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नोटबंदी के मंच पर यूपी की ताज-लीला: चुनाव का खेवैया, बैरी रुपइया...

लोगों को आशा थी कि नोटबंदी से सारा काला धन निकल जाएगा और काले धन वाले काले चोर फांसी के फंदों से लटके मिलेंगे

Updated On: Dec 31, 2016 12:06 PM IST

Pradeep Bhargava

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नोटबंदी के मंच पर यूपी की ताज-लीला: चुनाव का खेवैया, बैरी रुपइया...

उत्तर प्रदेश में नोटबंदी से लोगों में अजब-गजब वाहवाही हुई थी जो धीरे-धीरे ठंडी पड़ रही है. लोगों को आशा थी कि नोटबंदी से सारा काला धन निकल जाएगा और काले धन वाले काले चोर फांसी के फंदों से लटके मिलेंगे.

लोग कई तरह के हैं जो तरह-तरह की बातें सोचते और करते हैं. लोगों की अपनी-अपनी मजबूरियां हैं और अलग-अलग चाहतें, जैसे युवक, महिलाएं, दूर देश में काम करने वाले मजदूर और दिहाड़ी मजदूरी वाले मजदूर, छोटे-बड़े दुकानदार, किसान और बड़ी-छोटी नेतागिरी करने वाले. हर एक की अपनी ढपली, अपना एक राग है.

उत्तरप्रदेश एक गरीब मुल्क है और यहां हर व्यक्ति न सिर्फ अपनी बल्कि अपने पड़ोसी और अपने समाज के बारे में भी सोचता है.

इस मायने में गंवई उत्तर प्रदेश, शहरी राज्यों की तड़क-भड़क से अलग खड़ा है, जहां हरेक मेरा-मेरा करता है, उसे अपनी जोरू, बाल-बच्चों की भी चिंता कम होती है. एक और बात उत्तर प्रदेश की है. यहां धन्नासेठ बहुत कम हैं जिनके पास से करोड़ों रुपया बरामद होता है. वैसे ही जैसे टी.वी. के ‘समाचार सीरियल’ में दिखाए जाते हैं.

कमाल है कि सवाल है? ये तो कमाल पर सवाल है

युवक अपने प्रिय प्रधानमंत्री की बातों से सबसे प्रसन्न नज़र आए और इस सर्दी में एटीएम पर चुपचाप लंबी लाइनो में रात-बिरात लगे रहे. उनका अपने नेता में अटूट विश्वास लाइनों में खड़े-खड़े, टीवी चैनलों को इंटरव्यू देते दिखाई देता था. वह इस बात में गर्व महसूस करते हैं कि जैसे सीमा पर ठंड में जवान खड़े रहते हैं, वे भी कालेधन की स्ट्राइक में धीरज से अपना फर्ज निभा रहे हैं.

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बीजेपी के कार्यकर्ताओं ने नोटबंदी पर पीएम मोदी के फैसले का स्वागत किया

व्याकुल राजनीतिक दल (भारतीय जनता पार्टी) ने उन्हें रसगुल्ले भी बांटे. पर सब जगह ऐसा नहीं था. देवरिया में व्याकुल दल की परिवर्तन यात्रा में कुछ पथभ्रष्ट युवकों ने व्याकुलों की जूते-चप्पल से मरम्मत की. युवकों के मन में सवाल उठने भी लगे हैं. तीस महीने पहले उन्होंने जिसे अपना नेता माना था, वह सही कर रहा है? क्या उसे छोड़ दिया जाए या फिर और समय दिया जाए? हर जाति के युवकों ने उसे वोट दिया था. पर अब उनका विश्वास खिसका है. सवाल उठने खड़े हो गए हैं, जिसका असर आगामी चुनाव में दिखाई देने वाला है.

