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अपनी नाकामी को छिपाने के लिए ऑड-ईवन से पीछे हटी केजरीवाल सरकार

क्या महिलाओं के फेफड़े ज्यादा मजबूत होते हैं जो उन्हें ऑड-ईवन से छूट मिलती है

Updated On: Nov 12, 2017 03:33 PM IST

Chandan Srivastawa Chandan Srivastawa
लेखक सामाजिक-सांस्कृतिक विषयों के शोधकर्ता और इन्क्लूसिव मीडिया फॉर चेंज के संस्थापक सदस्य हैं

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अपनी नाकामी को छिपाने के लिए ऑड-ईवन से पीछे हटी केजरीवाल सरकार

क्या ही अच्छा हो अगर ‘सांप मर जाये और लाठी भी ना टूटे’- पुरानी दिल्ली की तरह यह ख्याल भी अब बहुत पुराना हुआ. नई दिल्ली की तरह नया ख्याल यह है कि सांप आये या ना आये हमेशा ‘सांप-सांप’ चिल्लाओ, हवा में लाठी भांजते दिखो और इतनी तेज भांजो कि लोग सांप को भूल जायें, बस लाठी का भांजना ही देखते रहें!

इस बीच सांप अपने तयशुदा वक्त पर आये और मनमानी करके गुजर जाये; और, जो सांप गुजर जाओ तो अपनी जेब में छुपाकर रखी गई केंचुली हवा में लहराकर कहो-‘देखा हमारा कमाल! हमने सांप मार गिराया और लाठी मुसल्लम बची रही’! फिर तमाशबीन लोग कहेंगे ही कि ‘ बहुत खूब! क्या खूब लाठी भांजते हैं आप!’

अगर सांप और लाठी की कहावत के बारे में ऊपर लिखी बातों से आपको ऐतराज हो या फिर ऊपर की बातें कुछ ज्यादा ही हवा-हवाई लगती हों तो एक बार दिल्ली की ‘आप’ सरकार और उसकी ‘ऑड-ईवन’ की सालाना ‘कसरत’ के बारे में जरुर सोचिएगा, आपको सांप और लाठी की कहावत के नये मायने निकालने और समझने का एक नया जरिया मिलेगा.

कार, नगर-कोतवाल और शहर का हाल

दो साल से ज्यादा का वक्त गुजार लेने और दो बार ऑड-ईवन की योजना लागू करने लेने के बाद ‘आप’ की सरकार यह तो नहीं ही कह सकती ना कि हम दिल्ली की पहरेदारी पर नये-नये लगे हैं सो हमें ना तो यहां की गलियों और सड़कों का पता है ना ही उन पर गाड़ियों से होने वाली आवाजाही की रीत का. वह यह भी नहीं कह सकती कि दिल्ली को हर साल एक खास वक्त पर अपने विशाल फन के फुफकार मार धूल-धुएं-धुंध की जहरीली जकड़ में वायु-प्रदूषण नाम का जो सांप घेर रहा है तो हमें उसकी इस फितरत का पता ही नहीं.

कोई और राजनेता चाहे तो आंख मिचमिचाकर कह सकता है कि ‘हम ‘कार’ नहीं सरकार चलाते हैं- सो डीजल-पेट्रोल, धूल-धुएं की दमघोंटू बातें हमसे ना कीजिए. ऐसी बातों से दिल्ली के लोगों के फेफड़ों को फर्क पड़ता है तो पड़े हमारा अपना सीना इतना चौड़ा है कि हम पूरे पांच साल सांस रोककर भी सरकार चला लेंगे’. लेकिन केजरीवाल चाहें भी तो उनकी सियासत का शब्दकोश ऐसी जुबान बोलने नहीं देगा.

इस शब्दकोश में तो ‘आम आदमी’ और उसका अहवाल लिखा है. याद कीजिए, किसी आम शहरी की तरह ही मुख्यमंत्री केजरीवाल को धूल-धुएं से उपजी ‘खांसी’ है और इस खांसी का मफलर समेत उनकी मीडियामुखी सियासत में खास महत्व है. मार्के की दूसरी बड़ी बात यह कि दिल्ली के मुख्यमंत्री के बारे में मशहूर है कि वे ‘कार’ और ‘सरकार’ दोनों एक से भाव से चलाते हैं.

