live
S M L

फ़र्स्टपोस्ट की पड़ताल: प. बंगाल जहां दाल-सब्जी की तरह गत्तों में भरकर बेचे गए नवजात बच्चे

इस काम में अक्सर डॉक्टर भी मिले होते हैं. इन बच्चों को डेढ़ से ढाई लाख रुपए तक में बेचा जाता है.

Updated On: Apr 18, 2017 04:07 PM IST

Shantanu Guha Ray

0
फ़र्स्टपोस्ट की पड़ताल: प. बंगाल जहां दाल-सब्जी की तरह गत्तों में भरकर बेचे गए नवजात बच्चे

पश्चिम बंगाल में बच्चों की खरीद-फरोख्त का अवैध कारोबार पिछले करीब दो दशकों से फल-फूल रहा है. कहा जा रहा है कि बंगाल में अब तक दस हजार से ज्यादा बच्चे बेचे जा चुके हैं.

इसकी बड़ी वजह मुंबई-दिल्ली के रईस घरानों में बच्चों की भारी मांग है. कई बार तो इस कदर डिमांड होती है कि नवजात बच्चों को गत्तों में बंद करके अस्पताल से गिफ्ट की तरह बाहर ले जाकर बेच दिया जाता है. पिछले साल ही इस अवैध कारोबार का खुलासा पुलिस ने किया था.

बच्चों की दलाली करने वाले दिल्ली में सरकारी अधिकारियों के संपर्क में थे. ये अधिकारी उन्हें ये बताते थे कि वो कोलकाता में किन एनजीओ के जरिए बच्चे बेचने का कारोबार बढ़ा सकते हैं.

इन्हीं में से एक मामले में एक अहम आरोपी चंदन चक्रवर्ती पकड़ा गया. उसने कोलकाता पुलिस को बताया कि वो बंगाल बीजेपी की महासचिव जूही चौधरी के साथ कोलकाता से दिल्ली गया था.

उसका ये भी दावा था कि जूही चौधरी ने अपने नर्सिंग होम का मसला सुलझाने के लिए बीजेपी के नेताओं कैलाश विजयवर्गीय और रूपा गांगुली से भी बात की थी.

जूही चौधरी को पिछले महीने नेपाल सीमा से गिरफ्तार किया गया. उसके बाद बीजेपी ने उन्हें निलंबित कर दिया. हालांकि रूपा गांगुली ने अपने ऊपर लगे आरोपों को गलत बताया.

उन्होंने कहा कि ये उन्हें फंसाने की कोलकाता पुलिस की साजिश है जो ये काम तृणमूल कांग्रेस के इशारे पर कर रही है. गांगुली ने कहा कि पुलिस ने अब तक उनके खिलाफ एक भी सबूत नहीं पेश किए हैं. वो तो बस इसलिए उनका नाम ले रहे हैं क्योंकि गांगुली बीजेपी  नेता हैं.

6 महीने पहले हुआ खुलासा

बच्चों के खरीद-फरोख्त का ये मामला नवंबर 2016 में सामने आया था. तब पता ये चला था कि एक ही अस्पताल महीने में 65 बच्चे बेच रहा था. डॉक्टरों ने ये भी बताया कि वो बरसों से ये काम कर रहे हैं.

महीनों की जांच के बाद अब पुलिस का दावा है कि इसमें करीब डेढ़ सौ अस्पताल शामिल हैं. उत्तरी 24 परगना जिले में चल रहे कई नर्सिंग होम भी इस अवैध कारोबार में शामिल हैं.

baby

बच्चा चोरी के गिरोह में कम से कम 150 अस्पताल शामिल हैं

बांग्लादेश सीमा से लगे मसलंदपुर कस्बे में कई नर्सिंग होम के मालिकों ने माना है कि उन्होंने बांग्लादेश से भी बच्चों की तस्करी की है. उन्होंने ये भी बताया है कि वो पिछले दस सालों से ये काम कर रहे हैं.

कोलकाता के रिसर्चर अरिजित अधिकारी कहते हैं, 'ये तो सिर्फ एक अस्पताल का हाल है. अगर आप इसकी बुनियाद पर सिर्फ मोटा अनुमान लगाएं तो सालाना कम से कम 500 बच्चे बेचे जा रहे थे. ये आंकड़े डराने वाले हैं.'