रुपइया बैरी हो गए हमार

गांव की महिलाओं, ‘माताओं और बहनों’, को नोटबंदी को लेकर बहुत सख्त नाराजगी है. उनकी तो पोल ही खुल गई. वे अपने पतियों से बचाकर कुछ रुपया घर में रखती थीं. जब लड़की ससुराल से आए तो उसको और जमाई राजा को चुपचाप कुछ देने के लिए रुपया रखा जाता था. खुद मायके जाए तो भतीजी के लिए फ्राॅक खरीदने, मायके वाले गरीब हों तो खुद अपने लिए साड़ी खरीद कर वापस आ पति के सामने इठलाने के लिए रुपया काम आता था.

नोटबंदी ने उनका मजाक बना दिया है. उन्हें अब छुपा कर बचाया रुपया पति या बेटे के बैंक अकाउंट में डालना पड़ा. पति से या लड़के से उन्हें कुछ वापस मिला, न मिला. किसके करने-धरने से ये सब हुआ वे जानती हैं और गुस्से में उसे निर्बंशिया या बेऔलाद की गालियां भी देती हैं. 'मोतिया दहि जरी क पूत का ओट न देब.'

परदेस से बिन पैसे लौटे, न इधर के रहे, न उधर के

मेजा इलाके में पत्थर तोड़ने वाले कई मजदूर, गुजरात, महाराष्ट्र तक मजदूरी करने जाते हैं. नोटबंदी होने पर वे दो हजार से 20 हजार रुपये तक की मजदूरी बकाया छोड़ कर आए हैं. उन्हें ये पता नहीं है कि यह मजदूरी जो वे छोड़ आए हैं उन्हें मिलेगी कि या नहीं. अगर मिलेगी भी तो कब या फिर कॉन्ट्रैक्टर मिलेगा भी या नहीं?

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नोटबंदी का सबसे ज्यादा नुकसान दिहाड़ी मजदूरों को हुआ है

एक मजदूर ने एनडीटीवी पर देखा कि गुजरात के नरसेला में उनका कॉन्ट्रैक्टर एक गायक पर दो-दो हजार के हजारों नोट लुटा रहा है. पता नहीं वही कॉन्ट्रैक्टर था या कोई और. कई लोग लुटा रहे थे... लाखों रुपया बिखरा पड़ा था. हर एक व्यक्ति जो पैसा लुटा रहा था वो उन्हें कान्ट्रैक्टर ही दिखाई दे रहा था और लुटाया जा रहा रुपया उसे अपना या साथियों का लग रहा था.

गांव में नरेगा में काम के बदले मिले रुपए बैंकों में बंद है क्योंकि बैंक के पास रुपया नहीं है. उनके पास तो कार्ड भी नहीं कि एटीएम की लाइन में खड़े हों और व्याकुल दल उन्हें रसगुल्ला खिला दे. पता नहीं प्रदेश में वोट पड़ने के समय तक यहां रहेंगे या मजदूरी करने निकल पड़ेंगे नहीं तो रसगुल्ला खिलाने वाली पार्टी को ही वोट देते. उनका कॉन्ट्रैक्टर इसी पार्टी का है. कॉन्ट्रैक्टर उनके साथ कैसा भी सुलूक करे वे रहेंगे मालिक के ही साथ.

कैश या स्वैपः गहरी है चाल

एक हैं झूंसी (इलाहाबाद) की रहने वाली कल्लो देवी. जोड़-तोड़ कर अपनी लड़की की शादी में पूरा लाख रुपया खर्चा किया. सोचा था फलों की दुकान से होने वाली आमद से उधार चुका देंगी. नोटबंदी के चलते ग्राहक ही न आए. तीन म्यूचुअल फंड इनवेस्टमेंट से कर्जा लिया था जो अब जान के पीछे पड़ी हैं.

ऐसे हजारों हजार छोटे दुकानदार हैं जो बेचारे स्वैप-मशीनें लगवा रहे हैं. समझने भी लगे हैं कि वित्तमंत्री की टैक्स की मार से अब बचना कठिन है. एक हैं रमाशंकर जिन्हें सबसे छुपा कर चिक्की खाने का बड़ा शौक है. दुकान पहुंचे चिक्की लेने और ऐंठ कर अपना डेबिट कार्ड निकाला, दुकानदार को बोले स्वैप मशीन है? दुकानदार ने स्वैप मशीन निकाली और बोला- चिक्की के पचास रुपये कैश में और सत्तर रुपया स्वैप में. रमाशंकर जी सकुचाए लेकिन पचास रुपया नकद में देकर चिक्की कुतरते चले गए.