दरअसल कार के बगैर तो केजरीवाल के अब तक के सियासी सफरनामे की कल्पना ही नहीं की जा सकती. याद कीजिए वो मशहूर ‘ब्लू वैगन आर’? इस साल गुम हो गई तो केजरीवाल ने ट्वीट किया कि दिल्ली पुलिस का आखिर ‘ध्यान किधर है’? पुलिस ने आकाश-पाताल एक करके उसे खोज निकाला. पुलिस को शायद केजरीवाल की सियासत का पता था. यह प्रतीकों की सियासत है, प्रतीक गुम जायें तो उनसे जुड़ी शख्सियत के गुमनामी में जाने का अंदेशा रहता है.

ब्लू वैगन आर के साथ केजरीवाल की छवि बड़े जतन से बनायी गई है. साल 2014 के जाड़े में दिल्ली पुलिस के खिलाफ धरने के वक्त यह कार उनकी कैबिनेट बन गई थी. पहली बार मुख्यमंत्री बने तो इसी कार में बैठे-बैठे आम शहरी से दुआ-सलाम करते हुए उनकी फोटो खिंचती थी. ऑड-ईवन के पुराने दिनों में इसी कार पर उन्होंने अपने मंत्रिमंडल के साथियों के साथ कार-पूलिंग का मुजाहरा किया था.

इससे पहले चुनावी प्रचार के दिनों में यह कार कभी ‘इंटरव्यू’ के गरज से टीवी स्टुडियो में बदलती दिखी, तो कभी पार्टी दफ्तर के रुप में. वे कार में चढ़ते और दिल्ली की किसी गुमनाम गली के आखिरी छोर के मकान तक पहुंचकर वहां बिजली का मीटर ठीक करते नजर आये. देखते-देखते यह कार वीआईपी कल्चर पर दिल्ली के आम शहरी को तरजीह देने के एक प्रतीक में बदल गई.

Arvind Kejriwal, head of AAP and Chief Minister of Delhi, walks past his car as he arrives at the NCC camp in New Delhi

उन्हें और उनकी पार्टी को दिल्ली का सबकुछ पता था- बिजली के तेज चलते मीटरों और पानी बढ़ते जा रहे बिल का पता था, प्राइवेट स्कूलों की मनमानी से लेकर सरकारी अस्पतालों की कामचोरी तक सब ही पर उनकी नजर थी. और अचरज कीजिए कि, आम आदमी पार्टी की सियासत के इसी बुनियादी दावे का गुब्बारा राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण(एनजीटी) ने अपने सवालों की सूई चुभोकर फोड़ दिया है.

एनजीटी के सवाल और गवर्नेंस का नाकामी

दिल्ली के लोगों ने तो नहीं पूछा, वे मन ही मन ‘जुगाड़’ लगा रहे थे कि कोई तरकीब सूझे जो 13 नवंबर से 17 नंवबर के बीच ऑड वाले दिन उनका दोपहिया या चरपहिया ऑड नजर आये और ईवन वाले दिनों ईवन कि तभी एनजीटी ने ऑड-ईवन नाम के सालाना कसरत को लेकर सबसे जरुरी सवाल पूछ लिए और, एनजीटी के सवाल पूछते ही जाहिर हो गया कि केजरीवाल सरकार वायु-प्रदूषण के मोर्चे पर कुछ खास कर नहीं पा रही मगर ‘बहुत कुछ करता हुआ दिखना’ जरुर चाह रही है.

