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बुंदेलखड : नरैनी में 74 विधवाओं का दर्द नहीं बना चुनावी मुद्दा

किसी भी पार्टी को नहीं नजर आईं इन विधवाओं की मुश्किलें

IANS Updated On: Feb 09, 2017 05:33 PM IST

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बुंदेलखड : नरैनी में 74 विधवाओं का दर्द नहीं बना चुनावी मुद्दा

उत्तर प्रदेश के हिस्से वाले बुंदेलखंड में अनुसूचित जाति के लिए सुरक्षित बांदा जिले की नरैनी विधानसभा सीट में गुढ़ा ऐसा गांव है, जहां पिछले 10 वर्षो में कुपोषण, भुखमरी और आर्थिक तंगी से कथित तौर पर 74 लोगों की मौत हो चुकी है.

मृतकों की विधवाएं भी मुफलिसी की जिंदगी गुजार रही हैं, लेकिन इन्हें न तो कोई सरकारी मदद मिली और न ही उनके 'दर्द' को किसी राजनीतिक दल ने चुनावी मुद्दा ही बनाया. यहां के निवर्तमान विधायक और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष गयाचरण दिनकर इस बार भी यहां से बीएसपी के उम्मीदवार हैं.

मध्य प्रदेश से सटा नरैनी विधानसभा क्षेत्र

bundelkhand

प्रतीकात्मक तस्वीर

बांदा जिले का नरैनी विधानसभा क्षेत्र मध्य प्रदेश की सरहद से सटा हुआ है. इसी क्षेत्र में गुढ़ा एक ऐसा गांव है, जहां पिछले 10 सालों में कुपोषण, भुखमरी और आर्थिक तंगी के चलते गंभीर बीमारियों से कथित तौर पर 76 लोगों की मौतें हो चुकी हैं. इनकी विधवाओं को अब तक कोई सरकारी मदद नसीब नहीं हुई और अब ये परिवार दो वक्त की रोटी को तरस रहे हैं.

इस सीट के निवर्तमान विधायक गयाचरण दिनकर विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष हैं और इस बार भी यहां से बीएसपी के उम्मीदवार हैं. हालांकि सपा-कांग्रेस गठबंधन और भाजपा सहित कुल 13 उम्मीदवार चुनाव मैदान में हैं, लेकिन किसी ने भी इन विधवाओं के 'दर्द' को अपने चुनावी मुद्दों में शामिल करने की जरूरत नहीं समझी.

छह हजार की आबादी वाले गुढ़ा गांव में कल्ली, श्यामा, चंपा, शकुंतला, रनिया, कलावती, शिवरानी, संपत सुखरानी, विद्या, जगरानी, चुन्नी, शांति, लीला, गोरीबाई जैसी 27 से 55 साल उम्र के बीच की 76 विधवाएं हैं, जिनके पति कथित तौर पर कुपोषण, भुखमरी और आर्थिक तंगी के कारण इलाज के अभाव में दम तोड़ चुके हैं.

27 साल की महिला शांति देवी ने कहा कि इलाज के अभाव में 2012 में उसके पति महेश की मौत हो चुकी है, डेढ़ बीघे खेती की जमीन के सहारे वह अपने बाल-बच्चों को पाल रही है.

शांति ने बताया कि पति की मौत के बाद उसे सरकारी मदद के नाम पर फूटी कौड़ी नहीं मिली. इसी गांव की दूसरी 40 साल की विधवा लीला ने कहा कि 2008 में लंबी बीमारी के चलते उसके पति की मौत हो गई थी, उसके नाम तीन बीघे कृषि भूमि है, जो उस समय पांच हजार रुपए में गिरवी थी और पति के ऊपर तीन लाख रुपए से अधिक सरकारी कर्ज था.

वह बताती है कि पति की मौत के बाद वह बनी-मजूरी के सहारे दो वक्त की रोटी का इंतजाम करती है.

रामकली का दर्द अन्य महिलाओं से जुदा है, वह बताती है कि पति गांव के साहुकारों का हजारों रुपए कर्ज लिए थे, बीमारी से पति रामस्वरूप की 2010 में हुई मौत के बाद दबंगों ने कर्ज की बदले खेती की जमीन पर कब्जा कर लिया. अब उसे गांव में काम भी नहीं मिल रहा है, वह कई रातें भूख से गुजार चुकी है.

इसी गांव की महिला गोरीबाई बताती है कि आर्थिक तंगी से इलाज के अभाव में उसके पति परदेशी की 2007 में टीबी से मौत हो गई थी, अब तक उसे पेंशन तक नहीं नसीब हुई.

इन महिलाओं की जुबानी तो सिर्फ बानगी है, इस गांव की ऐसी 76 विधवाएं हैं, जो पति की मौत के बाद मुफलिसी की जिंदगी गुजार रही हैं. इनके दर्द को छूने की कोशिश न तो सरकारी मशीनरी ने की और न ही चुनाव के मैदान में इस समय उतरे उम्मीदवार ही इनकी खोज ले रहे हैं.

क्या कहते हैं वर्तमान विधायक

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इस बारे में बीएसपी प्रत्याशी गयाचरण दिनकर का कहना है कि उनकी पांच साल की विधायकी में इन महिलाओं के बारे में किसी ने नहीं बताया, अगर जानकारी होती तो जरूर मदद की जाती. वह कहते हैं कि चुनाव प्रचार के दौरान इन महिलाओं से मिलकर उनके हाल जानने की कोशिश करेंगे.

बीजपी से दूसरी बार चुनाव मैदान में उतरे राजकरण कबीर का कहना है, 'पिछले पांच साल किसी भी पद पर नहीं था, महज बीजेपी का एक सिपाही था. अधिकारियों से इनकी मदद की गुजारिश की थी, लेकिन नहीं सुनी गई.'

पिछला चुनाव एसपी से लड़ चुके और अब गठबंधन से कांग्रेस उम्मीदवार भरतलाल दिवाकर का कहना है, 'कुछ महिलाओं को पेंशन आदि की सुविधाएं दिलाई गई हैं, बाकी आवेदन लेकर उनके पास आईं ही नहीं.'

उम्मीदवारों के बोल कुछ भी हों, लेकिन तल्ख सच्चाई यह है कि गुढ़ा गांव की इन महिलाओं के 'दर्द' को राजनीतिक दलों के उम्मीदवार अपने चुनावी मुद्दों में शामिल करने से कतरा रहे हैं. इस गांव के अलावा और कई गांव ऐसे हैं, जहां महिलाएं, बुजुर्ग और बच्चे कुपोषण और मुफलिसी की जिंदगी गुजार रहे हैं. लेकिन 'नेताजी' की 'दिव्यदृष्टि' उन तक नहीं पहुंच पा रही.

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