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राजनीति में अव्वल केजरीवाल सरकार के स्कूली छात्र फीसड्डी

राजधानी के सरकारी हाई स्‍कूलों के हजारों छात्र अब भी ठीक से पढ़ पाने में सक्षम नहीं हैं.

Updated On: Nov 26, 2016 11:49 AM IST

FP Staff

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राजनीति में अव्वल केजरीवाल सरकार के स्कूली छात्र फीसड्डी

दिल्‍ली के शिक्षा विभाग के तमाम प्रयासों के बावजूद राजधानी के सरकारी हाई स्‍कूलों के हजारों छात्र अब भी ठीक से पढ़ पाने में सक्षम नहीं हैं.

दिल्‍ली के शिक्षा मंत्री मनीष सिसोदिया ने सरकारी स्‍कूलों के सभी शिक्षकों से यह संकल्‍प लिया था कि वे ढाई महीने के भीतर सभी बच्‍चों को पढ़ना सिखा देंगे. इसके लिए 'एवरी चाइल्‍ड कैन रीड') नाम से एक अभियान चलाया गया था. इसकी समय-सीमा 14 नवंबर को पूरी हो चुकी है. अफसोस है कि अब तक इस मामले में हालात पहले जैसे ही बने हुए हैं.

इस साल शिक्षक दिवस पर मनीष सिसोदिया ने सरकारी स्‍कूलों के शिक्षकों को संकल्‍प दिलवाया था कि वे बाल दिवस तक सभी बच्‍चों को पढ़ना सिखा देंगे.

सभी छात्रों को पढ़ना सिखाने के लक्ष्‍य के पीछे जो उद्देश्‍य था, उसका आधार शिक्षा विभाग द्वारा किया गया एक अध्‍ययन था जिसमें पाया गया था कि दिल्‍ली के सरकारी स्‍कूलों के 74 फीसदी छात्रों को पढ़ना नहीं आता. यह बात नौवीं और दसवीं कक्षा के बच्‍चों पर भी लागू होती थी.

सारे शिक्षक हालांकि 'एवरी चाइल्‍ड कैन रीड' नामक अभियान से खुश नहीं थे. वे इसे एक सनक का नाम देते हैं.

नाम न छापने की शर्त पर एक शिक्षिका कहती हैं, 'सभी छात्रों को, खासकर उन्‍हें जो छठवें दरजे तक पढ़ना नहीं सीख पाए, केवल ढाई महीने के भीतर पढ़ना सिखा पाना नामुमकिन है.'

उनके मुताबिक यह मानकर चला जाता है कि छठवें दरजे तक एक छात्र पढ़ने और लिखने का बुनियादी कौशल अर्जित कर लेगा, लेकिन एमसीडी के स्‍कूलों में प्राथमिक स्‍कूलिंग करने वाले कई बच्‍चों को तो अक्षरों की पहचान तक नहीं है.

हर साल आधे से अधिक छात्र फेल

दिल्‍ली सरकार द्वारा किए गए एक अध्‍ययन के मुताबिक सरकारी स्‍कूलों से बोर्ड की परीक्षाओं में बैठने वाले करीब आधे बच्‍चे हर साल इसके चलते फेल हो जाते हैं.

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इस साल जून में शिक्षा विभाग दिल्‍ली की शिक्षा प्रणाली से इस बीमारी को दूर करने के लिए चुनौती 2018 नाम की एक नई योजना लेकर आया था, जिसमें पिछड़ने वाले बच्‍चों को अलग से कक्षाओं की सुविधा दिए जाने का प्रावधान था. यह योजना 2018 तक बोर्ड परीक्षाओं में पास होने की दर में इजाफे और इस तरह ड्रॉपआउट की दर में कमी के लिहाज से लागू की गई थी.

एक शिक्षक कहते हैं, 'इसी योजना के प्रभाव को बढ़ाने के उद्देश्‍य से शिक्षा मंत्री ने शिक्षकों से अपील की थी कि वे 14 नवंबर तक सभी बच्‍चों को पढ़ना सिखाने का संकल्‍प लें.'

