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गांधी जयंती पर सेवाग्राम पहुंचे राहुल गांधी की इस बड़ी चूक का क्या होगा असर?

गांधी जयंती के दिन कांग्रेस वर्किंग कमेटी ने आजादी के बाद पहली बार सेवाग्राम में मीटिंग तो की लेकिन कोई बड़ा संदेश नहीं दे पाई

Updated On: Oct 07, 2018 12:41 PM IST

FP Staff

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गांधी जयंती पर सेवाग्राम पहुंचे राहुल गांधी की इस बड़ी चूक का क्या होगा असर?

महाराष्ट्र के सेवाग्राम में गांधी जयंती के मौके पर कांग्रेस ने 2019 के रण के लिए सांकेतिक बिगुल फूंक दिया. राहुल गांधी के नेतृत्व में 'बापू' के रास्ते पर चलने के लिए खुद को दोबारा प्रतिबद्ध करते हुए कांग्रेस ने अपने और बीजेपी-आरएसएस की विचारधारा के अंतर को दिखाने की कोशिश की. कांग्रेस ने बंटे भारत और समावेशी यानि सबको बराबरी का हक देने वाले भारत के बीच के अंतर को दिखाने की कोशिश की.

पार्टी ने 'आजादी की नई लड़ाई' पर बल देने की कोशिश. इसके तहत उसने बंटवारे, पूर्वाग्रह और नफरत को बढ़ावा देने वाली ताकतों से आजादी की लड़ाई की बात कही है. आजादी के बाद पहली बार ऐसा हुआ कि कांग्रेस वर्किंग कमिटी (CWC) की बैठक सेवाग्राम में हुई. यह बैठक करीब दो घंटे तक चली, जिसे कांग्रेस ने ऐतिहासिक करार दिया.

क्या था कांग्रेस की इस चूक का नतीजा?

इस सांकेतिक बैठक के जो भी मायने हों, लेकिन ये साफ है कि गांधी जयंती पर सेवाग्राम पहुंचकर भी कांग्रेस ने एक ऐतिहासिक मौका गंवा दिया. जनता से दोबारा जुड़ने, देश के लिए नए विजन, पिछली गलतियों से सीख लेते हुए भविष्य के लिए मजबूत कार्यक्रम तैयार करने और संभावित राजनीतिक सहयोगियों के साथ सामंजस्य बिठाने की दिशा में कोई रोडमैप तैयार करने में कांग्रेस असफल हुई. नतीजा यह हुआ कि गांधी जयंती के अगले ही दिन बीएमपी सुप्रीमो मायावती ने कहा कि पांच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव में वह कांग्रेस के साथ गठबंधन नहीं करेंगी.

बता दें कि चुनाव आयोग ने शनिवार को मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, तेलंगाना और मिजोरम में विधानसभा चुनाव की तारीखों का ऐलान किया है.

लिहाजा कहना चाहिए कि कांग्रेस गांधी की तपोभूमि में जाने के बावजूद अपने पुराने वैभव के टुकड़ों को समेटने से चूक गई.

सीडब्लूसी ने दो प्रस्ताव पास किए. पहला-महात्मा की विरासत का आह्वान और दूसरा-दिल्ली में किसान यात्रा के दौरान लाठीचार्ज के बाद परेशान किसानों के साथ खड़े होना. इसके चलते कांग्रेस की यह बैठक एक इवेंट तो बन गई लेकिन कोई ठोस संदेश देने में नाकाम रही. याद रहे कि पांच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले कांग्रेस की इस बैठक के फलीभूत होने की संभावना कम है. 2019 में मजबूत दावेदारी के लिए इन राज्यों में बेहतर प्रदर्शन करना कांग्रेस के लिए बहुत जरूरी है.

पार्टी के प्रवक्ता ने कहा कि किसानों से किए वादों, बेरोजगारी और संभावित गठबंधन को लेकर विचार करने के लिए दो अलग-अलग समितियां बनाई गई हैं. दोनों ही मुद्दे सीडब्लूसी के दो रिसॉल्यूशंस के तहत उठाए गए हैं. अब हमें देखना होगा कि किसानों की समस्या और बेरोजगारी के मुद्दों से कांग्रेस कैसे निपटती है.

