live
S M L

इंटरनेशनल आर्ट फेयर: दिल्ली वालों के बिना खर्च कला को समझने का अच्छा मौका

ललित कला अकादमी का ये पहला आर्ट फेयर खास तौर पर मध्यमवर्ग के लिए कला को समझने का अच्छा मौका है

Updated On: Feb 12, 2018 07:22 PM IST

Animesh Mukharjee Animesh Mukharjee

0
इंटरनेशनल आर्ट फेयर: दिल्ली वालों के बिना खर्च कला को समझने का अच्छा मौका

इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र दिल्ली में ललित कला अकादमी का आयोजित अंतर्राष्ट्रीय कला मेला चल रहा है. 800 कलाकारों वाला ये कला मेला 17 फरवरी 2018 तक चलेगा. दिल्ली शहर में यूं तो कला से जुड़े कई इवेंट होते रहते हैं. मगर पहली बार आयोजित हुआ ये ‘आर्ट फेयर’ कई मायनों में खास है. न सिर्फ कलाकारों के लिए बल्कि कला में रुचि रखने वालों के लिए भी.

मध्यवर्ग के बीच आर्ट

एमएफ हुसैन की एक पेंटिंग

एमएफ हुसैन की एक पेंटिंग

यहां कई जगह से कलाकार आए हैं. देश के कोने-कोने से आए कलाकारों के अलावा दुनिया भर के भी कई आर्टिस्ट हैं. अगर आप घर के इंटीरियर पर ठीक-ठाक खर्च करना चाहते हैं. या कला में कुछ इनवेस्टमेंट करना चाहते हैं तो ये आर्ट फेयर अच्छा मौका है. इसके अलावा बिना किसी एंट्री टिकट का ये कला मेला सिर्फ घूमने जाने वालों के लिए अच्छा ऑप्शन है.

खरीददारी के लिए जाने वालों को दो बातें याद रखनी चाहिए, ये शिल्प कला का मेला नहीं है. इसका मतलब है कि यहां आपको क्राफ्ट या हैंडी क्राफ्ट नहीं मिलेगा. मसलन मधुबनी पेंटिंग, बांधनी या पैठणी यक्षगान जैसी कलाओं से बना सामान यहां नहीं मिलेगा. अलग-अलग जगहों से आए कलाकारों के काम में कई बार उनकी जगह का असर दिखता है. लेकिन ये काम बहुत दूसरी तरह का है. मसलन तेजी से लोकप्रिय होते पेंटर अर्पण भौमिक की पेंटिंग कोलकाता को दिखाती हैं, मगर इनमें दुर्गापूजा और पारंपरिक बिंबों की जगह ट्राम, पीली टैक्सी जैसे ऑब्जेक्ट हैं.

अर्पण भौमिक की एक पेंटिंग

अर्पण भौमिक की एक पेंटिंग

दूसरी बात है कि ये कला अगर अच्छी है तो इसकी कीमत भी है. मेले के आयोजकों ने स्टॉल की फीस काफी कम रखी है. लगभग 30,000 रुपए में कलाकार 15 दिन के लिए प्रदर्शनी लगा सकते हैं. एक-एक स्टॉल में कई कलाकार हैं तो ये खर्च और भी कम हो जाता है. इन सबके बाद भी कला थोड़ी महंगी है. उदाहरण के लिए शांतिनिकेतन की रबी आर्ट गैलरी में 1,000 रुपए से चारकोल पेंटिंग्स शुरू होती हैं लेकिन अगर आपको एमएफ हुसैन का सेरीग्राफ चाहिए तो इसके लिए कम से कम 25,000 रुपए खर्च करने होंगे. थोड़े चर्चित पेंटर्स की पेंटिंग्स और इंस्टॉलेशन भी 30,000-40,000 से शुरू होते हैं. इस गैलरी से जुड़े विपिन पॉल बताते  हैं कि कला की इससे कम कीमत तो नहीं हो सकती.