दिल्‍ली के द्वारका सेक्‍टर 2 स्थित सरकारी को-एड सीनियर सेकंडरी स्‍कूल के प्रिंसिपल शशि कांत सिंह बताते हैं कि उनका स्‍कूल छात्रों को पढ़ना सिखाने में 82 फीसदी से ज्‍यादा की कामयाबी हासिल कर चुका है.

वे कहते हैं, 'कुल 148 बच्‍चों को अलग कक्षाओं के लिए छांटा गया था. अभियान के बाद उनमें से 124 बच्‍चे अब पूरा का पूरा पैराग्राफ पढ़ना सीख गए हैं.'

दिल्‍ली सरकार के शिक्षा विभाग के सूत्र हालांकि बताते हैं कि यह आंकड़ा सभी सरकारी स्‍कूलों के मामले में समान नहीं है. तमाम ऐसे स्‍कूल हैं जहां अभियान शुरू होने के बाद आयोजित टेस्‍ट में छात्रों का प्रदर्शन बहुत खराब रहा है.

शिक्षकों के 26031 पद खाली

सूत्र के मुताबिक पढ़ने की परीक्षा में सरकारी स्‍कूलों के केवल 39.43 फीसदी छात्र पास हो सके हैं. दिल्‍ली में ऐसे 900 से ज्‍यादा स्‍कूल हैं. इसलिए बहुप्रचारित अभियान के बावजूद न पढ़ पाने वाले छात्रों की संख्‍या अब भी हजारों में हो सकती है.

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अभियान की निगरानी करने वाली शिक्षा विभाग की अतिरिक्‍त निदेशक डॉ. सुनीता कौशिक से फर्स्‍टपोस्‍ट ने संपर्क करने की कोशिश की लेकिन उनके दफ्तर से जवाब आया कि वे छुट्टियों पर बाहर गई हुई हैं.

दिल्‍ली में सरकारी स्‍कूलों के लिए लंबे समय से संघर्ष कर रहे चर्चित एक्टिविस्‍ट अशोक अग्रवाल ने फर्स्‍टपोस्‍ट को बताया कि सरकार स्‍कूल अधिरचना की कमी के चलते पिछड़ रहे हैं.

उन्‍होंने कहा कि दिल्‍ली के सरकारी और एमसीडी स्‍कूलों में फिलहाल 26031 से ज्‍यादा पद खाली पड़े हैं.

अपीली पक्ष के पैरोकार अग्रवाल कहते हैं, 'दिल्‍ली उच्‍च न्‍यायालय ने आज ही सोशल जूरिस्‍ट द्वारा दायर उस अवमानना याचिका के जवाब में दिल्‍ली सरकार को अपना हलफनामा दाखिल करने के लिए चार हफ्ते का वक्‍त दिया है, जिसमें पिछले कुछ वर्षों के दौरान शिक्षकों की नियुक्ति न किए जाने को रेखांकित किया गया था.'

उन्‍होंने यह भी बताया कि करीब दस फीसदी शिक्षक हमेशा छुट्टी पर रहते हैं. उन्‍हें सेवा नियमों के तहत यह लाभ मिलता है.

उन्‍होंने यह भी बताया कि कई सरकारी और एमसीडी स्‍कूल ऐसे हैं जिनके पास सभी छात्रों को शिक्षा देने के लिए पर्याप्‍त जगह तक मौजूद नहीं है.

उन्‍होंने कहा, 'जैसा शैक्षणिक ढांचा मौजूद है, उसके मद्देनज़र इतनी कम अवधि में शिक्षकों के लिए बच्‍चों को पढ़ना सिखाने का लक्ष्‍य तय किया जाना अवास्‍तविक है.'

कुछ शिक्षक कहते हैं कि चुनौती 2018 भले ही पास की दर बढ़ाने और ड्रॉपआउट की दर घटाने की एक महत्‍वाकांक्षी योजना है, लेकिन केवल ढाई महीने के भीतर सभी छात्रों को पढ़ना सिखाने का फैसला अनावश्‍यक था.

एक शिक्षक कहते हैं, 'चुनौती 2018 का लक्ष्‍य हासिल करने के लिए हमें उसके समर्थन में पर्याप्‍त शैक्षणिक ढांचे की दरकार है, सनक की नहीं.'

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