क्या है कांग्रेस के साथ समस्या? राहुल गांधी भले ही जनता से जुड़ने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन उनकी संगठनात्मक व्यवस्था में या तो लोग ही नहीं हैं या फिर जो हैं वे उनके दिल्ली दरबार के ही लोग हैं. पिछले तीन दशकों में कांग्रेस ने किसी ऐसे मास मूवमेंट का नेतृत्व नहीं किया, जिससे समाज में सकारात्मक बदलाव आया हो.

सीडब्लूसी की बैठक के बाद पार्टी के प्रवक्ता ने कहा कि पार्टी गांधी के अहिंसा के सिद्धांत पर चलते हुए आंदोलन करने की योजना बना रही है. कांग्रेस ने एक पदयात्रा निकाली थी, जिसमें राहुल गांधी शामिल हुए, इस पदयात्रा के बाद उन्होंने जनसभा को संबोधित किया. इस सभा में राहुल ने जनता से कहा कि नरेंद्र मोदी सरकार हर मोर्चे पर फेल हुई है इसलिए अब जनता को 2019 में कांग्रेस को दोबारा मौका देना चाहिए.

कांग्रेस की मंशा साफ थी. लेकिन पार्टी की संस्थागत संरचना, विजन और न्यू इंडिया के लिए योजनाएं और जनता से दोबारा जुड़ने के लिए पार्टी के प्रयासों से जुड़े सवालों के जवाब सीडब्लूसी की बैठक में नहीं मिल सके.

gandhi गांधी के रास्ते पर चलने की बात कहना और असल में उसका पालन करना-दो अलग-अलग बातें हैं. सालों बाद ऐसा हुआ कि कांग्रेस के नेता सेवाग्राम आश्रम पहुंचे थे, ये वही जगह है जहां से 1942 में गांधीजी की कांग्रेस ने 'भारत छोड़ो आंदोलन' की शुरुआत की थी.

शुक्रवार को हिंदुस्तान टाइम्स लीडरशिप समिट में कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा कि यदि पार्टी सत्ता में लौटती है तो उनकी प्राथमिकताएं क्या-क्या होंगी. उनकी तीन बड़ी प्राथमिकताएं होंगी- छोटे-मझोले उद्यमों को मजबूती प्रदान करना, किसानों को यह अहसास दिलाना कि वे कितने महत्वपूर्ण हैं और कम खर्च में शिक्षा-स्वास्थ्य के बेहतरीन इंतजाम.

जब यदि इतिहास के पन्नों को थोड़ा पीछे पलटें तो पाएंगे कि 1948 में 11 से 15 मार्च के बीच महादेव स्मारक भवन में महात्मा गांधी के विस्तारित परिवार (कांग्रेस संगठन) के 150 से ज्यादा सदस्य पांच दिनों तक बंद रहे थे. इस सीडब्लूसी बैठक में एक ही सवाल पर मंथन चल रहा था- बापू के बाद क्या?

गांधीजी के करीबी महादेव भाई देसाई की याद में बना ये स्मारक 1942 से 44 के बीच गांधी की बहुत सारी यादों और विरासत को समेटे हुए है. गांधी को 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के चलते जेल भेज दिया गया था. 1944 में जेल से बाहर आने के बाद गांधी ने पहला संबोधन यहीं से दिया था.

मार्च 1948 की बैठक पर किताब भी लिखी गई, जिसका शीर्षक है- ' Gandhi Is Gone. Who Will Guide Us? '

इस बैठक में जवाहरलाल नेहरू, आचार्य विनोबा भावे (इन दोनों को गांधी क्रमशः अपना पहला और दूसरा सत्याग्रही कहते थे), जेसी कुमारप्पा, ठाकर बप्पा, कृपलानी, जयप्रकाश नारायण, मौलाना अब्दुल कलाम आजाद और राजेंद्र प्रसाद शामिल हुए थे.

gandhi (1) गांधी की हत्या के बाद पूरे देश में शोक की लहर थी. उनके करीबी सहयोगी, अनुयायी और समर्थक खुद को अंधेरे में घिरा हुआ महसूस कर रहे थे. यह बैठक पहले फरवरी 1948 में होने वाली थे. गांधी इस बैठक में कांग्रेस का विघटन कर एक बड़ी संस्था (जिसका नाम उन्होंने 'लोक सेवक संघ' सोचा था) के गठन पर चर्चा करने वाले थे.

इस बैठक में शामिल होने वाले ज्यादातर लोगों का सवाल था, क्या सत्य और अहिंसा के रास्ते पर चलकर ऐसे समाज का निर्माण किया जा सकता है जो न्यायपूर्ण और सभी को बराबरी का हक देने वाला हो. सवाल ये भी था कि ऐसे समाज के निर्माण के लिए कांग्रेस और कांग्रेस सरकार को क्या कदम उठाने होंगे.

