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मोदी की नोटबंदी से विपक्षी दल असमंजस में

पीएम मोदी द्वारा की गई नोटबंदी के विरोध में समूचा विपक्ष भ्रमित है

Updated On: Nov 27, 2016 10:39 AM IST

सुरेश बाफना
वरिष्ठ पत्रकार

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मोदी की नोटबंदी से विपक्षी दल असमंजस में

8 नवंबर की रात को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा 500 और 1000 रुपए के नोट बंद किए जाने की घोषणा के बाद देश की राजनीति में भूचाल जैसी स्थिति पैदा हो गई है. 9 नवंबर को लगभग सभी विपक्षी दलों की प्रतिक्रिया सकारात्मक थी. सभी ने कहा कि हम काले धन के खिलाफ सरकार जो भी कदम उठाएगी उसके साथ हैं, लेकिन जब बैंकों के सामने आम लोगों की लाइन एक किलोमीटर लंबी हो गई तो विपक्षी दलों ने अपना राग बदल लिया.

कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी सहित कई वरिष्ठ नेताओं को लगा कि राजनीतिक तौर पर मोदी ने अपने सिर पर गोली मार ली है और यही मौका है कि उन सभी राजनीतिक दलों को एकजुट किया जाए जो मोदी-विरोधी हैं. आप पार्टी के नेता व दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने तो घोषणा कर दी कि जनता मोदी के खिलाफ बगावत कर देगी और कुछ दिनों के भीतर ही मोदी को इस्तीफा देना पड़ेगा.

कांग्रेस पार्टी के नेताओं का विश्लेषण था कि नोटबंदी पर आम लोगों की परेशानी के चलते भाजपा के भीतर भी मोदी-विरोधियों की आवाज तेज होगी. ये मोदी-विरोधी तभी सामने आएंगे, जब विपक्षी दल एकजुटकर जनता की परेशानी को देशव्यापी आंदोलन में तब्दील करने में कामयाब होंगे.

इस बात में सच्चाई है कि नोटबंदी के निर्णय से भाजपा के कई नेता व सांसद अलग-अलग कारणों से परेशान और दुखी थे. वे भी यह उम्मीद लगाए बैठे थे कि यदि जनता की बढ़ती परेशानी और एकजुट विपक्षी दलों के विरोध के चलते प्रधनामंत्री मोदी को अपने निर्णय पर पुनर्विचार करेंगे.

शास्त्री जी ने भी मांगा था जनता का सहयोग

Lal Bahadur Shastri

गेटी इमेज

नरेंद्र मोदी को इस बात का श्रेय दिया जाना चाहिए कि उन्होंने तमाम भीतरी व बाहरी विरोध व विपरीत स्थितियों के बावजूद एक क्षण के लिए भी यह आभास नहीं कराया कि वे नोटबंदी के निर्णय को वापस लेने पर विचार कर सकते हैं. लाल बहादुर शास्त्री के बाद मोदी दूसरे प्रधानमंत्री है, जिन्होंने देश की जनता से अपील की कि कुछ सप्ताह के लिए सबको परेशानी के दौर से गुजरना पड़ेगा.

आजादी के बाद भारत में लगभग सभी दलों के नेताओं ने आम जनता को वास्तविकता से दूर रखकर सब्जबाग दिखाकर अपना राजनीतिक उल्लू सीधा करने की कोशिश की है. जब देश में खाद्यान्न की कम हो गई थी, तब लाल बहादुर शास्त्री ने देशवासियों से सप्ताह में एक दिन उपवास करने का अनुरोध किया था और जनता ने उसे स्वीकार किया था.

मोदी ने लगभग उसी अंदाज में कहा कि काले धन के खिलाफ लड़ाई में जनता को 50 दिनों की मुसीबतों से गुजरना पड़ेगा. नोट बदलवाने के लिए आठ-दस घंटे लाइन में खड़े होने के बाद भी लगभग 80 प्रतिशत लोगों ने कहा कि मोदी ने सही कदम उठाया है. मोदी अब नेताओं की बजाय सीधे जनता को विश्वास में लेकर अपनी राजनीति को आगे बढ़ा रहे हैं.

