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नोटबंदी: पीएम मोदी का 50 दिनों का वादा मुश्किलों भरा है

सबसे आशावादी आकलन यही है कि कैश की कमी मार्च तक ही सामान्य हो सकेगी

Updated On: Dec 02, 2016 10:27 AM IST

Dinesh Unnikrishnan

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नोटबंदी: पीएम मोदी का 50 दिनों का वादा मुश्किलों भरा है

भारतीय स्टेट बैंक की चेयरमैन अरुंधती भट्टाचार्य से बुधवार को पूछा गया कि एटीएम मशीनों में कैश की कमी कब तक रहने वाली है. जब कर्मचारियों के खातों में अब वेतन डाले जाएंगे और लोग एटीएम मशीनों/बैंक शाखाओं के चक्कर लगाएंगे, उसके लिए बैंकिंग व्यवस्था कितनी तैयार है? इसपर उन्होंने कहा, 'अभी 33000 एटीएम मशीनें हमारे लिए कैश निकाल रही हैं. दिन गुजरने के साथ और भी मशीनें शुरू होंगी. आपको रिजर्व बैंक से बात करनी चहिए,'

वर्तमान में भारतीय स्टेट बैंक के 49000 एटीएम हैं. अगर 33000 एटीएम मशीनों से कैश निकल रहा है तो इसका मतलब हुआ कि देश के सबसे बड़े बैंक (पैसों के आधार पर) की लगभग 67 प्रतिशत एटीएम मशीनों से कैश निकल रहा है. मान लेते हैं कि बाकी बैंकों ने भी अपनी कम-से-कम 50-60 प्रतिशत मशीनों में कैश भर लिया होगा. चीजें बेहतर होनी चाहिए थीं. लेकिन, आप अपनी आंखों देखी को तो झुठला नहीं सकते.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नोटबंदी ऐलान के तीन हफ्ते बाद भी बैंकिंग व्यवस्था में दो लाख एटीएम मशीनें कैश की कमी से जूझ रही हैं और रोजाना जीवन में दर्दभरी कहानियां नजर आ रही हैं. 21 दिन बीत जाने के बाद भी मुश्किलें घटती नहीं दिख रही हैं, विशेषत: ग्रामीण इलाकों में. (इनके बारे में यहां, यहां, यहां, और यहां पढ़ सकते हैं.)

500 के नोटों की समस्या

रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया और सरकार दोनों जनता को भरोसा दिलाती रही हैं कि बैंकों के पास पर्याप्त कैश हैं और घबराने की कोई बात नहीं है. फिर भी जमीनी तौर पर लगातार कैश की कमी अभी तक क्यों दिखाई दे रही? कारण समझना बहुत आसान है. 500 और उससे कम के नोट पर्याप्त मात्रा में हैं ही नहीं. रुपये छापने वाले सरकारी कारखाने बड़े पैमाने पर 2000 के नोट छाप रहे हैं और आम आदमी के ज्यादा काम आने वाले 500 के नोट की छपाई दुर्लभ बनी हुई है. 500 के नोटों के अभाव के लिए भट्टाचार्य ने भी नकदी की कमी को दोष दिया है.

500 Rs note

पांच सौ के नोटों की कमी अभी बनी हुई है.

भट्टाचार्य ने कहा, 'फिलहाल ज्यादा उपलब्धता बड़े नोटों की बनी हुई है. लोगों को चाहिए छोटे नोट, विशेषत: 500 के नोट. प्रिंट हो रही कतारों को बदलने में वक्त लगता है. शुरुआत में छपाई 2000 के नोटों पर केंद्रित थी ताकि थोक में नोट उपलब्ध कराए जा सकें.'

बैंकों तक 500 के नोट पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध होने में और कितना वक्त लगेगा? इस पर भट्टाचार्य ने जवाब दिया कि 'रिजर्व बैंक से बात करिए.' रिजर्व बैंक ने 500 के नोटों की छपाई के सन्दर्भ में कोई जानकारी नहीं दी है. नोटों की कमी से जुड़ी विस्तृत प्रश्नोत्तरी केन्द्रीय बैंक प्रवक्ता को भेजी गई थी जिसका यह लेख लिखे जाने तक जवाब नहीं दिया गया है.

