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नोटबंदी: आपको नोट नहीं मिला? कोई नहीं... लड्डू खाइए

दिल्ली भाजपा नोटबंदी के बाद कतार में लगे लोगों के घर लड्डू बांटेगी

Updated On: Dec 14, 2016 09:38 AM IST

Sandipan Sharma Sandipan Sharma

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नोटबंदी: आपको नोट नहीं मिला? कोई नहीं... लड्डू खाइए

भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की दिल्ली इकाई ने नोटबंदी के बाद अपने ही पैसे को निकालने के लिए कतार में लगे लोगों के घर-घर जाकर लड्डू बांटने का फैसला किया है.

हो सकता है कि ये कदम इंतजार का फल मीठा होता है वाले मुहावरे से प्रेरित हो. (यहां देखें) लेकिन भारत में इंतजार का फल सिर्फ लडडू ही नहीं होता है. जो लोग यहां कतार में लगे हैं वो आलू, विदेशी करेंसी और नॉन वेज का भी मजा रहे हैं.

कुछ दिनों पहले पश्चिमी राजस्थान में ड्राइविंग करते हुए मैंने देखा कि सुबह पांच बजे लोग स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की एक शाखा से पैसे निकालने के लिए कतार में खड़े हैं.

हमारा ड्राइवर लोकल ही था. उसने कहा, स्थिति अब सुधरी है. पहले तो सुबह चार बजे से लाइन लगती थी. इसका भी अपना मजा है. आप भी देखिए. इसलिए हमने वहां थोड़ा रुकने का मन बनाया.

कुछ ही मिनट बाद महिलाओं के लिए बनी लाइन में हंगामा हो गया. लड़ाई में एक औरत ने दूसरी के बांह पर दांत गड़ा दिए. फिर क्या था. सब एक दूसरे पर पिल पड़े. पुलिस बुलानी पड़ी. तब जाकर मामला शांत हुआ.

India Economy

नोटबंदी के बाद देश भर का कारोबार प्रभावित है. लोगों के पास नोट न होने से मांग घट गई. (फोटो: एपी)

एक रुपये किलो आलू

पिछले हफ्ते कानपुर में कारोबारियों ने एक्सप्रेस रोड के एक व्यस्त चौराहे पर सैकड़ों किलो आलू फेंक दिए.

आलू की कीमत में भारी गिरावट के कारण ऐसा किया गया. दाम एक रुपए किलो से भी नीचे आ गए. लोगों के मुताबिक नोटबंदी के बाद कोई मांग ही नहीं है.

कोल्ड स्टोरेज में भी आलू रखना महंगा सौदा है, इसलिए कारोबारियों ने इसे बांटने का फैसला कर लिया. अगर नहीं बांटते तो ये कबाड़ बन जाता. (यहां देखें)

तो यहां नोटबंदी का कम से कम कुछ फायदा दिखाई दे रहा है. कम से कम मुफ्त के आलू मिल रहे हैं.

पांच दिनों पहले घबराए हुए मेरे एक दोस्त ने मॉरिशस से फोन किया और पूछा कि वो अपने परिवार के 12 सदस्यों के साथ भारत आए या नहीं आए.

परिजनों में छह तो छोटे बच्चे थे. दोस्त ने जानना चाहा, मैंने सुना है वहां विदेशी नोट नहीं बदले जा रहे हैं. हम कैसे गुजारा करेंगे?

मैंने पता लगाने की ठानी. विदेशी नोट बदलने वाले एक एजेंट ने बताया, सॉरी, हमारे पास नोट है ही नहीं. लेकिन अगर कुछ कमीशन देंगे तो मैं व्यवस्था करवा दूंगा.

मैंने पूछा, कितना ? बदलने का रेट 71.75 रुपया है पर मैं आपको 67 ही दे पाऊंगा. ये डॉलर या यूरो को बदलने पर पांच रुपए का शुद्ध मुनाफा है. इसे काला धन भी बोल सकते हैं.

इन नोट बदलने वालों के लिए तो अच्छे दिन वाकई चल रहे हैं. फिर क्या, लड्डू मंगाया जाए.

अतुल्य भारत ! हां, जरूर, बस इंतजार कीजिए जब ये सैलानी अपने देश लौटेंगे तब कितनी अतुल्य कहानियां बतायेंगे कि कैसे उन्हें भीख मांगना पड़ा, उधारी लेनी पड़ी और गुजारा के लिए सड़क पर नाच-गाना करना पड़ा.