एनजीटी ने बीते शुक्रवार को केजरीवाल सरकार से सवाल किए

 ‘आप किस डेटा के आधार पर सिर्फ 5 दिन के लिए ऑड-ईवन क्यों लागू कर रहे हैं? पिछली बार ऑड-ईवन लागू हुआ था तब डीपीसीसी (दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति) के अनुसार प्रदूषण कम नहीं हुआ था,

48 घंटे पीएम 10 अगर 500 होता है और पीएम 2.5 अगर 300 होगा तो क्या आप ऑड-ईवन लागू कर देंगे?,

जो 500 बसें लाई जा रही हैं उनमें कितनी डीजल की हैं?, एक डीजल गाड़ी कितनी पेट्रोल कार के बराबर प्रदूषण करती है?,

पेट्रोल और छोटी गाड़ियों का दिल्ली के प्रदूषण में कितना योगदान है?, मोटरसाइकिल कितना प्रदूषण करती हैं और आपने इन्हें क्यों छूट दी?...

ये बुनियादी सवाल थे और इन सवालों के आधार पर ही शनिवार के दिन एनजीटी ने केजरीवाल सरकार की ऑड-ईवन योजना को मंजूरी तो दी लेकिन शर्त रखी कि ना तो इस योजना से महिलाओं को छूट दी जायेगी और ना ही दो पहिया चलाने वालों को. फैसले के बाद केजरीवाल सरकार को लगा कि सचमुच बहुत तैयारी की जरुरत है वर्ना अफरा-तफरी मच जायेगी.

दरअसल केजरीवाल सरकार ने तात्कालिक तौर पर अपनी ऑड-ईवन योजना को रोकने का फैसला किया है तो इसलिए कि उसके पास एनजीटी के सवालों का ठीक-ठीक उत्तर नहीं है. थोड़े में कहें तो एनजीटी के सवालों से वायु-प्रदूषण के मोर्चे पर केजरीवाल सरकार के पिछले कामकाज की एक तरह से समीक्षा हो गई है और समीक्षा-रिपोर्ट केजरीवाल सरकार को नाकारा ठहराती है.

दिल्ली में दोपहिया और महिला

एनजीटी के सवाल और ऑड-ईवन योजना के लिए सशर्त मंजूरी से साबित हो गया है कि दिल्ली में केजरीवाल सरकार लोगों के लिए वैकल्पिक परिवहन व्यवस्था नहीं कर पायी है.

एक समाचार के मुताबिक अगर दोपहिया वाहनों को ऑड-ईवन योजना में चलने ना दिया जाए तो परिवहन-तंत्र पर रोजाना 35 लाख यात्रियों के आवागमन का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा. इस बोझ को पार लगाने के लिए इतना भर काफी नहीं कि डीटीसी की बसों में पांच दिनों के लिए सफर मुफ्त कर दी जाए.

bike pollution women

दो साल पहले सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर दिल्ली की सरकार ने महानगर में घुसने वाले व्यावसायिक वाहनों और ट्रकों पर पर्यावरण की सुरक्षा के नाम पर कॉपन्सेशन चार्ज लगाया था. उस वक्त इस कदम को नाकाफी बताते हुए आईआईटी कानपुर की रिसर्च के हवाले से एक समाचार में कहा गया कि ‘ हवा के प्रदूषण के एतबार से बात करें तो कारों की तुलना में दोपहिया वाहन पीएम 2.5 और पीएम 10 के लिए कहीं ज्यादा जिम्मेवार हैं. अगर वाहनों के जरिए होने वाले प्रदूषण में पीएम 2.5 और पीएम 10 कणों का ख्याल करें तो इसमें 46 प्रतिशत योगदान ट्रकों का है, जबकि दोपहिया वाहनों का 33 प्रतिशत. इस प्रदूषण में चारपहिया वाहनों का योगदान 10 फीसदी का है और शेष के लिए बसें, तिपहिया और हल्के व्यावसायिक वाहन जिम्मेवार हैं.’

दिल्ली सरकार के सामने संकट ये है कि वो वाहनों से जरिए होने वाले प्रदूषण को कम करता हुआ भी दिखना चाहती है और दोपहिया वाहनों को ऑड-ईवन के अपने सालाना कर्मकांड में छूट भी देना चाहती है. दोपहिया वाहनों पर ऑड-ईवन लागू करने की सूरत में यात्रियों के अतिरिक्त बोझ (35 लाख) को ढोने के लिए डीटीसी की बसें नाकाफी हैं.

