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विधानसभा चुनाव 2017: नोटबंदी का असर पक्का लेकिन रंगत नहीं

नोटबंदी पर चर्चा सब कर रहे हैं, लेकिन इस आधार पर फैसला क्या होगा, इसपर कहा नहीं जा सकता

David Devadas Updated On: Jan 23, 2017 05:16 PM IST

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विधानसभा चुनाव 2017: नोटबंदी का असर पक्का लेकिन रंगत नहीं

पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों का शोर बढ़ रहा है. इस बार चुनाव में नोटबंदी के मुद्दे पर सबसे ज्यादा चर्चा हो रही है. मुद्दे तो और भी हैं लेकिन नोट बैन ऐसा मुद्दा है जो शायद इन चुनावों की दशा और दिशा तय करे. दिलचस्प बात ये है कि नोटबंदी पर चर्चा तो तमाम मतदाता कर रहे हैं, लेकिन वो ये नहीं समझ पा रहे हैं कि इसके आधार पर क्या फैसला करें?

गोवा के सैलानियों वाले अरपोरा इलाके की रहने वाली शारदा सफाई का काम कर गुजर-बसर करती हैं. नोटबंदी को लेकर उनका रुख एकदम साफ है. वो कहती हैं, 'मैं दोबारा मोदी को वोट नहीं दूंगी. पता नहीं आगे वो क्या करें'. कड़वाहट भरे अंदाज़ में वो कहती हैं कि देखो... उसने नोटों के साथ क्या किया.

नोटबंदी ने देश की जनता पर जितना गहरा असर डाला है, उससे तो शारदा की प्रतिक्रिया वाजिब लगती है. कई और लोग भी ऐसे होंगे जो शारदा जैसी राय रखते होंगे लेकिन ऐसा नहीं है.

The 50-day deadline to deposit the old Rs-1000 and 500 notes ends

पिछले कुछ दिनों में मैंने चुनाव को लेकर तमाम लोगों से चर्चा की है. शारदा उन गिने-चुने लोगों में से एक हैं जिन्होंने बातचीत में नोट बैन का जिक्र किया.

मोदी के नाम पर लड़ा जा रहा चुनाव

गोवा जैसे छोटे राज्य में भी एक बात तो एकदम साफ है. इस चुनाव में मोदी सबसे बड़ा मुद्दा हैं. गोवा की अंजुना बीच पर हाल ही में फिर से बनाए गए राम मंदिर के पास मैंने एक बीजेपी कार्यकर्ता से बात की. मैंने उससे पूछा कि ये चुनाव पूर्व मुख्यमंत्री और मौजूदा रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर का है या फिर प्रधानमंत्री मोदी का. उसने बिना पलक झपकाए कहा, ये चुनाव नरेंद्र मोदी के नाम पर लड़ा जा रहा है.

गोवा के ही कैलेंगुट में दुकान चलाने वाले एलेक्स कहते हैं कि नोटबंदी इकलौता ऐसा मुद्दा है, जिसमें वो बीजेपी के साथ हैं. नोट बैन को लेकर एलेक्स को तमाम शिकायतें हैं. वो कहते हैं कि नोटबंदी अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा कदम होगा, लेकिन इस वक्त मेरे कारोबार को नुकसान हो रहा है.

एलेक्स की शिकायत इस फैसले को लेकर नहीं, बल्कि इसे लागू करने के तरीके को लेकर है. एलेक्स कई हफ्तों की मशक्कत के बावजूद एक स्वाइप मशीन नहीं हासिल कर सके हैं, जिससे उनका धंधा प्रभावित हो रहा है.

एलेक्स बताते हैं कि नोटबंदी के एलान के कुछ हफ्तों के भीतर ही बड़ी संख्या में सैलानी नकदी संकट से इतने परेशान हो गए कि वक्त से पहले ही अपने देश लौट गए. उसके बाद से कई सैलानियों ने तो गोवा आने का प्लान ही कैंसिल कर दिया.

हालांकि एलेक्स का मानना है कि नोट बैन से देश को फायदा होगा. एलेक्स अब खुद को कांग्रेस का समर्थक कहते हैं, जबकि पांच साल पहले ये ही एलेक्स बीजेपी के समर्थक थे.

नोटबंदी को जबरदस्त समर्थन भी

राजनीति के मैदान में इस तरह की मिली-जुली राय भ्रम में डालने वाली है. एक सर्वे के मुताबिक देश के 80 फीसदी लोग नोट बैन के समर्थन में हैं. साफ है कि नोटबंदी के मुद्दे पर तो मौजूदा सरकार को नुकसान नहीं होने वाला.

Narendra Modi

प्रधानमंत्री मोदी ने 8 नवंबर की रात से 500 और 1000 रुपये के नोटों पर बैन लगा दिया था (फोटो: पीटीआई)

इस सर्वे की सबसे दिलचस्प बात ये थी कि ग्रामीण इलाकों में 85 फीसदी आबादी नोट बैन के हक में थी. जबकि आम तौर पर ये राय थी कि नोटबंदी से ग्रामीण इलाकों में लोग बहुत नाराज हैं. 80 फीसदी महिलाएं और 60 से ज्यादा की उम्र के 77 फीसदी मर्द नोट बैन के समर्थक हैं. जबकि इनमें से 80 फीसदी लोगों ने कहा था कि वो अभी भी नकद लेनदेन के हक में हैं.

जिस कंपनी ने ये सर्वे किया था, उसने लोगों से फोन के जरिए संपर्क किया था. इसमें 17 बड़े राज्यों के लोगों की राय ली गई थी. हर उम्र, तबके, समुदाय और जाति के लोगों से नोटबंदी के बारे में सवाल किए गए थे. कंपनी ने फोन पर बातचीत के अलावा जमीनी स्तर पर जाकर भी लोगों से राय ली थी. खास तौर से ग्रामीण इलाकों के लोगों से बात की गई थी, जिनके पास मोबाइल होने की संभावना कम थी.

नोटबंदी पर सबसे प्रमाणिक सर्वे

ये सर्वे बिहार, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, असम, झारखंड, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, गुजरात और छत्तीसगढ़ समेत 17 राज्यों में किया गया था.

इस सर्वे की एक और खास बात थी. इसे दस भाषाओं में किया गया था- हिंदी, बंगाली, मराठी, गुजराती, तमिल, कन्नड़, मलयालम, तेलुगू, ओड़िया और अंग्रेजी में लोगों से सवाल किए गए थे.

इन बातों को ध्यान में रखकर ये कहा जा सकता है कि नोटबंदी पर ये सबसे प्रामाणिक सर्वे था. जिसमें नोट बैन पर जनता की राय जानने की कोशिश की गई थी.

कहने का मतलब ये कि नोटबंदी को लेकर बीजेपी, जनता के गुस्से का सामना करने से उबर चुकी है. अब सामने अहम विधानसभा चुनाव है, जिनमें नोटबंदी मुद्दा तो रहेगा. मगर इस मुद्दे पर तो कम से कम बीजेपी को ज्यादा नुकसान नहीं होने वाला. हां, दूसरे मुद्दों के मोर्चे पर जरूर पार्टी को मात मिल सकती है.

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