ये कीमत बड़ी आसानी से कुछ लाख में पहुंच जाती है. कला का पूरा बाज़ार भी इसी तरह काम करता है. लोग किसी उभरते हुए कलाकार का आर्टवर्क कुछ हजार में खरीदते हैं, जब वो मश्हूर हो जाए तो इसे लाखों-करोड़ों में नीलाम कर देते हैं.

कला पर अर्थव्यवस्था की मार

lalit kala academy international art fare

आर्ट फेयर में थोड़ा टहलने और आर्टिस्ट्स से बातचीत करने पर एक बात सामने आती है. कला की दुनिया में मंदी आई है. ज्यादातर कलाकार पूरी तरह से पेंटिंग्स पर निर्भर नहीं करते हैं. कोई आर्ट टीचर है, किसी ने डिज़ाइन स्टूडियो खोल रखा है. इस स्लो डाउन के द्विपक्षीय कारण हैं.

कला काफी समय तक अमीरों के लिए पैसा खपाने का जरिया थी. नोटबंदी जैसे उपक्रमों ने इसमें कमी की है. इसके अलावा भी तमाम आर्थिक कारण हैं जिनके चलते कला को बड़े निवेशक नहीं मिल रहे हैं.

दूसरी वजह कलाकारों की अपनी कमी हैं. आप दुनिया के किसी भी बड़े पेंटर का काम देखें, एक नजर में आप पहचान जाएंगे कि कौन सी पेंटिंग मॉने की है, क्या हुसैन ने बनाया है. रवि वर्मा की कलाकृतियां, अमृता शेरगिल के पोट्रेट दूर से पहचाने जा सकते हैं. भारत की कलाकारों की नई पीढ़ी में इसकी कमी झलकती है. कुछ एक नाम हैं जिनके काम में एक यूनीक टच दिखता है. ऐसे कलाकारों की कमी नहीं जो पश्चिम के कम जाने पहचाने काम से ‘प्रेरित’ दिखते हैं.

इसके अलावा टेक्नॉलजी की जानाकारी न होना भी एक बड़ा मुद्दा है. हमने कई गैलरियों, पेंटर्स और आर्टिस्ट्स से बात की. एक-आध को छोड़कर किसी का फेसबुक पेज नहीं है. किसी की वेबसाइट नहीं है. जबकि पश्चिमी कलाकार इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफॉर्म के बखूबी इस्तेमालकर लाखों फॉलोअर बना रहे हैं. नोएडा में रहने वाली पेंटर निशा दयाल आर्ट टीचर भी रही हैं. वो कहती हैं कि हमारे यहां पेंटिंग को हमेशा स्कूल में आखिरी दर्जे पर रखा जाता है. इसलिए कई सारे प्रतिभाशाली कलाकार या तो कला से दूर चले जाते हैं या शौक भरने भर का काम करते हैं.

निशा दयाल

निशा दयाल

इन सबके बीच मीडियम्स की कमी और अभिव्यक्ति पर बंदिशें भी एक मुद्दा है. ज्यादातर कलाकार एक्रेलिक पेंटिग्स बनाते हैं. ये कैनवास एक दो दिन में सूख जाता है. जबकि ऑयल पेंट सूखने में 15 दिन से एक महीने का समय ले लेता है. इसी तरह वॉटर कलर पेंटिंग्स में काफी मेहनत लगती है और लोग कीमत नहीं देना चाहते हैं.

इन सारे कारणों से कलाकारों के काम में एकरसता आती दिखती है. वहीं ज्यादातर कलाकार बुद्ध, गणपति और ऐब्सट्रैक्ट जैसे विषय चुनते हैं. बातचीत में एक पेंटर बताती हैं कि कई बार चाहकर भी किसी धर्म से जुड़ी पहचान वाला आर्टवर्क बनाने में डर लगता है.

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
KUMBH: IT's MORE THAN A MELA

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi