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किसान मार्च: किसानों के पास कोई नेता नहीं, क्या हमारे नेताओं में उनके मुद्दे की समझ है?

नेताओं के बयानों से स्पष्ट होता है कि खेती की मूल समस्या के बजाए इसका इस्तेमाल राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के लिए किया जा रहा है

Updated On: Dec 02, 2018 10:13 AM IST

Jyoti Yadav Jyoti Yadav
स्वतंत्र पत्रकार

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किसान मार्च: किसानों के पास कोई नेता नहीं, क्या हमारे नेताओं में उनके मुद्दे की समझ है?

30 नवंबर को दिल्ली में किसान मुक्ति मोर्चा मौजूदा केंद्र सरकार से अपनी गुहार लगाकर वापस हो गया. यहां से अब देश के सामने तीन प्रश्न खड़े होते हैं-

  1. भारत में कौन है किसानों का नेता जो खेती और इंटरनेशनल मार्केट दोनों को समझता है?
  2. क्या खेती को एक इंडस्ट्री के तौर पर देखा जाए और इस नाते क्या किसान एक अलग और मजबूत वोट ग्रुप बनाते हैं?
  3. इस सारे हंगामे के बीच क्या है महिला किसानों की स्थिति?
किसानों के मामले में क्या नेताओं के इरादे और समझ पर भरोसा किया जा सकता है?

30 नवंबर को किसानों के मंच पर 23 विपक्षी पार्टियों के नेता मौजूद रहे. वहीं सत्ताधारी पार्टी के नेताओं ने दूर से बयान दिए. इन बयानों को जानना बेहद जरूरी है क्योंकि देश के कई राज्यों में चुनाव हो रहे हैं और छह महीने के अंदर लोकसभा चुनाव भी होना है.

राहुल गांधी- किसानों और युवाओं की आवाज को नरेंद्र मोदी भी नहीं दबा सकते. केंद्र सरकार पंद्रह उद्योगपतियों के साढ़े तीन लाख करोड़ माफ कर सकती है तो किसानों का लोन क्यों माफ नहीं कर सकती?

सीताराम येचुरी- प्रधानमंत्री आपके सारे पैसे ले लेते हैं और बदले में कुछ नहीं देते. बीेजपी के नेता कौरवों की तरह हैं जो हर पांच साल में राम मंदिर का मुद्दा उठाते हैं.

अरविंद केजरीवाल- प्रधानमंत्री ने किसानों की पीठ में छुरा घोंपा है. उनकी बीमा योजना फ्रॉड है, ये डाका योजना है.

इनके अलावा शरद यादव और उनके जैसे और भी पुराने नेता थे. लगभग सारे नेता कर्जा माफी और न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाने के पक्ष में थे.

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किसान मार्च में आए बिहार के विनोद सिंह ने विपक्षी पार्टियों के बयानों पर तालियां तो बजाईं पर ये भी कहा कि इनके पास ना तो सरकार है ना ही पावर, ये कर क्या लेंगे. जब ये सत्ता में आएंगे तो रामलीला मैदान में हमारे साथ बीजेपी रहेगी, ये लोग फिर थोड़ी सुनेंगे हमारी. ये रामलीला तो हम कई सालों से देख रहे हैं.

किसानों से काफी दूर बैठे केंद्र सरकार के नेताओं ने क्या कहा?

वहीं केंद्रीय कृषि मंत्री राधामोहन सिंह ने कहीं और कहा, 'कांग्रेस ने स्वामीनाथन कमेटी की रिपोर्ट लागू नहीं की जिसमें न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाया जाना था. मोदी सरकार ने किसानों के लिए कई काम किए हैं, इंश्योरेंस पॉलिसी लाई है और 2022 तक आमदनी दोगुना करने का प्लान किया है.'

वहीं फूड प्रोसेसिंग मंत्री हरसिमरत कौर बादल ने CII के एक कार्यक्रम में कहा, 'दो हजार करोड़ रुपए लगाकर NBFC बनाई जाएगी जो फूड प्रोसेसिंग में पैसा लगाएगी जिससे किसानों की आमदनी दोगुना करने में मदद मिलेगी. केंद्र सरकार तो न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ा सकती है, पैसा लगा सकती है पर कार्यान्वयन का जिम्मा तो राज्य सरकारों का ही. अनाज तो वही खरीदेंगे. फूड प्रोसेसिंग में तो साढ़े तीन गुना बढ़ोत्तरी हुई है. दुर्भाग्य है कि किसानों को फायदा नहीं मिल रहा. केंद्र सरकार ने तो न्यूनतम समर्थन मूल्य भी बढ़ाया है.'

योगेंद्र यादव ने अपनी किताब ‘मोदीराज में किसान’ में लिखा है कि केंद्र सरकार ने न्यूनतम समर्थन मूल्य तो बढ़ाया है पर ये स्वामीनाथन कमेटी की संपूर्ण लागत C2 पर नहीं बल्कि आंशिक लागत A2+FL पर बढ़ाया है.

वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी चुनावी सभा में राहुल गांधी पर तंज कसा कि उनको मूंग और मसूर में अंतर नहीं पता, फिर वह G-20 समिट में भाग लेने अर्जेंटीना चले गए. वहां अमेरिका और जापान के साथ मिलकर JAI (जापान, अमेरिका, इंडिया) शब्द बनाया जिसका हिंदी में मतलब है जय.

PM Modi In Nagaur

प्रधानमंत्री जापान और अमेरिका से चर्चा कर लेते तो बीजेपी को कर्नाटक में प्रदर्शन नहीं करना पड़ता

ये रोचक रहता अगर प्रधानमंत्री अमेरिका और जापान से भी खेती पर चर्चा कर लेते. जापान में खेती की समस्या लेबर से जुड़ी है. मिनिस्ट्री ऑफ एग्रीकल्चर, फॉरेस्ट एंड फिशरीज, जापान की 2015 की रिपोर्ट के मुताबिक टेक्नोलॉजी तो है खेती में, पर ज्यादातर 65 साल से ऊपर के लोग काम कर रहे हैं. युवा खेती में नहीं आना चाहता. इसका उपाय जापान ने कंपनी फार्मिंग के रूप में निकाला है. कंपनियां खेती कर रही हैं और फूड प्रोसेसिंग प्लांट भी बैठा रही हैं. इससे युवा वापस खेती में आ रहा है. वहीं अमेरिका अपने किसानों को बहुत ज्यादा सब्सिडी देने के लिए जाना जाता है.

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अगर खेती लायक जमीन की बात करें तो जापान में 11%, अमेरिका में 20% और भारत में 52% जमीन है. अगर खेती करनेवालों के लिहाज से देखें तो जापान में लगभग 15% लोग खेती में लगे हैं और अमेरिका में 2%. जबकि भारत में ये आंकड़ा 70% तक पहुंच जाता है. जमीन और आबादी का अनुपात भारत में भयावह है. फिर भारत में किसानों के कई वर्ग हैं- बड़े किसान, मध्यम किसान, छोटे किसान, खेतिहर मजदूर. ज्यादा संख्या छोटे किसानों और खेतिहर मजदूरों की है. महिलाएं तो गिनी भी नहीं जातीं. जबकि छोटे किसानों और खेतिहर मजदूरों में ज्यादातर संख्या महिलाओं की ही देखने को मिलती है.

नेताओं के बयानों से स्पष्ट होता है कि खेती की मूल समस्या के बजाए इसका इस्तेमाल राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के लिए किया जा रहा है. 10 दिसंबर को कर्नाटक में विपक्षी पार्टी बीजेपी सत्ताधारी जेडी-एस और कांग्रेस की मिली जुली कुमारस्वामी सरकार के खिलाफ एक लाख किसानों का मार्च कराने जा रही है. ये कर्जा माफी को लेकर किया जा रहा मार्च है.

दिल्ली और कर्नाटक में हो रहे किसानों के मार्च और नेताओं के बयानों का विरोधाभास सब कुछ साफ कर देता है. जो राजनीतिक पार्टी दिल्ली में सारी स्थितियों को सही बता रही है, वही पार्टी कर्नाटक में दिल्ली में उठी मांगों के लिए धरना दे रही है. ...और जो दिल्ली के विरोध में शामिल है, उसके खिलाफ विरोध हो रहा है.

ऐसे में कहां हैं किसान नेता, जो एक झटके में दिल्ली के बोट क्लब को पंचायत बना देते थे?

दिल्ली के मार्च में पूरे देश के किसान आए. पर कर्नाटक में बीजेपी किसानों का आंदोलन करा रही है. इसका मतलब है कि ऐसे किसान नेताओं की कमी है, जो किसानों को मुद्दों पर लामबंद कर सकें. महाराष्ट्र के बीजेपी सांसद राजू शेट्टी और यूपी के किसान नेता वी एम सिंह किसानमोर्चा में शामिल थे. राजू शेट्टी ने लेजेंडरी किसान नेता शरद जोशी के साथ भी काम किया है. वहीं वी एम सिंह मेनका गांधी के रिश्तेदार हैं और कांग्रेस, जनता दल, समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस सबमें रह चुके हैं. तीन साल पहले इन्होंने किसान पार्टी बनाई थी. पीलीभीत के तरफ का क्षेत्र इनका चुनावी रणक्षेत्र है.

किसान मोर्चा में पत्रकार पी साईनाथ और स्वराज इंडिया के योगेंद्र यादव भी मौजूद थे. पर ये दोनों ही लोग राजनीतिक नहीं हैं. साथ ही इन्हें किसानों का नेता कहना उचित नहीं होगा. योगेंद्र यादव ने तो पिछले तीन साल में देश के कई संकटग्रस्त खेतिहर इलाकों के दौरे किए हैं और खेती की समस्या के खिलाफ एक जंग छेड़ रखी है. पर इसको चुनावी राजनीति से जोड़ना उचित नहीं रहेगा क्योंकि ये समस्या सुलझाने के लिए है.

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पर सवाल ये है कि संसद में किसानों की पहुंच कैसे बनाई जाए? साईनाथ ने ये मांग तो की थी कि 21 दिनों का एक जॉइंट पार्लियामेंट्री सेशन चले जिसमें किसान भी संसद में बोलें. पर केंद्र सरकार ने इसके बारे में बोला ही नहीं. इस बारे में यूपी से आए शिवनाथ सिंह कहते हैं कि संसद में बोलने के लिए महेंद्र सिंह टिकैत जैसा नेता चाहिए.

फेसबुक से साभार

फेसबुक से साभार

महेंद्र सिंह टिकैत ने जाट नेता के तौर पर मुजफ्फरपुर के पास शामली से अपना राजनीतिक करियर शुरू किया था. 1989 में बिजली की बढ़ी कीमतों के खिलाफ उन्होंने लगभग पांच लाख किसानों के साथ दिल्ली के बोट क्लब में घेरा डाल दिया था. टिकैत ने किसानों के आंदोलन को जबरदस्त राजनीतिक रूप दिया. उसी मंच पर शरद जोशी भी थे जो प्रोफेशनल इकॉनमिस्ट थे, यूएन के साथ अपनी शानदार नौकरी विदेश से छोड़कर भारत आए थे. खेती की और फिर खेतिहरों के साथ मिलकर उनके हक की लड़ाई करने लग गए. बोट क्लब में किसानों की जीत हुई. तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने इनकी बातें मानीं. पर इसी जीत के साथ किसानों का आंदोलन कमजोर भी पड़ गया.

प्रतीकात्मक रूप से देखा जाए तो एक घटना हुई. छह फुट के महेंद्र सिंह टिकैत ने पतले-दुबले शरद जोशी को मंच से उठाकर फेंक दिया था. पता नहीं चला कि ऐसा क्यों हुआ था. शरद जोशी एकमात्र किसान नेता थे जिनको इंटरनेशनल मार्केट से लेकर जमीनी खेती के बारे में सब कुछ पता था और यहीं से किसान आंदोलन का पतन हुआ. 1990 से लेकर 2005 के बीच में गेहूं और धान पर न्यूनतम समर्थन मूल्य लगभग दोगुना बढ़ा और राजनीतिक शक्तियों की नजरों में किसान नेताओं की अहमियत खत्म हो गई. इस बात का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि पिछले छह सालों में ही महेंद्र सिंह टिकैत और शरद जोशी की मृत्यु हुई है पर उनका करियर कब का खत्म हो चुका था. उनके अनुयायी बीजेपी और कांग्रेस जॉइन कर चुके थे.

यहां तक कि खेती की समस्या पर मनमोहन सरकार ने स्वामीनाथन कमेटी बैठा दी, पर किसी को किसान नेताओं की जरूरत नहीं हुई. कमेटी की रिपोर्ट्स को किनारे रखकर कांग्रेस सरकार ने मनरेगा और फूड सिक्योरिटी बिल जैसी चीजें ला दीं. इसी दौर में ग्लोबल मार्केट का भी प्रभाव बढ़ा. पर कोई किसान नेता उभरकर सामने नहीं आया. ग्लोबल मार्केट के बढ़ने की वजह से ही सरकारी नीतियां भी प्रभावित हुईं और अभी भी हो रही हैं.

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एक रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ल्ड बैंक लगातार विकासशील देशों पर दबाव बना रहा है कि खेती में ज्यादा सब्सिडी ना दी जाए, जिससे खेतिहर खेती छोड़ेंगे और उद्योंगों के लिए मजदूर मिलेंगे. सरकारी नीतियां इसी तरफ अग्रसर हैं. पर इन सारी समस्याओं के बीच शरद जोशी और महेंद्र सिंह टिकैत भी उपेक्षित हो गए थे.

अब जब किसानों का दल दिल्ली से वापस लौट रहा है तो बस एक उम्मीद के साथ कि शायद कुछ हो जाए. एक नेता नहीं उभरा है इस मार्च के बाद. इतनी मात्रा में इकट्ठा होने के बावजूद केंद्र सरकार ने स्टेटमेंट भी नहीं दिया, ना ही किसी मंत्री ने इस भीड़ को संबोधित किया.

क्या खेती को एक इंडस्ट्री समझा जाए?

अगर खेती को इंडस्ट्री समझा जाए तो सीधा सा समीकरण होगा. जो लागत मूल्य कम रखेगा और उपभोक्ताओं को कम दाम में उपलब्ध कराएगा, वो मार्केट में बना रहेगा. बाकी को मार्केट अर्थात खेती छोड़नी पड़ेगी. भारत की 70% आबादी खेती में ही लगी हुई है. अगर खेती को उद्योग की तरह लिया जाएगा तो ज्यादातर आबादी बेकार हो जाएगी. ज्यादातर लोगों को खेती छोड़नी ही पड़ेगी. इन लोगों को रोजगार देने के लिए सरकार को कई उद्योग लगाने होंगे.

भारत सरकार का कौशल विकास मंत्रालय आया तो था इसी वादे के साथ कि कम पढ़े-लिखे या कम तकनीकी लोगों को ट्रेनिंग देकर रोजगार लायक बनाएंगे. पर रोजगार देने वाले ही अभी तक नहीं आए हैं. ऐसे में करोड़ों लोगों को खेती से विमुख कर कहां विस्थापित किया जाएगा? फूड प्रोसेसिंग इंडस्ट्री जरूर कुछ अपेक्षाएं जगाती है. पर सिर्फ इसके बूते कुछ नहीं हो पाएगा. फिर से बड़े किसानों को ही फायदा होगा. क्योंकि इंडस्ट्री अपने फायदे के हिसाब से काम करेगी. वो छोटे किसानों की मदद के लिए नहीं बनी है.

गौरतलब है कि 2007 के ग्लोबल मंदी में भारत खेती पर निर्भर रहने की वजह से ही बच पाया था. अगर भारतीय खेती भी इंटरनेशनल मार्केट से जुड़ी होती तो भारत को बहुत कुछ चुकाना पड़ सकता था.

