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उत्तर प्रदेश चुनाव का 'द्वापर' कनेक्शन

द्वापर युग की तरह व्यवस्था परिवर्तन होगा और सत्ता से बेदखल जातियां अपनी अलग राह बनाएंगी

Updated On: Jan 29, 2017 12:47 PM IST

Madhukar Upadhyay

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उत्तर प्रदेश चुनाव का 'द्वापर' कनेक्शन

ये कहानी विचित्र अवश्य है लेकिन रोचक है. महाभारत और पुराणों में दर्ज है. इसे प्रामाणिक इतिहास न मानने के पर्याप्त कारण हो सकते हैं पर उसे अपर्याप्त मानकर अतीत को खारिज करना उचित नहीं होगा. कथा का दोहराव इसी तरफ इशारा करता है कि वह दोबारा पढ़ी जाए. पूरी गंभीरता के साथ.

खांडवप्रस्थ में सोमवंशी राजाओं का शासन था. काल पूरी तरह तय नहीं है लेकिन इसे द्वापर की घटना माना जाता है. खांडवप्रस्थ के राजा ययाति थे और क्षेत्र सिंधु नदी से लेकर गंगा तक फैला हुआ था. महाराज नहुष और अशोकसुंदरी की संतान ययाति ख्यातिनाम शासक थे. उन्हें पांडवों का पूर्ववर्ती कहा जाता है.

ययाति की पहली पत्नी देवयानी थीं, जिनके दो पुत्र थे- यदु और तुर्वसु. तीन संतानें गोपनीय विवाह से बनीं दूसरी पत्नी शर्मिष्ठा से थीं. द्रह्यु, अनु और पुरु. शर्मिष्ठा वृषपर्व की पुत्री थीं और देवयानी की दासी की तरह आई थीं. शर्मिष्ठा से ययाति के संबंधों से नाराज देवयानी ने इसकी शिकायत असुरराज वृषपर्व के गुरु और अपने पिता शुक्राचार्य से की. शुक्राचार्य ने ययाति को वृद्ध होने का शाप दे दिया.

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सबसे छोटे पुत्र पुरु ने ययाति को अपना यौवन दिया और जीवन पुन: सामान्य हो गया लेकिन इस कथा का दूसरा हिस्सा बड़े बेटे यदु से जुड़ा था. यौवन के लिए ययाति ने सबसे पहले उनसे ही संपर्क किया था. लेकिन यदु ने साफ इंकार कर दिया था. वह पिता की शापमुक्ति के लिए अपना यौवन देने पर सहमत नहीं थे.

नाराज पिता ने यदु को सत्ता से बेदखल कर दिया. उन्होंने कहा कि वो स्वयं और उनकी संतानें कभी सोमवंशी शासक नहीं हो सकतीं. यह अधिकार ययाति ने पुरु को दिया और वे सोमवंश के अगले शासक बने.

राजकुमार यदु ने अलग वंश परंपरा शुरू की. उनके साथ आए लोग यादव कहलाए और परंपरा यदुवंशी. यदुवंश का उत्थान और पतन द्वापर में ही हुआ. यदु के छोटे भाई तुर्वसु का एक नाम यवन था और यवन हमेशा यदुवंशियों के साथ रहे.

ऋगवेद के अनुसार यदु उस काल में फैल रही पांच आर्य भारतीय नस्लों में एक थी. इनका उल्लेख वेद में ‘पंचमानुष’ की तरह आता है. महाभारत के साथ भागवत पुराण, विष्णु पुराण, गरुण पुराड़ और अन्य ग्रंथों में इसका हवाला है.

कलियुग नहीं ये द्वापर है

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भारत की चक्रीय युग व्यवस्था में यकीन रखने वाले मानते हैं कि जब दोबारा द्वापर आएगा, ये ही कहानी दोहराई जाएगी. यदुवंश का उत्थान होगा और उसकी कीर्ति पताका फहराएगी. सवाल सिर्फ इतना है कि कलियुग कब बीतेगा? द्वापर कब आएगा?

ज्योतिषीय गणना के आधार पर संस्कृत विद्वान कुल्लूक भट्ट ने कलियुग की आयु चार लाख 32 हजार वर्ष बताई है, जिसमें से अभी केवल पांच हजार वर्ष बीते हैं. यानी कि ये उसका शुरुआती काल है.

19वीं शताब्दी के स्वामी श्री युक्तेश्वर गिरि ये गणना नहीं मानते. उनके अनुसार भारतीय पंचांग में गड़बड़ी है और ये गड़बड़ी पिछले द्वापर के अंतिम और कलियुग के प्रारंभिक वर्षों में हुई जब राजा परीक्षित सत्ता में थे. ये वही काल था जब कलियुग आता देखकर युधिष्ठिर ने अपने पोते परीक्षित को सत्ता सौंप दी और हिमालय चले गए.

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युक्तेश्वर गिरि.

पंचांग में इसीलिए सुधार नहीं हो सका. युक्तेश्वर गिरि कुल्लूक भट्ट से अलग राय रखते हैं. उनका मानना है कि कलियुग बीत चुका है और हम इस समय द्वापर में हैं. उसके प्रथम चरण में.

स्वामी युक्तेश्वर गिरि की गणना के मुताबिक कलियुग सन् 1699 में समाप्त हो गया. हम द्वापर और कलियुग के 200 वर्ष के संधिकाल से आगे निकल चुके हैं, जो 1899 में पूरा हुआ. बकौल स्वामी युक्तेश्वर द्वापर की अवधि सन् 4099 में पूरी होगी और हम त्रेता युग में प्रवेश करेंगे.

अमेरिकी शोधकर्ता और वैज्ञानिक रॉबर्ट स्कॉच ने ‘लॉस्ट नॉलेज ऑफ दि एंशियेंट्स’ में लिखा है कि वैज्ञानिक सोच और विकास के जिस स्तर पर मनुष्य अभी है, वह द्वापर युग की विशेषताओं से मेल खाता है. दूर कुरुक्षेत्र का आंखों देखा हाल सुनाने वाली दिव्य दृष्टि (टेलीविजन), आकाशवाणी या दूरसंचार के अन्य साधन, सब जैसे लौट आए हैं.

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स्कॉच के अनुसार समाज में हो रहे परिवर्तन भी इसी तरफ संकेत करते हैं. जिसमें अगले 2000 साल की कहानी पिछले द्वापर के दोहराव के बावजूद रोचक होगी. सत्ता से बेदखल की गई जातियां अलग राह बनाएंगी और व्यवस्था परिवर्तन स्थाई भाव हो जाएगा.

क्या हम वाकई द्वापर में हैं? द्वापर के 318वें वर्ष में?

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