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कश्मीर सीरीज पार्ट-2: कश्मीर की राजनीति में नए नेता का उदय, सज्जाद लोन से पीडीपी और नेशनल कॉफ्रेंस दोनों ही डरे हुए हैं

एक तरफ पीडीपी पार्टी है, जिसमें से हर रोज़ कोई न कोई पलायन कर रहा है. दूसरी तरफ लोन की पार्टी है, जहां बीजेपी के साथ जाने की घोषणा करने के बाद भी विधानसभा चुनावों से पहले उनकी पार्टी में शामिल होने वाले लोगों की लंबी लिस्ट है

Updated On: Dec 28, 2018 10:06 PM IST

Sameer Yasir

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कश्मीर सीरीज पार्ट-2: कश्मीर की राजनीति में नए नेता का उदय, सज्जाद लोन से पीडीपी और नेशनल कॉफ्रेंस दोनों ही डरे हुए हैं

(एडिटर्स नोट जैसे-जैसे ये साल खत़्म होने को है, वैसे-वैसे जम्मू-कश्मीर राज्य के जीवन का भी एक और उपद्रवी और अशांत साल भी खत्म होने की कगार पर है. इस मौके पर फ़र्स्टपोस्ट वहां से रिपोर्ट की गई रिपोर्ताज की श्रृंख़ला छापने जा रहा है, जिसमें ये बताने की कोशिश की जाएगी कि पिछले एक साल में ये राज्य कितना और कैसे-कैसे बदला है. साल 2018 में कश्मीर की धरती पर किस तरह के बदलाव आए हैं. इस सीरिज़ में ख़ासतौर पर नए दौर में पनपे आतंकवाद और घाटी के बदलते राजनीतिक परिदृश्य पर ख़ास ध्यान दिया जाएगा. इसके अलावा जम्मू कश्मीर के तीनों इलाकों के बीच हर दिन बढ़ती खाई भी इस रिपोर्ताज के केंद्र में होगी.)  

कश्मीर घाटी में सशस्त्र विद्रोह की शुरूआत 1990 के दशक के शुरुआती सालों में हो गया था, लेकिन वहां की मुख़्यधारा की राजनीति में आज जिस तरह की बेचैनी और अनिश्चित्ता का माहौल बना हुआ है, वैसा पहले कभी नहीं हुआ.

इस साल यहां के राजनीतिक मैदान में एक नए खिलाड़ी का पदार्पण हुआ है, जिसने साल 2014 के चुनावों में सिर्फ़ दो सीटों पर ही जीत हासिल की थी. उस खिलाड़ी का नाम है सज्जाद गनी लोन.

Jammu Kashmir

प्रतिकात्मक तस्वीर

सज्जाद गनी लोन के राजनीतिक पैंतरों ने, घाटी के दो प्रमुख राजनीतिक पार्टियों नेशनल कॉफ्रेंस और पीडीपी यानी पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी के भीतर एक डर पैदा कर दिया है. इतना कि लोन की योजनाओं पर पानी फेरने के लिए दोनों विरोधी दल कुछ समय के लिए ही सही – एक दूसरे के साथ भी हो लिए थे.

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कुछ साल पहले तक, यहां कोई भी सज्जाद लोन को गंभीरता से लेने को तैयार नहीं था, लेकिन आज के हालात काफी बदले हुए हैं. आज सज्जाद लोन के दांव-पेंच ने एक बार फिर से उस समय की यादें ताज़ा कर दी हैं, जब नई दिल्ली ने राज्य में नेश्नल कॉफ्रेंस के भीतर दल-बदल की आग लगा दी थी. उस समय नेशनल कॉफ्रेंस प्रदेश की एकमात्र प्रांतीय पार्टी थी और कांग्रेस के इस कदम से पूरे कश्मीर के वोटों का बंटवारा हो गया था.

कश्मीर में दिसंबर का महीना चिलाई कलान का महीना होता है:

कश्मीर में दिसंबर का महीना अपने साथ सर्द रातें और दिन लेकर आता है, क्योंकि साल के इस अंतिम हफ़्ते में ही अगले 40 दिनों तक चलने वाले चिलाई कलान की शुरूआत होती है. चिलाई कलान कश्मीर घाटी में रहने वालों के लिए सबसे कठिन समय होता है. लेकिन, इसके विपरीत इस साल यहां दिसंबर के महीने में राजनीतिक गर्मी परवान पर है, जो घाटी में आने वाले किसी राजनैतिक उठा-पटक की ओर इशारा कर रहा है.