करेंसी प्रिंटिंग क्षमता 40 प्रतिशत

आईएएनएस की 17 नवम्बर की रिपोर्ट के मुताबिक, करेंसी प्रिंटिंग प्रेसों की क्षमता के आधार पर नोटों की भरपाई करने में लगभग 6 महीने का वक्त लगेगा, विशेषत: 500 के नए नोटों की. चार करेंसी प्रेस हैं- नासिक (महाराष्ट्र), देवास (मध्य प्रदेश), सलबोनी (पश्चिम बंगाल) और मैसूर (कर्नाटक) में. पहली दो सिक्योरिटी प्रिंटिंग एंड मिंटिंग कॉरपोरेशन आॅफ इंडिया लिमिटेड के माध्यम से केंद्र सरकार के हैं. वित्त मंत्रालय की हालिया सालाना रिपोर्ट से मिली जानकारी के अनुसार इन दो प्रेसों की साल भर की करेंसी प्रिंटिंग क्षमता देश में मौजूद कुल करेंसी की 40 प्रतिशत है.

अन्य दो प्रेस, सलबोनी और मैसूर, भारतीय रिजर्व बैंक नोट मुद्रण प्राइवेट लिमिटेड (बीआरबीएनएमपीएल) के अंग हैं, जो कि पूरी तरह रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के अधीन हैं.

बीआरबीएनएमपीएल की वेबसाइट के अनुसार, ये दो, कुल करेंसी का 60 प्रतिशत छापते हैं. प्रति वर्ष दो शिफ्ट में 16 बिलियन नोट प्रिंट कर सकते हैं. इसका मतलब है कि देश की कुल क्षमता 2 शिफ्टों में 26.66 बिलियन नोटों की है. अगर सभी 3 शिफ्ट जारी रहें, जैसा कि सरकार के अनुसार अब हो रहा है, सभी चारों प्रेस एक साल में 40 बिलियन नोट छाप सकेंगे.

जब पीएम मोदी ने नोटबंदी का ऐलान किया, देश में 500 के 15.78 बिलियन नोट चलन में थे और 1000 के 6.84 बिलियन नोट. संक्षेप में, कैश की कमी की भरपाई होने में कम-से-कम कुछ महीने लगेंगे.

50 दिन का वादा

13 नवंबर को पीएम मोदी ने नोटबंदी के बाद जनता को हुई मुश्किलों के बदले 50 दिनों की मोहलत मांगी थी. लेकिन क्या प्रधानमंत्री अपना वादा पूरा कर सकते हैं? इस स्तर पर आकर यह संदेहपूर्ण लगता है. ज्यादातर बैंकर, अर्थशास्त्री और वित्तीय क्षेत्र के विशेषज्ञों ने कहा है कि स्थितियों के सामान्य होने तक कैश की कमी कम-से-कम मार्च तक बनी रह सकती है. यानी प्रधानमंत्री द्वारा मांगे गए वक्त से तीन महीने ज्यादा.

‘क्विंट’ की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार सरकार के नासिक और देवास कारखानों में 500 के नए नोटों की छपाई रुकने की ओर है. रिजर्व बैंक के सूत्रों का हवाला देते हुए रिपोर्ट बताती है कि लगातार हो रही त्रुटियों और प्रिंटिंग क्षमता में कमी ने रिजर्व बैंक और सरकार को यहां 500 के नोटों की छपाई रोक देने के लिए मजबूर किया है. फर्स्टपोस्ट ने इस खबर की पुष्टि नहीं की है. लेकिन, अगर यह रिपोर्ट सच है तो आम आदमी तक 500 के नोटों की पर्याप्त पहुंच बनने में और अधिक देरी होगी. इंतजार करिए कि आगे कैसी स्थिति बनती है.

रिजर्व बैंक के पूर्व डिप्टी गवर्नर केसी चक्रबर्ती ने फर्स्टपोस्ट से कहा, 'स्थिति बहुत खराब है. सामान्य होने में कम से कम पांच-छह महीने लगेंगे.' 500 के नोट छपवाने में सरकार की जल्दीबाजी के कारण और ऐसा करते हुए तैयारी की कमी की वजह 500 के नए नोटों के दो रूप जनता के बीच आ गए. प्रिंटिंग की गलतियां दिखाई दीं, जैसे महात्मा गांधी की तस्वीर की परछाई में, राष्ट्रीय प्रतीकों में, छायाचित्रों के रंगों में और किनारों की बनावट में. जहां तक 500 के नोटों की बात जाए तो यह और कुछ नहीं केंद्रीय बैंक की तैयारी में कमी दर्शाता है.