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अगर इस संदर्भ में फिर से नेताओं के बयानों को पढ़ा जाए तो ये लोग खेती को इंडस्ट्री के तौर पर ही समझ रहे हैं, कि ये लगाया, वो लगाया फिर बात खत्म. पर ऐसा नहीं है. 70 के दशक में प्रोफेसर स्वामीनाथन की अगुवाई में ही ग्रीन रिवोल्यूशन हुआ. पर ये क्रांति पंजाब और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के धनी किसानों और गेहूं और धान की फसलों तक ही सीमित रह गई. यहां तक कि उर्वर जमीन और पानी से भरपूर बिहार और बंगाल में भी ये क्रांति नहीं हो पाई. बाकी जगहों के किसान और फसलें अनदेखी रह गईं. 30 साल बाद ग्रीन रिवोल्यूशन भी पुराना पड़ गया. उसी तरह स्वामीनाथन कमिटी की रिपोर्ट को भी 12 साल हो चुके हैं. मार्केट फोर्सेज के दबाव में ये रिपोर्ट भी कहीं पुरानी ना पड़ जाए.

इस सारे हंगामे के बीच क्या है महिला किसानों की स्थिति?

अगर रामलीला मैदान में हुए किसान मार्च को देखें तो मुख्य रूप से तेलंगाना की महिला किसानों का प्रदर्शन सामने आया. ज्यादातर औरतें ऐसी थीं जिनके किसान पति आत्महत्या कर चुके थे. इसके अलावा उत्तर प्रदेश, बिहार, केरल जैसे राज्यों से भी कुछ औरतें थीं. उत्तर प्रदेश के उन्नाव की सुशीला देवी तो अपनी जमीन के हक के बारे में बात कर रही थीं.

ध्यान देने की बात थी कि इनमें से कोई भी औरत ना तो खुद बड़ी किसान थी, ना ही किसी बडे़ किसान के घर से थीं. ये सारी औरतें कम जमीन वाली थीं. गांवों में खेती में लगी हुई औरतें कमजोर घरों की ही होती हैं. धनी घरों की औरतें खेतों में काम नहीं करतीं. फिर खेतों में काम करनेवाली औरतों का जमीन पर हक नहीं होता. वो बस काम करती हैं. इस हिसाब से देखें तो खेती में महिला किसान खेतिहर मजदूर से बढ़कर नहीं है.

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ये कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि महिला किसान को खेतिहर मजदूर ही समझा जाए. इस नाते सरकार को किसानों का वर्गीकरण कराना ही पड़ेगा.

स्वामीनाथन कमेटी ने जरूर अपनी रिपोर्ट में महिला किसानों को किसान क्रेडिट कार्ड देने का प्रावधान रखा था. पर ना तो सरकार ने, ना ही किसी किसान आंदोलन ने इस बात को ऊपर रखा. महिला किसान बंधुआ मजदूरों की तरह खेतों में काम करती हैं, साथ ही बंधुआ प्रदर्शनकारियों की तरह मार्च में आती हैं.

अगर पुरुष किसानों की बात करें तो हरियाणा के किसानों ने औरतों के मार्च में आने पर नाक-भौं सिकोड़ ली. इसकी वजह भी है. महिला किसानों को दिल्ली आने के बाद वॉशरूम, नहाने, खाने इत्यादि की दिक्कत हो जाती है. यूपी की ही निर्मला ने बताया कि लौटने के बाद महीना लग जाएगा पैरों का दर्द खत्म होने में.

अगर किसान नेताओं की बात करें तो महेंद्र सिंह टिकैत ने ही यूपी की मुख्यमंत्री मायावती को अपशब्द कहे थे और 2008 में मायावती ने 6,000 पुलिसवालों को भेजा था टिकैत को गिरफ्तार करने के लिए. टिकैत ने बाद में माफी मांगी. उसी तरह राज्यसभा में चुनकर गए शरद जोशी एकमात्र राज्यसभा सांसद थे अपने वक्त में, जिन्होंने महिलाओं के लिए 33% आरक्षण का विरोध किया था. ऐसे में महिला किसान की स्थिति खेतिहर मजदूर से भी नीचे हो जाती है.

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