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बजट की ढाल के बावजूद कर्नाटक में बीजेपी को बहाना पड़ेगा पसीना

हाल ही में हुए एक सर्वे में कांग्रेसी सीएम सिद्धारमैया को राज्य में सीएम उम्मीदवार को तौर पर सबसे लोकप्रिय बताया गया है

Updated On: Feb 06, 2018 08:27 AM IST

Anant Mittal

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बजट की ढाल के बावजूद कर्नाटक में बीजेपी को बहाना पड़ेगा पसीना
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने लोक-लुभावन बजट को ढाल बनाकर कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धरमैया पर निकम्मेपन और भ्रष्टाचार के आरोप लगाते हुए बीजेपी के लिए राज्य विधानसभा चुनाव की रणभेरी बजा दी है.

उन्होंने उज्जवला योजना में राज्य में 8.5 लाख मुफ्त रसोई गैस कनेक्शन देने और बेंगलुरु मेट्रो के लिए बजट में आवंटित 17000 करोड़ रुपए तथा पांच लाख रुपए की स्वास्थ्य बीमा योजना की मिसाल देकर खुद को गरीब हितैषी और कांग्रेस तथा सिद्धरमैया को धंधेबाज बताया.

जबकि सिद्धारमैया क्षीर भाग्य, अन्न भाग्य, कृषि भाग्य, इंदिरा वस्त्र भाग्य, इंदिरा कैंटीन आदि लोक-लुभावन योजनाओं के भरोसे कांग्रेस को चुनावी वैतरणी पार कराने के लिए पहले से ही मैदान में डटे हुए हैं. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी उन्हीं के नेतृत्व में चुनाव लड़ने का ऐलान पहले ही कर चुके हैं.

लेकिन सिद्धारमैया सबपर भारी 

गौरतलब है कि हाल में सीएसडीएस के चुनाव पूर्व सर्वेक्षण में सिद्धारमैया को कर्नाटक में सबसे लोकप्रिय नेता पाया गया है. उन्हें 34 फीसद ने मुख्यमंत्री पद के लिए उपयुक्त बताया है जबकि बीजेपी के मुख्यमंत्री उम्मीदवार येदियुरप्पा लोगों की तीसरी पसंद रहे. दूसरी पसंद जनता दल सेकुलर नेता एच डी कुमारस्वामी रहे.

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कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया

रायशुमारी में सिद्धारमैया के नेतृत्व में 49 फीसद मतों के साथ कांग्रेस की सरकार दोबारा बनने के आसार भी पाए गए. उसके अनुसार बीजेपी को 27 फीसद और जनता दल सेकुलर को 20 फीसद मत मिल सकते हैं. इसीलिए मोदी—शाह सहित पार्टी के मुख्यमंत्री उम्मीदवार और पूर्व मुख्यमंत्री बी एस येदियुरप्पा भी 85 दिन लंबी परिवर्तन यात्रा के दौरान सिद्धरमैया पर ही निशाना साधे रहे.

मोदी भी रविवार को परिवर्तन यात्रा की बेंगलुरु में समापन सभा में ही बोल रहे थे. उन्होंने पिछले पौने चार साल में केंद्र से कर्नाटक को दो लाख करोड़ रुपए भेजने मगर विकास नदारद होने पर ताज्जुब जताया. उनसे पहले पार्टी अध्यक्ष अमित शाह भी सिद्धरमैया को हिंदू विरोधी बताकर ध्रुवीकरण का दाव खेल चुके हैं. यह बात दीगर है कि मुख्यमंत्री ने ट्वीट में मोदी का नम्मा यानी अपने कर्नाटक में स्वागत करते हुए उनसे महादयी नदी का पानी गोवा से दिलाने में दखलंदाजी की अपील का दाव खेल दिया.

उनका कहना था कि आपके द्वारा देश के स्टार्ट अप और इनोवेशन हब यानी नवाचार के गढ़ नम्मा बेंगलुरु में आने का समय निकालने की मुझे खुशी है. अपनी जनता की ओर से मैं आपसे, हमारी पीने के पानी की जरूरत पर ध्यान देने और महादयी का विवाद सुलटाने को समय निकालने का अनुरोध करता हूं. कर्नाटक को महादयी से 7.56 टीएमसी फीट पानी मुहैया कराने से उत्तर कर्नाटक के जिलों की प्यास बुझेगी.

