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'आप' के पांच साल: पूरे नहीं हुए कई वादे और इरादे

रविवार को आम आदमी पार्टी ने जोर-शोर से अपना पांचवां स्थापना दिवस मनाया

Debobrat Ghose Debobrat Ghose Updated On: Nov 27, 2017 03:34 PM IST

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'आप' के पांच साल: पूरे नहीं हुए कई वादे और इरादे

मोहन राठौर दिल्ली के गोविंदपुरी इलाके में रहने वाले एक आम आदमी हैं. वो ऑटोरिक्शा चलाते हैं. मोहन करीब दो दशक पहले मध्य प्रदेश के भिंड से दिल्ली आए थे. शुरुआत में छोटे-मोटे काम कर के काम चलाया. फिर पिछले दस साल से मोहन अपना ऑटोरिक्शा चलाते हैं.

2013 की गर्मियों में मोहन ने एक और आम आदमी की बात पर यकीन करने का फैसला किया. उन्होंने अन्ना हजारे के आंदोलन से शोहरत में आए अरविंद केजरीवाल के समर्थन का फैसला किया. अरविंद केजरीवाल आम आदमी पार्टी बनाकर दिल्ली का विधानसभा चुनाव लड़ रहे थे. उन्होंने लोगों ने भ्रष्टाचार मुक्त सरकार बनाने का वादा किया.

केजरीवाल ने दिल्ली के करीब 80 हजार ऑटोवालों से आम आदमी पार्टी का समर्थन करने की अपील की. केजरीवाल ने कहा कि वो शीला दीक्षित की अगुवाई वाली कांग्रेस सरकार को उखाड़ फेंकेंगे और नई राजनीति करने वाली आम आदमी पार्टी की सरकार बनाएंगे. केजरीवाल ने वादा किया था कि वो लोगों की जिंदगी में नया सवेरा लाएंगे.

समर्थक हैं नाराज

लेकिन आज चार साल बाद मोहन राठौर और उनके जैसे बहुत से लोग केजरीवाल से निराश हैं. ये वही लोग हैं जिन्होंने केजरीवाल पर भरोसा करके आम आदमी पार्टी को वोट दिया था. 2015 के चुनाव में आम आदमी पार्टी ने दिल्ली विधानसभा की 70 में से 67 सीटें जीत ली थीं. ये एक ऐतिहासिक और रिकॉर्ड जीत थी.

मोहन राठौर कहते हैं कि, 'जीत के तुरंत बाद केजरीवाल सरकार ने कम कीमत पर बिजली और फ्री पानी देने का वादा पूरा किया. पर उसके बाद हम ऑटोवालों के लिए जो कहा था उसका कुछ नहीं हुआ'. मोहन सवालिया अंदाज में कहते हैं कि और बहुत सारे वादों का क्या हुआ?

रविवार को आम आदमी पार्टी ने जोर-शोर से अपना पांचवां स्थापना दिवस मनाया. उसी ऐतिहासिक रामलीला मैदान में आम आदमी पार्टी ने अपने स्वयंसेवकों, सदस्यों और 22 राज्यों के कार्यकर्ताओं के साथ ये जश्न मनाया, जहां से केजरीवाल ने आंदोलन की शुरुआत की थी.

Bhopal: Delhi Chief Minister Arvind Kejrival being welcomed with traditional bow& arrow by Party workers during Aam Aadmi Party rally in Bhopal on Sunday. PTI Photo(PTI11_5_2017_000084B)

तस्वीर: पीटीआई

आम आदमी पार्टी की स्थापना 26 नवंबर 2012 को हुई थी. इसके ज्यादातर नेता अन्ना हजारे के 2011 के इंडिया अगेंस्ट करप्शन आंदोलन से ही निकले थे. हालांकि अन्ना हजारे आंदोलन को राजनीतिक बनाने के खिलाफ थे. मगर केजरीवाल ने उनके ऐतराज की अनदेखी करते हुए आम आदमी पार्टी बनाई और चुनाव लड़ा.

