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क्या सिंधिया की राह में रोड़ा बनेगी दिग्विजय सिंह की नई जिम्मेदारी?

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने कुल छह समितियां मध्यप्रदेश के लिए बनाई हैं. सबसे महत्वपूर्ण समिति दिग्विजय सिंह की अध्यक्षता वाली समन्वय समिति है

Dinesh Gupta Updated On: May 24, 2018 09:05 AM IST

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क्या सिंधिया की राह में रोड़ा बनेगी दिग्विजय सिंह की नई जिम्मेदारी?

पहले कमलनाथ को मध्यप्रदेश कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष और फिर दिग्विजय सिंह को समन्वय की जिम्मेदारी दिए जाने से मध्यप्रदेश कांग्रेस में डेढ़ दशक पुराने राजनीतिक समीकरण फिर से उभरकर सामने आ गए हैं. ताजा राजनीतिक समीकरण में कांग्रेस सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया की भूमिका सीमित होती दिखाई दे रही है.

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने मध्यप्रदेश के नेताओं को साधने के लिए कमेटियां गठित कर एडजस्ट करने का जो फार्मूला अपनाया है, उससे असंतोष कम होने के बजाए बढ़ता हुआ दिखाई दे रहा है. मंदसौर कांग्रेस में तो पूर्व सांसद मीनाक्षी नटराजन के समर्थकों ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया है. मीनाक्षी नटराजन भी पार्टी के फैसले नाराज बताई जातीं हैं. मीनाक्षी नटराजन, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की करीबी हैं. वे अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की सचिव हैं.

प्रदेश कांग्रेस में दिग्विजय युग का उदय

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने कुल छह समितियां मध्यप्रदेश के लिए बनाई हैं. समन्वय समिति, घोषणा पत्र समिति, अनुशासनात्मक कार्यवाही की समिति, मीडिया एवं संवाद की समिति, चुनाव प्रचार समिति तथा चुनाव रणनीति समिति के जरिए राहुल गांधी ने प्रदेश कांग्रेस के सभी बड़े नेताओं को कोई न कोई जिम्मेदारी विधानसभा चुनाव के लिए सौंपी है.

सबसे महत्वपूर्ण समिति दिग्विजय सिंह की अध्यक्षता वाली समन्वय समिति है. ड़ेढ दशक के बाद यह पहला मौका है, जब चुनाव में दिग्विजय सिंह की उपयोगिता को पार्टी में स्वीकार किया गया है. वर्ष 2003 में कांग्रेस ने जब राज्य की सत्ता गंवाई थी, उस वक्त मुख्यमंत्री के पद पर दिग्विजय सिंह ही थे. चुनाव हारने की स्थिति में दस साल तक कोई पद न लेने की घोषणा दिग्विजय सिंह द्वारा की गई थी. 2003 में सड़क, बिजली और पानी के मुद्दे पर सत्ता गंवाने के बाद दिग्विजय सिंह ने अपने आपको प्रदेश कांगे्रस की राजनीति से अलग कर लिया था.

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वर्ष 2008 और वर्ष 2013 के विधानसभा चुनाव में भी दिग्विजय सिंह का कोई उपयोग पार्टी द्वारा नहीं किया गया. वर्ष 2008 का विधानसभा चुनाव सुरेश पचौरी तथा वर्ष 2013 का विधानसभा चुनाव कांतिलाल भूरिया के नेतृत्व में लड़ा गया था. दोनों चुनाव में कांग्रेस को करारी हार का सामना करना पड़ा था. कांग्रेस इस बार सत्ता में वापसी के लिए हर संभव कोशिश कर रही है.

इसी कोशिश के तहत दिग्विजय सिंह की भूमिका भी तय की गई है. राज्य में कांग्रेस के चार बड़े चेहरे माने जाते हैं. कमलनाथ, ज्योतिरादित्य सिंधिया, दिग्विजय सिंह और सुरेश पचौरी. चारों नेताओं के बीच समन्वय की कमी पिछले पंद्रह साल से देखी जा रही है. कांग्रेस की लगातार हार की वजह भी नेताओं के आपसी मतभेद ही हैं. दिग्विजय सिंह ने अपने आपको मुख्यमंत्री की दौड़ से पहले ही बाहर कर लिया था. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने उनकी भूमिका नेताओं के बीच समन्वय बनाने की तय की है. दिग्विजय सिंह को कमलनाथ के करीब माना जाता है. नई भूमिका तय होने के बाद यह माना जा रहा है कि प्रदेश कांग्रेस में दिग्विजय युग का उदय हो गया है.

