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नोटबंदी: आर्थिक या सियासी

बगैर किसी तैयारी के सरकार ने क्यों किया नोटबंदी का फैसला?

Updated On: Nov 26, 2016 09:43 AM IST

Rajesh Raparia Rajesh Raparia
वरिष्ठ पत्र​कार और आर्थिक मामलों के जानकार

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नोटबंदी: आर्थिक या सियासी

500 और 1000 रुपए के नोट बंदी के 15 दिन हो गए हैं. लेकिन अभी भी हमें जो सुधार दिल्ली, मुंबई, कोलकता में नजर आ रहा है वो ग्रामीण इलाकों में नहीं है.गांवों में नकदी की समस्या विकराल रूप धारण करती जा रही है. आज भी बिजनेस में 40 फीसदी कारोबार नकदी में होता है.

ऐसा लगता है सरकार ने जो फैसला लिया है वो बहुत ही अच्छा है लेकिन कार्यान्वयन की तैयारी आधी-अधूरी लगती है. इसलिए सरकार को बार-बार तारीखें बढ़ानी पड़ रही है और बार-बार नियमों में बदलाव करना पड़ रहा है.

इसे एक छोटे से उदाहरण से इस तरह समझा जा सकता है. सरकार ने नोटबंदी के 15 दिनों के बाद  कहा कि जन-धन खातों में 50,000 रुपए से ज्यादा जमा नहीं कराया जा सकता है. जन-धन खातों में अब तक 21,000 करोड़ रुपए जमा हो चुके हैं.

फैसला अभी ही क्यों?

अर्थव्यस्था को धक्का तो लगेगा ही यह तय है.

अर्थव्यस्था को धक्का तो लगेगा ही यह तय है.

वित्त मंत्रालय और सरकार ने यह साफ नहीं किया है कि यह फैसला अब क्यों लिया गया, पहले क्यों नहीं लिया गया.

इस फैसले के दूरगामी परिणाम के बारे में खुद वित्त मंत्री का मानना है नोटबंदी का जो फैसला लिया गया है उसका असर 6 महीने तक रहेगा. 6 महीने के हिसाब से मार्च तिमाही के नतीजे भी कमजोर रहेंगे.

बीते 24 नवंबर को पूर्व वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ने जो वक्तव्य दिया है, उस हिसाब से देश के जीडीपी में 2 फीसदी की कमी आएगी. मनमोहन सिंह भारतीय अर्थव्यवस्था को समझने वाले सबसे सही व्यक्ति हैं. अगर उन्हें लगता है कि जीडीपी में गिरावट आएगी तो इसमें शक नहीं होना चाहिए.

सर्विस सेक्टर को उम्मीद थी कि तीसरी तिमाही के नतीजों में सुधार आएगा, लेकिन नोट बंदी के फैसले ने इस सेक्टर की उम्मीद पर पानी फेर दिया है. इसका सीधा-सीधा असर देश की जीडीपी पर पड़ेगा. इस फाइनेंशियल ईयर के लिए अभी तक जीडीपी ग्रोथ 7.7 फीसदी रहने की उम्मीद जताई जा रही थी. लेकिन अब जीडीपी ग्रोथ 7.2 फीसदी भी रहती है तो गनीमत होगी.

शादी वाले हैरान किसान परेशान

लेकिन मैं एक चीज नहीं समझ पाया कि सरकार ने नोटबंदी का ऐलान करने के लिए यह वक्त क्यों चुना. इस समय तीसरी तिमाही के नतीजे आते हैं. शादियों का सीजन होता है. साथ ही किसान रबी फसल की बुआई शुरू करते हैं. ऐसे में इस समय 500 और 1000 रुपए के नोट बैन करने से नकदी की समस्या पैदा हो गई है. कारोबार के लिहाज से भी यह समय काफी व्यस्त रहता है.

खुद को हिंदु धर्म का हितैषी मानने वाली बीजेपी के इस फैसले से शादियों में भी काफी मुश्किलें आ रही हैं. देश में आम लोगों की शादियां 2.50 से 3 लाख रुपए में हो जाती है. ऐसे में लोगों से बिल मांगना समझ से परे है. इसलिए यह टाइमिंग क्यों है, इसका कोई जवाब नहीं है. यह साफ है कि यह फैसला आने वाले विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखकर लिया गया है. लेकिन मेरा मानना है कि यह काले धन चारों को पकड़ने के बजाय पॉलिटिकल फैसला ज्यादा है.

गांवों में एटीएम और बैंकों तक नकदी नहीं पहुंच पाया है. कैश की कमी के कारण ज्यादातर एटीएम बंद हैं. 24 नवंबर से बैंकों में पुराने नोट का एक्सचेंज बंद हो गया है. इससे काफी अव्यवस्था बढ़ेगी.

Demonetization

सौजन्य: पीटीआई

सरकार के इस फैसले से सबसे ज्यादा प्रभावित वे लोग होंगे जिनकी सैलरी 15000 रुपए महीने है. 500 और 1000 रुपए के नोट बैन होने का सबसे बुरा असर इन लोगों पर ही पड़ने वाली है. इनके खाने-पीने और शिक्षा पर तगड़ी मार पड़ी है.

इस मामले में सरकार की दलील है कि बैंकों के पास कैश जमा होने से ब्याज दरों में गिरावट आएगी. लेकिन मौजूदा माहौल में ब्याज दरों में गिरावट का फायदा नहीं उठाया जा सकता है, क्योंकि डिमांड काफी कम है. ऐसे में यह उम्मीद करना कि प्राइवेट निवेश बढ़ेगा, बहुत बेमानी है.

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