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आम आदमी पार्टी ने अलग तरह की सियासत करने का वादा किया था. उन्होंने लोगों को भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन देने का भरोसा दिया था. केजरीवाल और उनकी पार्टी ने कहा था कि उनकी सरकार आम आदमी की सरकार होगी.

अपने स्थापना दिवस पर आयोजित कार्यक्रम को आम आदमी पार्टी ने क्रांति के पांच साल का नाम दिया. इसमें केजरीवाल ने पुराने दिनों को याद करते हुए आंदोलन की बातें कीं. बीजेपी और कांग्रेस पर हमला बोला. बाकी नेताओं ने केजरीवाल सरकार के काम-काज की तारीफ में कसीदे पढ़े. मंत्रियों ने अपनी सरकार की पीठ थपथपाई.

कुछ काम हुए पर नाकामियां भी कम नहीं

दिल्ली के लोगों को सस्ती बिजली और मुफ्त में पानी उपलब्ध कराने के अलावा भी केजरीवाल सरकार ने कुछ अच्छे काम किए हैं. उन्होंने दिल्ली के सरकारी स्कूलों की हालत सुधारी है. स्कूलों के बुनियादी ढांचे को बेहतर किया है. सेहत के मोर्चे पर आम आदमी पार्टी ने मोहल्ला क्लिनिक खोलने का वादा किया था. कुछ मोहल्ला क्लिनिक खुले भी हैं. मगर उनकी तादाद बहुत कम है.

आम आदमी पार्टी की तमाम नाकामियों में से सबसे बड़ी नाकामी की मिसाल है संगम विहार का इलाका. संगम विहार, एशिया की सबसे बड़ी अवैध कॉलोनी है. इस कॉलोनी को दिल्ली जल बोर्ड से सीधे पानी सप्लाई नहीं होती. आम आदमी पार्टी ने वादा किया था कि सत्ता में आने पर वो ये दिक्कत दूर करेगी. लेकिन वहां के निवासी आज भी टैंकर माफिया के मोहताज हैं.

संगम विहार के लोग कहते हैं कि चुनाव से पहले टैंकर माफिया कांग्रेस के इशारे पर काम करते थे. आज आम आदमी पार्टी का स्थानीय विधायक टैंकर माफिया को नियंत्रित करता है. आम आदमी पार्टी को लोगों ने वोट इस माफिया से निजात पाने के लिए दिया था. मगर वैसा कुछ हुआ नहीं.

file photo

सत्ता में आने के बाद से ही आम आदमी पार्टी में विरोध के सुर फूटने लगे थे. कई स्वयंसेवक और पार्टी के संस्थापक सदस्यों ने केजरीवाल के खिलाफ आवाज उठाई थी. योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण जैसे नेताओं को पार्टी से बाहर कर दिया गया. इन नेताओं के जाने से पार्टी की बौद्धिक पहचान खत्म हो गई. इन नेताओं को पार्टी से निकालने की कड़ी निंदा हुई थी. इन नेताओं ने पहले तो स्वराज अभियान चलाया. फिर स्वराज इंडिया के नाम से अलग पार्टी बना ली.

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इतिहासकार और आम आदमी पार्टी के सदस्य रहे राजमोहन गांधी ने 2014 का लोकसभा चुनाव लड़ा था. राजमोहन गांधी ने संडे ट्रिब्यून में लिखा था कि, 'केजरीवाल अकेले या उन लोगों के साथ क्रांति नहीं ला सकते, जिनके साथ वो बेहतर महसूस करते हैं. कई बार उन्हें ऐसे लोगों की जरूरत पड़ेगी, जो उन्हें पसंद नहीं हैं. लेकिन ये लोग बहुत काम की सलाह देने वाले हैं. इनके पास काबिलियत है. इनके पास खास नजरिया है. ऐसे लोगों के प्रति पार्टी के स्वयंसेवकों और समर्थकों में बहुत सम्मान है'.

