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नोटबंदी: 'जियो मोदी क्या दांव मारा है कसम से...'

पिछले दो वर्षों से देश में जो सांप्रदायिकता का माहौल था वह अब वर्ग-संघर्ष में बदल गया है.

Updated On: Dec 18, 2016 08:26 AM IST

Nazim Naqvi

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नोटबंदी: 'जियो मोदी क्या दांव मारा है कसम से...'

नोटबंदी को लागू हुए मुश्किल से अभी एक हफ्ता ही हुआ था. मैं खार (वेस्ट) से मुंबई एयरपोर्ट के लिए रवाना हुआ. भला हो उबर टैक्सी सर्विस का, जिसे सिर्फ 148 रुपये ही देने पड़े. इस कैशलेस होते संसार में थोडा कैश जेब में पड़ा हो, यही सबसे बड़ी राहत की बात है.

रास्ते में उबर के ड्राइवर (जो नोटबंदी से संतुष्ट नजर आ रहा था) ने ये कहकर चौंका दिया कि 'साब कुछ कह लो, लेकिन मोदी ने एक मुहावरे को उलट दिया है'. मैं चौंक पड़ा, क्योंकि अभी तक लग रहा था कि नोटबंदी ने देश की जेब उलट दी है लेकिन यहां तो बात मुहावरे तक पहुंच चुकी है. पूछा, कौन सा मुहावरा? बोला 'वही मुहावरा जो अमीर के लिए बोला जाता था कि इसके पास तो इतना पैसा है की सात पुश्तें खाएंगी'.

सांप्रदायिकता की जगह वर्ग-संघर्ष

उस ड्राइवर का ये जुमला एक बार फिर पूरी शिद्दत के साथ याद आया जब मैं 50 साल की सियासत में डूबी हुई आंखों को पढ़ने की कोशिश कर रहा था और उन आंखों के मालिक, एक अनुभवी नेता, बोल रहे थे, 'जो सबसे बड़ी बात इस नोटबंदी से हुई है वो ये कि पिछले दो वर्षों से देश में जो सांप्रदायिकता का माहौल था वह अब वर्ग-संघर्ष में बदल गया है.

वर्ग-संघर्ष, हां ये वर्ग-संघर्ष ही तो है जिसके नतीजे में गरीब अपनी तकलीफों को भुला बैठा है. 'भैया हमें तो आदत है भूखा रहने की, लेकिन अब तो लाला जी के चेहरे पर भी उसी भूख और भय की परछाईं देखकर ये आंखें तृप्त हो रही हैं. अब इन ससुरों को पता चलेगा कि भूख क्या होती है. सात पुश्तों वाली बेफिक्री, एक झटके में उड़न-छू हो गई. जियो मोदी क्या दांव मारा है कसम से...'

नोटबंदी ने दिलाई सांप्रदायिकता से मुक्ति

आजादी के बाद से लेकर आज तक कभी ऐसा नहीं हुआ कि पूरा देश एक साथ घायल हुआ हो. जाहिर है कि जब घायल होने की कोई मिसाल नहीं है तो जो संयम दिखाई दे रहा है उसकी तुलना भी नहीं की जा सकती. मामला अर्थ-व्यवस्था का है जो आंकड़ों के सहारे समझी और समझाई जाती है, वहां भी नोटबंदी से प्रभाव का कोई आंकड़ा उपलब्ध नहीं है इसलिए तुलना की गुंजाइश वहां भी नहीं है.

