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राजौरी गार्डन का फैसला: दिल्लीवालों के दिल से उतर रही है आम आदमी पार्टी

राजौरी गार्डन के नतीजे इस बात का सबूत हैं कि राजनीति का अरविंद केजरीवाल एपिसोड अब खत्म हो गया है.

Updated On: Apr 13, 2017 04:29 PM IST

Sandipan Sharma Sandipan Sharma

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राजौरी गार्डन का फैसला: दिल्लीवालों के दिल से उतर रही है आम आदमी पार्टी

आम आदमी पार्टी बड़ी तेजी से सियासी बियाबान की तरफ बढ़ रही है. दिल्ली विधानसभा की राजौरी गार्डन सीट के उप चुनाव इस बात का पक्का संकेत हैं. आम आदमी पार्टी का जो हश्र पंजाब के चुनाव में हुआ वो पार्टी के लिए बड़ी चेतावनी थी.

अब राजौरी गार्डन सीट के नतीजे ने इस बात पर मुहर लगा दी है कि राजनीति का अरविंद केजरीवाल एपिसोड अब खत्म हो गया है.

इस सीट पर केजरीवाल की पार्टी के उम्मीदवार की जमानत तक जब्त हो गई. आम आदमी पार्टी के नेता और दिल्ली के उप-मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने राजौरी गार्डन सीट पर अपनी हार मान ली है.

राजौरी गार्डन सीट के नतीजों से एक बात और साफ है. कांग्रेस, दिल्ली की राजनीति में वापसी कर रही है. इस सीट पर कांग्रेस को चालीस फीसदी के करीब वोट मिले. वहीं बीजेपी को 48 प्रतिशत मतदाताओं ने समर्थन दिया.

आज के नतीजों की 2015 के विधानसभा चुनाव के नतीजों से तुलना करें तो, दो साल पहले आम आदमी पार्टी ने ये सीट दस हजार से ज्यादा वोटों के अंतर से जीती थी.

पार्टी को 46 फीसद से ज्यादा वोट मिले थे. जबकि उस वक्त कांग्रेस उम्मीदवार 12 प्रतिशत वोटों के साथ तीसरे नंबर पर रहा था. पर दो साल में हालात पूरी तरह बदल गए हैं.

NEW DELHI, INDIA - MARCH 30: Delhi Chief Minister Arvind Kejriwal (L) and Deputy Chief Minister Manish Sisodia (R) during the Raising Day of Delhi Fire Service at Fire Service Management Academy, Rohini on March 30, 2015 in New Delhi, India. (Photo by Subrata Biswas/Hindustan Times via Getty Images)

उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने मीडिया के सामने आकर अपनी पार्टी की हाल स्वीकार की

लोगों का समर्थन गायब

अरविंद केजरीवाल को हार से ज्यादा इस बात की फिक्र करनी चाहिए कि आखिर उनकी पार्टी को दो साल पहले मिला भारी समर्थन कहां गायब हो गया.

2015 में आम आदमी पार्टी को भारी जीत इसीलिए मिली थी क्योंकि कांग्रेस का सारा वोट आम आदमी पार्टी के खाते में चला गया था. अब वोटर कांग्रेस की तरफ वापस जा रहे हैं.

अगर राजौरी गार्डन सीट के नतीजों को संकेत माना जाए तो दिल्ली नगर निगम के चुनाव में केजरीवाल की पार्टी बुरी तरह हारने वाली है.

अगर ऐसा होता है, तो केजरीवाल की सरकार की हालत बेहद कमजोर हो जाएगी. वो कुछ और काम करने के बजाय सिर्फ अपना वक्त काटने का काम कर पाएगी और अगले चुनाव में उसका सफाया हो जाएगा.

इस उप चुनाव में मिली हार केजरीवाल के लिए बड़ा झटका इसलिए भी है क्योंकि...दिल्ली में आम आदमी पार्टी और हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस ही दो ऐसी पार्टियां हैं जो सत्ता में हैं पर उप चुनाव में हार गईं. जबकि आम तौर पर उप चुनावों में सत्ताधारी पार्टी जीतती रही है.

लोग सत्ताधारी पार्टी को इसीलिए वोट देते हैं ताकि वो सरकार का फायदा उठा सकें. पर वोटर इसके उलट फैसला करते हैं तो साफ है कि जनता का सरकार पर से भरोसा उठ गया है.

आम आदमी पार्टी ने राजौरी गार्डन सीट पर 35 फीसद से ज्यादा वोट गंवाए हैं. साफ है कि केजरीवाल सरकार से जनता का भरोसा पूरी तरह उठ चुका है.

आम आदमी पार्टी की ऐसी हालत की वजहें साफ हैं. 2015 में दिल्ली का चुनाव जीतकर केजरीवाल दिल्ली की कीमत पर राष्ट्रीय राजनीति करने की कोशिश में जुट गए.

अपनी जिम्मेदारी ठीक तरीके से निभाने और अपना किला मजबूत करने के बजाय केजरीवाल दूसरे राज्यों में अपनी पार्टी का दायरा बढ़ाने की कोशिश करने लगे.

वो ऐसे योद्धा बन गए जो अपना गढ़ सुरक्षित किए बगैर दूसरे मोर्चे जीतने की कोशिश करने लगा. इधर उनका अपना किला भी ढहने लगा.

महत्वाकांक्षा किसी काबिल इंसान के हाथ में ताकतवर हथियार होती है. मगर यही हथियार नाकाबिल के हाथ लग जाए तो उसके लिए घातक साबित होता है.

अपनी काबिलियत का सही आकलन नहीं कर पाने की वजह से नाकाबिल लोग ऐसी छलांग लगा लेते हैं कि उन्हें चोट लगनी तय होती है.

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लोगों को शिकायत थी कि केजरीवाल दिल्ली छोड़ दूसरे राज्यों पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं

केजरीवाल की महत्वकांक्षा

कुछ महीने पहले तक लग रहा था कि केजरीवाल को पंजाब में जीत मिलेगी और गोवा में भी उनकी पार्टी अच्छा प्रदर्शन करेगी. उनके समर्थक ख्वाब देख रहे थे कि उनकी पार्टी हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, गुजरात और राजस्थान में भी धाक जमाएगी.

लेकिन अब ये ख्वाब भी इतिहास बन गए हैं. 2013 में हुई आम आदमी क्रांति की मशाल की लौ कमजोर हो चुकी है.

केजरीवाल तो शायद फिर भी वापसी कर लें. मगर आज की तारीख में वापसी की चुनौती भी बहुत बड़ी लग रही है. दिल्ली में भी उन्हें वापसी के लिए कड़ी मेहनत करनी होगी.

पहले जहां केजरीवाल को ईमानदार लोगों का नेता माना जाता था. उनकी टीम को लेकर ये राय थी कि वो लोग साफ-सुथरी छवि वाले हैं. ईमानदारी से काम करते हैं. लेकिन केजरीवाल ने धीरे-धीरे अपनी पार्टी को अपनी चापलूसी करने वालों का झुंड बना डाला.

किसी शख्सियत की बुनियाद पर बने सियासी दलों का यही हाल होता है. जब नेता की कलई खुलने लगती है तो पार्टी कमजोर होने लगती है.

जब ऐसा होता है तो तानाशाही करने वाले नेता सिर्फ बेचारगी में खुद को खत्म होते देखते रह जाते हैं. वजह ये होती है कि वो लोगों को एक बेहतर विकल्प देने की हालत में नहीं होते.

आज आम आदमी पार्टी का वही हाल होता दिख रहा है.

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