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सिद्धारमैया की सोशल रणनीति

सिद्धारमैया यह भी साफ कर चुके कि केंद्र सरकार से फंड हासिल करना राज्य सरकार का अधिकार है, क्योंकि वही कर संग्रह करके यह राशि केंद्र सरकार को भेजती है. महादयी के पानी की मांग के लिए कन्नड़ समर्थक जमातों ने रविवार को कर्नाटक बंद की अपील की हुई थी जिसे प्रधानमंत्री की रैली के मद्देनजर मुख्यमंत्री के प्रयास से स्थगित किया गया. हालांकि अमित शाह की जनवरी में राज्य में हुई सभा के दौरान एहतियाती बंदिशें लागू थीं जिन्हें, उन्होंने मुख्यमंत्री की साजिश बताया था.

सिद्धारमैया को पटखनी देने के लिए बीजेपी संगठन के स्तर पर भी व्यापक तैयारी कर रही है. गुजरात की तरह पन्ना प्रमुख का दांव, शाह कर्नाटक में भी दोहरा रहे हैं. साथ ही बीजेपी के मौजूदा विधायकों को एक के साथ एक सीट की जिम्मेदारी भी सौंपी जा रही है. यानी हरेक बीजेपी विधायक को अपनी सीट के साथ ही पार्टी द्वारा निर्धारित और एक सीट के चुनाव प्रबंध की जिम्मेदारी भी उठानी होगी. शाह ने पार्टी की प्रदेश इकाई से सीधे मुख्यमंत्री को ही निशाने पर रखने को कहा है.

साथ ही सारे धड़ों को येदियुरप्पा की बात मानने और गुटबाजी से बाज आने की भी सख्त हिदायत दी है. हालांकि एक घटक ऐसा है जो बीजेपी के बहुत मजबूत होकर सत्ता पाने के पक्ष में नहीं है. उन नेताओं को आशंका है कि बीजेपी ज्यादा सीट जीत गई तो येदियुरप्पा ताकतवर हो जाएंगे. बीजेपी के बड़े नेता ईश्वरप्पा सार्वजनिक बयान भी दे चुके कि येदियुरप्पा की बातें अंतिम नहीं होगी.

पीएम मोदी के साथ बीएस येदियुरप्पा

पीएम मोदी के साथ बीएस येदियुरप्पा

येदियुरप्पा को उत्तरी कर्नाटक से चुनाव लड़ाने की तैयारी की भी सुगबुगाहट है क्योंकि वहां की 92 सीट सरकार बनाने के लिए महत्वपूर्ण हैं.

कर्नाटक की 224 सदस्यीय विधानसभा में बीजेपी के कुल 40 विधायक हैं और मंसूबा गुजरात की तरह 150 सीट जीतने का जताया जा रहा है. यह बात दीगर है कि गुजरात में तमाम दांवपेच के बावजूद बीजेपी 99 सीट के फेर में ही अटक गई. सत्ता के अन्य दावेदार जनता दल सेकुलर के भी 40 और कांग्रेस के 122 विधायक हैं. जनता दल सेकुलर को भी इस चुनाव में अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़नी है.

सिमट चुकी है देवगौड़ा की पार्टी

अपने खोए जनाधार को पुनर्जीवित करने के लिए राज्य की दूसरी प्रमुख जाति वोक्कलिग्गा के प्रतिनिधि एच डी कुमारस्वामी ने मंगलुरु-हुबली-धारवाड़ में लंगर डाल रखा है. साल 1995 में बीजेपी के उभार से पहले दक्षिणी कर्नाटक में पूर्व प्रधानमंत्री एच डी देवेगौड़ा का व्यापक असर था मगर धीरे-धीरे उनकी पार्टी दक्षिण के तीन जिलों मैसूर, हासन और मंड्या में सिमट गई. सत्ता की सौदेबाजी लायक सीट जीतने के लिए देवेगौड़ा को गदग, हावेरी, बेलगवी, दावणगेरे, हुबली और धारवाड़ आदि जिलों की सीटों में भी सेंध लगानी होगी.

कुमारस्वामी बीजेपी से गलबहियां करके 2006—07 में मुख्यमंत्री भी रह चुके हैं. कुमारस्वामी ने येदियुरप्पा को सत्ता नहीं सौंप कर वायदा तोड़ा था इसलिए 2008 के विधानसभा चुनाव में लिंगायतों का थोक में सहानुभूति वोट पाकर बीजेपी की सरकार बनी थी. येदियुरप्पा लिंगायत हैं और किसी दक्षिणी राज्य में पहली बार सत्तारूढ़ होने के बावजूद बीजेपी आपसी झगड़ों, खनन-जमीन-सेक्स स्कैंडलों में ऐसी फंसी कि लोगों ने 2013 में फिर कांग्रेस का दामन थाम लिया.