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स्वाइप मशीनों और डेबिट कार्ड से पेमेंट एक विकल्प के तौर पर उभरा

दूरदर्शी वित्तमंत्री यह देख रहे थे. उनकी कुटिल चंठई वाली मुस्कान गायब हो गई और चेहरा उतर गया. दुकानदार व्याकुल पार्टी के समर्थक और रमाशंकर विरोधी रहे हैं. दुकानदार का टैक्स के चलते व्याकुल पार्टी से मोहभंग हो रहा है. रैडिकल रमाशंकर सोच रहे हैं कि सरकार को टैक्स तो देना ही चाहिए, नहीं तो शक्तिशाली राष्ट्र कैसे बनेगा? विचारों की उलटा-पलटी से व्याकुल पार्टी नहीं समझ पा रही कि वह नोटबंदी से फायदे में रहेगी या नुकसान में.

स्वैप, किस्मत वाह और आह का खेल

ई-पेमेंट को जनता अपनाए इसके लिए वित्तमंत्री जी ने लॉटरी की शुरुआत की है. रमाशंकर जी ने भी एक जगह दांव तो लगा दिया पर ये भी जानते हैं कि एक जीतने वाले की वाह के पीछे लॉटरी हारने वाले हजारों की आह भी होगी. वित्त मंत्री जी सोचते हैं कि एक वाह हजारों की आहों से ज्यादा पार्टी का फायदा करेगी. क्योंकि आह करने वाले वाह पाने के लिए लॉटरी लगाते रहेंगे अनंत काल तक.

इधर काला धन वापस आने के इंद्रजाल से राष्ट्रीय चेतना का निर्माण हो रहा है. दूसरी ओर लोग अपनी रोजमर्रा की आह से विचलित हैं. दोनों में कौन भारी पड़ेगा वह इस बात पर निर्भर करेगा कि बात कौन कह रहा है, किस मौके पर व कैसे कह रहा है. अगर बात मन में बैठ गई तो व्याकुल पार्टी के न्यारे-न्यारे.

किसान का मंगलः चाचा भतीजे का दंगल

उत्तर प्रदेश किसानों का भी देश है, बल्कि किसानों का ही देश है अभी भी. छोटे-बड़े सभी किसानों की हालत खराब है. पैसा कम होने से बीज तो डाला पर खाद न डाल पाए. कुछ किसान तो घटिया बीज ही डाल पाए. पैसा उधार तो मिलता पर बहुत ज्यादा ब्याज पर.

समावादी पार्टी की दंगल ने यूपी के वोटरों को असमंजस की स्थिति में डाल दिया है

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धान की कीमत लग रही 1500 रुपया क्विटल नकद अगर अभी चाहिए तो. बाद में पता नहीं कब, इंतजार करो तो मिले 1900 रुपया. लोगों के पास सब्जी खरीदने को पैसा नहीं. औने-पौने भाव में किसानों को सब्जी बेचनी पड़ रही है. कहीं-कहीं तो लागत भी नहीं मिली. ज्यादा किसान तो ओबीसी हैं और समाजवादियों के साथ हैं. लेकिन समाजवादी आपस में ही भिड़े पड़े हैं कि कौन बड़ा समाजवादी- चाचा या भतीजा. कुछ ओबीसी छोड़-छाड़ ‘पटेलाई’ करने व्याकुल पार्टी के साथ पहले ही चले गए थे.

मोहब्बत और नफरत

चिनाॅय सेठ जिनके अपने घर शीशे के हों वो दूसरों पर पत्थर नहीं फेंका करते.