अरिजित पिछले कई सालों से पूर्वोत्तर के राज्यों में बच्चों की खरीद-फरोख्त के धंधे पर नजर रख रहे हैं. वो कहते हैं कि बिहार, बंगाल, ओडिशा और झारखंड में धड़ल्ले से बच्चे बेचे जा रहे हैं.  इसमें सरकारी अस्पतालों के डॉक्टर और प्राइमरी हेल्थ केयर सेंटर के कर्मचारी भी मिले हुए हैं. अरिजित कहते हैं कि इसके लिए सिर्फ बंगाल को दोष देना ठीक नहीं होगा.

वो कहते हैं कि भारत के किसी भी अस्पताल में जन्मे बच्चों का आंकड़ा रखने की व्यवस्था बेहद लचर है. छोटे शहरों में तो हालात और बुरे हैं. वो कहते हैं कि कंप्यूटर हैं...आंकड़े भी दर्ज होते हैं. पर ये आंकड़े भी तो वही लोग डालते हैं, जो बच्चों की खरीद-फरोख्त के धंधे से जुड़े होते है. ऐसे में धांधली करना आसान हो जाता है.

तीन मिनट में बच्चा चोरी

पिछले महीने कोलकाता में चिन्मयी बेज नाम की महिला को बच्चा चुराते हुए गिरफ्तार किया गया था. वो ये काम एक फार्मासिस्ट की मदद से कर रही थी. फार्मासिस्ट के अस्पताल की नर्सों से अच्छे ताल्लुक थे. बच्चा चोरी का ये काम बड़ी ही आसानी से बिना किसी ठोस योजना के सिर्फ तीन मिनट में निपटाया गया था.

सीसीटीवी फुटेज से पता चला कि चिन्मयी अस्पताल की आईसीयू में दाखिल हुई और बच्चे को गोद में लेकर चलती बनी. बाद में उसने बताया कि उसे दिमागी परेशानी थी.

चिन्मयी के मुताबिक, 'अक्सर वो पेट से तकिया बांधकर खुद के गर्भवती होने का नाटक करती थी. उसने बताया कि सास-ससुर के तानों से तंग आकर वो और उसके पति दोनों जल्द से जल्द बच्चा चाहते थे.'

कोलकाता के पुलिस अधिकारी अशोक प्रधान बताते हैं कि उन्होंने ये मामला तीन दिनों में सुलझा लिया था. ये बच्चे को बेचने नहीं उसकी चोरी का मामला था. प्रधान कहते हैं कि भले ही ये चोरी का मामला हो मगर एक बड़े स्कैंडल के सामने आने के फौरन बाद ये घटना होने से जाहिर है कि अस्पतालों में नवजात बच्चों की सुरक्षा का कोई इंतजाम नहीं.

Baby

बच्चों की तस्करी में ज्यादातर लेन-देन नकद होता है

ये भी पढ़ें: 10 महीने के बच्चे पर आतंकी होने का शक, 10 घंटे तक पूछताछ

वो कहते हैं कि, 'नर्सों..फार्मासिस्टों और डॉक्टरों की मदद से धड़ल्ले से बच्चे बेचे जा रहे हैं. तस्कर आराम से अस्पताल में घुसकर बच्चे उठा ले जाते हैं. पैसे का लेन-देन नकद होता है.'

सरकारी और निजी अस्पतालों में बरसों से ठुकराए गए नवजात बच्चों को बेचने के आरोप लगते रहे हैं. एजेंट इसके लिए बिन ब्याही मांओं को फंसाते हैं. उन्हें कहा जाता है कि बच्चे की डिलीवरी के बाद वो उन्हें छोड़कर आराम से जा सकती हैं. इस काम में अक्सर डॉक्टर भी मिले होते हैं. इन बच्चों को डेढ़ से ढाई लाख रुपए तक में बेचा जाता है.

कई बार डॉक्टर मांओं को बताते हैं कि उन्होंने मरे हुए बच्चे को जन्म दिया है. दुखी मां-बाप ये सोचते भी नहीं कि डॉक्टर उनसे झूठ बोल रहे हैं. अक्सर वो बच्चे का शव भी नहीं मांगते. इसीलिए बच्चों को बेचने का धंधा आराम से चलता है.

उधर मां घर पहुंचती है. इधर उसके बच्चे को आराम से बेच दिया जाता है. वो अपने नए मां-बाप के पास पहुंच जाता है.

डॉक्टरों की मदद से काला धंधा

कोलकाता के पुलिस अधिकारी अशोक प्रधान कहते हैं कि बच्चों के दलाल पूरे देश में पाए जाते हैं. सिर्फ बंगाल में ऐसा नहीं होता. वो बताते हैं कि साल 2015 में बच्चों को गोद लेने के 3700 कानूनी मामले दर्ज हुए. जबकि बच्चों की मांग इससे दस गुना ज्यादा है.