स्वयंसेवक आम आदमी पार्टी का ताकत रहे हैं. लेकिन बहुत से स्वयंसेवकों ने नाखुश होकर पार्टी छोड़ दी. कई लोग योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण के साथ चले गए. कई स्वयंसेवकों ने मिलकर आम आदमी वॉलंटियर्स एक्शन मंच या AAVAM बना लिया.

AAP foundation day

क्या चापलूसों से भर गई है आप

इसके संयोजक करन सिंह कहते हैं कि, 'आम आदमी पार्टी पहले स्वयंसेवकों वाली पार्टी थी. मगर अब ये चापलूसों की गोलबंदी बनकर रह गई है. अब ये पार्टी केजरीवाल और उनके कुछ खास लोगों का गिरोह भर है. पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र नहीं रह गया है. पार्टी में सिर्फ अरविंद केजरीवाल की चलती है'.

आम आदमी पार्टी के घोषणापत्र में किए गए बहुत सारे वादे अधूरे हैं. इनकी लिस्ट बहुत लंबी है. पार्टी ने डीटीसी बसों में महिलाओ की सुरक्षा के लिए मार्शल तैनात करने का वादा किया था. पर ऐसा किया नहीं. फ्री वाई-फाई, सीसीटीवी लगाने, रात में मेट्रो स्टेशन तक बसें चलाने, स्थानीय इलाकों का बेहतर रख-रखाव, प्रदूषण पर काबू पाने जैसे कई वादे अधूरे हैं.

केजरीवाल और उनकी सरकार ने लगातार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर लगातार हमले करती रही. उप-राज्यपाल से इतनी लड़ाई मोल ली कि दिल्ली में विकास का काम कमोबेश ठप पड़ गया. आम लोगों ने इन बातों को जरा भी पसंद नहीं किया. पार्टी अपनी महत्वाकांक्षाओं को भी नहीं पूरा कर सकी. आम आदमी पार्टी को पंजाब और गोवा में जबरदस्त हार का सामना करना पड़ा. अब आम आदमी पार्टी राजस्थान, मध्य प्रदेश और कर्नाटक में चुनाव लड़ने की तैयारी में है.

आज आम आदमी पार्टी विवादों का दूसरा नाम बन गई है. फिर चाहे इसके मंत्री जितेंद्र तोमर की फर्जी डिग्री का मामला हो या फिर संदीप कुमार की सेक्स सीडी. सरकार का 526 करोड़ रुपए का प्रचार का बजट भी विवाद की वजह बना. खुद पार्टी के विधायक पंकज पुष्कर ने इसका विरोध किया. केजरीवाल सरकार का एक साल में 399 शराब की दुकानों को लाइसेंस देना भी सुर्खियों में रहा.

पिछले दिनों में केजरीवाल का पार्टी के संस्थापक नेता रहे कुमार विश्वास से भी झगड़ा हुआ. केजरीवाल के करीबी ओखला के आम आदमी पार्टी विधायक अमानतउल्लाह खान ने विश्वास को आरएसएस का एजेंट कहा. पहले तो अमानतउल्लाह खान को सस्पेंड कर दिया गया. मगर पार्टी की एक कमेटी ने जांच में उन्हें क्लीन चिट दे दी. जिसके बाद वो फिर से सक्रिय हो गए. इससे केजरीवाल और कुमार विश्वास के संबंध और बिगड़ गए.

पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में भी कुमार विश्वास अलग-थलग पड़ गए. केजरीवाल और उनके बीच दरार खुलकर उजागर हो चुकी थी.

रविवार को कुमार विश्वास ने अपने भाषण में पार्टी की चाल और चरित्र पर तीखा हमला किया. उन्होंने विरोधियों को चुनौती देते हुए कहा कि वो पार्टी छोड़कर नहीं जाएंगे. साफ है कि आम आदमी पार्टी ने पांच साल के सियासी जीवन में लंबा सफर तय किया है. अब वो पक्की राजनीतिक पार्टी बन गई.

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