वेतन जमा करने की समस्या

आने वाले दिनों में बैंकों के लिए स्थितियां और कठिन होंगी, जब कर्मचरियों के खातों में वेतन जमा किया जाएगा और जब उन्हें निकाला जाएगा. एटीएम मशीनों औए बैंकों के बाहर बहुत लंबी-लंबी कतारें दिखाई दे सकती हैं.

demonetisation

ज्यादातर एटीएम में कैश नहीं हैं इसलिए वे खाली पड़े हैं.

जाहिर है कि छोटे नोट चलन में मौजूद नहीं हैं, जिसका अर्थ यही है कि कुछ राज्य सरकारों को वेतन देने में कठिनाई का सामना करना पड़ेगा. एक उदाहरण केरल सरकार का है, जिसने रिजर्व बैंक को पहले ही चिट्ठी लिखकर वेतन देने के लिए करेंसी की कमी का हवाला दिया है. स्थानीय अखबारों में छपी रिपोर्ट के अनुसार, राज्य सरकार ने वेतन और पेंशन देने के लिए रिजर्व बैंक से 1200 करोड़ रुपए के नोट मांगे हैं.

जब तक पैसे निकालने पर सीमा बनी रहेगी, लोगों के जमा करने की प्रवृत्ति उनकी मुश्किलें बढ़ाती रहेगी. फिलहाल बैंकों से पैसे निकालने की साप्ताहिक सीमा 24,000  रुपए है और एटीएम मशीनों से 2500 रुपए प्रतिदिन. यहां तक कि जन धन खातों पर भी अस्थायी रोक है और महीने में 10000 रुपए ही निकाले जा सकते हैं. इन सबका यही मतलब हो सकता है कि जो भी लोग एटीएम और बैंकों से पैसे निकालेंगे, वे बुनियादी जरूरतों के अतिरिक्त खर्च करने में हिचकेंगे. जब पैसों के संचार की गति धीमी चल रही है, यह कैश की कृत्रिम कमी भी आगे जुड़ जाएगी. कारखानों से प्रिंट होकर आ रहे पैसे भी व्यवस्था में जल्दी नहीं लौटेंगे.

समस्या बनी रहने वाली है

कहा सकता है कि बैंकों को एटीएम मशीनों को भरने और पैसे निकालने की सीमा बढ़ाने में कठिनाई होगी. अभी ही ज्यादातर बैंक अपने पैसे निकालने आ रहे उपभोक्ताओं से उपभोक्ता परिचय ले रहे हैं ताकि सुनिश्चित किया जा सके कि वही खाताधारक है और उसे वास्तव में उसे पैसे की जरूरत है. लेकिन, एक सीमा के बाद, बैंकर यही नहीं करते रह सकते हैं. जब तक सरकारी प्रेस व्यवस्था के भीतर पर्याप्त संख्या में कैश नहीं उपलब्ध करा देते, रिजर्व बैंक जनता पर से पैसे निकालने पर लगी सीमा को हटाने की स्थिति में नहीं होगी. ज्यादा निकासी प्रतिबंध, जैसे कि जनधन खाते के साथ हो रहा है, आम आदमी के लिए खतरे का सिग्नल है और उन्हें बता रहा है कि समस्या बनी रहने वाली है. उन्हें अपने पैसों के साथ सावधानी बरतने की जरूरत है.

फिलहाल तो सबसे आशावादी आकलन यही कहता है कि कैश की कमी से उत्पन्न स्थितियां मार्च तक ही सामान्य हो सकेंगी. वह भी तब जब चारों सरकारी प्रिंटिंग प्रेस पूरी क्षमता के साथ तीन शिफ्ट में काम करें. जब तक 500 के नए नोट पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं हो जाते, समस्या बनी रहेगी. 2000 के नोट औसत उपभोक्ता के काम कम ही आ पाता है क्योंकि फुटकर की उपलब्धता ही नहीं है. उम्मीद यही की जा सकती है कि रिजर्व बैंक और सरकार इन भविष्यवाणियों को गलत साबित करेगी.

(आईएएनएस इनपुट्स के साथ)

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