एक हैं मायावती. पार्टी के खाते में दिल्ली के बैंक में पैसा जमा कराया 102 करोड़ रुपया. खम ठोक के बोलीं, ‘है कोई माई की लाल पार्टी, बताए उसके अकाउट में कितना पैसा है और कहां से आया? मुझे देने वाले पार्टी सदस्य हैं, तुम्हें कौन दे रहा बताओ.' व्याकुल पार्टी से पूछा कि बता तेरे खातों में 8 नवम्बर से 10 महीने पहले तक कितना पैसा था और 8 नवंबर के बाद कितना पैसा खातों में आया? सभी पार्टियों की सिट्टी-पिट्टी गुम. न कोई ट्वीट करे न फेसबुक, न कोई भाषण में मायावती को जवाब दे. लो कर लो बात. उसके समर्थक फूल कर कुप्पा हो रहे हैं. अधिकतर हैं भी तो गरीब. वोट पड़ने वाले दिन वाली आधी रात में व्याकुल और समाजवादियों के देवताओं के प्रसाद सोमरस से मन डोल भी तो जाता है. उत्तर प्रदेश है पश्चिम बंगाल नहीं. 'कोई नृप होए, हमें का हानि' तुलसीदास ने यहीं गंगा किनारे कही थी.

शतरंज के खिलाड़ी है प्यादों के व्यापारी

शतरंज की बिसात बिछ चुकी है. अखिलेश और मायावती और राहुल गांधी नोटबंदी के विरुद्ध मुखर हैं. अखिलेश ने विकास का एजेंडा बीजेपी के हाथों से देखते-देखते उड़ा लिया और अपने को विकास का छोकरा समझ रहे हैं. अखबारों से ऐसा ही लगता है. टीवी पर एनिमेटेड बुलेट ट्रेन भी चलती है. मायावती का अपना अटल-अविचल ऐसा वोट बैंक है जो किसी के पास नहीं. उनको स्टेपनी वोट चाहिए जो कहीं-कहीं वे जुटा लेंगी. उनपर नोटबंदी का जितना फर्क पड़ना था, पड़ चुका है.

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मायावती के पास एक मजबूत वोटबैंक है जो हर हाल में उनके साथ है

राहुल ने गरीब मजदूरों, किसानों और महिलाओं की बातों से व्याकुल पार्टी के नाक में दम किया हुआ है. व्याकुल पार्टी नोटबंदी के झटके को राष्ट्रीय चेतना बनाने के लिए प्रतिबद्ध है. उसके सैनिक, अर्ध सैनिक कहते फिर रहे हैं कि धीरे-धीरे हलाल करने से अच्छा है झटके से काला धन निकाला जाए. व्याकुल पार्टी के पास अभी कई एजेंडे हैं जिन पर काम शुरू होना है. नोटबंदी के चलते सैनिक कम हैं, काम ज्यादा. अभी शहर-कस्बों में थोड़ा सामाजिक तनाव, भूले-बिसरों की घर-वापसी, भगवान राम के लिए आलीशान मंदिर भी वहीं बनाना है. हर बूथ पर 5 सैनिक का इंतजाम अलग से करना है. अभी व्याकुल पार्टी को घोड़े की कई टेढ़ी चाल चलनी है. उसने नोटबंदी से कुछ प्यादों को स्ट्रेटिजकली शहीद भी कराया है. इनकी शहादत कैसे भुनेगी समय और टेढ़ी चाल से ही मालूम पड़ेगा.

मायावती के हाथी सीधे चलते हैं पर मारक होते हैं. दो हाथी मिलकर राजा को मात दे सकते हैं. समाजवादी ऊंट की तरह तिरछा चलता है पर काला ऊंट सफेद घर में आना चाहता है और सफेद काले में. कांग्रेस की रानी अभी अपनी जगह पर स्थिर है. कहते हैं कि अगर वह रंग में आ जाए तो जीत पक्की. हर पार्टी ने कुछ प्यादों का शहीद होने दिया है पर एक-आधा प्यादा सभी रखे हुए है ताकि राजा की रक्षा की जा सके. आखिरकार कुछ प्यादों की शहादत और कुछ के होने से ही राजा सही सलामत रह सकता है.

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