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खुश तो तुम बहुत होगे गध्धू महाराज!

किताबों ने गधे को जितनी शोहरत दिलाई उससे ज्यादा यूपी के सीएम और देश के पीएम ने मिलकर दिला दी

rakesh kayasth Updated On: Feb 25, 2017 10:56 AM IST

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खुश तो तुम बहुत होगे गध्धू महाराज!

गधे ने खबरों में आने के लिए कुछ नहीं किया. ना टिकट मांगने धरने पर बैठा. ना कोई कंट्रोवर्शियल ट्ववीट किया.

ना किसी बड़े आदमी पर दुल्लती झाड़ी, ना अपना लोन माफ करवाकर पतली गली से विदेश भागा.

लेकिन बिना कुछ किये अचानक गधे को सबकुछ मिल गया. वो सुर्खियों में इस कदर आया कि बकायदा ट्विटर पर ट्रेंड करने लगा.

इस लेवल की पब्लिसिटी हासिल करने के लिए लोग क्या-क्या नहीं करते. लेकिन शोहरत कुछ करने से कहां मिलती है भला!

किस्मत हो तो गध्धू जैसी

अगर कुछ करके शोहरत मिलती तो गधा कब का मशहूर हो गया होता. वो जितनी मेहनत करता है, उतनी तो एक आईएसएस टॉपर भी नहीं करता.

लेकिन दुनिया हमेशा से उसका मजाक उड़ाती आई है. लेकिन अचानक गधे की किस्मत ने पलटा खाया. पुराना मुहावरा है, वक्त पड़े तो गधे को भी बाप बनाना पड़ता है. वक्त सचमुच पड़ गया और ये कोई ऐसा वैसा वक्त नहीं है.

आन, बान और शान का महासंग्राम है, जो देश का राजनीतिक भविष्य तय करेगा. इस इस महासमर में गधा चेतक बनकर सरपट दौड़ रहा है और देखने वाले आहें भर रहे हैं-किस्मत हो तो गध्धू जैसी.

दशकों बाद मिली पहचान

गधा सदियों से उपेक्षित था. पचास के दशक में उर्दू फैटेंसी के शहंशाह कृशन चंदर ने गधे की आत्मकथा लिखकर इस मेहनतकश कौम को पहली बार पहचान दिलाई.

उपन्यास लोकप्रिय हुआ तो कृशन चंदर ने उसका पार्ट टू भी लिख डाला. इसके बाद शरद जोशी ने भी गधे को याद किया.

लेकिन पिछले 50-60 साल में लिखी गई किताबों ने गधे को जितनी शोहरत दिलाई उससे कई गुना ज्यादा यूपी के सीएम और देश के पीएम ने मिलकर दिला दी और वो भी हफ्ते भर के भीतर.

अब कौन शिकायत कर सकता है कि भारत के नेता काम नहीं करते, कम से कम गधा को बिल्कुल नहीं करेगा.

शोहरत पाकर गधा बहुत खुश है, लेकिन उसके दिमाग में घूम-फिरकर एक सवाल आ रहा है, आखिर इतनी शोहरत का वो करेगा क्या?

किसी सूफियाना कलाम की तरह रह-रहकर एक सवाल उसके दिमाग में गूंज रहा है-गध्धू कि जानू मैं कौन?

कनफ्यूजन में है गदहा

चुनावी मौसम में लोग गधे को बाप नहीं बनाते कई बार बाप को भी गधा बना देते हैं. गधे के कनफ्यूजन की वजह यही है.

उसे समझ में नहीं आ रहा कि उसका सम्मान हो रहा है या अपमान. अखिलेश यादव ने जब उसे पहली बार उसे याद किया तो लगा कि उसकी बेइज्जती कर रहे हैं.

अखिलेश ने अमिताभ बच्चन को नसीहत दी कि वे गधे को फोकट में भाव ना दें.गधा भी कोई प्रमोट करने की चीज़ है?

गधे की दिमाग का बल्ब जला-ये तो गाली है. लेकिन दो-दिन के भीतर प्रधानमंत्री बता दिया कि गधा अपमान नहीं दुनिया का सबसे बड़ा सम्मान है.

मोदीजी ने कहा-मैं गधे से प्रेरणा ग्रहण करता हूं. जरा सोचिये पूरा देश मोदीजी से प्रेरणा लेता है और मोदीजी गधे से.

सबसे बड़ा प्रेरक व्यक्तित्व बन गया गधा

मतलब गधा इस देश का सबसे बड़ा प्रेरक व्यक्तित्व है. तमाम आध्यात्मिक गुरुओं और मोटिवेशनल स्पीकर और चुनावी रणनीतिकारों से भी बड़ा.

इस तर्क के आधार पर आप मान सकते हैं कि अगर आप किसी को सम्मान देना चाहते हैं तो मान्यवर, महोदय या महाशय के चक्कर में पड़ने की जरूरत नहीं है. सिर्फ गधा कह देने से काम चल जाएगा. सामने वाला आदमी खुश हो जाएगा.

लेकिन खुशी के इस माहौल में गधा खुश होकर भी उदास है. कुछ लोग कह सकते हैं कि उदासी उसका स्वभाव है.

लेकिन सच मानिये वो अपने स्वभाव की वजह से उदास नहीं है बल्कि तथ्यों के गहन विश्लेषण के बाद उदास है.

जिस गधे के शान में कसीदे पढ़े जा रहे हैं, वो कृशन चंदर का डंकी फ्रॉम बाराबंकी नहीं है. सचमुच वो यूपी वाला गधा नहीं है. वो भारत के सिंगापुर यानी गुजरात में विचरने वाला गधा है. विलुप्त होती एक ऐसी प्रजाति जो शेर से भी ज्यादा कीमती है.

दुनिया भर के सैलानी उसे देखने के लिए खासतौर से कच्छ आते हैं. यूपी वाले गधों का रिश्ता इस गुजराती गधे के साथ सिर्फ नाम है.

ठीक वैसे ही जैसे सोमालिया और स्विटजरलैंड दोनो जगहों में रहने वाले इंसान कहे जाते हैं.

अब गधा उदास ना हो क्या करे. चुनाव में उसे ज़बरदस्ती चेतक बनाकर खड़ा कर दिया गया है.

गधे को मैदान में लाये जाने से के बाद से कैंपेन का तरीका, नेताओं की संवाद शैली, सबकुछ एकदम बदल गये हैं.

गेम चेंजर गधा फिर भी उदास है. दूसरी तरफ चुनाव पर नजर गड़ाये लोग विश्लेषण में जुटे हैं-देखे चुनावी गधा इस बार किस करवट बैठता है.

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