शुक्रवार को, लंबे समय से पीडीपी से नाराज़ चल रहे, प्रभावशाली शिया नेता आबिद अंसारी ने सज्जाद लोन के नेतृत्व वाली पीपल्स कॉफ्रेंस का हाथ थाम लिया. अंसारी का लोन के साथ जाना इकलौती घटना नहीं है. इससे पहले – पूर्व विधायक जंस्कार, सय्यद मोहम्मद बाक़िर रिज़वी, पीडीपी के अतिरिक्त प्रवक्ता अभिजीत जसरोटिया, वकील अबरार अहमद, पूंछ के इरफ़ान इंकिलाबी और जम्मू के आशीष पंडिता ने भी रविवार को पीपल्स कॉफ्रेंस की सदस्यता कुबूल कर ली थी.

इसके साथ ही सज्जाद लोन की पार्टी में शामिल होने वाले लोगों की संख्या दिन प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है.

51 साल के सज्जाद लोन आत्मविश्वास से लबरेज़ हैं. वे अपनी सामान्य, समझदारी से भरी आवाज़ और लहज़े में बातें करते दिखते हैं. वे अपनी बातों में अक्सर कश्मीर की सभी समस्याओं के लिए पूर्व के सभी शासकों और नेताओं को ज़िम्मेदार ठहराते हैं.

पीपल्स कॉन्फ्रेंस के लीडर सज्जाद लोन

पीपल्स कॉन्फ्रेंस के लीडर सज्जाद लोन

वे कहते हैं, 'हम किसी भी पार्टी के साथ चुनाव पूर्व गठबंधन में शामिल होने नहीं जा रहे हैं. फिर चाहे वो कोई क्षेत्रीय पार्टी हो या कोई राष्ट्रीय दल. हम राज्य के सभी 87 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े करेंगे और चुनाव लड़ेंगे. हमारे साथ हर दिन नए लोग जुड़ते जा रहे हैं, बदलाव की ओर अग्रसर हमारा कारवां लगातार बढ़ता जा रहा है, और हम इसमें हर किसी को शामिल कर रहे हैं, उनको भी जो राजनीति में नए हैं और उनको भी जिनके पास अनुभव है.' उत्तरी कश्मीर के हंदवाड़ा से विधायक रह चुके लोन ने ये बातें श्रीनगर में हुए एक प्रेस कॉफ्रेंस के दौरान कही.

हुर्रियत के इस पूर्व नेता इस बात को लेकर पूरी तरह से स्पष्ट हैं कि वो चुनावी राजनीति का इस्तेमाल राज्य को आर्थिक तौर पर मज़बूत करने के लिए करना चाहते हैं. वे नहीं चाहते कि उनका राज्य दिल्ली से मिलने वाली आर्थिक मदद पर निर्भर रहे. वे नहीं चाहते कि राज्य के छोटे-छोटे बच्चे और युवा पत्थरबाज़ी में शामिल हों और सिर्फ़ उनके जैसे कुछ चुनिंदा लोगों के बच्चों को शिक्षा मिले.

लोन चाहते हैं कि – धारा 370 को न सिर्फ़ बचाकर रखा जाए बल्कि उसकी खोयी प्रतिष्ठा को भी वापिस लाने की ज़रूरत है. वे कहते हैं, 'अचीवेबल नेशनहुड' यानी वो राष्ट्रीयता जिसे हासिल किया जा सके, (उनकी पार्टी का कश्मीर विज़न डॉक्युमेंट) उन्हें राजनीतिक तौर पर आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करता है.

लोन ने अक्सर ये कहा है कि उन्हें आज़ादी की मांग करने वाले कैंप में कभी भी स्वीकार नहीं किया गया है, इसकी वजह उनकी जुदा सोच थी जो अलगाववादी नेताओं की सोच से बिल्कुल भी मेल नहीं खाती थी.

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हालांकि, ये भी तय है कि लोन की राजनीतिक कुश्ती का असर ज़्यादातर उत्तरी कश्मीर के इलाके में ही होगा. कम से कम अगले कुछ समय के लिए. लेकिन, वे जब-जब किसी प्रेस कॉफ्रेंस को संबोधित करते हैं, तब-तब अन्य राजनीतिक दलों में बेचैनी बढ़ जाती है.

