रताप जैसे लोगों के बयानों पर डैमेज कंट्रोल करना पार्टी और परिवार दोनों के लिए परेशानी वाला होगा.

इसके अलावा लालू यादव की बेटी मीसा भारती राज्यसभा सांसद हैं. उनकी भी राजनीतिक महत्वाकांक्षा जगजाहिर है. ऐसे में तेजस्वी को अपने विरोधियों के साथ-साथ पार्टी और परिवार के बीच के पावर टसल से निपटना पड़ सकता है.

लेकिन, लालू यादव के फिर से भ्रष्टाचार के मामले में जेल जाने के बाद अब बिहार की सियासत में भी गहरा असर होने वाला है. इस वक्त नीतीश कुमार और बीजेपी बिहार में मिलकर सरकार चला रहे हैं. इस वक्त एनडीए के साथ रामविलास पासवान, उपेंद्र कुशवाहा और जीतन राम मांझी भी हैं. फिलहाल बिहार सरकार के साथ नंबर है. लेकिन, लोकसभा चुनाव को लेकर अभी से ही सियासी बिसात बिछनी शुरू हो गई है.

कांग्रेस-आरजेडी का समीकरण

लालू को सजा के बाद कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी मुश्किल होगी. जिस सजायाफ्ता लालू यादव के मसले पर 2013 में राहुल गांधी ने पार्टी उपाध्यक्ष रहते कड़े तेवर दिखाए थे, अब क्या राहुल गांधी अध्यक्ष बनने के बाद अपना नजरिया बदल लेंगे? क्या राहुल गांधी चारा घोटाले के दूसरे मामले में दोषी लालू के साथ लोकसभा चुनाव में आगे बढ़ पाएंगे? फिलहाल संकेत तो ऐसे ही लग रहे हैं. पिछले महीनों तेजस्वी यादव और राहुल गांधी की मुलाकात के बाद इस तरह के कयास लगाए जा रहे हैं.

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कयास इसलिए भी लग रहे हैं क्योंकि सोनिया गांधी ने अपने युवराज को उत्तराधिकार सौंप दिया है तो अब लालू ने भी कुछ ऐसा ही कर दिया है. ऐसे में इन दोनों की मुलाकात को बिहार में लोकसभा चुनाव की तैयारियों और गठबंधन की कोशिश से ही जोड़कर देखा जा रहा है.

Lalu Yadav-Rahul Gandhi

बिहार में कांग्रेस लंबे समय से लालू यादव की पार्टी आरजेडी पर निर्भर होती चली आई है

अब लालू यादव को सजा होने के बावजूद बिहार में कांग्रेस और आरजेडी के बीच गठबंधन पर बात आगे बढ़ सकती है. आरजेडी इस मुद्दे पर अपने कोर –वोटर की सहानुभूति का फायदा उठाने की कोशिश करेगी. उधर, आरजेडी और कांग्रेस दोनों की ही कोशिश है कि बिहार में कुछ असंतुष्ट जेडीयू-बीजेपी के लोगों को अपने पास जोड़ा जाए.

जेडीयू नेता और विधानसभा के पूर्व स्पीकर उदयनारायण चौधरी से लेकर श्याम रजक तक ने दलितों के मुद्दे को उठाकर पार्टी के भीतर अपनी उपेक्षा पर नाराजगी जता दी है. ऐसे में आरजेडी की कोशिश इन अंसतुष्ट नेताओं को अपने साथ जोड़ने की हो रही है.

उपेंद्र कुशवाहा और जीतनराम मांझी पर नजर

इसके अलावा एनडीए के दो सहयोगी उपेंद्र कुशवाहा और जीतन राम मांझी पर भी कांग्रेस और आरजेडी की नजर है. जातीय समीकरण साधने की कोशिश में जुटी आरजेडी कुशवाहा वोटों के लिए उपेंद्र कुशवाहा को साधने की कोशिश कर रही है.

दूसरी तरफ 'हम' (हिन्दुस्तानी अवाम मोर्चा) के नेता पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी भी अपनी उपेक्षा को लेकर एनडीए से बहुत खुश नहीं हैं. लिहाजा जीतन राम मांझी को अपने साथ जोड़ने को लेकर आरजेडी और कांग्रेस दोनों ही कवायद कर रहे हैं. लालू यादव के जेल जाने के बाद किसी के लिए भी आरजेडी के साथ जाना आसान नहीं होगा. अगर जीतन राम मांझी एनडीए का साथ छोड़ते भी हैं तो उस परिस्थिति में भी वो कांग्रेस के ही साथ जाना पसंद करेंगे. सूत्रों के मुताबिक, राहुल गांधी के अध्यक्ष बनने के बाद कांग्रेस की तरफ से भी जीतनराम मांझी के साथ-साथ उनकी पार्टी के नेता महाचंद्र प्रसाद सिंह और नरेंद्र सिंह को भी कांग्रेस में शामिल करने को लेकर कवायद हो रही है.

लालू यादव को सजा के बाद बिहार में सियासी समीकरण बदल सकते हैं. बिन लालू आरजेडी के लिए अपने कुनबे को साथ रखने के साथ-साथ नए साथी की तलाश करना मुश्किल होगा. कारण दागदार लालू के साथ जाने में खतरा भी कम नहीं है. लेकिन, इस मुश्किल हालात में भी 2013 में अध्यादेश फाड़कर लालू के खिलाफ रहने वाले राहुल गांधी का सहारा मिल सकता है.

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