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संसद को चोरों-दलालों का अड्डा लिख देने पर भी पत्रिका पर नहीं हुई थी कार्रवाई

इस अभूतपूर्व टिप्पणी के जरिए पत्रिका 'प्रतिपक्ष' ने लाइसेंस घोटाले की एक बार फिर संसद में चर्चा कराने की कोशिश की थी. मूल मुद्दे पर तो चर्चा फिर भी नहीं हो सकी, पर पत्रिका पर चर्चा हो गई

Surendra Kishore Surendra Kishore Updated On: Mar 19, 2018 12:29 PM IST

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संसद को चोरों-दलालों का अड्डा लिख देने पर भी पत्रिका पर नहीं हुई थी कार्रवाई

नई दिल्ली से प्रकाशित साप्ताहिक पत्रिका ‘प्रतिपक्ष’ देश की एकमात्र ऐसी पत्रिका थी जिसकी रिपोर्ट पर सन् 1974 में लगातार 5 दिन तक लोकसभा में गर्मागर्म चर्चा हुई थी.

पांडिचेरी लाइसेंस घोटाले की पृष्ठभूमि में प्रतिपक्ष ने संसद को ‘चोरों और दलालों का अड्डा’ लिख दिया था. इस अभूतपूर्व टिप्पणी के जरिए पत्रिका ने लाइसेंस घोटाले की एक बार फिर संसद में चर्चा कराने की कोशिश की थी. मूल मुद्दे पर तो चर्चा फिर भी नहीं हो सकी, पर पत्रिका पर चर्चा हो गई.

इस नाटकीय घटनाक्रम के तहत विरोधी बेंच की ओर से ही ‘प्रतिपक्ष’ के खिलाफ लोकसभा में विशेषाधिकार हनन का प्रस्ताव पेश किया गया. इसके पीछे प्रतिपक्ष की अपनी रणनीति थी.

पहले तो सत्ताधारी दल के अनेक सदस्यों ने भी एक साथ खड़ा होकर सदन में उस प्रस्ताव का समर्थन किया. पर सत्ता पक्ष को जब समझ में आ गया कि यह ‘प्रतिपक्ष’ पत्रिका की चाल है तो उनकी रणनीति बदल गई. इस तरह लगातार 5 दिन तक एक पक्ष प्रस्ताव का समर्थन और दूसरा पक्ष विरोध करता रहा. उन 5 दिनों में सदन में दूसरा कोई काम नहीं हो सका.

Pratipaksh Magazine

अंततः संसद के लिए ऐसी अपमानजनक टिप्पणी करने के बावजूद पत्रिका का कुछ नहीं बिगड़ा. याद रहे कि 1975 में आपातकाल लगने के साथ ही उस पत्रिका का प्रकाशन बंद हो गया था. बाद में भी ‘प्रतिपक्ष’ का प्रकाशन शुरू भी हुआ था, पर वह अधिक दिनों तक चल नहीं सका. उसके तेवर भी बदल चुके थे.

‘प्रतिपक्ष’ पत्रिका का स्वर्णिम काल वर्ष 1972 से 1975 तक ही रहा. इसके प्रधान संपादक भले जॉर्ज फर्नाडिंस थे, जो उन दिनों सोशलिस्ट पार्टी के अध्यक्ष भी थे, पर, वह पार्टी का मुखपत्र नहीं था. यदि उस पत्रिका के स्वभाव का आकलन करें तो कुछ लोग उसे ‘दिनमान’ और ‘ब्लिट्ज’ के बीच की एक चीज बताते थे. या दोनों का मिश्रण.

सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक-सांस्कृतिक मसलों को भाषणों और बहसों में गुम कर देते हैं

इसके प्रकाशन के उद्देश्य के बारे में जॉर्ज फर्नांडिस ने तब कहा था कि ‘प्रतिपक्ष विधान मंडलों और संसद जैसे अभिव्यक्ति के उन सभी मंचों को यह बेनकाब करेगा जो अवाम के वास्तविक सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक-सांस्कृतिक मसलों को भाषणों और बहसों के घटाटोप में गुम कर दिया करते हैं, और कुछ न करते हुए भी अपने नाकारापन पर रेशमी ओढ़न लादे रहते हैं. वह हिंदुस्तानी अगुआ वर्ग के मोह, स्वार्थ, भ्रम और दुरावस्थाओं को उघाड़ने की कोशिश करेगा जो हिंदुस्तानी समाज को गरिमाहीन, प्राणहीन, पराश्रयी बना रहे हैं. वह सामाजिक जीवन के उन पक्षों को सामने लाने की कोशिश करेगा जिनसे वो मुंह चुराते रहे हैं.’

8 सितंबर, 1974 के अंक में ‘प्रतिपक्ष’ पत्रिका के मुख्य पृष्ठ का शीर्षक था ‘संसद या चोरों और दलालों का अड्डा?’ इसके साथ दी गई स्टोरी में लाइसेंस घोटाले को उजागर किया गया था जिसे पहले सरकार द्वारा दबा दिया गया था.