दिग्विजय सिंह, प्रदेश कांग्रेस के ऐसे अकेले नेता हैं, जिनके समर्थक गांव-गांव में हैं. दिग्विजय सिंह के मुख्य भूमिका में आते ही समर्थक भी घरों से निकल आए हैं. दिग्विजय सिंह, ज्योतिरादित्य सिंधिया से भी अपने रिश्ते सुधार चुके हैं. सिंधिया पिछले दिनों दिग्विजय सिंह के पुत्र जयवर्धन सिंह के आमंत्रण पर राघोगढ़ के किले में लंच के लिए गए थे. सिंधिया के चेहरे को मुख्यमंत्री पद के लिए सबसे प्रभावशाली माना जाता है.

बागियों को मिली है समितियों में जगह

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी द्वारा बनाई गईं आधा दर्जन समितियों में ज्यादातर ऐसे नेता हैं, जो आउटडेटेड माने जाते हैं. इन नेताओं को समितियों में जगह सिर्फ गुट संतुलन बनाने के कारण मिली है. कुछ नेता ऐसे भी हैं जो कांग्रेस से बगावत कर निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ चुके हैं. इनमें एक नाम मंदसौर के राजेंद्र सिंह गौतम का है. गौतम ने मीनाक्षी नटराजन के खिलाफ वर्ष 2009 में निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर लोकसभा के चुनाव लड़ा था. गौतम को दिग्विजय सिंह की अध्यक्षता वाली समन्वय समिति में सदस्य बनाया गया है. गौतम का नाम सामने आते ही मंदसौर के तीन कांग्रेसी नेताओं ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया है.

इस्तीफा देने वालों में महेन्द्र सिंह गुर्जर भी हैं. गुर्जर मंदसौर विधानसभा क्षेत्र से पिछली बार कांग्रेस के उम्मीदवार थे. जिला कांग्रेस महामंत्री राघवेन्द्र सिंह तोमर और महिला कांग्रेस अध्यक्ष बबीता सिंह तोमर ने भी इस्तीफा दिया है. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी गोलीकांड की पहली बरसी पर छह जून को मंदसौर आ रहे हैं. मीनाक्षी नटराजन को चुनाव घोषणा पत्र समिति का का वाइस चेयरपर्सन बनाया गया है. सिंधिया की अध्यक्षता वाली चुनाव समिति में एक चौंकाने वाला नाम रामगोपाल राजपूत का है. राजपूत बीजेपी से कांग्रेस में आए हैं. वे उमा भारती के करीबी माने जाते हैं.

समितियों के गठन से सिंधिया का कद घटा?

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कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी द्वारा बनाई गई नई समितियों के बाद सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया का कद काफी हद तक छांट दिया गया है. कमलनाथ को प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष बनाए जाने के साथ ज्योतिरादित्य सिंधिया को मध्यप्रदेश में कैंपेन कमेटी का चेयरमेन बनाया गया था.

इससे कार्यकर्ताओं में यह संदेश गया था कि कमलनाथ और सिंधिया की जोड़ी ही प्रदेश में कांग्रेस की सत्ता में वापसी के द्वार खोलेगी. ये नियुक्तियां एक माह पूर्व की गईं थीं. कांग्रेस ने एक माह में ही अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव करना पड़ा. सिंधिया की कैंपेन कमेटी के समानांतर ही पूर्व केंद्रीय मंत्री सुरेश पचौरी की अध्यक्षता में चुनाव रणनीति तैयार करने के लिए एक समिति और बना दी गई. अर्थात पचौरी की अध्यक्षता वाली कमेटी रणनीति बनाएगी और सिंधिया उस आधार पर प्रचार करेंगे?

कांग्रेस की छह नई समितियों में प्रतिपक्ष के नेता अजय सिंह का नाम कहीं भी नहीं है. कांग्रेस की समितियों में राज्यसभा सदस्य विवेक तन्खा अकेले ऐसे नेता हैं, जिनका नाम दो समितियों में है. तन्खा घोषणा पत्र समिति और चुनाव प्रचार समिति में सदस्य हैं. छह समितियों के गठन के अलावा पार्टी ने बीस जिला कांग्रेस कमेटियों के अध्यक्ष भी बदले हैं. नए अध्यक्षों की नियुक्ति से कई स्थानों पर पार्टी में असंतोष देखने को मिल रहा है.

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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