लिंगायतों के वीर शैव मठों का कर्नाटक में जबरदस्त प्रभाव है. इन मठों ने 20वीं सदी के आरंभ से ही जन शिक्षा और स्वास्थ्य संबंधी संस्थाएं बनाना शुरू कर दिया था. फिलहाल प्रदेश में लिंगायतों के एक हजार से ज्यादा मठ हैं. उनकी देखादेखी वोक्कलिग्गा और तमाम अन्य जातियों ने भी अपने मठ और उनके तहत शिक्षा एवं स्वास्थ्य संबंधी संस्थाएं बना रखी हैं.

सिद्धारमैया ने लिंगायतों को अल्पसंख्यक दर्जा देने का पासा फेंका था मगर आरएसएस के दखल से बीजेपी उसे रोकने में कामयाब रही. इसी तरह पांचवीं जमात तक पढ़ाई कन्नड़ भाषा में कराने की मुख्यमंत्री की पहल का भी बीजेपी ने पहले विरोध किया मगर उन्हें जन समर्थन मिलते देख उसने चुप्पी साध ली.

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सिद्धारमैया के दावे

बीजेपी की हिंदुत्ववादी राजनीति की प्रयोगशाला भी दक्षिणी कर्नाटक ही है. इसीलिए कांग्रेस इस क्षेत्र में जनता दल सेकुलर और बीजेपी की टक्कर का फायदा उठाने के फेर में है. मुख्यमंत्री सिद्धारमैया खुद भी मैसूर के चामुंडेश्वरी विधानसभा सीट से विधायक हैं. हालांकि अपने पांच साला शासन में वे उत्तरी कर्नाटक में भरपूर विकास का दावा कर रहे हैं. उनके अनुसार उनकी सरकार ने पिछ़डा क्षेत्र में शामिल हैदराबाद-कर्नाटक क्षेत्र के विकास के लिए कृषि, सिंचाई, पीडब्लूडी, ग्रामीण विकास, शिक्षा, समाज कल्याण और अन्य क्षेत्रों में रिकॉर्ड धन दिया है.

सिद्धारमैया पर शाह मुसलमानों पर मुकदमे रद्द करने की तोहमत भी लगा रहे हैं. जवाब में सिद्धारमैया ने विभिन्न आंदोलनों में पकड़े गए किसानों, मजदूरों, कन्नड़ समर्थकों आदि तमाम वर्गों के लोगों पर मुकदमे रद्द करने की दलील दी है. उनके अनुसार उनमें अल्पसंख्यक भी शामिल हैं. साथ उन्होंने याद दिलाया कि येदियुरप्पा ने भी मुख्यमंत्री बनते ही संघ कार्यकर्ताओं पर मुकदमे रद्द किए थे.

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इसी तरह उत्तर प्रदेश में योगी सरकार, पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी, केरल में पिनारयी विजयन आदि द्वारा भी मुकदमे रद्द करने का उन्होंने उल्लेख किया है. उनके अनुसार पुराने मैसूर क्षेत्र में बीजेपी के पास चुनाव में खड़े करने लायक ढंग के प्रत्याशी भी नहीं हैं. वे 71 वर्ष उम्र पार कर जाने और वर्ष 2023 के बाद चुनावी राजनीति में मौजूद नहीं रहने की दलील भी दे रहे हैं.

सिद्धारमैया साल 2005 में देवगौड़ा की पार्टी जनता दल सेकुलर से निकाले जाने के कुछ समय बाद कांग्रेस में शामिल हुए थे. उससे पहले वे दो बार उपमुख्यमंत्री और वित्तमंत्री मंत्री भी रह चुके थे. देवेगौड़ा की अपने बेटे कुमारस्वामी को राजनीतिक वारिस बनाने की कोशिश ने ही उनका सिद्धारमैया से मतभेद कराया. सिद्धारमैया कुरूबा गौड़ा जाति के किसान परिवार से हैं.

दस साल की उम्र तक स्कूल का मुंह भी न देख पाने वाले सिद्धारमैया बाद में वकालत पास करके वकील बने. उन्होंने 1983 में अपने पहले ही चुनाव में भारतीय लोकदल के टिकट पर जीत कर सबको हैरान कर दिया था. कर्नाटक की राजनीति में देवराज अर्स के बाद उन्हें ही राज्य की पिछड़ी और दलित जातियों को लामबंद करने का श्रेय जाता है.

इसी बूते उनके नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार अप्रैल-मई में संभावित चुनाव में फिर से बनने के आसार जताए जा रहे हैं. इससे जाहिर है कि लोक-लुभावन बजट की मजबूत ढाल के बावजूद बीजेपी को कर्नाटक में पसीना बहाना पड़ेगा.

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