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सज्जाद लोन एक लंबी चौड़ी कद-काठी के आकर्षक व्यक्तित्व के इंसान हैं, जिन्हें कश्मीरी आवाम काफी पसंद करती है. वो कश्मीरी आवाम जो प्रदेश की दोनों क्षेत्रीय पार्टियों से तंग आ चुकी है, वो पार्टी जिसने लगातार सालों साल उनके वोटों का इस्तेमाल अपने निजी फायदों के लिये किया है.

एक राजनीतिक विशलेषक के मुताबिक, 'ऐसा नहीं है कि लोन उन नेताओं से अलग साबित होंगे, लेकिन इस समय कश्मीर के राजनैतिक परिदृश्य में उनका होना ही किसी ताज़े हवा के झोंके के बराबर है. ये कश्मीर की राजनीति में एक ताज़गी लाता है.'

सज्जाद लोन जम्मू कश्मीर पीपल्स कॉफ्रेंस पार्टी के अध्यक्ष हैं. इस पार्टी का गठन उनके पिता मरहूम अब्दुल गनी लोन ने किया था. लोन ने साल 2009 के आम चुनावों इसी पार्टी की टिकट पर बारामुला से चुनाव लड़ा था, लेकिन तब उन्हें नेश्नल कॉफ्रेंस के प्रत्याशी ने हरा दिया था.

2014 में उन्होंने हंदवाड़ा से असेंबली चुनाव लड़ने का फैसला किया, जहां उन्हें जीत मिली. बाद में वे बीजेपी के साथ हो लिए, जिसके लिए सोशल मीडिया पर उनकी कड़ी आलोचना भी की गई, लेकिन इसके बावजूद उनकी पार्टी में शामिल होने वाले लोगों की संख्या पर कोई प्रतिकूल असर नहीं पड़ा और लोग उनके साथ हो गए.

एक तरफ पीडीपी पार्टी है, जिसमें से हर रोज़ कोई न कोई पलायन कर रहा है, दूसरी तरफ लोन की पार्टी है, जहां उन्होंने सार्वजनिक तौर पर बीजेपी के साथ जाने की घोषणा कर दी है, लेकिन इसके बावजूद सज्जाद लोन के पास ऐसे लोगों की लंबी फेहिरिस्त है, जो अगले विधानसभा चुनावों से पहले उनकी पार्टी में शामिल होने के तैयार खड़े हैं. ये लोग फिलहाल वेटिंग लिस्ट में हैं.

राज्य में पीडीपी और बीजेपी के बीच गठबंधन और मिली-जुली सरकार बनने के बाद एक लंबी शांति छायी थी, लोन खुद इस सरकार में मंत्री थे. लेकिन अब उन्होंने अपना मुंह खोलना शुरू कर दिया है.

उनका ट्विटर अकाउंट जो उनके मंत्री बनने के बाद से लगातार बंद पड़ा था – वो अब काफी एक्टिव हो गया है, जहां से लोन अपने हर विरोधी को बिना किसी दयाभाव के लगातार आड़े हाथों ले रहे हैं. वे हर किसी पर हमला कर रहे हैं. बीजेपी की रणनीति के हिसाब से देखें तो वे राज्य की दोनों क्षेत्रीय पार्टियों के बदले में एक बेजोड़ विकल्प बनकर सामने आ रहें हैं.

लेकिन, इस सब के बावजूद लोन काफी हद तक अकेले भी हैं. अपनी लाख कोशिशों के बावजूद वे नेशनल कॉफ्रेंस और पीडीपी को तोड़ने में नाकाम रहें हैं. अपनी इन्हीं दावों के दम पर उन्होंने पिछले महीने राज्य में सरकार बनाने का दावा पेश कर दिया था. उन्होंने राज्यपाल सत्यपाल मलिक को लिखी गई चिट्टी में दावा किया था कि उन्हें 18 विधायकों का साथ हासिल है, लेकिन अब जब कि विधानसभा भंग कर दिया गया है तब वे विधायक कहीं भी उनके साथ नहीं दिखते हैं.

लेकिन, बीजेपी और बड़े भाई नरेंद्र मोदी के समर्थन से, ऐसा लगता है कि उनके सितारे इस वक्त़ बुलंदी पर हैं, क्योंकि इन दिनों कश्मीर की सियासी हलचल में जिस व्यक्ति के घर का पता सबसे ज़्यादा पूछा जा रहा है – वो व्यक्ति सज्जाद लोन ही हैं.

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