डीटीसी ने कोर्ट में दाखिल एक शपथपत्र में कहा है कि उसे 11000 नई बसों की जरुरत है. डीटीसी के पास फिलहाल 3951 बसें हैं और इसमें 21 फीसद बसें अपनी उम्र गुजार चुकी हैं, सो हद से हद एक साल के भीतर उन्हें सड़क से हटाना होगा. अगर ये बसें चलती रहीं तो दिल्ली सरकार के वाहनों के लिए निर्धारित प्रदूषण के मानकों का ही उल्लंघन करेंगी.

महिलाओं को ऑड-ईवन में छूट देने की मंशा जाहिर कर बेशक ‘आप’ सरकार अपने ‘वीमन-फ्रेंडली’ होने की छवि बनाये रखना चाहती है लेकिन छूट की उसकी नीयत का खोट भी बड़ा जाहिर है. क्या ‘आप’ सरकार यह जताना चाहती है कि धूल-धुएं और धुंध को सहने के मामले में महिलाओं के फेफड़े मर्दों की तुलना में ज्यादा मजबूत होते हैं? क्या उसके पास इस सोच को साबित करने का कोई पुख्ता आधार है कि महिलाओं का अपनी स्कूटी या कार में अकेले सफर करना सुरक्षा के लिहाज से ज्यादा निरापद है बनिस्बत सार्वजनिक परिवहन सुविधा मसलन मेट्रो या बसों में सफर करने से? क्या आम आदमी पार्टी की सरकार ये सोच कर चल रही है कि दिल्ली की सारी महिलाएं अपने निजी वाहनों से ही सफर करती हैं?

जब जोश खूब हो और तजुर्बे नदारद

वायु-प्रदूषण को कम करने के उपायों को लेकर एनजीटी और दिल्ली सरकार के सवाल-जवाब से दिल्ली को ‘ग्रीन और क्लीन’(स्वच्छ और हरित) बनाये रखने की कवायदों की गरीबी का पता चलता है.

सालों से पेंच इस एक सवाल पर फंसता रहा है कि दिल्ली को गैस-चैंबर बनाने का सबसे बड़ा जिम्मेदार कौन— निर्माण-कार्यों की धूल , वाहनों का धुआं और सड़कों पर उडती धूल , उद्योग-धंधों से निकलने वाली विषैली गैस या फिर पंजाब-हरियाणा और पश्चिम यूपी के खेतों में जलती पिराली. दिल्ली सरकार के पास इनमें से किसी के भी नियमन का ना ठीक-ठीक हौसला है ना ही वैधानिक ताकत. केंद्रीय, प्रांतीय और नगरनिगम के स्तर पर दोष एक-दूसरे को देने का खेल जारी रहता है क्योंकि मसला अंतर्राज्यीय है और विकास की मौजूदा प्राथमिकताओं पर पलटकर सोचने की मांग करता है.

pollution parali burning farmer

इस खेल में ‘आप सरकार’ ने होली-दिवाली, ईद-बकरीद की ही तरह अपने लिए एक सरकारी कर्मकांड ढूंढ़ लिया है. वह वायु-प्रदूषण को कम करने के मोर्चे पर खास कुछ भी नहीं कर पा रही लेकिन उसके लिए ‘बहुत कुछ करता हुआ नजर’ आना जरुरी है. ऑड-ईवन योजना ‘बहुत कुछ करता’ नजर आने की सबसे बेहतर तरकीब है. जब आप इस योजना पर अमल करते हैं तो दिल्ली के अव्वल और अदना हर नागरिक को संदेश मिल जाता है कि भाई, सावधानी बरतो, धीरे चलो, दिल्ली को ग्रीन और क्लीन बनाने के नेक ख्याल से “सरकार काम पर” है!

इस संदेश से लोगों को लगते रहता है कि दिल्ली में आम आदमी की फिक्र करने वाली सचमुच कोई सरकार भी है और जब तक लोगों को ऐसा लगता रहे, केजरीवाल सरकार का काम चलता रहेगा. बिना हर्रे फिटकरी के अगर रंग चोखा निकले तो पहरेदार पिया को आखिर रंगीन पगड़ी बांधने से क्यों चूंके!

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