सरोगेसी पर फिल्म बनाने वाली फिल्मकार इशानी दत्ता कहती हैं कि ये काला धंधा इसलिए आराम से चलता है क्योंकि कमोबेश हर अस्पताल में बच्चों का हिसाब किताब लोग रखते हैं मशीनें नहीं.

कोई इंसान ही बच्चे की पैदाइश का हिसाब कागज पर दर्ज करता है. इसके बाद उसे कंप्यूटर में दर्ज किया जाता है. इसमें हेराफेरी करने की काफी गुंजाइश रहती है.

baby

ज्यादातर मौकों पर ये बच्चे बिन ब्याही मांओं के होते हैं

पश्चिम बंगाल की पुलिस ने बच्चों की दलाली के जुर्म में पांच एजेंट और सरकारी अस्पतालों के दो बड़े अधिकारियों को गिरफ्तार किया था. एजेंटों को डॉक्टर बच्चे मुहैया कराते थे. कई बार एजेंट ऐसी गर्भवती महिलाओं को ढूंढकर अस्पताल लाते थे जो किसी वजह से बच्चा गिराना चाहती थीं. उन्हें बस किसी तरह से डिलीवरी के लिए राजी किया जाता था.

बच्चों की खरीद-फरोख्त के इल्जाम में बीस डॉक्टर गिरफ्तार किए गए हैं. इनमें सॉल्ट लेक इलाके के डॉक्टर दिलीप घोष भी शामिल हैं. घोष बीजेपी के सदस्य रहे हैं. उन्होंने नगर-निगम का चुनाव भी पार्टी के टिकट पर लड़ा था. बीजेपी ने उन्हें पार्टी की सदस्यता से निलंबित कर दिया है.

एक और डॉक्टर नित्यानंद बिश्वास दक्षिण कोलकाता के मशहूर इलाके बेहाला के रहने वाले हैं. इसी इलाके में सौरव गांगुली भी रहते हैं. नित्यानंद को तब गिरफ्तार किया गया जब एक मरीज ने उन पर बच्चा बेचने का इल्जाम लगाया.

बिश्वास ने अब तक पचास बच्चे बेचने का जुर्म कबूला है. वो अक्सर बिन ब्याही गर्भवती लड़कियों को निशाना बनाते थे. ये लड़कियां हर हाल में अपने बच्चों से पीछा छुड़ाना चाहती थीं.

लड़का महंगा, लड़की सस्ती

बच्चों की कीमत करीब दो लाख लगाई जाती थी. वहीं लड़कियों के लिए एक लाख रुपए दाम रखा गया था. गोरे बच्चों के लिए चार लाख रूपये तक लिए जाते थे. डॉक्टरों को साठ से 80 हजार रुपए तक कमीशन मिलता था.

इस रैकेट का खुलासा तब हुआ जब सीआईडी ने एक क्लिनिक में छापा मारा. वहां रुई में लिपटे तीन बच्चे मिले तो गत्तों में रखे गए थे. पुलिस अधिकारी कहते हैं कि नित्यानंद बिश्वास बच्चों की दलाली के माफिया की तरह काम कर रहे थे.

ये भी पढ़ें: बरसों की मेहनत पर पानी फेर सकता है महिला विरोधी कानून

rupa$kailash

इस रैकेट का खुलासा होने पर बीजेपी नेता रूपा गांगुली और कैलाश विजयवर्गीय का भी नाम आया

नित्यानंद ने हेल्पर के तौर पर करियर शुरू किया था. लेकिन वो आखिर में डॉक्टर बन गया. वो इलाज करने लगा. नुस्खे लिखने लगा. वो अपने पास नौ डिग्रीयां होने का दावा करता था.

स्थानीय लोग कहते हैं कि पहले भी बिश्वास के यहां छापे पड़े थे. ठाकुरनगर में जब भी उसकी क्लिनिक पर पुलिस आई वो गायब हो जाता था. स्थानीय गायघाट थाने की पुलिस के मुताबिक वो दो बार गिरफ्तार किया गया था.

साल 2005 और 2009 में भी वो जेल भी गया था. ये तब हुआ था जब उसकी क्लिनिक से बच्चे लापता होने की शिकायत हुई थी. लेकिन वो दोनों बार जमानत पर छूटकर बाहर आया और फिर से धंधे पर लग गया.

लोग बताते हैं कि नित्यानंद बिश्वास का क्लिनिक इसलिए भी चलता था कि स्थानीय सरकारी अस्पताल और प्राइमरी हेल्थ सेंटरों का बुरा हाल है. वो दो गांवों और करीब पांच हजार की आबादी की सेहत का इकलौता रखवाला था. इसीलिए उसका धंधा खूब चलता था.