विनोबा भावे गांधी को संस्थागत रूप देने के खिलाफ थे. जेसी कुमारप्पा ने एक ऐसे संस्था के निर्माण पर जोर दिया, जो गांधी की विरासत को आगे लेकर जाए. वहीं प्यारेलाल जैसे अन्य नेता गांधी की आखिरी इच्छा को लेकर दुविधा में थे. गांधी की इच्छा थी कि कांग्रेस का विघटन कर लोक सेवा संघ का निर्माण किया जाए. इस सबके बीच सर्व सेवा संघ का निर्माण हुआ, जो एक गैर-राजनीतिक संगठन था जाति-धर्म के भेदभावों से परे समाज की बेहतरी के काम में जुट गया.

नेहरू ने कांग्रेस के विघटन का विरोध किया था. उन्होंने सरकार की समस्याओं, उसकी सीमाओं पर बात करते हुए कहा कि एक ऐसी संस्था की जरूरत है, जो गांधी के विचारों को आगे लेकर जाए, क्योंकि सरकार अकेले हर समस्या का समाधान नहीं कर सकती है. उन्होंने कहा कि कांग्रेस के राजनीतिक महत्व को देखते हुए उसे वैसे ही बनाए रखना चाहिए.

सीडब्लूसी ने इस बैठक में सर्व सेवा संघ से दोबारा जुड़ने का मौका गंवा दिया. भले ही कांग्रेस नेता इससे अवगत न हो पर सर्व सेवा संघ की वजह से ही कांग्रेस वर्किंग कमिटी की बैठक वर्धा में हो पाई. सर्व सेवा संघ ने बैठक के लिए महादेव स्मारक भवन देने की हामी भरी थी. इसके लिए सीडब्लूसी को शुक्रगुजार होना चाहिए. कुछ दिन पहले आश्रम ट्रस्ट के अधिकारी ने सेवाग्राम परिसर में राजनीतिक बैठक की अनुमति देने से इनकार कर दिया था. उन्होंने कहा था कि प्रार्थना के लिए उनका स्वागत है पर राजनीतिक बैठक की अनुमति नहीं दी जाएगी. कांग्रेस की बैठक से कई गांधीवादी अब भी नाराज हैं.

बापू के शांत सेवाग्राम में मंगलवार को एक घंटे तक जो माहौल था, उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. आम लोगों को सुबह 11 बजे ही आश्रम परिसर से बाहर निकाल दिया गया. दूसरी तरफ से कांग्रेस पार्टी के बड़े बड़े नेता वहां पहुंच रहे थे.

एक गायक ने भजन गाना शुरू किया. करीब एक घंटे तक तस्वीरें लेने का क्रम जारी रहा. पहली पंक्ति में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी बैठे थे, उनके साथ पूर्व अध्यक्ष और यूपीए चेयरपर्सन सोनिया गांधी और पूर्व पीएम मनमोहन सिंह बैठे थे. उन्होंने चुपचाप प्रार्थना की. फिर पास में ही नई तालीम समिति की तरफ से जलाए जा रहे स्कूल में पहुंचे. यहां खाना खाने के बाद सेवाग्राम के नियमों के तहत उन्होंने अपने जूठे बर्तन खुद ही साफ किये.

अपनी आत्मा को ढूंढने निकले किसी समूह के नैसर्गिक मुलाकात से ज्यादा यह मिनट टू मिनट कार्यक्रम की तरह था. सेवाग्राम परिसर की कई झोपड़ियां टूट चुकी हैं, वहां रहने वाले ज्यादातर लोग बूढ़े हो चुके हैं. बाहर से आने वालों से कम ही बात करते हैं. लेकिन उनके पास अनुभवों का संसार है बांटने को. अगर कांग्रेस नेता दो घंटे से थोड़ा अधिक वक्त निकालकर वहां पहुंचते तो शायद उन्हें उनसे कुछ सीखने को मिल जाता. सीडब्लूसी एक और बड़े सवाल का जवाब देने से चूक गई कि आखिर आम जनता को कांग्रेस का समर्थन क्यों करना चाहिए? पार्टी की योजनाओं में आम आदमी कहां पर है?

(न्यूज 18 के लिए जयदीप हार्दिकर की रिपोर्ट)

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