मोदी ने अपनी इस लड़ाई को काले धन के साथ फर्जी नोट, आतंकवाद व नक्सलवाद के खिलाफ भी जोड़ दिया. नोटबंदी के बाद पहले तीन दिनों तक देश भर में जो हालात हुए उससे कई नेता इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि आर्थिक अराजकता की स्थिति निर्मित हो रही है. टीवी चैनलों के परदे पर पूरा देश बैंकों के सामने कतार में खड़ा दिखाई दिया. कुछ टीवी चैनलों ने जनता की इस परेशानी को बढ़ा-चढ़ाकर भी दिखाया.

संसद में असमंजस में दिखा विपक्ष

Winter Session of Parliament

पीटीआई इमेज

पिछले पांच दिनों तक संसद में जो कुछ हुआ, उससे यह स्पष्ट हुआ कि नोटबंदी को लेकर विपक्षी दल पूरी तरह असमंजस व भ्रम की स्थिति में है. राज्यसभा में पहले दिन नोटबंदी पर बहस हुई. दूसरे दिन जब बैंकों के सामने लोगों की कतार लंबी हुई तो कांग्रेस सहित सभी विपक्षी दलों ने अपनी रणनीति बदली. मांग की गई कि जब तक प्रधानमंत्री सदन में मौजूद नहीं होंगे और जवाब नहीं देंगे, तब तक कारर्वाई आगे नहीं बढ़ेगी.

फिर जब प्रधानमंत्री राज्यसभा में मोजूद हुए और बोलने के लिए तैयार हुए तो मांग की गई कि मोदीजी को बहस के दौरान निरन्तर सदन में रहना होगा। राज्यसभा में प्रधानमंत्री मोदी पर यह आरोप लगाया गया कि उन्होंने भाजपा के कुछ नेताओं और दोस्तों को पूर्व जानकारी दे दी थी. केजरीवाल ने तो इसे 8 लाख करोड़ का घोटाला बता दिया.

कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद ने कहा कि हम नोटबंदी के विरोध में नहीं है, लेकिन डॉ. मनमोहन सिंह ने इसे कानूनी लूट की संज्ञा दे दी. बिहार के मुख्यमंत्री व जद(यू) अध्यक्ष नीतिश कुमार मोदी के कदम का समर्थन कर रहे हैं. लालू व मुलायम इस मुद्दे पर अधिक बोलने के खतरे को महसूस कर रहे हैं. ममता बनर्जी व केजरीवाल अलग रास्ते पर चल रहे हैं. मायावती का कहना है कि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में लाभ लेने के लिए मोदी ने नोटबंदी की है. दूसरी तरफ उनके अनुसार इस निर्णय से लोग परेशान भी है.

मोदी ने अब इस लड़ाई को काले धन तक सीमित नहीं रखा है, उन्होंने इसे अमीर-गरीब व ईमानदार-बेईमान के बीच संघर्ष का रूप दे दिया है. नोटबंदी की वजह से जिस रफ्तार के साथ देश में काले धनवालों का पर्दाफाश हो रहा है, उसी अनुपात में विपक्षी दलों की परेशानी बढ़ती जा रही है. आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति में मोदी विपक्षी नेताओं की तुलना में कई कदम आगे हैं.

पीएम के आरोप से परेशान विपक्ष

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अब विपक्षी दल मोदी के इस आरोप से परेशान है कि कुछ लोग नोटबंदी का विरोध इसलिए कर रहे हैं कि मोदी ने उन्हें पर्याप्त समय नहीं दिया. विपक्षी दलों ने मोदी पर हमला बोला तो मोदी ने भी विपक्ष पर हमला बोल दिया है. यह लड़ाई अब पूरी तरह चुनावी राजनीति का हिस्सा बन चुकी है, इसलिए इसका जारी रहना या थम जाना राजनीतिक लाभ-हानि के गणित पर ही निर्भर करेगा.

नोटबंदी को लेकर जनता के दिमाग में क्या चल रहा है? इस सवाल को लेकर विपक्षी दलों के नेता आज भी भ्रमित दिखाई दे रहे हैं. वहीं दूसरी तरफ नरेंद्र मोदी इस भरोसे के साथ आगे बढ़ रहे हैं कि काले धन के खिलाफ शुरु की गई इस लड़ाई में जनता उनके साथ है. अगले साल फरवरी में पांच राज्यों में होनेवाले विधानसभा चुनाव को अब नोटबंदी पर जनमत-संग्रह के रूप में ही देखा जाना चाहिए. उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव का नतीजा इस बात का संकेत भी होगा कि 2019 के लोकसभा चुनाव में क्या होनेवाला है?

 

 

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