India Currency Notes Protest

नोटबंदी के बाद 24 नवंबर को अहमदाबाद में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के आवास पर प्रदर्शन करते कांग्रेस कार्यकर्ता. (फोटो: एपी)

मुद्दे पर लौटते हैं. नोटबंदी का बहुत बड़ा असर हुआ है. लेकिन, जहां होना था वहां नहीं.

अगर सरकार पंजाब और उत्तर प्रदेश चुनाव से पहले छक्के मारना चाहती थी तो उसे जान लेना चाहिए कि कुछ सेल्फ गोल भी हो गए हैं.

फैसला आते ही पार्टी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करिश्माई व्यक्तित्व पर पूरा दांव लगा दिया कि, वो इसे गेम चेंजर बना देंगे और तात्कालिक कठिनाई को देश के लिए बलिदान बताकर समर्थन हासिल करेंगे.

पीएम का करिश्माई व्यक्तित्व

हम फर्स्टपोस्ट के एक आलेख में पहले भी बता चुके हैं कि दर्द कोई तभी तक सहन करता है जब तक कि यह पड़ोसी से कम हो.

नोटबंदी के संदर्भ में कष्ट या पीड़ा को अंत में आने वाली खुशी की तरह देखा गया. इसे लालच भी कह सकते हैं.

कइयों ने माना कि धनकुबेरों का कालाधन खत्म हो जाएगा और राजनीति का रॉबिनहुड उन पैसों को गरीबों के बीच बांट देगा. खास कर उनके बैंक खातों में नकदी आ जाएगी.

नोटबंदी को सर्जिकल स्ट्राइक की तरह ऐसे पेश किया गया जैसे कोई लुटेरा दुश्मन के इलाके को तेजी से लूट कर आगे बढ़ते हुए दुश्मन से लूटी संपत्ति को आपस में बांटने की बात कर रहा हो.

मतलब दोनों हाथ में लड्डू का सपना. पर ऐसा होता दिखाई नहीं दे रहा है.

कई लोगों ने रिजर्व बैंक के पास अचानक बहुत ज्यादा नकदी आ जाने के कयास लगाए थे जिसे विंडफॉल गेन कहते हैं. लेकिन ऐसा होता हुआ दूर-दूर तक दिखाई नहीं दे रहा है. (यहां देखें)

कैश की कमी से अर्थव्यवस्था चरमरा रही है. मांग घट गई है. असंगठित क्षेत्र तो बंदी की कगार पर है.

पहले मोदी का समर्थन करने वालों में शामिल दीपक पारेख जैसे बैंकर और तवलीन सिंह जैसी पत्रकार भी अब नोटबंदी के नकारात्मक असर पर चिंता जता रहे हैं. (यहां देखें)

जैसा कि पूर्व वित्तमंत्री पी चिदंबरम ने कई अर्थशास्त्रियों के हवाले से कहा है कि इस फैसले से लाखों लोगों की आजीविका प्रभावित हुई है. (यहां देखें)

और अब तो शिकारी खुद शिकार बनते हुए दिखाई दे रहे हैं. राजस्थान पत्रिका में छपी खबर के मुताबिक सरकार के कराए स्टिंग ऑपरेशन से पता चलता है कि पूरे सिस्टम में किस कदर भ्रष्टाचार फैला हुआ है.

अखबार का कहना है कि गृह मंत्रालय के पास हजारों बैंक खातों में फर्जी लेन-देन की पूरी जानकारी है.

इसके अलावा 25 करोड़ जनधन खाताओं में से बहुत से खातों पर आयकर विभाग की नजर है.

ये तादाद इतनी बड़ी है कि अगर इन पर और जुड़े बैंक वालों पर हाथ डाला गया तो वे निश्चित तौर पर अगले चुनाव में लड्डू का मजा नहीं लेंगे.

इलाहाबाद में 17 नवंबर को एक बैंक के बाहर कतार में लगे लोग. (फोटो: एपी)

इलाहाबाद में 17 नवंबर को एक बैंक के बाहर कतार में लगे लोग. (फोटो: एपी)

अब जब मिठाई की बात हो रही है तो बीजेपी से जुड़ी लड्डू की एक प्रसिद्ध कहानी बताते हैं.

पिछले साल आठ अक्टूबर को बिहार विधानसभा चुनाव की मतगणना वाली सुबह बीजेपी ने लड्डू बांटना शुरू कर दिया था क्योंकि शुरुआती रुझान उनके पक्ष में था.

लेकिन कुछ घंटों के भीतर ही पार्टी की बुरी गत सामने आई और सारे लड्डू पटना के बीरचंद पटेल मार्ग पर फेंकने पड़े.

नोटबंदी पर भी बीजेपी को अपने लड्डू तब तक संभाल कर रखने चाहिए जबतक जनता अपना कैश गिन नहीं लेती.

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