वो एक डिलीवरी के लिए तीन से चार हजार रुपए लेता था. स्थानीय अस्पताल काफी दूर था. इसलिए लोग उसकी क्लिनिक में जाते थे. ये तो लोगों को पता था कि उसके क्लिनिक में अबॉर्शन होता था. मगर लोगों को ये अंदाजा नहीं था कि वो बच्चों की दलाली भी करता था.

गर्भवती महिलाओं की सर्जरी में बिश्वास की मदद नज्मा बीबी नाम की एक नर्स करती थी. नजमा उत्तरी 24 परगना जिले में अपना खुद का क्लिनिक भी चलाती थी. वो अक्सर अबॉर्शन करती थी और नित्यानंद बिश्वास के साथ भी उसकी साठ-गांठ थी.

इन दोनों को उत्पल ब्यापारी नाम के शख्स से भी मदद मिलती थी. उत्पल सुबोध दत्ता वेलफेयर ट्रस्ट के नाम से एक एनजीओ चलाता था जो गरीब बच्चों की पढ़ाई और सेहत के लिए काम करने का दावा करती थी.

ये भी पढ़ें: देशभर में 93 लाख से ज्यादा बच्चे गंभीर कुपोषण से से पीड़ित

Chennai: Foreign nationals walking at an arterial road in Adyar that bears the brunt of cyclone Vardah due to uprooting of trees, in Chennai on Tuesday. PTI Photo (PTI12_13_2016_000166B)

इन बच्चों के खरीदारों में विदेशी पर्यटक भी शामिल हैं

विदेश से भी आए खरीदार

कोलकाता पुलिस के सीआईडी अफसर बताते हैं कि तीनों आपस में तालमेल से काम करते थे. बाकी दुनिया के लिए उत्पल ब्यापारी ही कारोबार का किंगपिन था. इसमें प्रभात सरकार और जांतू बिश्वास नाम के दो एजेंट भी शामिल थे.ये लोग कोलकाता जाकर दलालों से बातचीत करते थे.

21 नवंबर 2016 को नजमा के क्लिनिक और बिश्वास के नर्सिंग होम पर सीआईडी ने छापा मारा था. दो घंटे के भीतर ही बच्चों की दलाली के इनके गैंग का खुलासा हो गया था. इस मामले में बीस लोग गिरफ्तार किए गए हैं. इनमें से 19 के खिलाफ ठोस सबूत इकट्ठे हो चुके हैं. पुलिस ने 26 लोगों को गवाह बनाया है.

सीआईडी के एडीजी राजेश कुमार ने कहा कि वो पिछले तीन महीने से केस की पड़ताल कर रहे थे. वो सब्जी की तरह बच्चे बेच रहे थे. उनके ग्राहक ज्यादातर मुंबई और दिल्ली से थे. एक जोड़ा अमेरिका से आया था जिसने छह लाख रुपए देकर हर वाजिब दस्तावेज की मदद से बच्चा हासिल किया था.

राजेश कुमार कहते हैं कि बच्चे चुराकर उन्हें बेचने का काम भारत में हर जगह हो रहा है. कई बार तो अस्पताल से सीधे डॉक्टर ही बच्चे बेच देते हैं. कई बार इस काम में एजेंट शामिल होते हैं. वो कहते हैं कि कन्या भ्रूण हत्या और अवैध अबॉर्शन से ज्यादा बड़ी दिक्कत कुंवारी लड़कियों से होने वाले बच्चों की पैदाइश है. क्योंकि इसका कोई हिसाब नहीं रखा जाता.

2014 में सत्ता में आने के बाद पीएम मोदी की एनडीए सरकार ने बच्चे गोद लेने के नियम आसान किए हैं. इसी वजह से 2015 में तीन हजार से ज्यादा बच्चे वैध तरीके से अपनाए गए. राजेश कुमार कहते हैं कि बच्चों की दलाली रोकने का कानून और सख्त होना चाहिए.

राजेश कुमार कहते हैं कि इस रैकेट का खुलासा होने से बच्चों की दलाली बंद नहीं हुई. हां लोग ज्यादा सावधानी बरत रहे हैं. उन्हें डर है कि ये दलाल अब अपना धंधा दूसरे राज्यों में करेंगे. वो अब बच्चों को चुराकर बेचने के लिए नई साजिश रचेंगे. राजेश कुमार को इसी की ज्यादा फिक्र है.

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
KUMBH: IT's MORE THAN A MELA

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi