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क्या #MeToo कैंपेन से अभियुक्तों के अधिकारों का उल्लंघन होता है?

यह माना जा सकता है कि यौन शोषण के मामले में पीड़ित महिलाएं मानहानि का मुकदमा दर्ज किए जाने की धमकी से डरकर किसी तरह की कार्रवाई नहीं करने को मजबूर हो सकती हैं

Updated On: Oct 17, 2018 08:55 PM IST

Devika Agarwal

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क्या #MeToo कैंपेन से अभियुक्तों के अधिकारों का उल्लंघन होता है?
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#MeToo कैंपेन के सिलसिले में कुछ लोगों ने हाल में दिल्ली हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है. हाई कोर्ट में दायर याचिका में किसी महिला को अपने यौन शोषण के बारे में सोशल मीडिया पर वैसी जानकारी देने से रोकने की मांग की गई है, जिसके तहत याचिकाकर्ताओं पर आरोप लगाए जाते हैं.

याचिकाकर्ताओं की दलील है कि दिल्ली हाई कोर्ट ने पहले के अपने एक आदेश में कहा था कि इस तरह के मामलों में दोनों पक्षों (शिकायतकर्ता और आरोपी) की पहचान को गुप्त रखा जाना चाहिए. चूंकि मामला अदालत में विचाराधीन है, लिहाजा कोर्ट ने मौजूदा केस में दोनों पक्षों से सोशल मीडिया पर या किसी अन्य मीडिया संस्थान द्वारा इस बारे में चर्चा करने या संबंधित पक्षों की पहचान के बारे में सार्वजनिक तौर पर जानकारी मुहैया कराए जाने को लेकर रोक लगा दी है.

इस केस के जरिए एक बार फिर यह मुद्दा उभकर सामने आया है कि क्या यौन उत्पीड़न का सामना कर चुकी महिला को सोशल मीडिया पर आरोपियों या दोषियों की पहचान का खुलासा करने से कानूनी तौर पर रोका जा सकता है?

भारत में रेप के आरोपी की तरफ से दायर मानहानि के मामले

लॉयर्स कलेक्टिव नामक एक प्रमुख एनजीओ की तरफ से ऐसे कई मामलों के बारे में विस्तार से बताया गया है, जहां यौन शोषण के आरोपी शख्स ने शिकायतकर्ता के खिलाफ मानहानि का मुकदमा दायर किया है. उदाहरण के तौर पर द एनर्जी एंड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट (टेरी) के पूर्व एग्जिक्यूटिव वाइस चेयरमैन राजेंद्र पचौरी पर यौन शोषण के आरोपों के संदर्भ में बात करते हैं.

इस केस में पचौरी ने अपने खिलाफ यौन शोषण का आरोप लगाने वाली महिला के बयानों को सार्वजनिक तौर पर पेश करने के मामले में वकील वृंदा ग्रोवर और कुछ अन्य मीडिया हाउस के खिलाफ मानहानि का मुकदमा दायर किया था. दिल्ली के एक ट्रायल कोर्ट ने इस सिलसिले में फरवरी 2018 में मीडिया हाउस के खिलाफ किसी तरह का प्रतिबंध लगाने से मना कर दिया.

हालांकि, अदालत ने इस पर सुनवाई के दौरान सिर्फ पचौरी के खिलाफ यौन शोषण के मामले की रिपोर्टिंग को लेकर मीडिया को निश्चित दिशा-निर्देश जारी किए. इस मामले में अदालत ने इस निर्देश के अलावा कोई अन्य आदेश जारी करने की मांग को अस्वीकार कर दिया.

अदालत ने उस वक्त कहा था, 'इस मामले में सार्वजनिक तौर पर रिपोर्ट मुहैया कराने के खिलाफ जिस तरह के नियंत्रण (निषेधाज्ञा) की मांग की गई है. वह न सिर्फ मीडिया पर प्रतिबंध लगाने जैसा है, बल्कि इससे घटनाक्रम के बारे में जानकारी हासिल करने संबंधी लोगों के अधिकारों का भी हनन भी होता है. यह पूरी तरह से लोगों के जानने के अधिकारों का उल्लंघन जैसा मामला है.'

इसी से मिलते-जुलते घटनाक्रम के तहत दिल्ली के फोटोग्राफर माणिक कात्याल ने जुलाई 2016 में 36 महिलाओं पर मुकदमा दायर किया था. दरअसल, इन महिलाओं ने ऑनलाइन ब्लॉग में कात्याल पर यौन शोषण का आरोप लगाया था. बाकी देशों में भी ऐसे मामले तेजी से बढ़ रहे हैं, जिसके तहत यौन शोषण के आरोपी पुरुष अपने खिलाफ यौन शोषण की शिकायतों से निपटने के लिए मानहानि का मामला दायर कर रहे हैं.

हालांकि, यौन शोषण के आरोपियों की तरफ से इस तरह के मामले दर्ज किए जाने से पीड़ित महिलाओं के अपनी शिकायतों को लेकर पीछे हटने की आशंका भी बढ़ने लगती है. दरअसल, यह माना जा सकता है कि यौन शोषण के मामले में पीड़ित महिलाएं मानहानि का मुकदमा दर्ज किए जाने की धमकी से डरकर किसी तरह की कार्रवाई नहीं करने को मजबूर हो सकती हैं.

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अमेरिकी पोर्टल बजफीड ने यौन शोषण के मामले के बाद दायर मानहानि के मुकदमे और इसके बाद के घटनाक्रम संबंधी मामलों के बारे में विस्तार से जानकारी दी है- नवंबर 2017 में अमेरिकी निर्माता-निर्देशक ब्रेट रैटनर ने अपने ऊपर यौन शोषण का आरोप लगाने वाली एक महिला के खिलाफ मानहानि का मुकदमा दायर किया था. इस महिला ने रैटनर पर सोशल मीडिया के जरिए यौन शोषण का आरोप लगाया था.

हालांकि, इसी महीने (अक्टूबर 2018) खबर आई कि रैटनर ने मानहानि का मुकदमा वापस ले लिया. दरअसल, रेप का आरोप लगाने वाली इस महिला ने यह मान लिया था कि चूंकि यह वाकया एक दशक से भी पहले हुआ था, इसलिए इस बारे में उनकी यादाश्त 'अस्पष्ट और संदिग्ध' थी. हालांकि, इस सिलसिले में आई खबरों में रैटनर और उन पर रेप का आरोप लगाने वाली महिला के बीच समझौते का जिक्र नहीं किया गया है. बहरहाल, यह कहा जा रहा है कि पीड़िता ने सोशल मीडिया पर अपने यौन शोषण के बारे में पोस्ट डालते वक्त क्यों नहीं यह महसूस किया कि इस घटना को लेकर उनकी यादाश्त इतनी कमजोर है कि इसके बारे में इस सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर बात नहीं की जा सकती.

यहां यह बताना भी दिलचस्प है कि सोशल मीडिया पर जिस शख्स के खिलाफ आरोप लगाए जाने के बाद #MeToo कैंपन की राह तैयार हुई, उन्होंने भी अमेरिकी अखबार 'न्यूयॉर्क टाइम्स' के खिलाफ मानहानि का मामला दर्ज करने के संकेत दिए थे. यह मामला हालीवुड निर्माता हार्वे वेनस्टेन से जुड़ा है. 'न्यूयॉर्क टाइम्स' ने सबसे पहले वेनस्टेन के खिलाफ जांच-पड़ताल कर यौन शोषण के मामले की खबर दी थी और इसके बाद ही #MeToo कैंपन का मार्ग प्रशस्त हुआ. हालांकि, यह प्रेस के खिलाफ मानहानिक का मामला था, न कि इसमें पीड़िता के खिलाफ किसी तरह की कार्रवाई की गई थी.

आरोपी के अधिकार- यौन शोषण पर कानून क्या कहता है?

भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 228ए के तहत किसी की पहचान बताना या वैसी कोई भी सूचना को प्रकाशित करना या इस बारे में जानकारी मुहैया कराना अपराध है, जिससे यौन शोषण की पीड़िता की पहचान जाहिर हो जाए. हालांकि, यौन शोषण के आरोपी की गोपनीयता की सुरक्षा के लिए कानून में इस तरह का प्रावधान नहीं है.

इसी तरह के एक केस में दिल्ली हाई कोर्ट ने 2015 में सुप्रीम कोर्ट के एक जज के मामले में आदेश जारी करते हुए मीडिया पर उनके खिलाफ यौन शोषण के आरोपों के बारे में लिखने के बारे में रोक लगा दी थी. इस केस के संदर्भ में प्रमुख मानवाधिकार वकील और मजलिस की डायरेक्टर फ्लेविया एग्नेस का कहना है कि इस बात को लेकर कानून स्पष्ट नहीं है कि इसी तरह का ऑर्डर सोशल मीडिया से जुड़े प्लेटफॉर्म के मामले में भी लागू हो सकता है या नहीं.

सोशल मीडिया पर यौन शोषण का आरोप लगाए जाने के एक मामले में संगीतकार विलियम बेनसुस्सेन (गैसलैंप किलर) ने एक महिला के खिलाफ मानहानि का केस दर्ज किया था. दरअसल, महिला ने ट्विटर के जरिए इस शख्स पर रेप करने और अन्य तरह के आरोप लगाए थे. मानहानि का मामला दर्ज करने के बारे में विलियम का कहना था कि वह शिकायतकर्ता को चुप कराने का प्रयास नहीं कर रहे थे, बल्कि वह चाहते थे कि उनका 'सोशल मीडिया ट्रायल' होने की बजाय इस केस की जज और अदालत द्वारा सुनवाई हो.

क्या यौन शोषण की कथित पीड़िताओं के खिलाफ मानहानि के केस के कारण वे चुप हो सकती हैं?

अगर यौन शोषण की कहानी सोशल मीडिया पर बयां करने के कारण किसी महिला पर मानहानि का केस दर्ज होने का खतरा होता है, तो मुमकिन है कि वे यौन शोषण को लेकर अपने कड़वे के अनुभव के बारे में सोशल मीडिया पर पोस्ट डालने में हिचकिचाहट दिखाएं. बहरहाल, यह उचित नहीं है, क्योंकि इससे ऐसे मामलों में औपचारिक तौर पर न्यायिक हस्तक्षेप में भी बाधा पहुंचने की आशंका बनी रहेगी.

ऐसे कई उदाहरण देखने को मिल सकते हैं, जहां यौन शोषण के मामलों में सोशल मीडिया पर डाली गई पोस्ट को ही 'शिकायत' की तरह माना गया है. उदाहरण के तौर पर कुछ समय पहले जब कानून की एक छात्रा और इंटर्न ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज ए के गांगुली द्वारा यौन उत्पीड़न के बारे में ब्लॉग पर लिखा, तो उसके पोस्ट को आधिकारिक शिकायत के लिए छात्रा की सहमति माना गया. इसी शिकायत के आधार पर आरोपों की जांच के लिए तीन जजों की एक कमेटी बनाई गई और आखिरकार पूर्व जज गांगुली को पश्चिम बंगाल मानवाधिकार आयोग के चेयरमैन पद से हटने के लिए कहा गया.

इस बात को भी आधार बनाया जा सकता है कि सोशल मीडिया पर अपने यौन शोषण के बारे में बताने वाली पीड़ित महिलाएं अपने कड़वे अनुभव को साझा करने के लिए इस प्लेटफॉर्म का चुनाव इस वजह से करती हैं कि उन्हें यहां पर यह सब कुछ बयां करना ज्यादा सुरक्षित लगता है. इन कारण से भी ऐसे मामलों में मानहानि से संबंधित कानून लागू नहीं होने चाहिए, ताकि आरोपियों या दोषियों द्वारा शुरू की गई कानूनी कार्यवाही से उन्हें और परेशानी नहीं झेलनी पड़े.

इन तमाम घटनाक्रमों से जुड़ा एक मुद्दा यह भी है कि जिस सोशल मीडिया पोस्ट में यौन शोषण के आरोपियों के नाम का जिक्र किया जाता है, क्या उस पोस्ट को मुख्यधारा की मीडिया की तरफ से बताए गए दोषियों के नामों के मामले से अलग माना जाना चाहिए? इसका साफ तौर पर मतलब यह है कि क्या दोनों मामलों में (सोशल मीडिया और मुख्यधारा की मीडिया) में अलग-अलग नियम का पालन हो?

मेरा भी यह तर्क होगा कि जब पीड़ित महिलाएं यौन उत्पीड़न की घटना से जुड़ा अपना कड़वा अनुभव साझा करने के लिए सोशल मीडिया का सहारा लेती हैं, तो वे इसलिए ऐसा करती हैं, क्योंकि उनके पास अदालत में मुकदमा दायर करने या इसे आंतरिक शिकायत कमेटी (कार्यस्थल में मौजूद इकाई) में उठाने का उपाय नहीं होता है. इसकी कई वजहें हो सकती हैं. मसलन- अदालत में यौन उत्पीड़न का केस लड़ने के लिए कानूनी संसाधनों का अभाव या संस्थान की आंतरिक कमेटी में भरोसे की कमी का होना.

दरअसल, कई बार आंतरिक शिकायत कमेटी को यौन उत्पीड़न के मामलों में फैसले के लिए निष्पक्ष फोरम मानने को लेकर पीड़िता महिलाओं के मन में शंका बनी रहती है. लिहाजा, जब सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए लगाए गए आरोपों के मामले में अभियुक्त को अदालत में मानहानि की कार्रवाई की इजाजत दी जाती है, तो इससे पीड़िता के सार्वजनिक तौर पर और ज्यादा सुर्खियों में आने का भी खतरा होता है, जिससे शायद वह बचना चाहती हों.

यहां पर किसी की तरफ से बेहद आसानी से यह तर्क दिया जा सकता है कि फेसबुक या सोशल मीडिया के अन्य प्लेटफॉर्म भी पूरी तरह से सार्वजनिक माध्यम हैं. हालांकि, मुझे लगता है कि सोशल मीडिया यूजर (विशेष तौर पर पीड़िता के मामले में) द्वारा इस बात पर नियंत्रण रखा जा सकता है कि कौन उनके /उनकी पोस्ट को देख सकता है. इसके तहत पोस्ट को सिर्फ 'फ्रेंड्स' या 'फ्रेंड्स के फ्रेंड्स' तक ही देखने का प्रावधान किया जा सकता है या फ्रेंड लिस्ट में सिर्फ कुछ वैसे लोगों को ही चिन्हित किया जा सकता है, जो इस पोस्ट को देख सकें.

इस लिहाज से देखें तो किसी फेसबुक यूजर का पोस्ट वे ही देख सकते/सकती हैं, जिनके लिए संबंधित यूजर ने अपनी सहमति दी है. हालांकि, दूसरी स्थिति में पीड़िता के केस की रिपोर्टिंग (पीड़िता की इजाजत के बिना) मुख्यधारा की मीडिया द्वारा की जाती है.

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रेप के अभियुक्त द्वारा मानहानि के मामले को दर्ज करने पर लगाम लगाने की एक और अहम वजह यह भी है कि ऐसे मुकदमों से पीड़िता का मनोबल कमजोर पड़ सकता है. भारत में अदालतों को इस तरह के मुकदमों को स्ट्रैटिजक लिटिगेशन एगेंस्ट पब्लिक पार्टिसिपेशन (एसएलएपीपी) की श्रेणी में रखने पर विचार करना चाहिए. एसएलएपीपी अमेरिका में एक स्थापित अवधारणा है. इसके तहत वैसे मामलों से आशय होता है, जो जनहित के मुद्दों के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को हतोत्साहित करने के लिए दायर किए जाते हैं.

एसएलएपीपी मुकदमों का मकसद मुकदमेबाजी खर्च के तहत भारी-भरकम फीस के जरिए लक्षित इकाई या व्यक्ति के वित्तीय संसाधनों को खाली करना होता है. भारतीय कानून में साफ-साफ तौर पर एसएलएपीपी मुकदमों की श्रेणी के बारे में जिक्र नहीं किया गया है. हालांकि, तात्कालिक मामले में जहां रेप के आरोपी ने शिकायतकर्ता के खिलाफ मानहानि का मुकदमा दायर किया है, उसे एसएलएपीपी मुकदमे का एक अच्छा उदाहरण माना जा सकता है.

कुल मिलाकर कहा जाए तो पीड़ित महिलाओं को सोशल मीडिया में अपनी बात कहने को लेकर रोकना की कोशिश नहीं करनी चाहिए. दरअसल, कभी-कभी पारस्परिक दोस्तों और शिकायतकर्ता और अभियुक्त दोनों को जानने वाले लोगों की तरफ से यौन उत्पीड़न के मामले में सार्वजनिक तौर पर की जाने वाली निंदा कैमरे की जद में होने वाली अदालती कार्यवाही से ज्यादा असरदार साबित हो सकती है. इसके अलावा, इस तरह की निंदा बंद दरवाजे में होने वाली कंपनियों व अन्य इकाइयों की आंतरिक शिकायत कमेटी की कार्रवाई से भी ज्यादा प्रभावकारी होने की संभावना भी रहती है.

अगर कोई महिला एक छोटे समूह या सोशल मीडिया या फिर इंटरनेट पर अपने साथ हुए यौन शोषण के बारे में बात करती है, तो इससे आरोपी को आगे आकर सार्वजनिक तौर पर माफी मांगने के साथ इस घटना को स्वीकार करने या अपना पक्ष पेश करने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है. इस तरह से यह कहा जा सकता है कि सोशल मीडिया यौन उत्पीड़न के आरोपी और शिकायतकर्ता के बीच ताकत का संतुलन कायम करने में किसी अदालती या संगठित न्याय तंत्र से ज्यादा प्रभावकारी है.

(लेखिका नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी, दिल्ली में रिसर्चर हैं. इस लेख में कही गई बातें उनकी निजी राय हैं और ये जरूरी तौर पर संस्थान के विचार को नहीं दर्शाते हैं.)

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