प्रतिपक्ष की इस धमाकेदार स्टोरी और उसके शीर्षक को लेकर लोकसभा में पीलू मोदी और राज्यसभा में लालकृष्ण आडवाणी ने इस पत्रिका के खिलाफ विशेषाधिकार हनन का प्रस्ताव पेश किया. इसके पीछे विरोधी दलों की एक रणनीति थी. वो पांडिचेरी लाइसेंस घोटाले को इसी बहाने एक बार फिर उजागर करना चाहते थे.

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विरोधी दलों की इस रणनीति को पहले कांग्रेस ने नहीं समझा. इसलिए अनेक कांग्रेसी सदस्य सदन में एक साथ खड़े हो गए. संसद के प्रति अत्यंत अवमाननापूर्ण टिप्पणी पर वो तब तक एक कम चर्चित पत्रिका प्रतिपक्ष के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए स्पीकर से जोर-जोर से मांग करने लगे. पर इस बीच किसी ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को इसके पीछे की रणनीति के बारे में बता दिया. फिर क्या था, इंदिरा जी के इशारे पर कांग्रेसी सांसद स्पीकर जी.एस ढिल्लों से यह गुजारिश करने लगे कि पत्रिका के खिलाफ इस मामले को आगे नहीं बढ़ाना चाहिए.

इंदिरा गांधी

तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने विपक्ष की रणनीति का पता चलने पर स्पीकर से पत्रिका के खिलाफ मामले नहीं बढ़ाने की अपील की थी

संसद के बारे में ऐसी अपमानजनक बात पहले कभी कही या लिखी नहीं गई 

इस बीच राज्यसभा में पत्रिका और उस खबर के खिलाफ शासक दल निंदा प्रस्ताव पास करने में सफल रहा. हालांकि मामला गंभीर था और विशेषधिकार समिति में जाने लायक था. हमारी संसद के बारे में ऐसी अपमानजनक बात उससे पहले कभी नहीं कही या लिखी गई थी.

पत्रिका ने तब कुछ ऐसी बातें भी लिख दी थीं जिसे यहां दोहराया नहीं जा सकता.  लोकसभा में इस बात को लेकर 5 दिन तक सत्ता और विरोधी पक्ष में घमासान होता रहा कि पत्रिका के खिलाफ मामले को विशेषाधिकार समिति को भेजा जाए या नहीं. हालांकि अततः पत्रिका के खिलाफ मामला न तो विशेषाधिकार समिति को भेजा गया और न ही लाइसेंस घोटाले को उसकी तार्किक परिणति तक पहुंचाया जा सका. यह इस बात के बावजूद हुआ कि पत्रिका ने जिन शब्दों में संसद की अवमानना की थी वैसे शब्दों में भारतीय संसद की न तो उससे पहले और न ही बाद में कभी अवमानना की गई.

इस धुआंधार चर्चा के कारण पूरा देश जान गया कि लाइसेंस घोटाले को किस तरह उच्चत्तम स्तर से दबा दिया गया. किस तरह सत्ताधारी दल डर गया कि ‘प्रतिपक्ष’ का मामला विशेषाधिकार समिति में जाएगा तो एक बार फिर लाइसेंस घोटाला सामने आ जाएगा.

किस तरह इस घोटाले में तुल मोहन राम और एक पूर्व सांसद के खिलाफ सीबीआई ने कार्रवाई कर दी, पर मंत्री और अन्य कई सांसदों को बचा लिया.

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इस पर चर्चा के दौरान सीपीआई के हीरेन मुखर्जी ने लोकसभा में कहा था कि हाउस आॅफ कॉमन (ब्रिटेन की संसद का निचला सदन) को एक सदस्य ने महामूर्खों का सर्कस कहा था जिस पर कोई आपत्ति नहीं हुई. अगर ‘प्रतिपक्ष’ के लेख को विशेषाधिकार समिति में भेजा जाना है तो उसके साथ लाइसेंस कांड पर भी संसदीय जांच बैठाइए. सरकार जांच से घबरा क्यों रही है?

कांग्रेस के 21 सांसदों को बचाने के लिए जांच की मांग को ठुकराया गया

पीलू मोदी ने कहा कि पत्रिका में सदन के बारे में अपशब्दों का इस्तेमाल किया गया है. सभी संसद सदस्यों को चोर कहा गया है तो उसकी पूरी जिम्मेदारी सरकार की है जिसने लाइसेंस स्कैंंडल की संसदीय जांच की मांग को ठुकरा दिया. ऐसा कांग्रेस के 21 सांसदों को बचाने के लिए किया गया जिनकी सिफारिश पर पांडिचेरी की कंपनियों को आयात लाइसेंस दिए गए .

tul mohan ram new

तुल मोहन राम

याद रहे कि बाद में इस कांड की जांच की खानापूरी हुई और बिहार से एक सांसद तुल मोहन राम और एक पूर्व सासंद को कोर्ट ने सजा भी दी. तुल मोहन राम उन 21 सांसदों में शामिल थे. बाद में 80 के दशक में तुल मोहन राम ने इन पंक्तियों के लेखक को बताया था कि घोटाले की जड़ में तो बड़े लोग थे, पर सजा सिर्फ मुझे दी गई.

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