इलाहाबाद में 17 नवंबर को एक बैंक के बाहर कतार में लगे लोग. (फोटो: एपी)

इलाहाबाद में 17 नवंबर को एक बैंक के बाहर कतार में लगे लोग. (फोटो: एपी)

असहिष्णुता, अवार्ड-वापसी, लव-जिहाद, घर-वापसी, गो-हत्या, इनके अलावा साम्प्रदायिकता की चाशनी में लिपटी कुछ हिंसात्मक घटनाएं. देश के आतंरिक माहौल में नोटबंदी से पहले, मोदी-शासन इन्हीं से जूझ रहा था. मजे की बात ये कि वैसे ही रटे-रटाए बयान भी दे रहा था कि जिनको सुनने के हम आदी हैं. 'राज्य-सभा में अल्पसंख्यक मामलों के राज्यमंत्री मुख्तार अब्बास नक़वी ने जानकारी देते हुए बताया कि सूचनाओं के मुताबिक साम्प्रदायिक घटनाओं में पिछले दो वर्षों में कमी आई है.'

अमीर-गरीब सब लाइन में

नोटबंदी ने पूरा माहौल ही बदल दिया है. क्या हिन्दू क्या मुसलमान, क्या अमीर क्या गरीब, क्या अगड़ा और क्या पिछड़ा, सब लाइन में लगे हैं. हालांकि, इस बीच गरीब को जब ये नजर आया कि दो हजार के जिस एक नोट को हासिल करने में उसे घंटों लग रहे हैं, वही नायाब नोट किसी घर से ढाई करोड़ तो कहीं से दस करोड़ की तादाद में बरामद हो रहा है तो उसका धैर्य डोलने लगा.

सूत्रों की मानें तो खुफिया-तंत्र ने प्रशासन को इस खतरनाक स्थिति से वक्त रहते आगाह कर दिया है. कहा जा रहा है कि आयकर-विभाग के छापों में तेजी इसी बात का प्रमाण हैं. ‘प्रशासन जमाखोरों से सख्ती से निपट रहा है’ यही वह रामबाण-सन्देश है जो सौ करोड़ जनता के सब्र का पैमाना छलकने से रोक पाएगा, सरकार और खुफिया-तंत्र का यह निश्चित मत है.

देशभर में 586 छापे, तीन हजार करोड़ बरामद

ताजा आकंड़ों के मुताबिक आयकर-विभाग, शनिवार तक, देशभर में 586 छापे मार चुका है और लगभग तीन हजार करोड़ बरामद कर चुका है. ये कवायद 30 दिसंबर तक पूरे जोरो-शोर से जारी रहेगी, ऐसा आप मान सकते हैं.

Shiv Sena corporator allegedly arrested with new Rs 2000 currency notes

मुंबई में शुक्रवार को शिवसेना जुड़े एक व्यक्ति के पास से 40 लाख रुपये के नए नोट बरामद. (फोटो: पीटीआई)

अगली मुश्किल, आने वाले चुनावी माहौल की है. क्या चुनाव इसी वर्ग-संघर्ष के बीच होंगे. अगर ऐसा हुआ तो वोटों के समीकरणों का क्या होगा? कहीं का गुंडा कहीं लाकर खड़ा किया जा रहा है, इस दरवाजे का ठेकेदार उस दरवाजे से निकल रहा है. उनकी टोपी इनके सर पर फिट की जा रही है. साइकिल से मोटर साइकिल का मुकाबला होगा. सारी मेहनत पर नोटबंदी पानी फेर देगी क्या? ये काल्पनिक प्रश्न नहीं है.

इस बीच साक्षी महाराज और ओवैसी जैसे नेता जो ‘प्यार’ में भी साम्प्रदायिकता ढूंढ लेते हैं, बेचैन हैं. नोटबंदी को साम्प्रदायिक पोशाक कैसे पहनाई जाए? ओवैसी ने तो ‘मुसलमान-एटीएम’ और ‘हिन्दू-एटीएम’ शब्द रचना गढ़कर अपना खाता खोल दिया है. 'सरकार जान-बूझकर मुस्लिम बहुल इलाकों के एटीएम में पैसे नहीं डाल रही है'. अब बारी साक्षी महाराज जैसों की है लेकिन मुसीबत ये है कि कोई भी ऐसा पत्थर अपने ही बदन को जख्मी कर जाएगा. मोदी ने तो किसी को भी नहीं छोड़ा है.

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